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	<title>वाराणसी &#8211; Dastak Times |  दस्तक टाइम्स</title>
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	<description>By Dastak Times Hindi News Network</description>
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	<title>वाराणसी &#8211; Dastak Times |  दस्तक टाइम्स</title>
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		<title>मन्नत से मंच तक : जब जसपिंदर के सुर बने हनुमत चरणों का अर्पण</title>
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		<dc:creator><![CDATA[DN VERMA]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 09:44:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="300" height="135" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/jaspndar-narula1-300x135.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/jaspndar-narula1-300x135.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/jaspndar-narula1-1024x461.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/jaspndar-narula1-768x346.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/jaspndar-narula1-1536x692.jpg 1536w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/jaspndar-narula1.jpg 1698w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" />काशी की आध्यात्मिक वायुमंडल में जब जसपिंदर नरूला के कंठ से भक्ति के स्वर फूटे, तो यह केवल एक संगीत प्रस्तुति नहीं, बल्कि वर्षों पुरानी मन्नत के पूर्ण होने का भावुक क्षण बन गया। संकट मोचन संगीत समारोह के मंच पर उन्होंने जिस श्रद्धा और समर्पण के साथ “राम आएंगे” और “भज ले राम” जैसे &#8230;]]></description>
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<p><strong><em>काशी की आध्यात्मिक वायुमंडल में जब जसपिंदर नरूला के कंठ से भक्ति के स्वर फूटे, तो यह केवल एक संगीत प्रस्तुति नहीं, बल्कि वर्षों पुरानी मन्नत के पूर्ण होने का भावुक क्षण बन गया। संकट मोचन संगीत समारोह के मंच पर उन्होंने जिस श्रद्धा और समर्पण के साथ “राम आएंगे” और “भज ले राम” जैसे भजन प्रस्तुत किए, उसमें उनकी पूरी साधना और जीवन-दर्शन समाहित दिखा। कुछ वर्ष पूर्व काशी आगमन के दौरान हनुमत दरबार में की गई प्रार्थना आज साकार हुई, और यही अनुभूति उनकी आंखों की नमी और स्वर की गहराई में स्पष्ट झलकी। अपने पचास वर्षों के संगीत सफर को वह तपस्या मानती हैं, एक ऐसी यात्रा, जिसमें सिद्धांत, परिश्रम और ईश्वर में अटूट विश्वास ही उनके मार्गदर्शक रहे। युवाओं को संदेश देते हुए उनका सरल किंतु प्रभावी वाक्य गूंजता है, “सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता।” जसपिंदर नरूला के लिए संगीत केवल पेशा नहीं, बल्कि साधना है, और यही कारण है कि उनके सुर सीधे हृदय से निकलकर श्रोताओं की आत्मा को स्पर्श करते हैं।</em></strong></p>



<p>&#8211;<strong>सुरेश गांधी</strong></p>



<p>वाराणसी की आध्यात्मिक धड़कनों के बीच, जहां हर गली में इतिहास सांस लेता है और हर मंदिर में भक्ति गूंजती है, वहीं संकट मोचन संगीत समारोह की एक भावभीनी रात साक्षी बनी, संगीत, साधना और समर्पण के अद्भुत संगम की। इस पावन अवसर पर पचास वर्षों की तपस्या, पंजाब की सूफियाना मिट्टी, काशी की भक्ति और जीवन-दर्शन, पद्मश्री गायिका जसपिंदर नरूला ने न केवल अपनी प्रस्तुति से वातावरण को राममय किया, बल्कि अपने जीवन के अनुभवों और संगीत यात्रा के रहस्यों को वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गांधी के साथ साझा किया। यह संवाद केवल प्रश्नोत्तर नहीं, बल्कि एक कलाकार की आत्मा से निकली वह यात्रा है, जिसमें संघर्ष है, श्रद्धा है, और अंततः एक गहरा संतोष भी, सुरों की साधना ने उन्हें वहां पहुंचाया, जहां संगीत ईश्वर का माध्यम बन जाता है। प्रस्तुत है उनसे हुए बातचीत के कुछ प्रमुख अंशः-</p>



<p><strong>सुरेश गांधी : संकट मोचन के इस पावन मंच पर गाने का अनुभव कैसा रहा?<br>जसपिंदर नरूला : </strong>काशी में गाना अपने आप में एक अनूठा अनुभव है, एक जीवंत आध्यात्मिक ऊर्जा है। लेकिन जब बात संकट मोचन मंदिर की हो, तो यह अनुभव और भी गहरा हो जाता है। यहां गाना केवल प्रस्तुति नहीं, बल्कि एक अर्पण है। मुझे ऐसा लगा जैसे मैं नहीं गा रही, बल्कि मुझसे गवाया जा रहा है। यहां हर सुर सीधे हनुमान जी तक पहुंचता है। आज मैंने जो भी गाया, वह मेरी ओर से एक विनम्र भेंट थी। कुछ वर्ष पहले जब मैं गंगा महोत्सव में आई थी, तब मैंने हनुमान जी के दरबार में माथा टेका था और मन ही मन एक मन्नत मांगी थी, एक दिन मुझे यहां भजन गाने का अवसर मिले। आज वह मन्नत पूरी हुई है। यह मेरे लिए अत्यंत भावुक क्षण है… ये खुशी के आंसू हैं।</p>



<p><strong>प्रश्न : आपकी गायकी में सूफी, भक्ति और शास्त्रीय संगीत का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यह संतुलन कैसे संभव हुआ?<br>उत्तर :</strong> मैं पंजाब की मिट्टी से हूं, जहां सूफी संतों की परंपरा गहराई से जुड़ी हुई है। वहां का संगीत अपने आप में इबादत है। बचपन से ही मैंने यह सीखा कि संगीत केवल कला नहीं, बल्कि आत्मा की भाषा है। मैंने हमेशा अपनी मौलिकता को बनाए रखने की कोशिश की है। चाहे फिल्मी गीत गाऊं या भजन, मेरे लिए हर सुर एक साधना है। शायद यही कारण है कि मेरी गायकी में सूफियाना रंग भी है और भक्ति की गहराई भी।</p>



<p><strong>प्रश्न : आपने फिल्मी दुनिया में अपार सफलता हासिल की, फिर भी भक्ति और शास्त्रीय संगीत से जुड़ी रहीं। इसका क्या कारण रहा?<br>उत्तर : </strong>लोकप्रियता क्षणिक हो सकती है, लेकिन जड़ों से जुड़ाव स्थायी होता है। मैंने कभी अपने मूल को नहीं छोड़ा। शास्त्रीय संगीत मेरी नींव है और भक्ति मेरी आत्मा। फिल्मों में गाना मेरे करियर का हिस्सा है, लेकिन जब मैं भजन गाती हूं, तो वह मेरे भीतर की सच्ची अभिव्यक्ति होती है। यही मुझे संतुलित रखता है।</p>



<p><strong>प्रश्न : “प्यार तो होना ही था” गीत ने आपके करियर को नई ऊंचाई दी। उस दौर को कैसे याद करती हैं?<br>उत्तर :</strong> प्यार तो होना ही था का वह गीत मेरे जीवन का टर्निंग प्वाइंट था. रेमो फर्नांडीज के साथ गाया गया यह गीत आज भी लोगों के दिलों में बसा हुआ है। जब यह गीत आया, तो मुझे इतनी लोकप्रियता मिली, मैं खुद भी हैरान थी। लेकिन मैंने इसे सिर पर चढ़ने नहीं दिया, क्योंकि मुझे पता था कि असली यात्रा अभी बाकी है।</p>



<p><strong>प्रश्न : आपके संगीत सफर की शुरुआत कैसे हुई?<br>उत्तर :</strong> मेरा संगीत से रिश्ता बचपन से ही है। मेरे पिता केसर सिंह नरूला स्वयं संगीतकार थे। उन्होंने ही मुझे संगीत की पहली शिक्षा दी। घर का माहौल ऐसा था कि हर दिन रियाज़ होता था। आगे चलकर मैंने उस्ताद गुलाम सादिक खान से प्रशिक्षण लिया। शास्त्रीय संगीत ने मेरी आवाज़ को आधार दिया। यही आधार आज तक मेरे साथ है।</p>



<p><strong>प्रश्न : आपने अपने करियर में कई बड़े संगीतकारों के साथ काम किया। उस अनुभव को कैसे देखती हैं?<br>उत्तर :</strong> मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूं कि मुझे कल्याणजी जैसे महान संगीतकार का मार्गदर्शन मिला। उन्होंने मुझे इंडस्ट्री में आने का रास्ता दिखाया। इसके बाद विजू शाह और अन्य कई संगीत निर्देशकों के साथ काम करने का अवसर मिला। हर अनुभव ने मुझे कुछ नया सिखाया।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><a href="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/jaspndar-narula1-1.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="1024" height="461" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/jaspndar-narula1-1-1024x461.jpg" alt="" class="wp-image-882087" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/jaspndar-narula1-1-1024x461.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/jaspndar-narula1-1-300x135.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/jaspndar-narula1-1-768x346.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/jaspndar-narula1-1-1536x692.jpg 1536w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/jaspndar-narula1-1.jpg 1698w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a></figure>



<p><strong>प्रश्न : संकट मोचन में आपकी प्रस्तुति के दौरान “राम आएंगे” और “भज ले राम” जैसे भजनों ने लोगों को भाव-विभोर कर दिया। उस क्षण आपकी अनुभूति क्या थी?<br>उत्तर : </strong>जब मैं “राम आएंगे…” गा रही थी, तो मुझे लगा जैसे पूरा वातावरण राममय हो गया है। लोग झूम रहे थे, आंखें बंद कर प्रार्थना कर रहे थे, वह दृश्य शब्दों में नहीं कहा जा सकता। “मनवा रे जीवन है संग्राम, भज ले राम…” यह केवल गीत नहीं, जीवन का सार है। जब हम कठिनाइयों में होते हैं, तो भक्ति ही हमें संभालती है। प्रभु हर दिल में हैं। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि विश्वास है, जब हम सच्चे मन से पुकारते हैं, तो भगवान जरूर आते हैं। उस समय मैं खुद भी एक श्रोता बन जाती हूं और संगीत मुझे भीतर से छूता है।</p>



<p><strong>प्रश्न : आपने युवाओं को मेहनत और ईश्वर में विश्वास का संदेश दिया। आज के समय में यह कितना जरूरी है?<br>उत्तर : </strong>आज की दुनिया बहुत तेज हो गई है। हर कोई जल्दी सफलता चाहता है, धैर्य की कमी दिखती है। लेकिन मैं यही कहना चाहूंगी कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। मैंने 50 वर्षों तक लगातार मेहनत की है। यह कोई एक दिन की उपलब्धि नहीं है। अगर आप ईश्वर में विश्वास रखते हैं और अपने काम के प्रति ईमानदार हैं, तो सफलता जरूर मिलती है। मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता। जो लोग साधना से नहीं गुजरते, वे सफलता को टिकाकर नहीं रख पाते।</p>



<p><strong>प्रश्न : काशी और यहां के श्रोताओं के बारे में आपका क्या अनुभव रहा?<br>उत्तर : </strong>काशी के श्रोता बहुत विशेष होते हैं। वे केवल सुनते नहीं, बल्कि महसूस करते हैं। यहां संगीत आत्मा से जुड़ जाता है। जब मैंने देखा कि लोग छतों पर, बाहर स्क्रीन के सामने खड़े होकर भी सुन रहे हैं, तो मुझे लगा कि यह केवल मेरा नहीं, बल्कि संगीत का सम्मान है।</p>



<p><strong>प्रश्न : मंदिर के महंत से मुलाकात और काशी की पौराणिकता के बारे में जानकर आपकी क्या प्रतिक्रिया रही?<br>उत्तर : </strong>कार्यक्रम के बाद मेरी मुलाकात पंडित विश्वंभरनाथ मिश्र से हुई। उन्होंने मुझे काशी की परंपरा, गोस्वामी तुलसीदास और मंदिर की स्थापना की कथा सुनाई। उसे सुनकर मैं सच में भावुक हो गई। काशी केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक जीवंत आध्यात्मिक अनुभव है। मैं खुद को सौभाग्यशाली मानती हूं कि मुझे यहां गाने का अवसर मिला।</p>



<p>फिलहाल, यह संवाद केवल एक साक्षात्कार नहीं, बल्कि एक साधिका की आत्मकथा का अंश है। उनका जीवन-दर्शन सामने आया, जहां संगीत, भक्ति और संघर्ष एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं। जसपिंदर नरूला की आवाज़ में जो गूंज है, वह केवल सुरों की नहीं, बल्कि वर्षों की तपस्या, विश्वास और समर्पण की है। काशी की इस पावन भूमि पर उन्होंने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया, जब संगीत साधना बन जाता है, तो वह केवल सुना नहीं जाता… वह जिया जाता है। समारोह में उनकी प्रस्तुति ने यह साबित कर दिया कि उनकी आवाज़ में आज भी वही ऊर्जा और भावनात्मक गहराई है। “भज ले राम… राम… राम…” जैसे भजनों की गूंज ने पूरे मंदिर परिसर को भक्तिमय बना दिया। श्रोता झूम उठे, और हर सुर के साथ आस्था का प्रवाह और प्रगाढ़ होता गया। उनकी गायकी में भाव, ऊर्जा और आध्यात्मिकता का ऐसा संगम देखने को मिला, जिसने श्रोताओं को भीतर तक स्पर्श किया। यह केवल एक प्रस्तुति नहीं, बल्कि एक साधना थी, एक ऐसी साधना, जिसमें सुर ईश्वर को समर्पित हो जाते हैं।</p>
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			</item>
		<item>
		<title>जब काशी ने ओढ़ी सुरों की चादर : जाग उठा संगीत का आत्मलोक</title>
		<link>https://dastaktimes.org/when-kashi-covered-itself-with-the-sheet-of-tunes-the-soul-world-of-music-woke-up/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[DN VERMA]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 09:39:21 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[वाराणसी]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="300" height="144" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandit-shiromani1-300x144.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandit-shiromani1-300x144.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandit-shiromani1-1024x492.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandit-shiromani1-768x369.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandit-shiromani1-1536x738.jpg 1536w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandit-shiromani1.jpg 1806w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />स्वरों की नींव पर सजा रागों का महल, सुर, साधना और समरसता की रात, काशी में गूंजा रागों का अनंत संसार &#8211;सुरेश गांधी वाराणसी : काशी की आध्यात्मिक वेला में जब रात अपने चरम पर होती है, तब संकट मोचन संगीत समारोह केवल एक आयोजन नहीं रह जाता, बल्कि वह साधना, समर्पण और सुरों का &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="144" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandit-shiromani1-300x144.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandit-shiromani1-300x144.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandit-shiromani1-1024x492.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandit-shiromani1-768x369.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandit-shiromani1-1536x738.jpg 1536w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandit-shiromani1.jpg 1806w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />
<h3 class="wp-block-heading">स्वरों की नींव पर सजा रागों का महल, सुर, साधना और समरसता की रात, काशी में गूंजा रागों का अनंत संसार</h3>



