उत्तर प्रदेश से राहुल गांधी की ‘विदाई’ और प्रियंका की ‘इंट्री’ कांग्रेस के लिए शुभ

लखनऊ (अजय कुमार) : कांग्रेस महासचिव और उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका वाड्रा यूपी में काफी ‘मेहनत’ कर रही हैं। यह मेहनत प्रियंका की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। उत्तर प्रदेश में आज की तारीख में प्रियंका वाड्रा अकेली ऐसी नेता हैं जो ‘ड्राइंग रूम’ से निकल कर सड़क पर संघर्ष करते नजर आ रही हैं। वर्ना पिछले 30-32 वर्षों से कांग्रेसी सड़क पर संघर्ष करते दिखते ही कहां थे। चाटुकारिता के बल पर लोग पार्टी में बड़े-बड़े पदों पर आसानी हो जाया करते थे, जिन्होंने पार्टी का बेड़ा गर्क करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उत्तर प्रदेश से राहुल गांधी की ‘विदाई’ और प्रियंका की ‘इंट्री’ कांग्रेस के लिए शुभ मानी जा रही है। पार्टी का बदला मिजाज देखकर कांग्रेसी विचारधारा के वह लोग काफी खुश नजर आ रहे हैं, जो वर्षों से यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि एक ना एक दिन प्रदेश में कांग्रेस पुरानी पहचान हासिल कर लेगी।

प्रियंका जिस तरह से मिशन उत्तर प्रदेश को पूरा करने के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रही है, उसको देखते हुए इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि कांग्रेस 2022 में प्रियंका को उत्तर प्रदेश के भावी मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट कर दे। कांग्रेस के भीतर से भी इस तरह की आवाजें उठने लगी हैं। चर्चा तो यह भी है कि प्रियंका वाड्रा की एसपीजी सुरक्षा हटाए जाने और सरकारी बंगाल खाली किए जाने की नोटिस मिलने के बाद प्रियंका दिल्ली वाला बंगाला खाली करके लखनऊ में स्थायी रूप से ‘डेरा’ डाल सकती हैं ताकि मनोवैज्ञानिक रूप से कांगे्रसियों का मनोबल बढ़ाया जाए सके। प्रियंका पूर्व कांगे्रसी नेता दिवंगत शीला कौल वाले बंगले में शिफ्ट हो सकती हैं।

खैर, बात प्रियंका द्वारा उत्तर प्रदेश में बिछाई गई चुनावी बिसात की कि जाए तो प्रियंका ने 2022 के विधान सभा चुनाव की तैयारी बीते वर्ष लोकसभा चुनाव के समय से शुरू कर दी थी और आज की तारीख में वह काफी आगे बढ़ चुकी हैं। जहां सपा-बसपा अभी 2022 विधान सभा चुनाव के बारे में सोच भी नहीं रहे हैं, वहीं प्रियंका सधे हुए कदमों से 2022 के लक्ष्य की ओर आगे बढ़ रही हैं। 2022 का लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रियंका ने पुराने चेहरों को साइड लाइन करके अपनी पसंद की टीम तैयार कर ली है। प्रदेश से लेकर जिला और नगर इकाइयों तक पर उनकी नजर है।

कोरोना काल मेें प्रियंका जिस तरह की सियासत कर रही हैं उसकी ‘टाइमिंग’ पर सवाल उठाये जा सकते हैं, लेकिन प्रियंका के जज्बे को तो ‘सलाम’ करना ही पड़ेगा, जो कोराना से निपटने के लिए जद्दो-जहद कर रही योगी सरकार को लगतार आईना दिखाने का काम कर रही है। बिना इन आरोपों की चिंता किए कि कोरोना काल में भी गांधी परिवार घटिया सियासत कर रहा है। जब कोरोना के चलते देश लाॅकडाउन था। जनता सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रही थी। चेहरे पर मास्क और सैनिटाइजर्स के जरिए लोग कोरोना संक्रमण से जान बचने की कोशिश कर रहे थे।

