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	<title>कहानी &#8211; Dastak Times |  दस्तक टाइम्स</title>
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	<description>By Dastak Times Hindi News Network</description>
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	<title>कहानी &#8211; Dastak Times |  दस्तक टाइम्स</title>
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		<title>जवाब</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Dastak Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Oct 2017 06:06:01 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दस्तक-विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="300" height="233" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/kahani-0-300x233.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/kahani-0-300x233.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/kahani-0.jpg 627w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />निश्रुति पर मानों इस समय कोई वज्रपात हुआ हो। हाय ईश्वर! इसलिए ये रोज़ मुझे टालता रहा। बन्द कमरे में जो भी हुआ उससे तो वो आहत थी ही। पर लोग उसे क्या समझ रहे होंगे इसकी कल्पना कर के उसका हृदय काँप उठा। विभाग से बाहर आई तो पैर काँप रहे थे। पैदल चलने &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="233" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/kahani-0-300x233.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/kahani-0-300x233.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/kahani-0.jpg 627w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /><p><span style="color: #800000"><em><strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/kahani-0.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-188695 aligncenter" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/kahani-0-300x233.jpg" alt="" width="565" height="439" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/kahani-0-300x233.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/kahani-0.jpg 627w" sizes="auto, (max-width: 565px) 100vw, 565px" /></a>निश्रुति पर मानों इस समय कोई वज्रपात हुआ हो। हाय ईश्वर! इसलिए ये रोज़ मुझे टालता रहा। बन्द कमरे में जो भी हुआ उससे तो वो आहत थी ही। पर लोग उसे क्या समझ रहे होंगे इसकी कल्पना कर के उसका हृदय काँप उठा। </strong><strong>विभाग से बाहर आई तो पैर काँप रहे थे। पैदल चलने की हिम्मत नहीं थी। एक रिक्शे पर जा बैठी। पर जाना कहां है ये कैसे बता पाये।</strong></em></span></p>
<h4><strong>-निधि श्री&#8221;</strong></h4>
<p><strong>सर..सर मैं आपके आगे हाथ जोड़ती हूँ.. सर देखिये.. सर मैं ये सब नहीं कर सकती।’ श्रुति ने पीछे हटने की एक नाकाम कोशिश की।</strong><br />
<strong>शिक्षा के महान केंद्र के महान विभाग का केबिन नं 04। वैसे तो ये कमरा वरिष्ठ प्रो. चमन लाल चौबे का है। बहुत सी भाषाओं के प्रकांड विद्वान हैं। कई व्याख्यानों के लिए अमरीका भी जा चुके हैं। चौबे जी की एक बेटी है। विलायत पढ़ रही है। पत्नी घर में ही रहती है। धर्म कर्म वाले आदमी हैं। </strong><br />
<strong>चौबे जी ने व्यंग का एक बाण छोड़ा-</strong><strong>‘अरे बेटा!तुम्हें कहाँ कुछ कह रहा हूँ। मैं कर रहा हूँ न जो करना है। क्यों? तुम इतने नखरे क्यों करती हो?’</strong><br />
<strong>‘सर.मैं आपके पैर पड़ती हूँ.. मेरी उम्र की आपकी बेटी है सर!’</strong><br />
<strong>‘देखो मैं तुम्हें पहले भी कह चुका हूँ। फ़ालतू बातें मत किया करो। देखो श्रुति इसमें तुम्हारा फायदा ही फायदा है। तुम अभी बी.ए में हो। फिर एम.ए करोगी। फिर रिसर्च। यहाँ बिना सोर्स के कुछ नहीं होगा। मक्खी मारती रह जाओगी।’ फिर एकाएक जैसे उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ हो। ज़रा प्यार से बोले-</strong><br />