<p>&#8211;<strong>सुरेश गांधी</strong></p>



<p><strong>वाराणसी :</strong> काशी की आध्यात्मिक वेला में जब रात अपने चरम पर होती है, तब संकट मोचन संगीत समारोह केवल एक आयोजन नहीं रह जाता, बल्कि वह साधना, समर्पण और सुरों का जीवंत महाकुंभ बन जाता है। 103वें समारोह की दूसरी निशा भी कुछ ऐसी ही रही, जहां थकान का अस्तित्व संगीत की तरंगों में विलीन हो गया और हर श्रोता सुरों की धारा में डूबता चला गया. दिनभर की व्यस्तता और रात्रि जागरण के बावजूद जैसे ही शाम ढली, मंदिर परिसर में संगीत प्रेमियों का सैलाब उमड़ पड़ा। यह वही काशी है, जहां संगीत केवल सुना नहीं जाता, बल्कि जिया जाता है। और जब मंच सजा, तो लगा मानो स्वरों की नींव पर रागों का एक विराट महल खड़ा हो रहा हो।</p>



<p><strong>ड्रम, धुन और दैवीय स्पंदन : पहली प्रस्तुति ने बांधा समां<br></strong>डिड-डिग-डिग, तुम-टी-तुम, शुवे…ईप… की अनुगूंज के साथ शुरू हुई पहली प्रस्तुति ने पारंपरिक संगीत की सीमाओं को तोड़ते हुए एक नए प्रयोग का द्वार खोल दिया। मंच पर जब ड्रम, बाल्टी, थाली, घंट और परात जैसे सामान्य प्रतीत होने वाले वस्त्र वाद्य बनकर सजे, तो श्रोताओं ने एक अद्भुत संगीत प्रयोग का साक्षात्कार किया। इस प्रस्तुति के केंद्र में थे विख्यात पर्कशनिस्ट पंडित शिवमणि, जिनकी उंगलियां किसी यांत्रिक गति से वाद्यों पर थिरक रही थीं। उनके साथ मेंडोलिन पर यू. राजेश और पखावज पर विश्वंभर नाथ मिश्र की संगत ने इस प्रस्तुति को शास्त्रीयता और आध्यात्मिकता के अद्भुत संगम में बदल दिया। “रघुपति राघव राजाराम” और “गोविंद बोलो हरि गोपाल बोलो” जैसे भजनों को साउथ इंडो-वेस्टर्न शैली में प्रस्तुत कर कलाकारों ने यह सिद्ध कर दिया कि भक्ति का स्वर किसी एक शैली का मोहताज नहीं होता। श्रोताओं के कदम स्वतः थिरक उठेकृकहीं कोई बैठा नहीं रहा, हर कोई इस लय का हिस्सा बन गया।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><a href="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pamdit-shiromanaiii.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="517" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pamdit-shiromanaiii-1024x517.jpg" alt="" class="wp-image-882082" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pamdit-shiromanaiii-1024x517.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pamdit-shiromanaiii-300x151.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pamdit-shiromanaiii-768x388.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pamdit-shiromanaiii.jpg 1347w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a></figure>



<p><strong>मोहन वीणा और सात्विक वीणाः शांति का राग, आत्मा का संवाद<br></strong>दूसरी प्रस्तुति में ग्रैमी सम्मानित पंडित विश्व मोहन भट्ट और उनके सुपुत्र सलिल भट्ट ने मोहन वीणा और सात्विक वीणा की जुगलबंदी से वातावरण को दिव्यता से भर दिया। राग विश्वरंजनी में आलाप, जोड़ और झाला के क्रम ने जैसे श्रोताओं को ध्यान की अवस्था में पहुंचा दिया। मध्य लय और द्रुत लय की गतकारी के साथ तीन ताल की प्रस्तुति में दोनों वाद्यों के बीच संवाद ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो दो साधक आत्मा के स्तर पर एक-दूसरे से संवाद कर रहे हों। रामधुन के साथ इस प्रस्तुति का समापन हुआ, जिसने पूरे वातावरण को भक्ति में रंग दिया। तबले पर पं. रामकुमार मिश्र और कौशिक कुंवर की संगत ने इस जुगलबंदी को और प्रभावशाली बना दिया।</p>



<p><strong>तबला जुगलबंदी : लय के भीतर संवाद का सौंदर्य</strong><br>तीसरी प्रस्तुति में अजराड़ा घराना के जरगाम अकरम खां और दिल्ली घराना के खुर्रम अली नियाजी ने तबले की जुगलबंदी प्रस्तुत कर श्रोताओं को लय की गहराइयों से परिचित कराया। तीनताल में पेशकार, कायदा, टुकड़ा और रेला की प्रस्तुति के दौरान दोनों कलाकारों के बीच सवाल-जवाब का क्रम अत्यंत रोचक रहा। हर तिहाई के साथ श्रोताओं की वाहवाही गूंज उठती। संवादिनी पर मोहित साहनी और सारंगी पर अमान खां की संगत ने इस प्रस्तुति में मधुरता का स्पर्श जोड़ा, जिससे पूरी प्रस्तुति एक संतुलित संगीत अनुभव बन गई।</p>



<p><strong>गायन में रागों की गरिमा : उस्ताद गुलाम अब्बास खां का प्रभाव</strong><br>चौथी प्रस्तुति में रामपुर घराना के गुलाम अब्बास खां ने अपने गायन से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। राग बिहाग में विलंबित ख्याल से शुरुआत करते हुए उन्होंने स्वर विस्तार की ऐसी बुनावट रची कि वातावरण पूरी तरह रसमय हो उठा। इसके बाद द्रुत लय में छोटा ख्याल और राग सोहनी की बंदिश “ऐसो कन्हाई मानत नाहीं” ने प्रस्तुति को चरम पर पहुंचा दिया। तबले पर उस्ताद अकरम खां, संवादिनी पर पं. धर्मनाथ मिश्र और सारंगी पर विनायक सहाय की संगत ने इस प्रस्तुति को और अधिक प्रभावशाली बना दिया।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><a href="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandit-vishvmohan1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="479" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandit-vishvmohan1-1024x479.jpg" alt="" class="wp-image-882083" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandit-vishvmohan1-1024x479.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandit-vishvmohan1-300x140.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandit-vishvmohan1-768x359.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandit-vishvmohan1-1536x718.jpg 1536w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandit-vishvmohan1.jpg 1915w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a></figure>



<p><strong>बनारस घराने की थाप : जब इतिहास ने ली ताल में सांस</strong><br>पांचवीं प्रस्तुति में पं. शुभ महाराज ने तबले की थाप से जैसे संकट मोचन मंदिर की ईंट-ईंट में इतिहास की गूंज भर दी। तीनताल और धमार की जटिल संरचनाओं के बीच उन्होंने 16 और 14 मात्राओं की ऐसी कड़ियां स्थापित कीं, जिनमें बनारस घराने की परंपरा सजीव हो उठी। सारंगी पर विनायक सहाय और संवादिनी पर मोहित साहनी की संगत ने इस ऐतिहासिक प्रस्तुति को और भी रंगीन बना दिया।</p>



<p><strong>सितार की साधना : राग परमेश्वरी में डूबा परिसर</strong><br>छठवीं प्रस्तुति में कोलकाता से आए विख्यात सितार वादक पं. कुशल दास ने राग परमेश्वरी में आलापचारी से शुरुआत की। उनके सितार के सुर जैसे मंदिर परिसर में एक अदृश्य धारा की तरह बहने लगे। इसके बाद तीनताल में गतकारी और राग ललित के स्पर्श ने इस प्रस्तुति को आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान की। तबले पर पं. संजू सहाय की संगत ने इस प्रस्तुति को और भी सजीव बना दिया। श्रोता इस दौरान पूर्णतः ध्यानमग्न दिखाई दिए।</p>



<p><strong>अंतिम प्रस्तुति : भैरव के साथ भोर की आहट<br></strong>दूसरी निशा की अंतिम प्रस्तुति में पं. जसराज के शिष्य पं. रतन मोहन शर्मा ने अपने पुत्र स्वर शर्मा के साथ गायन प्रस्तुत किया। राग भैरव की गंभीरता और प्रातःकालीन रागों की मधुरता ने इस प्रस्तुति को एक अद्भुत समापन प्रदान किया। ऐसा लगा मानो संगीत स्वयं भोर का स्वागत कर रहा हो। तबले पर पं. रामकुमार मिश्र और संवादिनी पर पं. धर्मनाथ मिश्र की संगत ने इस प्रस्तुति को पूर्णता प्रदान की।</p>



<p><strong>संगीत बना साधना, काशी बनी साक्षी</strong><br>इस प्रकार संकट मोचन की दूसरी निशा केवल प्रस्तुतियों का क्रम नहीं रही, बल्कि यह एक आध्यात्मिक यात्रा बन गईकृजहां हर राग एक प्रार्थना था, हर ताल एक ध्यान। काशी ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि यहां संगीत केवल कला नहीं, बल्कि साधना है, और जो इस साधना में डूब गया, वह स्वयं को पा गया।</p>



<p></p>
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			</item>
		<item>
		<title>जब मोहन वीणा ने दुनिया से कहा, रुको, सुनो और थम जाओ!</title>
		<link>https://dastaktimes.org/when-mohan-veena-told-the-world-to-wait-listen-and-stop/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[DN VERMA]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 08 Apr 2026 10:05:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[वाराणसी]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="300" height="232" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandirt-vishvmohan2-6666-300x232.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandirt-vishvmohan2-6666-300x232.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandirt-vishvmohan2-6666-1024x792.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandirt-vishvmohan2-6666-768x594.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandirt-vishvmohan2-6666.jpg 1446w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />युद्ध के शोर में शांति के सुर वाराणसी के संकट मोचन मंदिर का पावन प्रांगण मंगलवार की रात केवल संगीत का साक्षी नहीं बना, बल्कि वह एक वैश्विक संदेश का केंद्र बन गया। जब दुनिया के कोने-कोने में युद्ध, तनाव और अस्थिरता की खबरें गूंज रही हैं, ठीक उसी समय पद्म भूषण पंडित विश्व मोहन &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="232" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandirt-vishvmohan2-6666-300x232.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandirt-vishvmohan2-6666-300x232.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandirt-vishvmohan2-6666-1024x792.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandirt-vishvmohan2-6666-768x594.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandirt-vishvmohan2-6666.jpg 1446w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />
<h3 class="wp-block-heading">युद्ध के शोर में शांति के सुर</h3>



<p><strong><em>वाराणसी के संकट मोचन मंदिर का पावन प्रांगण मंगलवार की रात केवल संगीत का साक्षी नहीं बना, बल्कि वह एक वैश्विक संदेश का केंद्र बन गया। जब दुनिया के कोने-कोने में युद्ध, तनाव और अस्थिरता की खबरें गूंज रही हैं, ठीक उसी समय पद्म भूषण पंडित विश्व मोहन भट्ट ने अपनी मोहन वीणा के सुरों से मानो विश्व को ठहरने का आह्वान किया। उनके साथ सात्विक वीणा पर पंडित सलिल भट्ट की संगति ने इस संदेश को और भी प्रभावशाली बना दिया। राग “विश्व रंजनी” की प्रस्तुति केवल एक संगीत रचना नहीं थी, बल्कि वह एक भावपूर्ण प्रार्थना थी, मानवता के लिए, शांति के लिए, संतुलन के लिए। आलाप से लेकर झाला तक हर सुर में एक बेचैनी भी थी और उसे शांत करने की साधना भी। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो सुरों के माध्यम से युद्ध के वातावरण पर नियंत्रण पाने और विश्व को एक नई दिशा देने की कोशिश की जा रही हो। संकट मोचन की यह प्रस्तुति इस बात का सशक्त प्रमाण बन गई कि जब शब्द विफल हो जाते हैं, तब संगीत ही वह भाषा बनता है जो सीधे हृदय से संवाद करता है</em></strong></p>



<p>&#8211;<strong>सुरेश गांधी</strong></p>



<p><strong><em>फिलहाल, संकट मोचन मंदिर में इन दिनों संगीत ही नहीं गूंज रहा है, बल्कि आध्यात्मिक तरंगे भी समय को ठहरा देने पर विवश करती नजर आ रही है. दीपों की लौ, मंदिर की पवित्रता और भक्तिभाव से भरे श्रोताओं के बीच जब मोहन वीणा और सात्विक वीणा के स्वर उठे, तो लगा मानो स्वयं पवनपुत्र हनुमान के चरणों में एक वैश्विक प्रार्थना अर्पित की जा रही हो। इस अद्वितीय संगीतमय क्षण के साक्षी बने सीनियर रिपोर्टर सुरेश गांधी ने कार्यक्रम के बाद पद्म भूषण पंडित विश्व मोहन भट्ट और उनके सुपुत्र, ‘तंत्री सम्राट’ पंडित सलिल भट्ट से विस्तृत बातचीत की। खास यह है कि ये संवाद केवल प्रश्नोत्तर नहीं, बल्कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की आत्मा तक पहुंचने का एक माध्यम बन गया। मोहन भट्ट ने संगीत, साधना और ‘विश्व रंजनी’ के रहस्यों से पर्दा उठाते हुए जो कहा, वो अकल्पनीय रही. आलाप से लेकर जोड़ और झाला तक, हर चरण में इस राग ने एक नई परत खोली। विलंबित लय की गंभीरता और द्रुत गति की चंचलता ने मिलकर एक ऐसा भाव रचा, जो श्रोताओं को भीतर तक स्पर्श करता चला गया। प्रस्तुत है बातचीत के कुछ प्रमुख अंश :-</em></strong></p>