देश में लगातार कोरोना पाॅजिटिव की संख्या बढ़ती जा रही थी। तब प्रियंका हर उस मुद्दे को हवा दे रही हैं, जो योगी सरकार की पेशानी पर बल डाल सकता था। प्रियंका आगे-आगे तो उनकी पार्टी के ‘दूसरी-तीसरी लाइन’ के युवा नेता कंधे से कंधा मिलाकर पीछे-पीछे चलते नजर आते हैं। प्रियंका के साथ संघर्षरत् नेताओं में कोई पुराना चेहरा नजर नहीं आता है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय ‘लल्लू’ और उनके ही जैसे अन्य गुमनाम या कम जाने-पहचान वाले संघर्षशील युवा नेताओं के सहारे प्रियंका, योगी सरकार के खिलाफ कई ऐसे मुद्दे उछाल चुकी है जिसको लेकर योगी सरकार को बार-बार ‘सफाई‘ तक देना पड़ा तो प्रियंका पर कोरोना काल में घटिया राजनीति करने का आरोप भी लगा।

वैसे घटिया राजनीति करने का आरोप गांधी परिवार पर कोई नया और पहली बार नहीं लगा है। नागरिकता संशोधन एक्ट (सीएए) के समय भी जब प्रियंका ने सीएए का विरोध कर रहे लोगों के पक्ष में योगी सरकार की हठधर्मी-उत्पीड़न के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था, तब भी उन पर देश विरोधी ताकतों के साथ खड़े होने का अरोप लगा था,लेकिन इसकी चिंता किए बिना प्रियंका उन लोगों के घर गईं जो सीएए का विरोध करते समय पुलिस की लाठियों का शिकार हुए थे। इस पर योगी सरकार की त्योरियां ठीक वैसे ही चढ़ गईं थीं,जैसी आज कोरोना काल में प्रियंका पर चढ़ी हुई हैं।
प्रियंका की यूपी में ‘संघर्षगाथा’ की बात की जाए तो चाहें कोरोनाकाल में कांगे्रस नेत्री द्वारा राजस्थान से उत्तर प्रदेश लाने के लिए प्रवासी मजदूरों के लिए बस की पेशकश की बात हो या फिर गत वर्ष जुलाई के ही महीने में सोनभद्र में हुआ दस लोगों का नरसंहार अथवा बीते दिसंबर माह में नागरिकता संशोधन एक्ट के विरोध में धरना-प्रदर्शन करने वालों के पक्ष में खड़े होकर योगी सरकार को मुस्लिम विरोधी करार देना।

हर बार प्रियंका के तेवर तीखे दिखे कि सोनभद्र नरसंहार के समय पुलिस उन्हें हिरासत में लेने को मजबूर हो गई थी तो बस की सियासत में योगी सरकार उनके प्रदेश कांगे्रस अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू को जेल की सलाखों के पीछे भेजने को मजबूर हो गई,जिसको प्रियंका ने सियासी मुद्दा बना दिया। यह कहने में कोई अतिशियोक्ति नहीं होगी की लोकसभा चुनाव के बाद प्रियंका ने जमीनी सियासत में सपा-बसपा को काफी पीछे छोड़ दिया है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि कांग्रेस नेत्री की नजर योगी सरकार के साथ-साथ बसपा के दलित वोट बैंक पर भी लगी हुई है, जो कभी कांगे्रस का मजबूत आधार हुआ करता था।

प्रियंका बार-बार माया को ‘भाजपा का अघोषित प्रवक्ता’ बताती रहती है, यह और बात है कि ऐसा कहते समय उन्हें इस बात का ध्यान नहीं रहता है कि केन्द्र की मनमोहन सरकार ने अगर अपना दस साल का कार्यकाल पूरा किया तो उसका काफी श्रेय माायवती को जाता है। बसपा के समर्थन के बिना मनमोहन सरकार घुटनों के बल नजर आने लगती थी।