<strong>‘मैं तुमसे बहुत स्नेह करता हूँ। तुम तो मेरी ही बिरादरी की हो। मुझसे जितना बन पड़ेगा तुम्हारे लिए करूँगा। और बदले में ज़्यादा कुछ मांग भी तो नहीं रहा तुमसे।’</strong><br />
<strong>श्रुति के मुँह से एक शब्द न निकला। गला रुंध गया था। पैर काँप रहे थे। देह गर्म थी। उसे बुखार आ गया था। आँखें नीची किये सर झुकाये वो चुप चाप खड़ी थी। न जाने क्यों चौबे जी उसे इस दशा में देखकर मन ही मन खुश हो रहे थे। ‘अरे मेरी बच्ची! तुम सोंच लो। जी भर के समय लो। मैं तुमसे ज़बरदस्ती नहीं कर रहा।’ फिर थोड़ा रुककर हंसते हुए बोले-&#8220;आखिर ज़बरदस्ती में वो मज़ा कहां जो रज़ामंदी में है।’</strong><br />
<strong>श्रुति आँखें न उठा सकी। इस वक़्त उसे ऐसा महसूस हुआ कि जैसे किसी ने उसे निवस्त्र कर भरे बाजार में छोड़ दिया हो। एक हाथ से अपना बैग और दूसरे हाथ से अपना दुपट्टा पकडे़ वो खड़ी ज़मीन की ओर ताकती रही। चौबे जी उस के इर्द गिर्द घूम रहे थे। किसी ना किसी बहाने उससे टकरा जाते या फिर सर पर हाथ फेरते हुए उनके हाथ अपने आप ही उसके कन्धों और पीठ को सहलाने लगते। पर-पुरुष के स्पर्श से कितनी घृणा होती है उसे उस वक्त मालूम हुआ।</strong><br />
<strong>श्रुति मौखिकी के लिए समय पर उपस्थित नहीं हो पायी थी। तो चौबे जी ने उसे केबिन में बुलाया। पिछले एक हफ्ते से उसे रोज़ बुलाते हैं। पर आज तक मौखिकी नहीं हुई। उन्होंने कह दिया है तुम मौखिकी दो न दो, कक्षाएं करो न करो तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा। श्रुति कह कह के थक गयी कि ‘सर मैंने श्लोक याद किये हैं आप ज़रा पूछें तो’ पर चौबे जी ने मौखिकी लेने में कोई विशेष रूचि न दिखायी। उससे उसके घर परिवार आदि की जानकारी लेते, रोज़ इधर उधर की बातें करते और फिर अगले दिन आने को कह देते। कहते अगले दिन मौखिकी होगी पर अगला दिन कभी न आता। ऐसा कर के उन्हें बहुत मज़ा आता था।</strong><br />
<strong>जाते-जाते उन्होंने श्रुति को धमकाया-‘बाहर जा के कोई तिकड़म न लगाना लड़की। याद है न अभी मौखिकी नहीं हुई। और वैसे भी एक हफ्ते से तू मेरे केबिन में आती है। देखने वाले भी खूब समझते हैं।’</strong><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/kahani-00.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-188696 aligncenter" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/kahani-00-300x230.jpg" alt="" width="579" height="444" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/kahani-00-300x230.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/kahani-00-90x68.jpg 90w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/kahani-00.jpg 422w" sizes="auto, (max-width: 579px) 100vw, 579px" /></a>श्रुति पर मानों इस समय कोई वज्रपात हुआ हो। हाय ईश्वर! इसलिए ये रोज़ मुझे टालता रहा। बन्द कमरे में जो भी हुआ उससे तो वो आहत थी ही। पर लोग उसे क्या समझ रहे होंगे इसकी कल्पना कर के उसका हृदय काँप उठा। </strong><br />
<strong>विभाग से बाहर आई तो पैर काँप रहे थे। पैदल चलने की हिम्मत नहीं थी। एक रिक्शे पर जा बैठी। पर जाना कहां है ये कैसे बता पाये। आवाज़ मानों गले में अटक गई थी। बड़ी देर लगी रिक्शे वाले को हॉस्टल का नाम बताने में।</strong><br />
<strong>हॉस्टल आयी तो ना किसी से बोली ना किसी की बात का जवाब दिया। कमरे में जा कर रजाई से मुँह ढंक लिया। चौबे हर आधे घंटे में फोन करता था। धमकियां देता,डराता। रात को 11 बजे फिर फोन आया। श्रुति भीतर तक कांप उठी। तेज़ बुखार से उसकी देह तप रही थी। उसने खुद को आईने में देखा तो फिर से वो घृणित स्पर्श याद आ गया। फूट फूट कर रोने लगी थी वो। एकाएक उठी, सामने टेबल पर रखे चाकू को उठाकर अपनी कलाई पर सटा लिया। पर अगले ही क्षण जैसे बहुत गंभीर हो गयी। चाकू वापस रख दिया। उस रात उसकी आँखों से जैसे नींद गायब हो गयी थी। उसे सुबह होने का इंतज़ार था। सात बजते बजते उसने खुद चौबे को फोन मिलाया।