<p><strong>सुरेश गांधी : संकट मोचन संगीत समारोह में आपकी प्रस्तुति को किस रूप में देखा जाए, एक कार्यक्रम, साधना या कुछ और?<br>पं. विश्व मोहन भट्ट :</strong> मुस्कुराते हुए कहते हैं, देखिए, संकट मोचन में प्रस्तुति देना किसी भी कलाकार के लिए केवल एक कार्यक्रम नहीं होता। यह साधना है, आराधना है। यहां हर सुर सीधे पवनपुत्र हनुमान के चरणों में अर्पित होता है। जब मैंने मोहन वीणा को हाथ में लिया, तो लगा जैसे मैं वादन नहीं, बल्कि प्रार्थना कर रहा हूं। वे आगे जोड़ते हैं, हमने जो भी प्रस्तुत किया, वह किसी मंचीय प्रदर्शन के लिए नहीं था, बल्कि यह विश्व शांति के लिए एक विनम्र प्रयास था।</p>



<p><strong>प्रश्न : आपकी और आपके पुत्र पं. सलिल भट्ट की जुगलबंदी को श्रोताओं ने बेहद सराहा। इस संगति को आप कैसे परिभाषित करेंगे?<br>उत्तर :</strong> यह जुगलबंदी कम, संवाद अधिक है। पिता-पुत्र का संबंध यहां गुरु-शिष्य में बदल जाता है। मेरे सुर एक दिशा देते हैं और सलिल उसे आगे बढ़ाते हैं। मोहन वीणा और सात्विक वीणा का यह संगम परंपरा और नवाचार का मिलन है।</p>



<p><strong>प्रश्न : आपने इस प्रस्तुति में राग “विश्व रंजनी” को केंद्र में रखा। इसके पीछे क्या भावना थी?<br>उत्तर : </strong>आज दुनिया जिस दौर से गुजर रही है, उसमें अशांति, संघर्ष और तनाव अधिक है। ऐसे समय में हमने सोचा कि संगीत के माध्यम से शांति का संदेश दिया जाए। क्यों न एक ऐसा राग प्रस्तुत किया जाए, जो केवल कानों को नहीं, बल्कि आत्मा को भी स्पर्श करे। ‘विश्व रंजनी’ उसी भावना से जन्मा, यह राग विश्व को रंजित करने, उसे शांति और संतुलन देने का प्रयास है।</p>



<p><strong>प्रश्न : क्या संगीत वास्तव में विश्व के तनाव और संघर्ष को कम कर सकता है?<br>उत्तर : </strong>संगीत में अपार शक्ति है। यह मनुष्य के भीतर के द्वंद्व को शांत करता है। जब व्यक्ति भीतर से शांत होगा, तभी समाज और विश्व में शांति संभव है। हम संगीतकारों का दायित्व है कि हम सुरों के माध्यम से प्रेम, करुणा और एकता का संदेश दें। मेरा मानना है, संगीत से विश्व युद्ध का वातावरण भी बदला जा सकता है.</p>



<p><strong>प्रश्न : आपकी प्रस्तुति में आलाप, जोड़ और झाला के साथ विलंबित और द्रुत गत की रचनाएं बेहद प्रभावी रहीं। क्या यह पूर्व निर्धारित था या सहज प्रवाह?<br>उत्तर :</strong> शास्त्रीय संगीत में संरचना होती है, लेकिन आत्मा सहजता में होती है। आलाप से हम राग का स्वरूप स्थापित करते हैं, जोड़ और झाला में उसे विस्तार देते हैं, और विलंबित-द्रुत में उसकी पूर्ण अभिव्यक्ति होती है। परंतु मंच पर बहुत कुछ उस क्षण की ऊर्जा पर निर्भर करता है।</p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-large"><a href="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandirt-vishvmohan2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" width="723" height="1024" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandirt-vishvmohan2-723x1024.jpg" alt="" class="wp-image-881924" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandirt-vishvmohan2-723x1024.jpg 723w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandirt-vishvmohan2-212x300.jpg 212w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandirt-vishvmohan2-768x1088.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandirt-vishvmohan2-1085x1536.jpg 1085w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/pandirt-vishvmohan2.jpg 1446w" sizes="auto, (max-width: 723px) 100vw, 723px" /></a></figure>
</div>


<p><strong>प्रश्न : अंत में आपने श्रीराम भजन की धुन से वादन को विराम दिया। क्या इसके पीछे कोई विशेष कारण था?<br>उत्तर : </strong>संकट मोचन में बिना भक्ति के कोई भी प्रस्तुति पूर्ण नहीं हो सकती। श्रीराम भजन के माध्यम से हमने अपनी प्रस्तुति को ईश्वर को समर्पित किया। यह हमारे लिए समापन नहीं, बल्कि समर्पण था।</p>



<p><strong>प्रश्न : आपको ग्रैमी अवॉर्ड जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले हैं। क्या वैश्विक मंच पर भारतीय शास्त्रीय संगीत को प्रस्तुत करना चुनौतीपूर्ण होता है?<br>उत्तर :</strong> चुनौती जरूर होती है, लेकिन यही हमारी जिम्मेदारी भी है। जब मैंने ‘मीटिंग बाई दी रीवर’ के लिए ग्रैमी प्राप्त किया, तब यह केवल मेरा नहीं, बल्कि भारतीय संगीत का सम्मान था। दुनिया में लोग हमारी परंपरा को समझना चाहते हैं, हमें बस उसे सच्चाई से प्रस्तुत करना होता है।</p>



<p><strong>प्रश्न : आपने मोहन वीणा का निर्माण किया और आपके पुत्र ने सात्विक वीणा को विकसित किया। इस नवाचार को आप कैसे देखते हैं?<br>उत्तर : </strong>जब मैंने मोहन वीणा का निर्माण किया, तब यह केवल एक प्रयोग था। लेकिन आज यह भारतीय संगीत की पहचान बन चुका है। यह मेरे लिए गर्व की बात है। परंपरा स्थिर नहीं होती, वह प्रवाहित होती है। मैंने गिटार को भारतीय शास्त्रीय संगीत के अनुरूप ढालकर मोहन वीणा बनाई। सलिल ने उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सात्विक वीणा का निर्माण किया। यह दर्शाता है कि संगीत जीवंत है और समय के साथ विकसित होता है। देखा जाएं तो हर पीढ़ी का अपना योगदान होता है। मैंने प्रयास किया है कि परंपरा को बनाए रखते हुए उसमें कुछ नया जोड़ा जाए, ताकि युवा पीढ़ी भी इससे जुड़ सके।</p>



<p><strong>प्रश्न : जयपुर में 35 मिनट में 52 राग प्रस्तुत करने का आपका रिकॉर्ड भी काफी चर्चित रहा। यह अनुभव कैसा रहा?<br>उत्तर : </strong>यह एक अनूठा अनुभव था। हर राग का अपना अलग भाव और व्यक्तित्व होता है। एक राग में डूबकर तुरंत दूसरे में प्रवेश करना आसान नहीं होता। लेकिन यह एक साधना का परिणाम था और ईश्वर की कृपा से सफल हुआ।</p>



<p><strong>प्रश्न : आपके साथ तबले पर पंडित राम कुमार मिश्रा और कौशिक कंवर की संगत रही। संगतकारों की भूमिका को आप कैसे देखते हैं?<br>उत्तर : </strong>संगतकार संगीत की आत्मा को विस्तार देते हैं। बनारस घराने की तबला संगत ने हमारी प्रस्तुति को और समृद्ध किया। यह सामूहिक साधना का ही परिणाम है कि प्रस्तुति पूर्णता प्राप्त करती है।</p>



<p><strong>प्रश्न : अंत में, युवा पीढ़ी के लिए आपका क्या संदेश है?<br>उत्तर : </strong>संगीत को केवल करियर न बनाएं, इसे साधना बनाएं। इसमें धैर्य, अनुशासन और समर्पण आवश्यक है। यदि आप ईमानदारी से साधना करेंगे, तो संगीत स्वयं आपको मार्ग दिखाएगा।</p>



<p><strong>प्रश्न : आप अपनी इस पूरी यात्रा को एक वाक्य में कैसे परिभाषित करेंगे?<br>उत्तर :</strong> मैं यही कहूंगा, हम कलाकार नहीं, केवल माध्यम हैं। जो कुछ भी होता है, वह ईश्वर की प्रेरणा से होता है। अगर हमारे सुरों से किसी के मन को शांति मिलती है, तो वही हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है।</p>



<p><strong>पिता-पुत्र की जुगलबंदी : संवाद या साधना?</strong><br>जब पंडित सलिल भट्ट से पूछा गया कि पिता के साथ मंच साझा करने का अनुभव कैसा होता है, तो वे भावुक हो उठते हैं। “यह जुगलबंदी नहीं, यह संवाद है। एक ऐसा संवाद जिसमें शब्द नहीं होते, केवल स्वर होते हैं। पिता जी का हर सुर मेरे लिए मार्गदर्शन होता है और मैं उसी पथ पर चलने का प्रयास करता हूं।” वे आगे कहते हैं, “मोहन वीणा और सात्विक वीणा का संगम केवल वाद्ययंत्रों का मेल नहीं, बल्कि परंपरा और नवाचार का संगम है।” तबले पर बनारस घराने के पंडित राम कुमार मिश्रा और असम के कौशिक कंवर की संगत ने संगीत को और भी समृद्ध किया। जब अंतिम चरण में श्रीराम भजन की धुन गूंजी, तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। ऐसा लगा मानो संगीत अपने चरम पर पहुंचकर ईश्वर में विलीन हो गया हो। बेशक, पंडित विश्व मोहन भट्ट और पंडित सलिल भट्ट की जुगलबंदी ने यह सिद्ध कर दिया कि संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि वह एक ऐसी शक्ति है, जो मानवता को जोड़ सकती है, उसे शांति का मार्ग दिखा सकती है।</p>
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			</item>
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		<title>घुंघरुओं की हर थिरकन में साधना, हर चक्कर में शिव का स्मरण : विधा लाल</title>
		<link>https://dastaktimes.org/sadhana-in-every-dance-of-ghunghrus-remembrance-of-shiva-in-every-round/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[DN VERMA]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 08 Apr 2026 10:00:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[वाराणसी]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="300" height="159" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/kathak-nrityangna-veedha-lal-555-300x159.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/kathak-nrityangna-veedha-lal-555-300x159.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/kathak-nrityangna-veedha-lal-555-1024x542.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/kathak-nrityangna-veedha-lal-555-768x407.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/kathak-nrityangna-veedha-lal-555.jpg 1379w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />संकट मोचन संगीत समारोह के पावन मंच पर जब जयपुर घराने की प्रख्यात कथक नृत्यांगना विधा लाल ने अपनी पहली प्रस्तुति दी, तो घुंघरुओं की गूंज केवल संगीत नहीं रही, बल्कि भक्ति और साधना का जीवंत स्वरूप बन गई। गिनीज बुक में एक मिनट में 103 चक्कर लगाने का विश्व रिकॉर्ड दर्ज कराने वाली इस &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="159" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/kathak-nrityangna-veedha-lal-555-300x159.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/kathak-nrityangna-veedha-lal-555-300x159.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/kathak-nrityangna-veedha-lal-555-1024x542.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/kathak-nrityangna-veedha-lal-555-768x407.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/kathak-nrityangna-veedha-lal-555.jpg 1379w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />
<p><strong><em>संकट मोचन संगीत समारोह के पावन मंच पर जब जयपुर घराने की प्रख्यात कथक नृत्यांगना विधा लाल ने अपनी पहली प्रस्तुति दी, तो घुंघरुओं की गूंज केवल संगीत नहीं रही, बल्कि भक्ति और साधना का जीवंत स्वरूप बन गई। गिनीज बुक में एक मिनट में 103 चक्कर लगाने का विश्व रिकॉर्ड दर्ज कराने वाली इस कलाकार ने न केवल अपनी तकनीकी दक्षता का प्रदर्शन किया, बल्कि भाव और आध्यात्मिकता का ऐसा समागम रचा कि हनुमत दरबार भाव-विभोर हो उठा। उनकी इस शानदार प्रस्तुति के बाद सीनियर रिपोर्टर सुरेश गांधी से विशेष बातचीत में विधा लाल ने साधना, गुरु-भक्ति, परंपरा और मंच का अनुभव साझा किया. उन्होंने स्पष्ट कहा कि कथक जैसी शास्त्रीय विधा को ऑनलाइन माध्यमों से पूरी तरह नहीं सीखा जा सकता। गुरु के सान्निध्य में ही इस कला की वास्तविक बारीकियां आत्मसात होती हैं। छह वर्ष की आयु से शुरू हुई उनकी साधना आज 56 देशों तक पहुंच चुकी है, लेकिन उनके लिए नृत्य अब भी आत्मिक अनुभूति और ईश्वर से संवाद का माध्यम है। कला, अनुशासन और गुरु-भक्ति के इस समन्वय ने विधा लाल को केवल एक कलाकार नहीं, बल्कि परंपरा की जीवंत वाहक बना दिया है</em></strong></p>