लब्बोलुआब यह है कि प्रियंका वाड्रा की पूरी सियासी कसरत 2022 के उ.प्र. विधानसभा चुनावों को लेकर हो रही है। बीते वर्ष जब लोकसभा चुनाव की जिम्मेदारी प्रियंका को सौंपी गई थी, तब ही राहुल गांधी ने कह दिया था कि प्रियंका 2022 के लिए यूपी में कांग्रेस की जमीन तैयारी करेगी। और तब से प्रियंका ऐसा कर भी रही है। प्रियंका ने जिस तरह से उत्तर प्रदेश में हलचल बढ़ा रखी है। उससे सपा-बसपा का अशांत होना स्वााभाविक है, लेकिन राजनीति के जानकारों को लगता है कि प्रियंका उत्तर प्रदेश में कांगे्रस को उस स्थिति में पहुंचा देना चाहती है, जहां बैठकर वह अन्य दलों के साथ टिकटों की सौदेबाजी कर सके।

बीते लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को जिस तरह से सपा-बसपा ने ‘दूध की मक्खी’ कि तरह निकल कर फेेंक दिया था। प्रियंका नहीं चाहती है कि वह ‘इतिहास’ 2022 के विधानसभा चुनाव में पुनः दोहराया जाए। गौरतलब हो, 2019 के लोकसभा चुनाव के समय मायावती की जिद्द के चलते कांगे्रस का सपा-बसपा के साथ गठबंधन का सपना चकनाचूर हो गया था, जिसका आज तक प्रियंका को मलाल है। इसी लिए प्रियंका मायावती पर तो हमलावर रहती हैं, लेकिन अखिलेश यादव को लेकर वह ज्यादा मुखर नहीं होती हैं। मायावती की जिद्द के चलते अकेले मैदान में कूदी कांग्रेस ठीक से लोकसभा चुनाव की तैयारी भी नहीं कर पाई थी, इसी के चलते प्रियंका के नेतृत्व में कांग्रेस को इतिहास की सबसे शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा था। यूपी में कांगे्रस एक सीट पर सिमट गई थी अमेठी में राहुल गांधी तक अपनी सीट नहीं बचा पाए थे, यह सब तब हुआ था जबकि सपा-बसपा गठबंधन का सहयोगी नहीं बनने के बाद प्रियंका ने मेहनत में कोई ‘कोरकसर’ नही छोड़ी थी। चुनाव के दौरान भी प्रियंका समाजवादी पार्टी के प्रति साफ्ट कार्नर लेकर चली थी।