</strong><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/kahani-000.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-188697 aligncenter" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/kahani-000-300x200.jpg" alt="" width="533" height="355" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/kahani-000-300x200.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/kahani-000-331x219.jpg 331w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/kahani-000.jpg 401w" sizes="auto, (max-width: 533px) 100vw, 533px" /></a>‘सर आप कब मिलेंगे?’ </strong><strong>चौबे अपनी जीत पर फूला न समाया।</strong><strong>‘अ.. श्रुति तुम दो बजे आओ बच्चा।’</strong><br />
<strong>ठीक दो बजे श्रुति ने चौबे का दरवाजा खटखटाया। </strong><strong>‘आओ श्रुति! तुम्हारा ही इंतज़ार था।’</strong><br />
<strong>श्रुति अंदर जा कर उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गयी। </strong><strong>चौबे ने उठकर दरवाज़े के पर्दे ठीक किये।</strong><br />
<strong>‘मैं जानता था कि तुम मान जाओगी। वैसे भी हॉस्टल की लड़कियों को तो इन चीज़ों की लत लग जाती है। तुम कुँआरी तो होगी नहीं मुझे पता है। कोई बॉयफ्रेंड तो होगा ही?’</strong><br />
<strong>श्रुति ने इसका कोई जवाब न दिया। बस एकटक उसे देखती रही।</strong><br />
<strong>चौबे अपनी जगह से उठकर उसके पास आ चुका था। </strong><br />
<strong>‘खैर छोड़ो! तुम नहीं बताना चाहती न सही। हाँ तो तुम्हें ये बता रहा था कि मौखिकी के नम्बर की चिंता मत करना। और परीक्षा में भी तुम्हें अव्वल करवा दूंगा। कल रविवार है। देखो यहां शहर में रिस्क है। काफ़ी लोग जानते हैं यहां। मैंने सारनाथ में एक कमरा बुक करा लिया है.. तुम्हें हॉस्टल से पिक अप&#8230;’</strong><br />
<strong>चटाक!!</strong><br />
<strong>इससे पहले चौबे अपनी बात पूरी कह पाता श्रुति ने उसके मुँह पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया </strong><strong>और उठकर कमरे से बाहर निकल गयी।</strong><br />
<span style="color: #800000"><strong>(-निधि श्री&#8221;,  </strong><strong>छात्रा- जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली)</strong></span></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>आर न पार (कहानी)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Dastak Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 18 Sep 2017 09:50:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दस्तक-विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="300" height="236" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/kahani_1-300x236.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/kahani_1-300x236.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/kahani_1.jpg 595w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />जीवन सत्य है और मृत्यु उस सत्य का अंत। हम उम्र भर जिसे छाया या छलावा समझते रहते हैं, वास्तव में वही सच है, अंतिम सच। इस सच को हम जीते जी झेलते रहते है, न मर कर भी रोज मरते हैं। फिर भी कुछ यादें अपरोक्ष रूप से मस्तिष्क की खूँटी पर टंगी रह &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="236" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/kahani_1-300x236.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/kahani_1-300x236.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/kahani_1.jpg 595w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /><p><em><strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/kahani_1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-181852 aligncenter" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/kahani_1-300x236.jpg" alt="" width="534" height="420" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/kahani_1-300x236.