<p>&#8211;<strong>सुरेश गांधी</strong></p>



<p>घुंघरुओं की मृदुल ध्वनि जब साधना का रूप ले लेती है, तब वह केवल नृत्य नहीं रहती, वह तपस्या बन जाती है। संकट मोचन संगीत समारोह के पावन मंच पर जब मशहूर कथक नृत्यांगना विधा लाल ने अपनी पहली हाजिरी दी, तो यह केवल एक प्रस्तुति नहीं, बल्कि वर्षों की साधना, गुरु-भक्ति और भारतीय संस्कृति के जीवंत प्रवाह का साक्षात् अनुभव था। उनके पगों की थिरकन में जहां लय का अनुशासन था, वहीं भावों में आध्यात्मिक ऊंचाई। इसी आध्यात्मिक वातावरण में जयपुर घराने की सुप्रसिद्ध इस कथक नृत्यांगना ने सीनियर रिपोर्टर सुरेश गांधी से विशेष बातचीत में कथक, गुरु-शिष्य परंपरा, आधुनिकता और अपने जीवन के विविध आयामों पर चर्चा की शुरु की तो गुरु-परंपरा, आधुनिकता और आत्मानुभूति के अनेक आयाम खुलते चले गए। वह स्पष्ट शब्दों में कहती हैं, आज के समय में इंटरनेट और यूट्यूब के माध्यम से बहुत कुछ सीखा जा सकता है, लेकिन कथक जैसी शास्त्रीय कला की बारीकियां वहां से नहीं मिलतीं। गुरु के चरण छुए बिना, उनके सान्निध्य में बैठे बिना, इस कला का वास्तविक ज्ञान अधूरा ही रहता है। उनका मानना है कि तकनीक केवल बाहरी रूप दिखा सकती है, लेकिन ‘रस’, ‘भाव’ और ‘आंतरिक संवाद’ केवल गुरु ही सिखा सकते हैं। उनका कती है, गुरु आपको केवल स्टेप्स नहीं सिखाते, वे आपको उस भाव तक ले जाते हैं, जहां नृत्य आत्मा से जुड़ता है, प्रस्तुत है उनसे बातचीत के कुछ प्रमुख अंश :-</p>



<p><strong>सुरेश गांधी : संकट मोचन के इस आध्यात्मिक मंच पर प्रस्तुति का अनुभव आपके लिए कितना विशेष रहा?<br>विधा लाल : </strong>यह मंच मेरे लिए केवल प्रस्तुति का स्थल नहीं, बल्कि साधना का मंदिर है। यहां नृत्य करना ऐसा है मानो मैं अपने भीतर के भावों को सीधे ईश्वर के समक्ष अर्पित कर रही हूं। जब मैंने ‘शंभू शिव शंभू’ से आरंभ किया, तो लगा जैसे हर थिरकन, हर चक्कर किसी अदृश्य शक्ति से जुड़ रहा है। यह अनुभव शब्दों में नहीं, केवल अनुभूति में ही व्यक्त होता है।</p>



<p><strong>प्रश्न : आज के डिजिटल युग में ऑनलाइन माध्यमों से कथक सीखने का चलन बढ़ा है, आप इसे कैसे देखती हैं?<br>उत्तर : </strong>तकनीक एक माध्यम हो सकती है, लेकिन वह गुरु का स्थान कभी नहीं ले सकती। कथक की बारीकियां, उसकी लय, उसकी आत्मा, उसका भाव, ये सब केवल गुरु के सान्निध्य में ही सीखे जा सकते हैं। गुरु के चरण स्पर्श किए बिना, उनके साक्षात् मार्गदर्शन के बिना यह कला अधूरी ही रहती है। इंटरनेट आपको रूप दिखा सकता है, लेकिन रस नहीं दे सकता।</p>



<p><strong>प्रश्न : आपकी नृत्य-यात्रा की शुरुआत कैसे हुई?<br>उत्तर : </strong>मैंने छह वर्ष की आयु में नृत्य सीखना शुरू किया। मेरे परिवार में यह परंपरा नहीं थी, लेकिन मेरे भीतर एक स्वाभाविक आकर्षण था। मेरे पिता उमेश जोशी पत्रकार रहे हैं, पर ससुराल पक्ष शास्त्रीय कला से जुड़ा हुआ है। मैंने अपनी गुरु गीतांजलि लाल से निरंतर शिक्षा ली, विवाह से पहले भी और बाद में भी।</p>



<p><strong>प्रश्न : गुरु-शिष्य परंपरा आपके लिए क्या मायने रखती है?<br>उत्तर :</strong> गुरु केवल तकनीक नहीं सिखाते, वे जीवन की दिशा देते हैं। मेरी साधना में मेरी गुरु सितारा देवी की परंपरा का गहरा प्रभाव है। उन्होंने हमें सिखाया कि नृत्य को केवल करना नहीं, उसे जीना है।</p>



<p><strong>प्रश्न : आप 56 से अधिक देशों में प्रस्तुति दे चुकी हैं, विदेशों में भारतीय नृत्य के प्रति कैसा आकर्षण देखा?<br>उत्तर : </strong>विदेशों में भारतीय शास्त्रीय नृत्य के प्रति गहरा सम्मान है। लोग हमारे पास आकर कहते हैं कि उन्हें घुंघरू चाहिए, वे इस परंपरा को अपनाना चाहते हैं। हमारे नृत्य की भाव-भंगिमा, वेशभूषा और आध्यात्मिकता उन्हें बहुत आकर्षित करती है।</p>



<p><strong>प्रश्न : गिनीज बुक में दर्ज आपके रिकॉर्ड को आप कैसे देखती हैं?<br>उत्तर :</strong> वह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन मेरे लिए वह अंत नहीं है। 103 चक्कर एक प्रतीक हैं, असली साधना तो निरंतर रियाज में है। आज भी मैं घंटों अभ्यास करती हूं, क्योंकि कला में ठहराव नहीं होना चाहिए।</p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-large"><a href="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/kathak-nrityangna-veedha-lal.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" width="690" height="1024" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/kathak-nrityangna-veedha-lal-690x1024.jpg" alt="" class="wp-image-881920" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/kathak-nrityangna-veedha-lal-690x1024.jpg 690w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/kathak-nrityangna-veedha-lal-202x300.jpg 202w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/kathak-nrityangna-veedha-lal-768x1141.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/kathak-nrityangna-veedha-lal-1034x1536.jpg 1034w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/kathak-nrityangna-veedha-lal.jpg 1379w" sizes="auto, (max-width: 690px) 100vw, 690px" /></a></figure>
</div>


<p><strong>प्रश्न : जयपुर घराने की विशेषताओं को आप कैसे परिभाषित करेंगी?<br>उत्तर :</strong> जयपुर घराना शक्ति, लय और जटिलता का संगम है। इसमें चक्कर, परन, उठान और ठाट की अद्भुत संरचना होती है। यह परंपरा भानुजी महाराज से शुरू होकर पंडित दुर्गालाल और सुंदर प्रसाद जैसे गुरुओं से समृद्ध हुई है। यहां भाव की सात्विकता और ताल की गहराई दोनों का संतुलन है।</p>



<p><strong>प्रश्न : क्या कथक में प्रयोग की गुंजाइश है?<br>उत्तर :</strong> निश्चित रूप से। मैं हमेशा नए प्रयोग करती हूं, लेकिन यह ध्यान रखती हूं कि मूल परंपरा अक्षुण्ण रहे। आधुनिकता और परंपरा का संतुलन ही कथक को जीवंत बनाए रखता है।</p>



<p><strong>प्रश्न : नृत्य आपके लिए क्या है, कला, पेशा या कुछ और?<br>उत्तर :</strong> मेरे लिए नृत्य एक आध्यात्मिक अनुभव है। जब मैं नृत्य करती हूं, तो ऐसा लगता है जैसे मैं अपने भीतर के ईश्वर से संवाद कर रही हूं। यही अनुभूति मुझे निरंतर साधना के लिए प्रेरित करती है।</p>



<p><strong>प्रश्न : परिवार और कला के बीच संतुलन कैसे बना पाती हैं?<br>उत्तर : </strong>मुझे अपने परिवार का पूरा सहयोग मिला है। यही कारण है कि मैं दोनों को संतुलित कर पाई हूं। मेरा बेटा भी इस परंपरा में रुचि ले रहा है, यह मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी है।</p>



<p><strong>प्रश्न : रियलिटी शो और नई पीढ़ी को लेकर आपका क्या दृष्टिकोण है?<br>उत्तर : </strong>रियलिटी शो मंच देते हैं, लेकिन कला की गहराई वहां नहीं मिलती। युवा पीढ़ी को धैर्य और साधना के साथ आगे बढ़ना चाहिए। कथक में भविष्य उज्ज्वल है, बस उसे सही दिशा देने की जरूरत है।</p>



<p><strong>प्रश्न : काशी और हनुमत दरबार से आपका जुड़ाव कैसा रहा?<br>उत्तर : </strong>मैं 2014-15 में पहली बार काशी आई थी, तभी से इस शहर ने मुझे अपनी ओर खींच लिया। यहां प्रस्तुति देना मेरी पुरानी इच्छा थी, जो आज पूरी हुई। हनुमत दरबार में नृत्य करना मेरे लिए सौभाग्य और आशीर्वाद है। यह मंच मेरे लिए केवल प्रदर्शन का स्थान नहीं, बल्कि साधना का धाम है। यहां नृत्य करना किसी मंदिर में पूजा करने जैसा है। जब ‘शंभू शिव शंभू’ पर मैंने शुरुआत की, तो लगा जैसे हर थिरकन सीधे भगवान तक पहुंच रही है।</p>



<p><strong>प्रश्न : आपकी प्रस्तुति में शास्त्रीयता के साथ भाव की गहराई भी दिखी, इसका रहस्य?<br>उत्तर : </strong>कथक केवल तकनीक नहीं है, यह भाव और भक्ति का संगम है। मेरे लिए हर मुद्रा एक प्रार्थना है। अगर मन में श्रद्धा हो, तो वह दर्शकों तक स्वतः पहुंच जाती है।</p>



<p><strong>प्रश्नः आप विदुषी सितारा देवी की शिष्या रही हैं, उनकी शिक्षा ने आपको कैसे गढ़ा?<br>उत्तर :</strong> गुरुजी ने हमें सिखाया कि मंच पर जाना मतलब आत्मा को खोल देना। उन्होंने हमेशा कहा, “नृत्य करो, लेकिन पहले उसे जियो।” आज जो भी मैं हूं, उनकी ही देन है। इस मंच पर अपनी प्रस्तुति मैंने उन्हें समर्पित की।</p>



<p><strong>प्रश्न : गिनीज बुक में नाम दर्ज होने के बाद जिम्मेदारी बढ़ी है?<br>उत्तर : </strong>बिल्कुल, यह सम्मान जितना बड़ा है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी है। अब हर प्रस्तुति में खुद को और बेहतर करना होता है। लेकिन मैं इसे दबाव नहीं, प्रेरणा मानती हूं।</p>



<p><strong>प्रश्नः तीन-तीन तबलों की संगत में आपकी थिरकन का तालमेल अद्भुत था, इसकी तैयारी कैसे होती है?<br>उत्तर : </strong>इसके लिए रियाज ही एकमात्र रास्ता है। घंटों तक ताल और लय पर काम करना पड़ता है। जब अभ्यास गहरा हो जाता है, तो मंच पर ताल अपने आप साथ चलने लगती है।</p>



<p><strong>प्रश्न : काशी और यहां के दर्शकों को आप कैसे देखती हैं?<br>उत्तर : </strong>काशी के दर्शक बेहद संवेदनशील और जानकार हैं। यहां लोग केवल देखते नहीं, महसूस करते हैं। यही कारण है कि यहां प्रस्तुति देना हर कलाकार का सपना होता है।</p>



<p><strong>प्रश्नः युवा कलाकारों के लिए आपका संदेश?<br>उत्तर : </strong>शॉर्टकट से कला नहीं सीखी जा सकती। धैर्य, अनुशासन और गुरु के प्रति समर्पण ही सफलता का मार्ग है। जितना समय साधना को देंगे, उतना ही कला आपको वापस देगी।</p>



<p>फिलहाल, संकट मोचन की इस रात्रि में विधा लाल के शब्द और उनके घुंघरुओं की अनुगूंज एक ही संदेश देती है, कला केवल प्रदर्शन नहीं, साधना है; और साधना का पथ गुरु के चरणों से होकर ही गुजरता है। उनकी वाणी में विनम्रता है, अनुभूति में गहराई, और हर उत्तर में वह अनवरत यात्रा, जो कथक को केवल नृत्य नहीं, बल्कि आत्मा का उत्सव बना देती है। विधा लाल की बातों में जितनी विनम्रता, उतनी ही गहराई भी झलकती है। उनके घुंघरुओं की गूंज केवल मंच तक सीमित नहीं, बल्कि साधना और समर्पण की वह कहानी है जो हर कलाकार को प्रेरित करती है।</p>



<p><strong>छह वर्ष की आयु से साधना की शुरुआत</strong><br>विधा लाल का कथक से रिश्ता किसी विरासत में नहीं मिला, बल्कि यह उनकी स्वयं की अर्जित साधना है। उनके पिता उमेश जोशी एक पत्रकार रहे हैं, जबकि ससुराल पक्ष भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य से जुड़ा हुआ है। वह बताती हैं, “मैंने छह साल की उम्र से नृत्य सीखना शुरू किया। तब शायद यह केवल एक रुचि थी, लेकिन धीरे-धीरे यह मेरी पहचान बनती गई।” उन्होंने अपनी गुरु गीतांजलि लाल से विवाह से पहले भी और विवाह के बाद भी निरंतर प्रशिक्षण लिया। यह निरंतरता ही उनके नृत्य की गहराई का आधार बनी।</p>
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		<title>प्रियल सुनानिया में जीवंत हुई विक्रमादित्य युग की राजकुमारी</title>
		<link>https://dastaktimes.org/vikramaditya-era-princess-comes-alive-in-priyal-sunaniya/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[DN VERMA]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 08 Apr 2026 09:55:08 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[वाराणसी]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="300" height="166" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/supriyal-sunaniya-feature-300x166.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/supriyal-sunaniya-feature-300x166.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/supriyal-sunaniya-feature.jpg 562w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />मंच पर राजकुमारी, भीतर इतिहास की साधक, प्रियल सुनानिया से खास बातचीत काशी के बीएलडब्ल्यू के सूर्य सरोवर मैदान में मंचित “सम्राट विक्रमादित्य” महानाट्य केवल दृश्य वैभव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना का सजीव रूप है। इसी भव्यता के बीच प्रियल सुनानिया का राजकुमारी रूप दर्शकों को ठहरने, सोचने और इतिहास को महसूस करने पर मजबूर &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="166" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/supriyal-sunaniya-feature-300x166.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/supriyal-sunaniya-feature-300x166.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/supriyal-sunaniya-feature.jpg 562w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />
<h3 class="wp-block-heading">मंच पर राजकुमारी, भीतर इतिहास की साधक, प्रियल सुनानिया से खास बातचीत</h3>