इसके उलट प्रियंका ने बसपा प्रत्याशियों के साथ कोई हमदर्दी नहीं दिखाई थी। यह सिलसिला आज भी जारी है। प्रियंका बसपा सुप्रीमों को चिढ़ाने के लिए कभी-भीम आर्मी के करीब जाकर तो कभी बसपा को भाजपा के साथ खड़ा करके हमलावर रहती है। इसी प्रकार दलितों को कांग्रेस के पक्ष में लुभाने के लिए भी प्रियंका समय-समय पर हथकंडे अपनाती रहती है। दलित उत्पीड़न से जुड़ी प्रत्येक घटना को प्रियंका खूब ‘हवा-पानी‘ देती है,लेकिन वह तब दलितों के पक्ष में कुछ नहीं बोलती हैं जब दलितों पर मुस्लिम अत्याचार करते हैं। जौनपुर में दलितों के साथ मारपीट के बाद घर जलाने का मामला और आजमगढ़ में दलित बालिकाओं के साथ मुस्लिम समाज के कुछ लड़कों द्वारा छेड़छाड और उनके साथ अभद्रता किए जाने की घटना के बारे में प्रियंका ने आज तक अपना अपना मुंह नहीं खोला है। उन्हें लगता है कि अगर उक्त घटनाओं में वह दलितों का पक्ष लेंगे तो मुसलमान वोटर उससे नाराज हो जाएंगे। हां, योगी सरकार ने जरूर दोनों घटनाओं में आरोपतियों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत कार्रवाई करने में देरी नहीं की। बसपा सुप्रीमो मायावती ने जब योगी सरकार के कदम की सराहना की तो प्रियंका ने झट से उन्हें भाजपा का अघोषित प्रवक्ता बता दिया।
बात कांग्रेस-समाजवादी पार्टी के रिश्तो की कि जाए तो कांगे्रस महासचिव प्रियंका वाड्रा,जहां सपा प्रमुख अखिलेश यादव के खिलाफ मुखर नहीं है तो अखिलेश भी प्रियंका को लेकर मायावती की तरह कभी एग्रेसिव नही होते है। इसलिए अटकलें इस बात की भी लग रही है कि ‘बुआ‘ से दूरियां बढ़ने के बाद अखिलेश 2017 की तरह एक बार फिर कांग्रेस के साथ विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए समझौता कर सकते हैं। भले ही 2017 में कांग्रेस गठबंधन के नतीजे अच्छे नहीं आए थे। अखिलेश को लगता है कि चार-पांच वर्षो में समय काफी बदल गया है। परिपक्तता के मामले में प्रियंका अपने भाई राहुल गांधी से काफी आगे हैं और दोनों को ही भाजपा और मोदी-योगी से निपटने के लिए एक-दूसरे की जरूरत है।

वैसे राजनीति जानकार यह भी संभावना व्यक्त कर रहे है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में ‘यूपी को यह साथ पसंद है का हश्र देखने को बाद अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी, कांग्रेस से गठबंधन लिए फूंक—फूंक कर कदम रखेगी। क्योंकि कांग्रेस की दामन पर बाबरी मस्जिद गिराने का दाग लगा हुआ है। इस वजह से मुसलमानों का एक बड़ा धड़ा आज भी कांगे्रस को गुनाहगार मानता है। भले ही अब यह मामला पूरी तरह से सुलक्ष चुका है। 2017 विधान सभा चुनाव के समय जब कांग्रेस-सपा के बीच गठबंधन हुआ था तब भी बसपा और भाजपा ने समाजवादी पार्टी को घेरा था कि क्यों उसने बाबरी मस्जिद तोड़ने वालों से हाथ मिला लिया। मुलायम ने तो कांग्रेस पर लगे इसी एक आरोप को ‘हथियार’ बनाकर कांगे्रस को ताउम्र प्रदेश की सिायसत में हासिए पर डाले रखा और स्वयं मुलसमानों के मसीहा बने रहे।

एक पार्टी की दो तस्वीरें-एक सुनहरी दूसरी धुंधली

उत्तर प्रदेश कांगे्रस के बारे में जब भी चर्चा होती है तो उसकी दो तस्वीरें उभर कर सामने आती हैं। एक वह कांग्रेस जिसने करीब 42 वर्ष तक प्रदेश पर राज किया था और उसके 11 नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हुए। आजादी मिलने के बाद 15 अगस्त 1947 को कांगे्रस नेता गोविंद वल्लभ पंत प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने थे और दिसंबर 1989 को इस्तीफा देने वाले नारायण दत्त तिवारी अंतिम कांग्रेसी मुख्यमंत्री साबित हुए। यह कांगे्रस का स्वर्णिम काल था।