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/kahani_1.jpg 595w" sizes="auto, (max-width: 534px) 100vw, 534px" /></a>जीवन सत्य है और मृत्यु उस सत्य का अंत। हम उम्र भर जिसे छाया या छलावा समझते रहते हैं, वास्तव में वही सच है, अंतिम सच। इस सच को हम जीते जी झेलते रहते है, न मर कर भी रोज मरते हैं। फिर भी कुछ यादें अपरोक्ष रूप से मस्तिष्क की खूँटी पर टंगी रह जाती हैं और उतरती ही नहीं। कारगिल शब्द आम-जनता के लिए एक शब्दमात्र बन कर जिन्दा है पर उस के लिए वह शब्द चिता-समान धू-धू कर आज तलक जल रहा है जो उस के महेन को लील गया। महेन की उस मृत घायल देह के सत्य से क्यों आज तक वह उस के जाने का चिरतंन सत्य आत्मसात नही कर पाई।</strong></em></p>
<figure id="attachment_181851" aria-describedby="caption-attachment-181851" style="width: 131px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/sudarshan.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="size-full wp-image-181851" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/sudarshan.jpg" alt="" width="131" height="189" /></a><figcaption id="caption-attachment-181851" class="wp-caption-text"><strong>-सुदर्शन प्रियदर्शिनी</strong></figcaption></figure>
<p><strong>निर्भय आकाश के नीचे और साफ-सुथरी करीने से कटी घास पर वह पसरी हुयी थी। ऊपर आकाश का चँदोवा उसे ताक रहा था। वह सोच रही थी क्या उसके घर देहरादून में भी आकाश ऐसा ही दिखता होगा &#8211; इतना स्वच्छ, इतना नीला और इतना पारदर्शी। शायद हाँ, शायद नहीं। वहां तो अक्सर जब मंसूरी में बादल घिरते तो देहरादून की मसें भीगने लगती। आकाश की नीलाई छुप कर एक रोमानी सा वातावरण बना देती।</strong><br />
<strong>वह बेसुध सी घास पर लोटने-पलौटने लगी। कभी -कभी उसे लगता है कि जिंदगी पास से कंधे उचकाती फर्राटे से गुजरी जा रही है और कह रही है-मैं तो जिन्दा हूँ-पर तुम नहीं। इन सन्नाटों ने तो उस का जीना भुला दिया है। जिंदगी के पिछले पंद्रह वर्ष एक-एक कर के उसे अपने बाहों में जकड़ते चले गए और उसे पता भी नहीं चला। वह हर समय बस बच्चों को याद कर-कर के और अपने घर को लेकर सुबकती रही है। अपने उस घर को जिस के मुख्य द्वार से एक दिन उसके महेन की अर्थी अंदर आई थी और फिर बाहर लौट गई। उस दिन की स्मृतियाँ कहीं सारी कायनात को धूमिल कर जाती हैं। उस दिन तो उस के लिए उगा-उगाया सूरज डूब गया था और बादलों की ओट में सदैव के लिए छिप गया था। मिलिट्री के कैप्टन विनोद ने महेन की शान में प्रशंसा की झड़ी लगा दी थी। बाकी लोग भी महेन की दयाद्र्रता, वीरता और मानवीयता की दुहाई देते रहे पर उसे वह सब कुछ इतना याद नहीं आता जितना उस की आँखों में बची है-उस पार्थिव शरीर की विदाई, जो आज तक उस की आँखों की नमी बन कर पलकों के नीचे दबी पड़ी है।</strong><br />
<strong>अच्छा ही है कि अब उसे उस घर में नहीं जाना पड़ेगा क्योंकि बेटी ने कहा है-नए घर की छत पड़ रही है। इस नए घर में महेन की अर्थी कभी न आएगी-न जाएगी। अब वह केवल उस की मानसी आँखों में प्रेत की छाया बन कर अपने सदय-मनुहार के साथ जिन्दा रहेगी। निम्मी सोचती है, महेन के जाने के छ: महीने बाद ही वह वहां से चली आई थी। वहां से पलायन का यही बड़ा कारण था। जब महेन के दोस्त विनय ने अपने छोटे भाई के साथ अमेरिका में अपनी माँ की देख-रेख के लिये सहायता करने का आग्रह किया केवल दो तीन माह के लिए। तब तक उस के अंदर के तूफ़ान थमे नहीं थे। वह घर, दीवारें सब कुछ काटने को दौड़ती थीं। बच्चे भी कहीं परिपाश्र्व में चले गये थे। बड़े जेठ-जिठानी ने बच्चों की देख रेख का आश्वासन दे-दे कर इस निर्णय को दृढ़ कर दिया था। उन्होंने कहा-बहू ! क्यों भूल रही हो यह हमारे महेन के बच्चे हैं, हम इन्हें संभाल लेंगे, और उन्होंने संभाला भी। तब वाणी बारह साल की और अवध केवल नौ साल का था। </strong><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/kahani_2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-181853 aligncenter" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/kahani_2-300x284.jpg" alt="" width="499" height="472" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/kahani_2-300x284.