<p><strong><em>काशी के बीएलडब्ल्यू के सूर्य सरोवर मैदान में मंचित “सम्राट विक्रमादित्य” महानाट्य केवल दृश्य वैभव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना का सजीव रूप है। इसी भव्यता के बीच प्रियल सुनानिया का राजकुमारी रूप दर्शकों को ठहरने, सोचने और इतिहास को महसूस करने पर मजबूर करता है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के साथ रंगमंच की साधना, यह संतुलन उनके समर्पण की गवाही देता है। प्रियल का अभिनय संवादों तक सीमित नहीं, बल्कि भावों की वह धारा है जो सीधे दर्शकों के भीतर उतरती है। यह प्रस्तुति बताती है कि नई पीढ़ी केवल तकनीक की नहीं, बल्कि अपनी जड़ों की भी संवाहक है। “सम्राट विक्रमादित्य” का यह मंचन, और उसमें प्रियल की भूमिका, इस बात का प्रमाण है कि जब कला और इतिहास का संगम होता है, तो केवल नाटक नहीं, एक युग पुनर्जीवित होता है</em></strong></p>



<p>&#8211;<strong>सुरेश गांधी</strong></p>



<p>वाराणसी के बीएलडब्ल्यू के सूर्य सरोवर मैदान में इन दिनों मंचित हो रहा “सम्राट विक्रमादित्य” महानाट्य सिर्फ एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि इतिहास, कला और भावनाओं का अद्भुत संगम बन गया है। भव्य लाइट एंड साउंड, विशाल मंच सज्जा और सैकड़ों कलाकारों की जीवंत प्रस्तुति के बीच एक चेहरा ऐसा भी है, जो दर्शकों के मन में विशेष छाप छोड़ रहा है, राजकुमारी की भूमिका निभा रहीं प्रियल सुनानिया। खास यह है कि प्रियल सुनानिया की कहानी सिर्फ एक कलाकार की कहानी नहीं है, बल्कि उस जुनून की कहानी है, जो साधारण से असाधारण बनने की राह दिखाता है। प्रियल खुद मानती हैं कि यह नाटक उनके लिए सिर्फ एक मंच नहीं, बल्कि इतिहास को जीने का अवसर है। राजकुमारी के किरदार में वह केवल संवाद नहीं बोलतीं, बल्कि उस युग की भावनाओं को महसूस करती हैं। उनका कहना है कि जब दर्शक तालियां बजाते हैं, तो लगता है कि मेहनत सफल हो गई। यही वह पल होता है, जिसके लिए एक कलाकार दिन-रात मेहनत करता है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहीं प्रियल पिछले आठ-नौ वर्षों से रंगमंच से जुड़ी हैं। उनकी अभिनय यात्रा जितनी दिलचस्प है, उतनी ही प्रेरणादायक भी। सीनियर रिपोर्टर सुरेश गांधी ने प्रियल सुनानिया से खास बातचीत की, जिसमें उन्होंने अपने अभिनय, संघर्ष, अनुभव और इस महानाट्य से जुड़े भावनात्मक पक्ष को खुलकर साझा किया। प्रस्तुत है बाचतीत के कछ प्रमुख अंशः-</p>



<p><strong>सुरेश गांधी : प्रियल, सबसे पहले यह बताइए कि “सम्राट विक्रमादित्य” महानाट्य में आप कौन-सी भूमिका निभा रही हैं?</strong><br><strong>प्रियल सुनानिया :</strong> मैं इस महानाट्य में राजकुमारी की भूमिका निभा रही हूँ। यह किरदार मेरे लिए सिर्फ एक रोल नहीं है, बल्कि एक जिम्मेदारी है। राजकुमारी का चरित्र बहुत ही संवेदनशील, गरिमामय और आत्मविश्वासी है। उसे मंच पर जीवंत करना मेरे लिए चुनौती भी है और गर्व की बात भी।</p>



<p><strong>सवाल : इस भूमिका तक पहुंचने की आपकी यात्रा कैसी रही?<br>जवाब :</strong> मेरी यात्रा बिल्कुल संयोग से शुरू हुई थी। मैं शुरुआत में डांस के लिए आई थी। मुझे लगा था कि बस नृत्य ही करूंगी, लेकिन निर्देशक की नजर मुझ पर पड़ी और उन्होंने मुझे इस भूमिका के लिए चुन लिया। शुरू में मैं थोड़ी हिचकिचाई, लेकिन धीरे-धीरे अभिनय से जुड़ती चली गई। आज यह मेरी पहचान बन चुका है।</p>



<p><strong>सवाल : आपने कहा कि आप कई वर्षों से रंगमंच से जुड़ी हैं, इस दौरान क्या बदलाव महसूस किए?<br>जवाब : </strong>जब मैंने शुरुआत की थी, तब मैं बहुत नर्वस रहती थी। संवाद बोलने में भी झिझक होती थी। लेकिन धीरे-धीरे आत्मविश्वास बढ़ा। हर नाटक ने मुझे कुछ नया सिखाया। अब मंच पर जाने से डर नहीं लगता, बल्कि एक अलग ही ऊर्जा मिलती है।</p>



<p><strong>सवाल : इस महानाट्य में काम करना आपके लिए कितना खास है?<br>जवाब : </strong>यह मेरे लिए बेहद खास अनुभव है। इतने बड़े मंच पर, इतने बड़े स्तर पर काम करना हर कलाकार का सपना होता है। यहां केवल अभिनय नहीं हो रहा, बल्कि हम इतिहास को जी रहे हैं। जब मैं राजकुमारी का परिधान पहनती हूँ और मंच पर उतरती हूँ, तो सच में ऐसा लगता है जैसे मैं उसी युग में पहुंच गई हूँ।</p>



<p><strong>सवाल : इंजीनियरिंग की पढ़ाई और रंगमंच, दोनों को कैसे संतुलित करती हैं?<br>जवाब : </strong>यह थोड़ा मुश्किल जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। समय प्रबंधन बहुत जरूरी है। मैं अपनी पढ़ाई को भी उतना ही महत्व देती हूँ जितना अभिनय को। दिन में पढ़ाई और शाम को रिहर्सल, इसी तरह संतुलन बना पाती हूँ।</p>



<p><strong>सवाल : आपके परिवार का इस यात्रा में कितना सहयोग रहा?<br>जवाब :</strong> मेरे परिवार का बहुत बड़ा योगदान है। शुरुआत में उन्हें थोड़ा संदेह था, लेकिन जब उन्होंने मेरा जुनून देखा, तो उन्होंने मेरा पूरा साथ दिया। आज वे मेरे सबसे बड़े सपोर्ट सिस्टम हैं।</p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-full"><a href="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/supriyal-sunaniya.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" width="562" height="866" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/supriyal-sunaniya.jpg" alt="" class="wp-image-881916" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/supriyal-sunaniya.jpg 562w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/supriyal-sunaniya-195x300.jpg 195w" sizes="auto, (max-width: 562px) 100vw, 562px" /></a></figure>
</div>


<p><strong>सवाल : इस नाटक के जरिए दर्शकों को क्या संदेश देना चाहती हैं?<br>जवाब : </strong>यह नाटक हमें हमारी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ता है। सम्राट विक्रमादित्य का युग न्याय, पराक्रम और समृद्धि का प्रतीक रहा है। हम चाहते हैं कि लोग इस इतिहास को समझें और उससे प्रेरणा लें।</p>



<p><strong>सवाल : मंच पर सबसे चुनौतीपूर्ण क्षण कौन-सा होता है?<br>जवाब : </strong>लाइव प्रदर्शन में हर पल चुनौतीपूर्ण होता है। एक छोटी-सी गलती भी सबके सामने आ जाती है। लेकिन यही तो रंगमंच की खूबसूरती है, यह हमें हर पल सजग और जीवंत बनाए रखता है।</p>



<p><strong>सवाल : आपकी आगे की क्या योजनाएं हैं?<br>जवाब :</strong> मैं अभिनय को आगे भी जारी रखना चाहती हूँ। साथ ही अपनी पढ़ाई पूरी करके एक अच्छा करियर बनाना चाहती हूँ। अगर मौका मिला, तो फिल्मों और बड़े मंचों पर भी काम करना चाहूंगी।</p>



<p>सवाल : युवा कलाकारों के लिए आपका क्या संदेश है?<br>जवाब : अगर आप किसी चीज को लेकर जुनूनी हैं, तो उसे जरूर करें। शुरुआत में कठिनाइयाँ आएंगी, लेकिन धैर्य और मेहनत से सब संभव है।</p>



<p><strong>सवाल : क्या नई पीढ़ी की पहचान बना रहा है यह रंगमंच?<br>जवाब : </strong>आज के डिजिटल दौर में जहां लोग मोबाइल और स्क्रीन में व्यस्त हैं, वहीं प्रियल जैसी युवा कलाकार रंगमंच को जीवित रखे हुए हैं। उनका यह प्रयास न केवल सराहनीय है, बल्कि प्रेरणादायक भी है। ऐस ए रिपोर्टर मेरा मानना है “सम्राट विक्रमादित्य” महानाट्य केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आंदोलन है। और इस आंदोलन की धड़कन हैं, प्रियल सुनानिया जैसी युवा कलाकार, जो अपने अभिनय से इतिहास को जीवंत कर रही हैं। उनकी यात्रा यह बताती है कि अगर जुनून सच्चा हो, तो रास्ते खुद बनते चले जाते हैं।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>एकजुटता से ही बनेगा मजबूत समाज, संगठन ही असली ताकत: महेन्द्र पाण्डेय</title>
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		<dc:creator><![CDATA[DN VERMA]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 08 Apr 2026 09:50:39 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[वाराणसी]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="300" height="131" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/mahendra-pandey-300x131.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/mahendra-pandey-300x131.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/mahendra-pandey-1024x446.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/mahendra-pandey-768x334.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/mahendra-pandey.jpg 1185w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />विसुंदरपुर के आदर्श इंटर कॉलेज में बुद्धिजीवियों का मंथन, सामाजिक चुनौतियों पर हुई गंभीर चर्चा, संस्कार, समरसता और सहयोग ही समाज को नई दिशा दे सकते हैं &#8211;सुरेश गांधी वाराणसी : मझवा विधानसभा क्षेत्र के आदर्श इंटर कॉलेज, विसुंदरपुर में रविवार को बुद्धिजीवी समाज के सदस्यों की एक अहम बैठक आयोजित की गई। बैठक में &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="131" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/mahendra-pandey-300x131.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/mahendra-pandey-300x131.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/mahendra-pandey-1024x446.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/mahendra-pandey-768x334.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/mahendra-pandey.jpg 1185w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />
<h3 class="wp-block-heading">विसुंदरपुर के आदर्श इंटर कॉलेज में बुद्धिजीवियों का मंथन, सामाजिक चुनौतियों पर हुई गंभीर चर्चा, संस्कार, समरसता और सहयोग ही समाज को नई दिशा दे सकते हैं</h3>



<p>&#8211;<strong>सुरेश गांधी</strong></p>



<p><strong>वाराणसी : </strong>मझवा विधानसभा क्षेत्र के आदर्श इंटर कॉलेज, विसुंदरपुर में रविवार को बुद्धिजीवी समाज के सदस्यों की एक अहम बैठक आयोजित की गई। बैठक में क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली। कार्यक्रम का केंद्र बिंदु समाज की एकता, संगठन की मजबूती और बदलते सामाजिक परिवेश में सामूहिक भूमिका तय करना रहा। मुख्य वक्ता समाजसेवी महेन्द्र पाण्डेय ने अपने संबोधन में कहा कि किसी भी समाज की पहचान उसकी एकजुटता और संगठन से होती है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में समाज को बांटने वाली शक्तियां लगातार सक्रिय हैं, ऐसे में सभी वर्गों को आपसी मतभेद भुलाकर एक मंच पर आना होगा। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि यदि समाज संगठित रहेगा तो कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होगी।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><a href="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/mahendra-pandey1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="391" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/mahendra-pandey1-1024x391.jpg" alt="" class="wp-image-881912" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/mahendra-pandey1-1024x391.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/mahendra-pandey1-300x115.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/mahendra-pandey1-768x294.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/mahendra-pandey1.jpg 1266w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a></figure>



<p>उन्होंने युवाओं को विशेष रूप से संबोधित करते हुए कहा कि शिक्षा के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारियों को समझना भी जरूरी है। केवल व्यक्तिगत विकास ही नहीं, बल्कि समाज के उत्थान के लिए भी युवाओं को आगे आना होगा। उन्होंने कहा संस्कार, समरसता और सहयोग ही समाज को नई दिशा दे सकते हैं. बैठक में अन्य वक्ताओं ने भी समाज में व्याप्त कुरीतियों, आपसी विघटन और जागरूकता की कमी जैसे मुद्दों पर चिंता व्यक्त की। वक्ताओं ने कहा कि शिक्षा और संवाद के माध्यम से ही समाज को मजबूत और सशक्त बनाया जा सकता है।</p>



