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	<title>इस मंदिर में हुई थी भोलेनाथ की देवी पार्वती से विवाह &#8211; Dastak Times |  दस्तक टाइम्स</title>
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		<title>इस मंदिर में हुई थी भोलेनाथ की देवी पार्वती से विवाह, जानें कहा है ये मंदिर</title>
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		<pubDate>Mon, 27 Aug 2018 17:03:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अद्धयात्म]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="300" height="212" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2018/08/भोलेनाथ-300x212.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2018/08/भोलेनाथ-300x212.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2018/08/भोलेनाथ.jpg 600w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" />धर्म: ऐसा माना जाता है की शिवरात्रि वह पवित्र दिन है, जिस दिन भगवान शिव ने हिमालय के मंदाकिनी क्षेत्र के त्रियुगीनारायण में माता पार्वती से विवाह किया था। भगवान शिव के विवाह को लेकर कई तरह की कथाएं अलग-अलग धर्म ग्रंथों में प्रचलित हैं। माता पार्वती और भगवान शिव के विवाह का प्रमाण है &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="212" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2018/08/भोलेनाथ-300x212.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2018/08/भोलेनाथ-300x212.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2018/08/भोलेनाथ.jpg 600w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /><p><strong>धर्म: ऐसा माना जाता है की शिवरात्रि वह पवित्र दिन है, जिस दिन भगवान शिव ने हिमालय के मंदाकिनी क्षेत्र के त्रियुगीनारायण में माता पार्वती से विवाह किया था। भगवान शिव के विवाह को लेकर कई तरह की कथाएं अलग-अलग धर्म ग्रंथों में प्रचलित हैं। माता पार्वती और भगवान शिव के विवाह का प्रमाण है यहां जलने वाली अग्नि की ज्योति जो त्रेतायुग से निरंतर जल रही है। कहते हैं कि भगवान शिव ने माता पार्वती से इसी ज्योति के सामने विवाह के फेरे लिए थे।हिंदू पौराणिक ग्रंथों के अनुसार पर्वतराज हिमावत या हिमावन की पुत्री थी। पार्वती के रूप में सती का पुनर्जन्म हुआ था। माता पार्वती ने कठिन ध्यान और साधना से भगवान शिव का वरण किया था। जिस स्थान पर मां पार्वती ने साधना की उस स्थान को गौरी कुंड कहा जाता है। जो श्रद्धालु त्रियुगीनारायण जाते हैं वे गौरीकुंड के दर्शन भी करते हैं। पौराणिक ग्रंथ बताते हैं कि शिव जी ने गुप्त काशी में माता पार्वती के सामने विवाह प्रस्ताव रखा था। इसके बाद उन दोनों का विवाह त्रियुगीनारायण गांव में मंदाकिनी सोन आैर गंगा के मिलन स्थल पर संपन्न हुआ।<img decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-254106" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2018/08/भोलेनाथ.jpg" alt="" width="600" height="424" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2018/08/भोलेनाथ.jpg 600w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2018/08/भोलेनाथ-300x212.jpg 300w" sizes="(max-width: 600px) 100vw, 600px" /></strong></p>