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/kahani_2.jpg 584w" sizes="auto, (max-width: 499px) 100vw, 499px" /></a>जीवन सत्य है और मृत्यु उस सत्य का अंत। हम उम्र भर जिसे छाया या छलावा समझते रहते हैं, वास्तव में वही सच है, अंतिम सच। इस सच को हम जीते जी झेलते रहते है, न मर कर भी रोज मरते हैं। फिर भी कुछ यादें अपरोक्ष रूप से मस्तिष्क की खूँटी पर टंगी रह जाती हैं और उतरती ही नही। कारगिल शब्द आम-जनता के लिए एक शब्द मात्र बन कर जिन्दा है पर उस के लिए वह शब्द चिता-समान धू-धू कर आज तलक जल रहा है जो उस के महेन को लील गया। महेन की उस मृत घायल देह के सत्य से क्यों आज तक वह उस के जाने का चिरतंन सत्य आत्मसात नही कर पाई। उम्र भर वह उस दृश्य के अहसास को कांख में दबाये-आँखों को मीचती-भींचती रही है कि वह तस्वीर पलकों की बरौनियों तक न पहुंचे। आज तक उस स्मृति को अंदर की कोठरी में रख जीती रही-मरती रही। जब आँखें मिचमिचाने लगें और सांसें फड़फड़ाने लगें तो आसमान का विस्तार बढ़ जाता है और अपना घेरा छोटा पड़ता जाता है। </strong><br />
<strong>उस के अंदर का सन्नाटा धुंआँसा सा होकर बाहर निकल रहा है। प्रकृति की आँखों पर जैसे मोतिया उतर आया है। सब कुछ धुंध में लिपटाया सा है और फीकी नंगी पेड़ों की टहनियों में हवा कसमसा कर धीरे-धीरे कराह रही है। छतों का रंग स्लेटी से सफेद होने को है। बर्फ की बारीक फुनगियां-पानी की बूंदों सी टपक रही हैं। पास ही परेम में शशि स्वच्छ हवा के झोंकों में मुस्करा रहा है। वह तो जैसे उसे भूल ही गई थी।</strong><br />
<strong>घर कब लौटोगी! घर जल्दी लौट जाऊँगी! अब छत पड़ रही है नए घर की। </strong><strong>बहुत अच्छा है निम्मी! अपने घर लौट जाओ। मैं भी बेघर हो गया हूँ। सदा तुम्हें ढूंढता रहता हूँ। दूसरों के घरों में तुम्हे लुढ़कते, फिसलते देखते मेरा मन दुखता है।</strong><br />
<strong>उस ने आँखें खोली-वह स्तब्ध रह गई और उठ कर बैठ गई-इधर उधर देखने लगी। ओह! यह तो महेन की आवाज थी! पर महेन की आवाज कहाँ से आयी। तो महेन भी चाहते हैं-मैं लौट जाऊं ! वह अपने आप में कसमसाने लगी। एक महीने के लिए आई थी और आज पन्द्रह साल हो गए। वह भी एक अवैध नागरिक की छुपन-छुपाई खेलते-खेलते। यहाँ न जाओ, यह न करो, वह न करो। इस से नही मिल सकती-उस के पास नहीं जा सकती। किसी अत्याचार की रिपोर्ट न लिखवाओ। सब कुछ बस कड़वा घूँट समझ कर पीयो और जीयो। </strong><br />
<strong>एक क्रूर निराशा उस के मानस को लील गई है और इसी लिए वह भावों में भी अभाव ढूंढने लगी है। इच्छाओं में अनिच्छाएं, जल में रेगिस्तान और मुस्कानों के पीछे छिपे-आंसू तलाशती रहती है। सारांशत: होनियों में अनहोनियां ढूढ़ने की लत पड़ गई है। इसी भटकन में पिछले पंद्रह साल से वह भटक रही है। उसे लगता है उस पर तिजारती दुनिया का मुलम्मा चढ़ गया है। वह भी बच्चों की जरूरतें पूरी करते-करते बेहद लालची हो गई है। पर दूसरी ओर वह जाने के साधन ढूँढती है तो कहने वाले यह भी कहते हैं,&#8217; क्यों यहाँ का पैसा और उससे प्राप्त ऐय्याशी को छोड़ कर बदहवासी गले लगाना चाहती हूँ।&#8217;</strong><br />
<strong>कभी किसी ने सोचा है कि ऊंची आवाजों और चीखों से महल नही ढहते पर धीमे कहे गए गहरे शब्दों से उन की नींव हिल जाती है। वह उम्र भर अपने शहर नुमा गाँव में ऊंची-ऊंची चिल्लाहटों में सुने गए सर फाड़ शब्दों को सुनने के बाद भी उन घरो में संध्या में गुलगुलों और पकोड़ों के साथ होती रुनझुन हंसी और कहकहे सुनती रही है और कुछ भी नहीं टूटा-पर यहाँ फुसफुसाहटों में धीमे से कहे शब्दों ने भी कांच की दीवारों में दरार डाल दी। हम आप के लिए अलग घर बनवा देंगे। अभी आप दो तीन साल और वहां रह सको तो! बेटी के शब्द मन के कांच में दरार बन गए और वह एक बार फिर लहूलुहान हो गई है क्योंकि एक बार बेटा भी यही कह चुका है।</strong><br />