<p>इस दौरान कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव भी पारित किए गए, जिनमें युवाओं को शिक्षा और रोजगार के प्रति प्रेरित करना, सामाजिक कार्यक्रमों में सहभागिता बढ़ाना और समाज के भीतर सहयोग की भावना को और सुदृढ़ करना शामिल रहा। कार्यक्रम के अंत में सभी उपस्थित लोगों ने समाज की एकता और संगठन को मजबूत बनाने का संकल्प लिया। साथ ही यह भी निर्णय लिया गया कि इस प्रकार की बैठकों का आयोजन भविष्य में निरंतर किया जाएगा, ताकि समाज को एक नई दिशा और सकारात्मक ऊर्जा मिलती रहे।</p>
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		<title>हर द्वार दस्तक, हर बच्चा स्कूल : काशी से शिक्षा क्रांति का शंखनाद</title>
		<link>https://dastaktimes.org/every-door-knock-every-child-school/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[DN VERMA]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 04 Apr 2026 16:37:48 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[वाराणसी]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="300" height="155" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi2-300x155.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi2-300x155.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi2-1024x529.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi2-768x397.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi2.jpg 1500w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />बच्चों के बीच पहुंचे सीएम, अपने हाथों से परोसा भोजन सीएम योगी का आह्वान : ‘स्कूल चलो अभियान’ बने जनांदोलन; शिक्षा नहीं सिर्फ डिग्री, संस्कार और राष्ट्र निर्माण का आधार, ऑपरेशन कायाकल्प’ के तहत 1.36 लाख से अधिक विद्यालयों में बुनियादी सुविधाएं विकसित हुई हैं और ‘ऑपरेशन निपुण’ से बच्चों में सीखने की रुचि बढ़ी &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="155" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi2-300x155.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi2-300x155.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi2-1024x529.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi2-768x397.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi2.jpg 1500w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />
<h3 class="wp-block-heading">बच्चों के बीच पहुंचे सीएम, अपने हाथों से परोसा भोजन</h3>



<p><strong><em>सीएम योगी का आह्वान : ‘स्कूल चलो अभियान’ बने जनांदोलन; शिक्षा नहीं सिर्फ डिग्री, संस्कार और राष्ट्र निर्माण का आधार, ऑपरेशन कायाकल्प’ के तहत 1.36 लाख से अधिक विद्यालयों में बुनियादी सुविधाएं विकसित हुई हैं और ‘ऑपरेशन निपुण’ से बच्चों में सीखने की रुचि बढ़ी है, काशी में कालभैरव व बाबा विश्वनाथ के दर्शन के साथ हुआ शुभारंभ</em></strong></p>



<p>&#8211;<strong>सुरेश गांधी</strong></p>



<p><strong>वाराणसी : </strong>उत्तर प्रदेश में शिक्षा को जन-जन तक पहुंचाने और हर बच्चे को विद्यालय से जोड़ने के संकल्प के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने काशी की धरती से ‘स्कूल चलो अभियान’ का भव्य शुभारंभ किया। शिवपुर स्थित कंपोजिट विद्यालय से अभियान की शुरुआत करते हुए उन्होंने इसे केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनभागीदारी से चलने वाला जनांदोलन बनाने का आह्वान किया। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कहा शिक्षा केवल सर्टिफिकेट या डिग्री नहीं, बल्कि मनुष्य को संस्कारी और राष्ट्र को सशक्त बनाने का सबसे बड़ा माध्यम है।</p>



<p><strong>अब समय यशस्वी बनने का</strong><br>अपने संबोधन के अंत में मुख्यमंत्री ने कहा यह कुड़ने का समय नहीं, यशस्वी बनने का समय है। हर व्यक्ति इस अभियान का हिस्सा बने और बच्चों को स्कूल तक पहुंचाए। काशी से शुरू हुआ ‘स्कूल चलो अभियान’ अब एक व्यापक सामाजिक आंदोलन का रूप लेता दिख रहा है। सरकार की योजनाओं, संसाधनों और जनभागीदारी के संगम से यह पहल न केवल शिक्षा के स्तर को ऊंचा उठाएगी, बल्कि आने वाले समय में एक सशक्त, संस्कारित और आत्मनिर्भर समाज की नींव भी मजबूत करेगी।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><a href="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="525" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi1-1024x525.jpg" alt="" class="wp-image-881501" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi1-1024x525.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi1-300x154.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi1-768x394.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi1-1536x787.jpg 1536w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi1.jpg 1600w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a></figure>



<p><strong>शिक्षा: समाज और राष्ट्र की असली ताकत<br></strong>मुख्यमंत्री ने कहा कि यदि सामाजिक और आर्थिक समानता लानी है, तो हर बच्चे तक शिक्षा पहुंचाना अनिवार्य है। जब बच्चा साक्षर होगा, तभी समाज विकसित होगा और प्रदेश समृद्ध बनेगा, अन्यथा निरक्षरता समाज को कमजोर कर देगी। उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य है कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे।</p>



<p><strong>2017 से पहले बनाम आज : बदली तस्वीर<br></strong>मुख्यमंत्री ने पुरानी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि पहले विद्यालयों की हालत जर्जर थी और बच्चों की संख्या लगातार घट रही थी। एक प्रसंग साझा करते हुए उन्होंने कहा रुचि पढ़ने में नहीं है या पढ़ाने में नहीं है, यह अंतर समझना होगा। आज ‘ऑपरेशन कायाकल्प’ के तहत 1.36 लाख से अधिक विद्यालयों में बुनियादी सुविधाएं विकसित हुई हैं और ‘ऑपरेशन निपुण’ से बच्चों में सीखने की रुचि बढ़ी है।</p>



<p><strong>ड्रॉपआउट 19% से 3%-अब लक्ष्य शून्य</strong><br>मुख्यमंत्री ने बताया कि प्रदेश में ड्रॉपआउट दर 19 प्रतिशत से घटकर 3 प्रतिशत हो गई है। उन्होंने शिक्षकों से इसे शून्य करने का आह्वान करते हुए कहा कि हर घर तक पहुंचकर बच्चों को स्कूल लाना होगा।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><a href="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi2-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="529" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi2-1-1024x529.jpg" alt="" class="wp-image-881502" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi2-1-1024x529.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi2-1-300x155.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi2-1-768x397.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi2-1.jpg 1500w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a></figure>



<p><strong>हर घर दस्तक : 1 से 15 अप्रैल तक विशेष अभियान<br></strong>‘स्कूल चलो अभियान’ के तहत 1 से 15 अप्रैल तक शिक्षक घर-घर जाकर बच्चों का नामांकन सुनिश्चित करेंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि अगर कोई बच्चा स्कूल से बाहर है, तो यह पूरे समाज की जिम्मेदारी है।</p>



<p><strong>80 हजार करोड़ का निवेश, योजनाओं की झड़ी</strong><br>मुख्यमंत्री ने बताया कि प्रदेश सरकार शिक्षा पर 80 हजार करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर रही है। बच्चों को निःशुल्क ड्रेस, किताबें. दो चरणों में डीबीटी के माध्यम से सहायता. 25 लाख बालिकाओं को ‘सुमंगला योजना’ का लाभ. कस्तूरबा गांधी विद्यालयों का विस्तार.</p>



<p><strong>बेसिक शिक्षा में भरोसा बढ़ा : मंत्री संदीप सिंह<br></strong>बेसिक शिक्षा मंत्री संदीप सिंह ने कहा कि परिषदीय विद्यालयों में 97% बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित हो चुकी हैं, जिससे अभिभावकों का विश्वास बढ़ा है और बच्चों का नामांकन तेजी से बढ़ा है।</p>



<figure class="wp-block-image size-full"><a href="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" width="1000" height="890" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi4.jpg" alt="" class="wp-image-881503" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi4.jpg 1000w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi4-300x267.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/siksha-cm-yogi4-768x684.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1000px) 100vw, 1000px" /></a></figure>



<p><strong>गरीब बच्चों के सपनों को पंख : अटल आवासीय विद्यालय<br></strong>श्रम मंत्री अनिल राजभर ने कहा कि अटल आवासीय विद्यालयों ने मजदूरों के बच्चों के जीवन में बड़ा बदलाव लाया है, जहां अब वे बेहतर सुविधाओं के साथ शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।</p>



<p><strong>बच्चों के बीच पहुंचे सीएम, अपने हाथों से परोसा भोजन<br></strong>कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने बच्चों से संवाद किया और मिड डे मील योजना के तहत बने भोजन को अपने हाथों से परोसकर उन्हें खिलाया। यह दृश्य पूरे कार्यक्रम का सबसे भावनात्मक क्षण बन गया।</p>



<p><strong>धार्मिक आस्था का संगम<br></strong>कार्यक्रम से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने काशी के कोतवाल कालभैरव मंदिर में दर्शन-पूजन किया और इसके बाद काशी विश्वनाथ धाम पहुंचकर बाबा विश्वनाथ का अभिषेक कर प्रदेश की खुशहाली की कामना की।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>विक्रमादित्य महोत्सव : अतीत का पुनर्जन्म, भविष्य का उद्घोष, राष्ट्रचेतना का महाजागरण</title>
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		<dc:creator><![CDATA[DN VERMA]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 04 Apr 2026 16:31:23 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[वाराणसी]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="300" height="123" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmaditya-naty01-300x123.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmaditya-naty01-300x123.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmaditya-naty01-1024x420.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmaditya-naty01-768x315.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmaditya-naty01-1536x631.jpg 1536w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmaditya-naty01.jpg 2022w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />गंगा की धारा जब समय से संवाद करती है, तो इतिहास केवल स्मृति नहीं रहता, वह अनुभव बन जाता है। काशी की उसी अनंत चेतना में जब सम्राट विक्रमादित्य की गाथा गूंजी, तो लगा मानो सदियों पुराना स्वर्णिम भारत फिर से सांस लेने लगा हो। महाकाल की भस्म आरती, वैदिक मंत्रों की गूंज, घोड़ों की &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="123" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmaditya-naty01-300x123.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmaditya-naty01-300x123.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmaditya-naty01-1024x420.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmaditya-naty01-768x315.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmaditya-naty01-1536x631.jpg 1536w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmaditya-naty01.jpg 2022w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />
<p><strong><em>गंगा की धारा जब समय से संवाद करती है, तो इतिहास केवल स्मृति नहीं रहता, वह अनुभव बन जाता है। काशी की उसी अनंत चेतना में जब सम्राट विक्रमादित्य की गाथा गूंजी, तो लगा मानो सदियों पुराना स्वर्णिम भारत फिर से सांस लेने लगा हो। महाकाल की भस्म आरती, वैदिक मंत्रों की गूंज, घोड़ों की टाप और तलवारों की चमक के बीच मंच पर जो दृश्य उभरा, वह केवल एक नाट्य प्रस्तुति नहीं था, वह भारतीय आत्मा का पुनर्जागरण था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और मोहन यादव की उपस्थिति में आरंभ हुआ यह महोत्सव “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की उस जीवंत तस्वीर में बदल गया, जिसमें काशी और उज्जैन एक ही सांस्कृतिक सूत्र में बंधे नजर आए. तीन मंचों पर फैला यह महानाट्य दर्शकों के लिए “लाइव इतिहास” बन गया, जहां न्याय, धर्म, पराक्रम और लोककल्याण की वे गाथाएं जीवंत हुईं, जिन्होंने भारत की आत्मा को आकार दिया। यह आयोजन बताता है कि भारत जब अपनी जड़ों को छूता है, तो वह केवल अतीत नहीं देखता, वह भविष्य गढ़ता है।</em></strong></p>



<p>&#8211;<strong>सुरेश गांधी</strong></p>



<p>गंगा की धारा जब समय से संवाद करती है, तो इतिहास केवल स्मृति नहीं रहता, वह अनुभव बन जाता है। काशी की उसी अनंत चेतना में जब सम्राट विक्रमादित्य की गाथा गूंजी, तो लगा मानो सदियों पुराना स्वर्णिम भारत फिर से सांस लेने लगा हो। महाकाल की भस्म आरती, वैदिक मंत्रों की गूंज, घोड़ों की टाप और तलवारों की चमक के बीच मंच पर जो दृश्य उभरा, वह केवल एक नाट्य प्रस्तुति नहीं था, वह भारतीय आत्मा का पुनर्जागरण था। तीन दिवसीय ‘सम्राट विक्रमादित्य महोत्सव’ का भव्य शुभारंभ काशी को कुछ घंटों के लिए प्राचीन भारत के उस युग में ले गया, जहां न्याय व्यवस्था केवल शासन नहीं, बल्कि धर्म था; जहां राजा केवल शासक नहीं, बल्कि लोककल्याण का प्रतीक था। मतलब साफ है गंगा के तट पर बसी काशी ने शुक्रवार की शाम केवल एक कार्यक्रम नहीं देखा, उसने अपने इतिहास को जीया।</p>



<p>बीएलडब्ल्यू के सूर्य सरोवर मैदान में जैसे ही महाकाल की भस्म आरती की झलक उभरी, वैदिक मंत्र गूंजे और घोड़ों की टाप के साथ सम्राट विक्रमादित्य मंच पर अवतरित हुए, पूरा परिसर जयघोष से थर्रा उठा। पूरी काशी को कुछ घंटों के लिए प्राचीन भारत के स्वर्णिम युग में बदल दिया। हजारों दर्शकों की भीड़ देर रात तक टकटकी लगाए उस इतिहास को देखती रही, जिसे अब तक किताबों में पढ़ा जाता था। यह मंचन अपने पैमाने और प्रस्तुति दोनों में असाधारण रहा। एक साथ तीन विशाल मंच, 225 कलाकार, 18 घोड़े, 2 रथ, 4 ऊंट, 1 हाथी और 1 पालकी, इन सबने मिलकर ऐसा दृश्य रचा कि दर्शक खुद को उसी कालखंड का हिस्सा महसूस करने लगे। सम्राट विक्रमादित्य का जन्म, राजतिलक, युद्ध कौशल, न्याय व्यवस्था, विक्रम-बेताल की कथा और धर्म रक्षा, हर प्रसंग को इतनी जीवंतता से प्रस्तुत किया गया कि हर दृश्य पर तालियों की गूंज उठती रही। हर दृश्य एक कहानी कहता था, सम्राट विक्रमादित्य का जन्म, उनका संघर्ष, राजतिलक, शकों पर विजय, न्याय की स्थापना और विक्रम-बेताल की रोचक कथा। मंचन की गति और संवादों की शक्ति ने दर्शकों को बांधे रखा।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><a href="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmadita-natya02.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="506" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmadita-natya02-1024x506.jpg" alt="" class="wp-image-881494" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmadita-natya02-1024x506.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmadita-natya02-300x148.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmadita-natya02-768x380.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmadita-natya02.jpg 1040w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a></figure>



