उत्तराखंडराज्य

उत्तराखंड: तीन दिन में पीएम मोदी की चार रैली से भाजपा को ताकत मिलना तय

उत्तराखंड में पिछले तीन दिनों में पीएम मोदी की चार ताबड़तोड रैलियों से भाजपा को ताकत मिलना तय है।

नई दिल्ली। गढ़वाल और कुमाउं में एक ही दिन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो चुनावी रैली का प्रभाव आंकने में सिर्फ भाजपाई जुटे हैं ऐसा नहीं है। कांग्रेस में मंथन ज्यादा तेज है। धड़कनें भी बढ़ गई हैं। दरअसल प्रदेश की आधी से ज्यादा सीटें ऐसी हैं जहां हार जीत का अंतर चार हजार से कम रहा है और लगभग एक दर्जन ऐसी सीटें हैं जहां यह अंतर हजार से भी कम रहा है। ऐसे में कांग्रेस को डर है कि मोदी मैजिक काम कर गया तो अब तक हरदा टच के कारण दिखती रही बढ़त काफूर न हो जाए।

यूं तो भाजपा और कांग्रेस की ओर से प्रदेश में विकास के कई वादे किए गए हैं लेकिन पिछले चुनावों को ध्यान में रखा जाए तो यह कहा जा सकता है कि बेरोजगारी और महंगाई के अलावा कोई तीसरा सबसे बड़ा मुद्दा व्यक्तिगत करिश्मा ही रहा है। भाजपा में मुख्यमंत्री चेहरे के अभाव के कारण कांग्रेस अब तक हरीश रावत के सहारे यहीं बढ़त बनाने की कोशिश करती रही थी।

लेकिन पिछले तीन दिनों में मैदान से लेकर पहाड़ तक चार रैलियां कर प्रधानमंत्री ने समीकरण और हिसाब किताब में फेरबदल ला दिया हो इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। चुनाव घोषणा से पूर्व देहरादून में प्रधानमंत्री की विशाल रैली और जनसमर्थन को देखते हुए ही भाजपा प्रधानमंत्री के चेहरे पर ही चुनाव जीतने की रणनीति बनाकर आगे बढ़ रही थी। सही वक्त पर हथौड़ा चला दिया गया है।

आज चुनाव प्रचार खत्म हो रहा है और उससे पहले गढ़वाल के श्रीनगर और कुमाउं के पिथौरागड़ में मोदी के लिए जो उत्साह दिखा वह जाहिर तौर पर कांग्रेस को परेशान कर रहा है। कांग्रेस के एक सूत्र ने माना भी कि पार्टी के लिए यह लड़ाई मुश्किल हो गई है।

दरअसल चुनाव की समीक्षा में यह बात पहले भी सामने आई थी कि केवल विकास चुनाव जीतने का माध्यम नहीं बन पाता है। 2007 चुनाव से पहले लोकनीति के एक सर्वे में लोगों ने कांग्रेस सरकार के प्रदर्शन को अच्छा माना था लेकिन चुनाव मे उसे सत्ता से बाहर कर दिया।

2012 में यही भाजपा के साथ दोहराया गया था। राज्य में किसी भी दल के पास ऐसा कोई बड़ा मुद्दा नहीं है जो मैदान से लेकर कुमाऊं और गढ़वाल में एक समान प्रभावी हो। ऐसे में प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व का असर होना लाजिमी है। खासकर उन एक दर्जन सीटों पर समीकरण बदलना तय है जहां जीत हार का अंतर हजार से भी कम रहा है।

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