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स्तम्भ

अद्धयात्म स्तम्भ

बोध आसान नहीं। शोध आसान है। शोध के लिए प्रमाण, अनुमान, पूर्ववर्ती विद्वानों द्वारा सिद्ध कथन और प्रयोग पर्याप्त हैं। बोध के लिए अनुभूति चाहिए। प्रत्यक्ष रूप प्रमाण ...
Comments Off on राष्ट्रीय अस्मिता का सामूहिक सत्य है ‘भारत बोध’
अद्धयात्म स्तम्भ

हम सब कर्मशील प्राणी हैं। कर्म की प्रेरणा है कर्मफल प्राप्ति की इच्छा। कर्मफल प्राप्ति की अभिलाषा के कारण ही सभी प्राणी सक्रिय हैं। मानव जीवन अनंत अभिलाषा ...
Comments Off on क्या कर्मफल की इच्छा दोषपूर्ण अभिलाषा है, अनासक्त कर्म ही क्यों श्रेष्ठ है?
साहित्य स्तम्भ

हम सभी स्वतंत्र भारत के परतंत्र नागरिक हैं…यह वाक्य पढ़ने में बिल्कुल गलत लगा न? कड़वा तो ऐसा है जैसे कच्ची निबौरी हो। लगेगा भी क्यों नहीं, कहते हैं ...
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अद्धयात्म आशुतोष राणा फीचर्ड साहित्य स्तम्भ

स्तम्भ: कैकेयी के स्वर ने राम में अपार ऊर्जा का संचार किया। एक हल्के से विराम के बाद राम ने कहा- माँ मुझे ज्ञात हुआ की मेरे राज्याभिषेक की ...
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आशुतोष राणा फीचर्ड साहित्य स्तम्भ

स्तम्भ:  मंथरा के जाने के बाद कैकेयी मंथरा के विचारों का सूक्ष्म अवलोकन करने लगीं, मनुष्य स्वभाव से ही महत्वाकांक्षी होता है, वह सदैव अपनी प्रभुता को लेकर ...
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अद्धयात्म आशुतोष राणा दस्तक-विशेष फीचर्ड साहित्य स्तम्भ

स्तम्भ: अयोध्या पीछे छूट चुकी थी, जनशून्य क्षेत्र आरम्भ हो चुका था। कैकेयी इस सत्य को जानती थीं कि जब कोई राज्य, राजा विहीन होता है तो असामाजिक ...
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अद्धयात्म आशुतोष राणा दस्तक-विशेष फीचर्ड साहित्य स्तम्भ

स्तम्भ: वे अपने महल के विशाल कक्ष में बेचैनी से चहल क़दमी कर रहे थे, मृत्यु के मुख पर खड़े होने के बाद भी जो अपनी बाँसुरी से ...
Comments Off on वासुदेव_कृष्ण : आशुतोष राणा की कलम से.. {भाग_१}
अद्धयात्म आशुतोष राणा दस्तक-विशेष साहित्य स्तम्भ

स्तम्भ : कंस ने लगभग डाँटते हुए कहा- मुझे बहलाओ मत कृष्ण। मैं गोकुल की गोपी नहीं हूँ, जो तुम्हारे बोले गए प्रत्येक शब्द को सत्य मान लूँ। ...
Comments Off on वासुदेव_कृष्ण : आशुतोष राणा की कलम से..{भाग_२]
अद्धयात्म आशुतोष राणा दस्तक-विशेष साहित्य स्तम्भ

स्तम्भ : कृष्ण अपने हृदय की आत्मीयता को कंस पर उड़ेलते हुए बोले- मुक्त होने के लिए रिक्त होना पड़ता है मामा। कृष्ण एक ऐसा रिक्त पात्र है ...
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अद्धयात्म आशुतोष राणा दस्तक-विशेष साहित्य स्तम्भ

स्तम्भ : कृष्ण, मेरी माँ पवनरेखा अनिंद्य सुंदरी थी, अपने पति उग्रसेन के प्रति पूर्णतः समर्पित। किंतु किसी भी स्त्री के लिए सम्बंध से अधिक महत्वपूर्ण सम्मान होता ...
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