<p>सम्राट विक्रमादित्य के प्रवेश का दृश्य पूरे आयोजन का चरम था। जैसे ही वे मंच पर आए, दर्शकों के भीतर उत्साह की लहर दौड़ गई। उनकी वेशभूषा, संवाद अदायगी और व्यक्तित्व ने उस ऐतिहासिक चरित्र को जीवंत कर दिया, जिसे अब तक केवल कथाओं में सुना जाता था। घोड़ों की टाप और युद्ध के दृश्य इतने वास्तविक थे कि दर्शकों को लगा जैसे वे किसी ऐतिहासिक युद्ध के प्रत्यक्ष साक्षी हों। वैसे भी भारत की पहचान उसकी निरंतरता में है। यहां समय रुकता नहीं, बल्कि परंपरा बनकर आगे बढ़ता है। काशी में आयोजित यह महोत्सव उसी निरंतरता का सजीव उदाहरण बनकर सामने आया। यह आयोजन केवल अतीत को याद करने का प्रयास नहीं, बल्कि उसे वर्तमान में पुनर्स्थापित करने का साहसिक प्रयास था। दर्शक दीर्घा में बैठे हजारों लोग केवल दर्शक नहीं थे, वे उस युग के सहभागी बन चुके थे, जहां न्याय, पराक्रम और धर्म की स्थापना ही जीवन का उद्देश्य था।</p>



<p>मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भाषण पूरे आयोजन का केंद्रीय बिंदु बनकर उभरा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत की सांस्कृतिक विरासत केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य का मार्गदर्शन है। “सम्राट विक्रमादित्य केवल एक राजा नहीं थे, बल्कि न्याय, धर्म और लोककल्याण के प्रतीक थे। यह मंचन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का सशक्त माध्यम है।” योगी ने तीखे अंदाज में कहा कि एक समय समाज में खलनायकों को ही नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिससे पीढ़ियां भ्रमित हुईं। उन्होंने मंच, सिनेमा और कला से जुड़े लोगों को संदेश दिया कि वे राष्ट्र और समाज को दिशा देने वाले आदर्श प्रस्तुत करें। उन्होंने काशी-उज्जैन के सांस्कृतिक संबंध को ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का जीवंत उदाहरण बताया और कहा कि काशी विश्वनाथ धाम बनने के बाद वैश्विक स्तर पर भारत की आध्यात्मिक पहचान और मजबूत हुई है।</p>



<p>मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा, “विक्रमादित्य का नाम न्याय, पराक्रम और सुशासन का पर्याय है। उनकी कीर्ति आज भी जनमानस में जीवित है।” उन्होंने राम-लक्ष्मण, कृष्ण-बलराम और भर्तृहरि-विक्रमादित्य की जोड़ी का उल्लेख करते हुए भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को रेखांकित किया और कहा कि दोनों राज्य मिलकर पर्यटन और संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाने में जुटे हैं। कार्यक्रम में काशी और उज्जैन की सांस्कृतिक एकता विशेष रूप से दिखाई दी। महाकाल की भस्म आरती और विश्वनाथ की नगरी का यह संगम दर्शकों के लिए भावनात्मक क्षण बन गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को यह आयोजन नई शक्ति देता है।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><a href="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmaditya-natya-03.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="496" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmaditya-natya-03-1024x496.jpg" alt="" class="wp-image-881495" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmaditya-natya-03-1024x496.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmaditya-natya-03-300x145.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmaditya-natya-03-768x372.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmaditya-natya-03.jpg 1040w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a></figure>



<p><strong>घड़ी : परंपरा और विज्ञान का प्रतीक<br></strong>पूरे आयोजन का सबसे चर्चित और प्रतीकात्मक क्षण वह रहा, जब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को 700 किलोग्राम वजनी ‘विक्रमादित्य वैदिक घड़ी’ भेंट की। यह घड़ी केवल एक उपहार नहीं, बल्कि भारतीय कालगणना, विक्रम संवत और प्राचीन वैज्ञानिक ज्ञान की गौरवशाली परंपरा का प्रतीक है। जो प्रकृति और ब्रह्मांड के साथ सामंजस्य स्थापित करती है। इसे काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित किया जाना प्रस्तावित है, जिससे काशी और उज्जैन, दोनों प्राचीन ज्ञान केंद्र, एक सूत्र में बंधते दिखाई देंगे। यह वैदिक घड़ी भारतीय समय गणना की उस पद्धति को दर्शाती है, जो सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक समय का आकलन करती है, यानी वह परंपरा, जो हजारों वर्षों से भारतीय जीवन पद्धति का आधार रही है। इस घड़ी की प्रस्तुति ने आयोजन को सांस्कृतिक ही नहीं, बौद्धिक और वैज्ञानिक विमर्श का भी केंद्र बना दिया।</p>



<p><strong>सांस्कृतिक दृष्टि और राजनीतिक संदेश<br></strong>इस आयोजन का एक महत्वपूर्ण पहलू उसका वैचारिक संदेश भी रहा। यह केवल सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि यह बताने का प्रयास था कि भारत की आत्मा उसकी परंपराओं में निहित है। ऐसे आयोजन यह स्पष्ट करते हैं कि जब समाज अपने आदर्शों को भूलता है, तो उसकी दिशा भटक जाती है; और जब वह अपने इतिहास से जुड़ता है, तो वह पुनः अपनी पहचान प्राप्त करता है।</p>



<p><strong>तकनीक और परंपरा का अद्भुत मेल<br></strong>हाईटेक लाइटिंग, एलईडी स्क्रीन, डिजिटल साउंड, स्मोक इफेक्ट और आतिशबाजी, इन सबने मंचन को सिनेमाई भव्यता दी। लेकिन इसके मूल में रही भारतीय परंपरा और शास्त्रीय प्रस्तुति ने इसे विशिष्ट बना दिया। बच्चों के लिए यह ‘लाइव इतिहास की किताब’ बन गया, जबकि युवाओं के लिए अपनी पहचान से जुड़ने का अवसर।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><a href="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmadity-natya05-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="420" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmadity-natya05-1-1024x420.jpg" alt="" class="wp-image-881497" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmadity-natya05-1-1024x420.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmadity-natya05-1-300x123.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmadity-natya05-1-768x315.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikrmadity-natya05-1.jpg 1040w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a></figure>



<p><strong>प्रदर्शनी ने बढ़ाया आकर्षण</strong><br>कार्यक्रम स्थल पर ‘आर्ष भारत’, ‘विक्रमादित्य और अयोध्या’, ‘84 महादेव’, ‘शिव पुराण’ और मध्य प्रदेश के तीर्थ स्थलों पर आधारित प्रदर्शनी भी लगाई गई, जिसने दर्शकों को भारतीय परंपरा के विविध आयामों से परिचित कराया।</p>



<p><strong>आयोजन नहीं, चेतना का पुनर्जागरण<br></strong>काशी में शुरू हुआ यह महोत्सव केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की ऐतिहासिक चेतना, न्याय परंपरा और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का पुनर्जागरण बनकर उभरा है। यह संदेश साफ है, भारत जब अपनी जड़ों से जुड़ता है, तो वह केवल इतिहास नहीं दोहराता, बल्कि भविष्य की दिशा तय करता है</p>



<p><strong>काशी, उज्जैनः एकात्मता का जीवंत प्रतीक</strong><br>इस महोत्सव ने काशी और उज्जैनकृदो प्राचीन सांस्कृतिक ध्रुवों, को एक सूत्र में पिरो दिया। महाकाल की भस्म आरती और काशी की आध्यात्मिक ऊर्जा का संगम दर्शकों के लिए अविस्मरणीय अनुभव बन गया। यह केवल धार्मिक एकता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक एकात्मता का प्रतीक था।</p>



<p><strong>दर्शकों का अनुभव : इतिहास का साक्षात्कार<br></strong>कार्यक्रम में उपस्थित दर्शकों के लिए यह अनुभव अविस्मरणीय रहा। बच्चों के लिए यह ‘लाइव इतिहास’ था, जबकि युवाओं के लिए यह अपनी पहचान से जुड़ने का अवसर। यह आयोजन केवल देखा नहीं गया, इसे महसूस किया गया, जिया गया।</p>



<p><strong>सामाजिक संदेश : मूल्यों की पुनर्स्थापना</strong><br>सम्राट विक्रमादित्य की गाथा के माध्यम से यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि न्याय सर्वोपरि है, शासन का उद्देश्य लोककल्याण है, संस्कृति ही राष्ट्र की आत्मा है, आदर्श ही समाज को दिशा देते हैं.</p>



<p><strong>भविष्य की ओर बढ़ता अतीत<br></strong>काशी में आयोजित यह महोत्सव केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य का उद्घोष है। यह बताता है कि भारत जब अपनी जड़ों से जुड़ता है, तो वह केवल इतिहास को नहीं दोहराता, वह एक नई दिशा तय करता है। यह आयोजन एक संदेश है भारत एक जीवित सभ्यता है, जो हर युग में स्वयं को पुनर्जीवित करती है और हर बार पहले से अधिक प्रकाशमान होकर उभरती है।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>काशी में उतरेगा विक्रम युग : हाथी-घोड़े, रथ और 200 कलाकारों संग जीवंत होगी सम्राट विक्रमादित्य की गाथा</title>
		<link>https://dastaktimes.org/vikram-era-will-descend-in-kashi-the-saga-of-emperor-vikramaditya-will-come-alive-with-elephants/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[DN VERMA]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 04 Apr 2026 16:23:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[वाराणसी]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="300" height="162" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikradity-300x162.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikradity-300x162.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikradity-1024x552.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikradity-768x414.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikradity-1536x828.jpg 1536w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikradity.jpg 1561w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और डॉ. मोहन यादव की उपस्थिति में आज से होगा इस महानाट्य का शुभारंभ, विक्रमोत्सव-2026 में बीएलडब्ल्यू मैदान बनेगा प्राचीन भारत का मंच, आतिशबाजी के बीच सजेगा इतिहास, तीन दिन चलेगा भव्य महानाट्य, दिखेगा शौर्य, धर्म और सुशासन &#8211;सुरेश गांधी वाराणसी : शिव की नगरी काशी एक बार फिर इतिहास के स्वर्णिम &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="162" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikradity-300x162.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikradity-300x162.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikradity-1024x552.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikradity-768x414.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikradity-1536x828.jpg 1536w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/vikradity.jpg 1561w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />
<p><strong><em>मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और डॉ. मोहन यादव की उपस्थिति में आज से होगा इस महानाट्य का शुभारंभ, विक्रमोत्सव-2026 में बीएलडब्ल्यू मैदान बनेगा प्राचीन भारत का मंच, आतिशबाजी के बीच सजेगा इतिहास, तीन दिन चलेगा भव्य महानाट्य, दिखेगा शौर्य, धर्म और सुशासन</em></strong></p>



<p>&#8211;<strong>सुरेश गांधी</strong></p>



<p><strong>वाराणसी :</strong> शिव की नगरी काशी एक बार फिर इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों को सजीव होते देखने जा रही है। विक्रमोत्सव-2026 के अंतर्गत 3 अप्रैल से बीएलडब्ल्यू मैदान में ‘सम्राट विक्रमादित्य’ महानाट्य का भव्य मंचन शुरू होगा। यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता, परंपरा और गौरव के पुनर्जागरण का महायज्ञ बनकर उभर रहा है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उपस्थिति में इस महानाट्य का शुभारंभ होगा। उज्जैन की ऐतिहासिक धरती से उठी विक्रमादित्य की गाथा अब काशी के मंच पर अपने समूचे वैभव और जीवंतता के साथ प्रकट होगी।</p>



<p><strong>जब मंच पर जीवित होगा इतिहास</strong><br>बीएलडब्ल्यू मैदान में तैयार किए जा रहे तीन भव्य मंच इस आयोजन की विराटता के साक्षी बनेंगे। केंद्र में विशाल मुख्य मंच और दोनों ओर सहायक मंचों पर सिंहासन बत्तीसी, बेताल पच्चीसी और भविष्य पुराण के प्रसंगों के माध्यम से सम्राट विक्रमादित्य के अद्वितीय व्यक्तित्व को उकेरा जाएगा। यह प्रस्तुति केवल कथा नहीं, बल्कि एक युग का पुनर्सृजन है- जहाँ न्याय केवल शब्द नहीं, शासन का आधार था; जहाँ ज्ञान, विज्ञान और संस्कृति अपने उत्कर्ष पर थे। नवरत्नों की विद्वता, दरबार की गरिमा और राजा के निर्णयों की निष्पक्षता—सब कुछ दर्शकों के सामने सजीव होगा।</p>



<p><strong>हाथी-घोड़े, रथ और रोशनी में सजेगा वैभव</strong><br>इस महानाट्य की सबसे बड़ी विशेषता इसकी जीवंतता है। 200 से अधिक कलाकारों के साथ 18 घोड़े, 2 रथ, 4 ऊँट, 1 पालकी और 1 हाथी मंच पर उतरेंगे। युद्ध दृश्य, राजदरबार, धार्मिक अनुष्ठान और लोकजीवन—हर दृश्य वास्तविकता का आभास कराएगा। 400 से अधिक आधुनिक लाइट्स, विशाल एलईडी स्क्रीन और भव्य आतिशबाजी इस आयोजन को दृश्यात्मक रूप से अद्वितीय बनाएगी। दर्शक केवल नाटक नहीं देखेंगे, बल्कि एक युग को जीएंगे।</p>



<p>महाकाल से काशी तक-आस्था का सेतु<br>लेफ्ट मंच पर उज्जैन के महाकाल मंदिर की भव्य प्रतिकृति और शिवलिंग पर भस्म आरती का दृश्य आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करेगा। यह आयोजन केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना का संगम भी है। इसी क्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा बाबा विश्वनाथ को ‘विक्रमादित्य वैदिक घड़ी’ का अर्पण किया जाएगा। यह घड़ी भारतीय कालगणना की प्राचीन परंपरा और आधुनिक तकनीक का अद्भुत संगम है, जो समय को सूर्योदय आधारित वैदिक प्रणाली से जोड़ती है।</p>