<strong>कुछ सम्बन्ध ऐसे होते हैं जो कट तो सकते हैं पर टूट नहीं सकते। छाया की तरह साया बन कर पीछे चलते हैं। पैसों के लालच में बच्चों की फरमाइशें-आज एक लाख चाहिए आज दो लाख और उन के साथ जुड़ी और न जाने कितनी ख्वाहिशें जिन्हें पूरा करते-करते आज तक वह अपने देस, अपने शहर, अपनी गलियाँ, हाट -बाजार, मिलिट्री की कन्टोन्मेंट का वातावरण और खुली स्वछंद हवा को छूने और महसूसने को तरसती रही और बेटी ने कह दिया-हम आप के लिए अलग घर बनवा देंगे! </strong><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/kahani_3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-181855 aligncenter" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/kahani_3-246x300.jpg" alt="" width="426" height="522" /></a>यहाँ किसी ने हाथ पकड़ा तो बेहयाई से। प्रयोग किया तो वस्तु समझ कर। जब भी हाथ छुड़ाया-वहां से निकाल दी गई। मालिक चिरोरियाँ करते रहे और मालकिने घृणा। इस उपेक्षा और उपहास के बीच जैसे युग बीत गए। जवानी की अल्हड़-आहत उम्र आज बुढ़ापे की दहलीज पर आ खड़ी हुई। आज न जाने क्या हुआ है उसे कि अंदर का दबा-घुटा लावा पसलियों को मरोड़ कर हृदय को कचोटता बाहर निकल रहा है। उस की आँख भर आई। बस अब कुछ भी हो उसे यहाँ से चले जाना है। उस ने बहुत प्रयत्न किये किसी तरह अपने अवैध निवास को वैध बना सकने के। यहाँ तक कि बच्चों को यहाँ बुला सकने के भी। किन्तु कुछ न हो सका। जिन के साथ आई थी उन्होंने ही सारे कागज छिपा कर रख लिए और कह दिया खो गये। वेतन भी पूरा न दिया और चलता कर दिया। कह दिया जिसकी सेवा-सुश्रषा के लिए लाये थे-वही नहीं रहीं तो क्यों रखें तुम्हें। हम दोनों नौकरी करते हैं। हमें तुम्हारी सहायता की आवश्यकता नहीं है। हम तुम्हें वापिस भेज सकते हैं पर रख नहीं सकते। उन का टका सा जवाब और उस समय का अपने बच्चों के लिए लिया गया निर्णय जीवन का जंजाल बन गया। जब लाये थे तो बहुत से सपने दिखाए थे, झांसे दिये थे कि बच्चों की जिंदगी बन जायेगी। वहां तुम नौकरानी नहीं-महारानियों की तरह रहोगी। एक सुनहरा सपना मन में संजो कर रख लिया था। सोचा अच्छा है, महेन की स्थानीय यादों से दूर हो जाऊंगी और इस दु:ख को आत्मसात करने में सहायता होगी। बच्चों ने भी भरपूर हामी भरी थी। पर आज सब कुछ नया-नवेला होकर डसने लगा है। गले में डाला हुआ उत्तरदायित्व-अपना ही फंदा बन गया है।</strong><br />
<strong>अचानक उसे लगा-चारों तरफ धुंध ही धुंध छा गई है। उसे देहरादून में अपने घर की बालकनी याद आ गई जहाँ खड़ी हो कर वह उस पावस ऋतु में नन्ही-नन्ही बूंदो में सायास भीगती थी। महेन की यादों में खोई-महेन के घर आने की प्रतीक्षा में, उसे अच्छा लगता था। उसे लगा महेन ने पीछे से आकर उसे भींच लिया है और अपने गालों से सटा कर बढ़ कर चूम लिया है। वह चाँद की कलाओं से भी विस्तृत महेन की मुस्कान उस के चेहरे से उतर कर उस के अंग-अंग को महकाने लगी थी। वह झपाटे से उठी-क्योंकि धुंध स्वयं बारिश का रूप ले रही थी और उसे भी भिगोने लगी थी। पर आज इस भीगने में टूटे सपनों की सीलन थी, पावस की रंगीन महक नहीं। उस के नीचे घास का बिछोना चींटियों की तरह रेंगने लगा। वह अपने आप में बिसूरती है। क्यों वह रोज इन ऋतुओं के तिलिस्म तले रिसने के लिए चली आती है। निम्मो तू तो जानती है कि तू वराह-मिहिर के दांतों में दबा वह ग्रास है जिसे न निगल सकते हैं न उगल। तेरे लिए जिंदगी एक गुंझल बन कर रह गई है। कैसे सुलझाएगी यह अष्टांग-जिस में तेरी अंगुलियां ही नहीं तेरी सारी कायनात उलझी है। वह तो जैसे एक किले में बंदी बना ली गई है और शत्रु दुर्ग पर संगल डाल कर कहीं लाम पर चला गया है। परैम में शशि कुनमुनाने लगा। मेम साहिब के आने का समय हो गया। वह घायल तिलस्म से जाग गई और ठोस धरती पर आ गिरी। उस का सारा अस्तित्व कम्पायमान था और नितांत- निर्जीव सा भी। वह कैसे जी रही है, क्यों जी रही है। किस अशुभ घड़ी में उस ने यह निर्णय ले लिया था! क्या सवार था उस पर! ऊपर से सारे परिवार वाले उसे इसी ओर धकेल रहे थे या नियति अपना जाल बुन रही थी, बस विदेश की पट्टी आँखों पर कसती चली गई थी और वह अंधी हो गई थी। </strong><br />