इस दौरान पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू,इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक का केन्द्र की राजनीति में दबदबा कायम था। यह दबदबा कम हुआ तो केन्द्र ही नहीं उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस के पतन का दौर शुरू हो गया। पतन का यह दौर ऐसा चाल कि कांगे्रस अर्श से फर्श पर आ गई। मई 1991 में राजीव गांधी की मौत के बाद कांगे्रस के उबरने की अंतिम उम्मीद भी खत्म हो गई। कांगे्रस सत्ता से ही नहीं दूर हुई विपक्ष के रूप में भी उसका नाम लेने वाला कोई नहीं बचा। जो कांग्रेस कहा करती थी कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है, जिसके दिग्गज नेताओं पंडित जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, संजय गांधी, सोनिया गांधी,राहुल गांधी आदि ने यूपी से लोकसभा चुनाव जीत कर दिल्ली में कांग्रेस को मजबूत किया, आज वही कांग्रेस यूपी में अपना वजूद तलाश रही है। कांगे्रस के वोट बैंक में भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने सेंधमारी कर ली। भाजपा ब्राहमण-बनियों का वोट ले उड़ी तो समाजवादी पार्टी ने पिछड़ा और बसपा ने कांगे्रस के दलित वोट बैंक को हथिया लिया। कांगे्रस परिवार रायबरेली और अमेठी तक ही सिमट कर रह गया।


उत्तर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के कमजोर होने का हश्र यह हुआ कि कांगे्रस दिल्ली की सत्ता से भी बाहर हो गई। मगर सियासत में कोई भी जंग आखिरी नहीं होती है। इसी लिए कांगे्रस महासचिव एक बार फिर यूपी कांग्रेस को उसकी खोई हुई पहचान देने के लिए प्रयासरत् हैं। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2022 की तैयारी में जुटी कांग्रेस की यूपी प्रभारी प्रियंका वाड्रा जल्द से जल्द जमीन स्तर तक संगठन को दुरुस्त कर लेना चाहती है। यही वजह है कि कुछ समय पहले ही जिन जिला और शहर अध्यक्षों को संगठन की कमान सौंपी गई थी, उनमें से कई को पैदल करने की तैयारी कर ली गई है। प्रियंका उनके काम से खुश नहीं है। इसी तरह प्रदेश कार्यकारिणी में भी कुछ फेरबदल की संभावना जताई जा रही है।

कांग्रेस को करीब से जानने वाले कहते हैं कि कोरोना महामारी और उससे पूर्व तमाम मौकों पर प्रियंका की अगुवाई में प्रदेश कांग्रेस ने अपने दायित्वों का निर्वाहन करते हुए जनहित में तमाम अभियान चलाये थे। इन अभियानों में कौन कांग्रेसी नेता और जिला-शहर संगठन कितनी भागेदारी निभा रहे थे, इस पर प्रियंका की पूरी नजर थी। कुछ जिला और शहर अध्यक्षों की रिपोर्ट नेगेटिव आई। इसी रिपोर्ट के आधार पर कुछ पुराने अध्यक्षों को बदलकर नए जिला-शहर अध्यक्षों की तैनाती की जा रही है। नाम लगभग तय हो चुके हैं, जिन पर जल्द ही दस जनपथ से मुहर लग जाना तय माना जा रहा है।

इसी के साथ बचे हुए अध्यक्षों का मनोनयन भी होने जा रहा है। पार्टी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने बताया कि अब जिलों की कार्यकारणी घोषित होने वाली हैं। जिन जिला-शहर की कार्यकारिणी घोषित न हो, समझिए कि वहां के अध्यक्ष बदले जाने हैं। इसके साथ ही प्रदेश की टीम में भी प्रवक्ताओं सहित कुछ को बदला जाना संभावित है। वहीं, महिला और युवा विंग के संगठनात्मक ढांचे में बदलाव प्रस्तावित है। अब तक महिला अध्यक्ष जोनवार बनाई जाती थीं, जबकि अब प्रदेश में एक ही महिला प्रकोष्ठ अध्यक्ष होंगी। युवाओं में भी यही फार्मूला अपनाया जाना है। यह तो समय की बताएगा प्रियंका की मेहनत 2022 के विधान सभा चुनाव में क्या रंग दिखाएगी।