<p><strong>सांस्कृतिक एकता और जागरण का संदेश<br></strong>काशी में मध्य प्रदेश के कलाकारों द्वारा इस महानाट्य का मंचन केवल एक प्रस्तुति नहीं, बल्कि उत्तर और मध्य भारत के सांस्कृतिक सेतु का प्रतीक है। यह आयोजन उस भारत की झलक दिखाता है, जहाँ विविधता में एकता केवल विचार नहीं, जीवन शैली थी। सम्राट विक्रमादित्य का चरित्र आज भी उतना ही प्रासंगिक है- न्यायप्रियता, प्रजा के प्रति समर्पण और राष्ट्र के प्रति अटूट निष्ठा का प्रतीक। यह महानाट्य नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने और गौरव का बोध कराने का माध्यम बन रहा है।</p>



<p><strong>शहर में उत्साह, उमड़ रही भीड़<br></strong>बीएलडब्ल्यू मैदान में चल रही तैयारियों और रिहर्सल को देखने के लिए भी बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। वाराणसी के नागरिकों में इस आयोजन को लेकर खासा उत्साह है और 3 से 5 अप्रैल तक चलने वाले इस महानाट्य को देखने के लिए लोग बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। काशी की पावन धरती पर ‘सम्राट विक्रमादित्य’ महानाट्य केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास, संस्कृति और आत्मगौरव का पुनर्पाठ है। यह वह क्षण है, जब अतीत वर्तमान के मंच पर उतरकर भविष्य को दिशा देता है- और काशी, एक बार फिर उस गौरवगाथा की साक्षी बनने को तैयार है।</p>
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			</item>
		<item>
		<title>1 रुपये में जमीन, 2000 मेगावॉट सोलर प्रोजेक्ट से एमपी-यूपी ने खोला भविष्य का खाका</title>
		<link>https://dastaktimes.org/land-for-1-rupee-2000-mw-solar-project/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[DN VERMA]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 02 Apr 2026 05:58:03 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[वाराणसी]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="300" height="160" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/dr-mohan-yadav1-300x160.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/dr-mohan-yadav1-300x160.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/dr-mohan-yadav1-1024x544.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/dr-mohan-yadav1-768x408.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/dr-mohan-yadav1-1536x817.jpg 1536w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/dr-mohan-yadav1-2048x1089.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />काशी से विकास का महाऐलान : विश्वनाथ धाम-महाकाल समझौता, ओडीओपी पर ऐतिहासिक एमओयू, 284 करोड़ का यूनिटी मॉल, केन-बेतवा से बुंदेलखंड को राहत, निवेश, पर्यटन और रोजगार पर एक साथ बड़ा दांव &#8211;सुरेश गांधी वाराणसी : काशी की पवित्र धरती मंगलवार को उस ऐतिहासिक क्षण की गवाह बनी, जब मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश ने &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="160" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/dr-mohan-yadav1-300x160.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/dr-mohan-yadav1-300x160.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/dr-mohan-yadav1-1024x544.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/dr-mohan-yadav1-768x408.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/dr-mohan-yadav1-1536x817.jpg 1536w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/dr-mohan-yadav1-2048x1089.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />
<h3 class="wp-block-heading">काशी से विकास का महाऐलान : विश्वनाथ धाम-महाकाल समझौता, ओडीओपी पर ऐतिहासिक एमओयू, 284 करोड़ का यूनिटी मॉल, केन-बेतवा से बुंदेलखंड को राहत, निवेश, पर्यटन और रोजगार पर एक साथ बड़ा दांव</h3>



<p>&#8211;<strong>सुरेश गांधी</strong></p>



<p><strong>वाराणसी : </strong>काशी की पवित्र धरती मंगलवार को उस ऐतिहासिक क्षण की गवाह बनी, जब मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश ने साझा विरासत को आधार बनाते हुए विकास, निवेश और पर्यटन के क्षेत्र में एक व्यापक और दूरगामी साझेदारी का ऐलान किया। एमपी-यूपी सहयोग सम्मेलन 2026 में लिए गए फैसलों ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा की जगह सहयोग की राजनीति नए भारत की दिशा तय कर रही है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सम्मेलन का शुभारंभ करते हुए कहा कि काशी विश्वनाथ धाम विश्व के सात पवित्र स्थलों में शामिल है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश तेजी से एक मजबूत और भरोसेमंद अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहा है। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सुशासन मॉडल की सराहना करते हुए कहा कि दोनों राज्य सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और ऐतिहासिक रूप से एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं और अब विकास के मोर्चे पर भी साथ आगे बढ़ रहे हैं।</p>



<p>सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि काशी विश्वनाथ विशिष्ट क्षेत्र विकास प्राधिकरण और श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबंधन समिति के बीच हुआ ऐतिहासिक समझौता रहा। इस करार से काशी और उज्जैन के बीच धार्मिक पर्यटन का नया अध्याय खुलेगा। श्रद्धालुओं को बेहतर, सुगम और समन्वित दर्शन व्यवस्था मिलेगी, जिससे दोनों राज्यों में पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी। इसके साथ ही ओडीओपी (वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट) को लेकर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच महत्वपूर्ण एमओयू हुआ। इस पहल के तहत स्थानीय उत्पादों, पारंपरिक शिल्प और जीआई टैग वस्तुओं को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की रणनीति बनाई गई है। इसी दिशा में उज्जैन में 284 करोड़ रुपये की लागत से यूनिटी मॉल बनाने की घोषणा की गई, जहां देशभर के ओडीओपी उत्पाद एक ही छत के नीचे उपलब्ध होंगे।</p>



<p>ऊर्जा क्षेत्र में भी दोनों राज्यों ने बड़ा कदम उठाया है। मुरैना में 2000 मेगावॉट के सोलर एनर्जी प्रोजेक्ट पर संयुक्त रूप से काम किया जाएगा। यह परियोजना किसानों को सस्ती बिजली उपलब्ध कराने के साथ-साथ उद्योगों को स्थिर ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करेगी। जल और कृषि के क्षेत्र में केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना को भी सम्मेलन में प्रमुखता दी गई। बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए यह परियोजना जीवनरेखा साबित हो सकती है, जिससे सिंचाई और पेयजल की समस्या का स्थायी समाधान मिलेगा। निवेश को आकर्षित करने के लिए मध्य प्रदेश सरकार ने कई महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं। मेडिकल कॉलेज और अस्पताल स्थापित करने के लिए 1 रुपये की लीज पर 30 एकड़ जमीन उपलब्ध कराने का निर्णय निवेशकों के लिए बड़ा प्रोत्साहन माना जा रहा है। इसके साथ ही स्वास्थ्य क्षेत्र में निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए अनुदान और आसान नीतियों की भी घोषणा की गई है।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><a href="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/udmi-dr-mohan-yadav.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="488" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/udmi-dr-mohan-yadav-1024x488.jpg" alt="" class="wp-image-881055" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/udmi-dr-mohan-yadav-1024x488.jpg 1024w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/udmi-dr-mohan-yadav-300x143.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/udmi-dr-mohan-yadav-768x366.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/udmi-dr-mohan-yadav-1536x733.jpg 1536w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/udmi-dr-mohan-yadav-2048x977.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a></figure>



<p>मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एक और महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए कहा कि मध्य प्रदेश अब नक्सल मुक्त राज्य बन चुका है। उन्होंने इसे विकास के लिए बड़ी उपलब्धि बताते हुए कहा कि इससे उद्योगों और निवेशकों को सुरक्षित वातावरण मिलेगा और प्रदेश में आर्थिक गतिविधियां तेजी से बढ़ेंगी। औद्योगिक और आर्थिक उपलब्धियों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि प्रदेश में सिंचाई का रकबा बढ़कर 55 लाख हेक्टेयर हो गया है और 70 हजार करोड़ रुपये से अधिक का निर्यात हो रहा है। राज्य में मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़कर 40 हो चुकी है, जो स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति का संकेत है।</p>



<p>सम्मेलन में उत्तर प्रदेश की ओर से भी एमएसएमई और ओडीओपी मॉडल की सफलता को साझा किया गया। राज्य में 96 लाख एमएसएमई इकाइयां कार्यरत हैं, जो 3 करोड़ लोगों को रोजगार दे रही हैं। युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के लिए बिना ब्याज के 5 लाख रुपये तक का ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है। पर्यटन के क्षेत्र में भी नई पहल की घोषणा हुई। मध्य प्रदेश ने ‘पीएमश्री पर्यटन वायु सेवा’ और ‘हेली पर्यटन सेवा’ शुरू कर धार्मिक स्थलों तक पहुंच को आसान बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। साथ ही काशी और उज्जैन को जोड़ते हुए एक साझा धार्मिक सर्किट विकसित करने की योजना बनाई गई है।</p>



<p>सम्मेलन के दौरान आयोजित प्रदर्शनी में दोनों राज्यों के शिल्पकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। बनारसी साड़ी, जरी-जरदोजी, गुलाबी मीनाकारी से लेकर महेश्वरी और चंदेरी वस्त्र तक, पारंपरिक कला और शिल्प की समृद्ध विरासत एक मंच पर दिखाई दी। मतलब साफ है काशी में आयोजित यह सम्मेलन केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि विकास, निवेश, पर्यटन और सांस्कृतिक एकता का एक व्यापक रोडमैप है। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की यह साझेदारी आने वाले समय में न केवल दोनों राज्यों, बल्कि पूरे देश के लिए एक नए विकास मॉडल के रूप में स्थापित हो सकती है।</p>



<p><strong>ट्रस्ट एमओयू से सुगम दर्शन, साझा धार्मिक सर्किट की तैयारी</strong><br>धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए काशी और उज्जैन के बीच एक नई कड़ी जुड़ गई है। काशी विश्वनाथ और महाकालेश्वर मंदिर ट्रस्ट के बीच हुए एमओयू से श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी। दोनों राज्यों ने एक साझा धार्मिक सर्किट विकसित करने की योजना बनाई है, जिससे काशी, उज्जैन और अन्य प्रमुख तीर्थ एक नेटवर्क में जुड़ेंगे। इससे पर्यटन उद्योग को भी बड़ा फायदा होगा।</p>



<figure class="wp-block-image size-full"><a href="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/dr-mohan-yadav-pradarshani.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" width="1000" height="562" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/dr-mohan-yadav-pradarshani.jpg" alt="" class="wp-image-881056" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/dr-mohan-yadav-pradarshani.jpg 1000w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/dr-mohan-yadav-pradarshani-300x169.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/dr-mohan-yadav-pradarshani-768x432.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2026/04/dr-mohan-yadav-pradarshani-390x220.jpg 390w" sizes="auto, (max-width: 1000px) 100vw, 1000px" /></a></figure>



<p><strong>1 रुपये में जमीन, निवेशकों के लिए खुला निमंत्रण</strong><br>मध्य प्रदेश ने निवेश आकर्षित करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। सरकार मेडिकल कॉलेज और अस्पताल खोलने के लिए ₹1 में 30 एकड़ जमीन उपलब्ध करा रही है। निवेशकों को ‘एंड-टू-एंड’ सपोर्ट, आसान मंजूरी प्रक्रिया और अनुदान जैसी सुविधाएं दी जा रही हैं। इससे स्वास्थ्य और उद्योग दोनों क्षेत्रों में तेजी आने की उम्मीद है।</p>



<p><strong>एमपी-यूपी मिलकर मुरैना में बनाएंगे बड़ा ऊर्जा हब</strong><br>ऊर्जा क्षेत्र में दोनों राज्यों ने संयुक्त रूप से मुरैना में 2000 मेगावॉट का सोलर प्रोजेक्ट स्थापित करने का निर्णय लिया है। यह परियोजना किसानों को सस्ती बिजली और उद्योगों को स्थिर ऊर्जा उपलब्ध कराएगी। साथ ही यह हरित ऊर्जा की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।</p>



<p><strong>केन-बेतवा परियोजना से बुंदेलखंड को नई जिंदगी</strong><br>केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना दोनों राज्यों के लिए जीवनरेखा साबित हो सकती है। इससे बुंदेलखंड क्षेत्र में सिंचाई का विस्तार होगा और पेयजल की समस्या दूर होगी। यह परियोजना किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायक होगी।</p>



<p><strong>एमपी-यूपी एमओयू, निर्यात और रोजगार को मिलेगा बढ़ावा</strong><br>ओडीओपी योजना के तहत दोनों राज्यों ने स्थानीय उत्पादों को वैश्विक बाजार तक पहुंचाने का संकल्प लिया है। उत्तर प्रदेश में जहां 96 लाख डैडम् इकाइयां कार्यरत हैं, वहीं मध्य प्रदेश के 55 जिलों में ओडीओपी उत्पाद विकसित किए जा रहे हैं।</p>



<p><strong>उज्जैन में बनेगा 284 करोड़ का यूनिटी मॉल</strong><br>उज्जैन में बनने वाला यूनिटी मॉल मध्य भारत का सबसे बड़ा ओडीओपी हब होगा। यहां विभिन्न राज्यों के उत्पादों को प्रदर्शित और बिक्री के लिए रखा जाएगा, जिससे कारीगरों को सीधा बाजार मिलेगा।</p>



<p><strong>नक्सल मुक्त एमपीः विकास को मिली नई रफ्तार<br></strong>मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि मध्य प्रदेश अब नक्सल मुक्त हो चुका है। इससे निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा और औद्योगिक गतिविधियों को नई गति मिलेगी।</p>



<p><strong>हेली सेवा और एयर कनेक्टिविटी से पर्यटन को नई उड़ान</strong><br>मध्य प्रदेश ने पर्यटन क्षेत्र में हेली सेवा और एयर कनेक्टिविटी बढ़ाने की पहल की है। इससे दूरस्थ धार्मिक स्थलों तक पहुंच आसान होगी और पर्यटन निवेश को बढ़ावा मिलेगा।</p>



<p><strong>काशी में सजी शिल्प की विरासत, दो राज्यों की कला एक मंच पर</strong><br>सम्मेलन में आयोजित प्रदर्शनी में दोनों राज्यों के शिल्पकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। बनारसी साड़ी, जरी-जरदोजी, मेटल क्राफ्ट, बांस शिल्प और चंदेरी वस्त्र जैसे उत्पादों ने सांस्कृतिक समृद्धि को उजागर किया।</p>
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