<strong>बीता हुआ समय ठूंठ बन कर खड़ा रहता है और हम उसे रोज झिंझोड़-झिंझोड़ कर उस से खट्टी &#8211; मीठी खुरमानियां लपकते रहते हैं। चाहे पेड़ ठूंठ बन चुका हो। वह घर भी तो मेरा ही है न! उस ने कहा था। हाँ माँ ! पर आप जानती हैं हम इतने वर्ष अलग रहें हैं और आप को भी तो अपनी तरह अलग रहने की आदत हो गई होगी-तीषा भी यही चाहती है। तीषा ऊपर रहेगी और मैं नीचे। बेटे ने भी अपना निर्णय सुना दिया था। समय तो हर क्षण जूती पहने-हमे लांघ जाने के लिए तत्पर रहता है और हम हैं कि उस के पीछे-पीछे नंगे पाँव दौड़ लगाते-लगाते हलाक होते रहते हैं। उसे लगा वह किसी लावारिस लाश सी घर में पड़ी है जहां उसे पहचानने के लिए कोई नही है। इस अनजान धरती पर लावारिस रह कर ही एक दिन वह खत्म हो जाएगी। निम्मों ने ऊपर फैले आकाश की ओर देखा और सोचा वह तो न आर की रही न पार की और देहरादून में बनते घर की ठक-ठक उस के कानों में बजने लगी। उस ने जल्दी से शशि को उठाया और मूसलाधार बौछार से बचने के लिए बरामदे की ओर दौड़ पड़ी। </strong></p>
<h4><strong>-सुदर्शन प्रियदर्शिनी</strong><br />
<strong>पता- 26 स्टार्टफोर्ड ड्राइव ब्रॉडव्यू एचटीसी ओहियो 44147 यूएसए</strong><br />
<strong>(440)717-1699</strong></h4>
<h3><strong>( लेखिका अमेरिका की प्रतिष्ठित कहानीकार, उपन्यासकार एवं कवयित्री हैं। ) </strong></h3>
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		<title>‘रेस्क्यू-ऑपरेशन’</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Dastak Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 24 Jul 2017 08:04:43 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दस्तक-विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="236" height="300" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_1-236x300.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_1-236x300.jpg 236w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_1-768x978.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_1-804x1024.jpg 804w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_1.jpg 860w" sizes="auto, (max-width: 236px) 100vw, 236px" />-सुबह बिस्तर छोड़ते के उपरान्त, अमूमन जैसी कि दिनचर्या है, दैनन्दिन की क्रिया-प्रक्रिया से पहले मेरी आदत है, कम-अज-कम दो गिलास गुनगुना पानी पीना। सो इसी क्रम में किचन में जाकर, सॉसपैन में अंदाजन दो गिलास पानी, हल्का गुनगुना होने के लिए गैस-चूल्हे पर चढ़ा दिया। पानी पीकर उसी सॉसपैन में चाय बनाने के लिए &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="236" height="300" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_1-236x300.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_1-236x300.jpg 236w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_1-768x978.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_1-804x1024.jpg 804w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_1.jpg 860w" sizes="auto, (max-width: 236px) 100vw, 236px" /><figure id="attachment_171999" aria-describedby="caption-attachment-171999" style="width: 170px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/ramnageena.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-171999" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/ramnageena.jpg" alt="" width="170" height="222" /></a><figcaption id="caption-attachment-171999" class="wp-caption-text"><strong><span style="color: #800000">-राम नगीना मौर्या</span></strong></figcaption></figure>