<p><strong>विवाह से पहले सभी देवताओं ने यहां स्नान भी किया और इसलिए यहां तीन कुंड बने हैं जिन्हें रुद्र कुंड, विष्णु कुंड और ब्रह्मा कुंड कहते हैं। इन तीनों कुंड में जल सरस्वती कुंड से आता है। सरस्वती कुंड का निर्माण विष्णु की नासिका से हुआ था और इसलिए ऐसी मान्यता है कि इन कुंड में स्नान से संतानहीनता से मुक्ति मिल जाती है। शिवरात्रि पर भगवान शिव-पार्वती की शादी हुई थी इसलिए इस पर्व को भगवान की विवाह वर्षगांठ के रूप में मनाया जाता है। भगवान शिव के विवाह को लेकर कई तरह की कथाएं अलग-अलग धर्म ग्रंथों में प्रचलित हैं।</strong></p>
<p><strong>मान्यता है कि भगवान शंकर ने हिमालय के मंदाकिनी क्षेत्र के त्रियुगीनारायण में माता पार्वती से विवाह किया था। इसका प्रमाण है यहां जलने वाली अग्नि की ज्योति जो त्रेतायुग से निरंतर जल रही है। कहते हैं कि भगवान शिव ने माता पार्वती से इसी ज्योति के समक्ष विवाह के फेरे लिए थे। तब से अब तक यहां अनेकों जोड़े विवाह बंधन में बंधते हैं। लोगों का मानना है कि यहां शादी करने से दांपत्य जीवन सुख से व्यतीत होता है। त्रेतायुग का यह शिव पार्वती के विवाह का स्थल रुद्रप्रयाग जिले के सीमांत गांव में त्रियुगीनारायण मंदिर के रूप में वर्तमान में आस्था का केंद्र है।</strong></p>
<p><strong>हिंदू पौराणिक ग्रंथों के अनुसार पार्वतराज हिमावत या हिमावन की पुत्री थी। पार्वती के रूप में सती का पुनर्जन्म हुआ था। त्रियुगीनारायण से पांच किलोमीटर दूर गौरीकुंड कठिन ध्यान और साधना से उन्होंने शिव का मन जीता। जो श्रद्धालु त्रियुगीनारायण जाते हैं वे गौरीकुंड के दर्शन भी करते हैं। पौराणिक ग्रंथ बताते हैं कि शिव ने पार्वती के समक्ष केदारनाथ के मार्ग में पड़ने वाले गुप्तकाशी में विवाह प्रस्ताव रखा था। इसके बाद उन दोनों का विवाह त्रियुगीनारायण गांव में मंदाकिनी साेन आैर गंगा के मिलन स्थल पर संपन्न हुआ। ऐसा भी कहा जाता है कि त्रियुगीनारायण हिमावत की राजधानी थी। यहां शिव पार्वती के विवाह में विष्णु ने पार्वती के भाई के रूप में सभी रीतियों का पालन किया था। जबकि ब्रह्मा इस विवाह में पुरोहित बने थे। उस समय सभी संत-मुनियों ने इस समारोह में भाग लिया था। विवाह स्थल के नियत स्थान को ब्रहम शिला कहा जाता है जो कि मंदिर के ठीक सामने स्थित है। इस मंदिर के महात्म्य का वर्णन स्थल पुराण में भी मिलता है।</strong></p>
<p><strong>केदारनाथ से पहले त्रियुगीनारायण मंदिर- वेदों में उल्लेख है कि यह त्रियुगीनारायण मंदिर त्रेतायुग से स्थापित है। जबकि केदारनाथ व बदरीनाथ द्वापरयुग में स्थापित हुए। यह भी मान्यता है कि इस स्थान पर विष्णु भगवान ने वामन देवता का अवतार लिया था।</strong></p>
<p><strong>कब और कैसे पहुंचे- केदारनाथ धाम भारत के उत्तराखण्ड राज्य के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है। केदारनाथ से 19 किमी पहले गंगोतरी, बूढ़ाकेदार सोनप्रयाग के रास्ते के निकट त्रियुगी नारायण मंदिर स्थित है। हर वर्ष केदारनाथ धाम मई से अक्टूबर माह के बीच आम दर्शनार्थियों के लिए खोला जाता है। शेष समय यहां का वातावरण प्रतिकूल रहता है। यहां पहुंचने के लिए हेलिकॉप्टर से भी यात्रा की जा सकती है। इसके अतिरिक्त यहां पहुंचने के लिए बस मार्ग से यात्रा करनी होती है। केदारनाथ धाम दर्शन करने के लिए भारत के किसी भी शहर से ट्रेन द्वारा हरिद्वार या ऋषिकेश पहुंचा जा सकता है। हरिद्वार से केदारनाथ धाम पहुंचने के लिए आवागमन के कई साधन उपलब्ध हो जाते हैं, जो कि सड़क मार्ग से केदारनाथ धाम पहुंचते हैं। </strong></p>
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