<p><strong>-सुबह बिस्तर छोड़ते के उपरान्त, अमूमन जैसी कि दिनचर्या है, दैनन्दिन की क्रिया-प्रक्रिया से पहले मेरी आदत है, कम-अज-कम दो गिलास गुनगुना पानी पीना। सो इसी क्रम में किचन में जाकर, सॉसपैन में अंदाजन दो गिलास पानी, हल्का गुनगुना होने के लिए गैस-चूल्हे पर चढ़ा दिया। पानी पीकर उसी सॉसपैन में चाय बनाने के लिए एक कप दूध और आवश्यकतानुसार पानी-चाय की पत्ती-अदरक-काली मिर्च आदि डालकर सॉसपैन को गैस-चूल्हे पर हल्की आंच कर रखते हुए ढक दिया। </strong><strong>रात की बारिश के बाद, आसमान साफ हो गया था। सूरज की किरणें खिड़कियों से छनकर बरामदे में आ रहीं थी। हमेशा की तरह चाय की चुस्कियां भरते पोर्च में आकर फर्श पर पड़े अखबार के बिखरे पन्नों को समेटने लगा कि तभी अचानक मेरी नजर सामने लॉन की तरफ लगे नल की ओर गयी। फर्श पर काले-काले बड़े-बड़े धब्बों के बीच कुछ रेंगने-छटपटाने जैसी एक आकृति सी दिखी। कौतुहलवश नजदीक जाकर देखा तो&#8230;एक केंचुए को चारों ओर से ढेरों चीटियां घेरे, धमा-चौकड़ी मचाते, चहुंओर से उस पर पिली पड़ीं थीं।</strong><br />
<strong>वहां का हौलनाक मंजर? देखकर भीतर-ही-भीतर मेरा मन खौफ से भर उठा। किसी निरीह के दर्द, छटपटाहट भरे अनुभव का भान हुआ। पर, अगले ही पल केंचुए की छटपटाहट शान्त हो गयी। जिसे देखकर एकबारगी लगा&#8230;शायद, इन चींटियों के बींधने-काटने से मर गया हो? चलो छोड़ो&#8230; ये इन चीटियों के भोजन के ही काम आ जायेगा? सोचा ये भी कि&#8230; ‘अरे ये तो सिम्पली एक फूड-चेन है, हमारी प्रकृति का। ऐसे में, मुझे ज्यादा सोच-विचार करने की आवश्यकता भी क्या?’</strong><strong>तो भी-फिर भी&#8230; उस केंचुए को लेकर कुछ विभ्रम, कुछ असमंजस की स्थिति तो थोड़ी देर तक मेरे मन-मस्तिष्क में बनी ही रही। फिर कुछ सोचा&#8230;‘चलो, इस केंचुए को उलट-पलट कर देखते ही हैं, क्या पता अभी जिन्दा हो?’ </strong><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-172001 alignright" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_1-236x300.jpg" alt="" width="274" height="348" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_1-236x300.jpg 236w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_1-768x978.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_1-804x1024.jpg 804w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_1.jpg 860w" sizes="auto, (max-width: 274px) 100vw, 274px" /></a>इसी निमित्त पास ही पड़ी एक सूखी डण्ठल से केंचुए को हल्के अभी छुआ भर ही होगा कि&#8230;‘‘त्राहिमाम हे भले-मानुष&#8230;’’ &#8230;मानों एस़ओ़एस़ का एक आत्र्तनाद सा गूंजा हो मेरे कानों में। एक झटके में अनेकों प्रसंग-कथाएं, मेरे मन-मस्तिष्क में आलोड़न-विलोड़न होने लगीं। प्रकारान्तर से ढेरों मर्मभेदी स्वर-लहरियां&#8230; स्मृति-पटल पर दस्तक देने लगीं। कानों में किसी मरणासन्न का कातर-स्वर प्रतिध्वनित हुआ। </strong><strong>तुरन्त ये सुविचार कौंधा मेरे मन-मस्तिष्क में कि ‘मुझे इस केंचुए को उलट-पलट कर देखना ही चाहिए।’ यही सोचते, उसी डण्ठल से एक बार उसे फिर हल्के ढकेलते, देखना चाहा। केंचुए में एक बार फिर हल्की हलचल हुई।</strong><br />
<strong>अरे&#8230; ये तो अभी जिन्दा है? इसे इन चींटियों की मार से बचाना चाहिए? अन्तर्मन में परोपकार या शायद&#8230; करुणा-भाव ने करवट बदला। ध्यान दिया तो&#8230; बुरी तरह उन चींटियों से घिरे होने, बार-बार बेरहमीं से उनके बींधने-काटने-सताने से वो केंचुआ असहाय सा महसूस कर रहा था। थोड़ी-थोड़ी देर पर उसमें हो रही हरकत, उसकी छटपटाहट, तिलमिलाहट, बेचैनी को नजदीक से साफ-साफ देखा&#8230;महसूस किया जा सकता था। </strong><strong>सर्व-समावेशी नजरिये&#8230; ऐसी देश-काल-स्थिति- परिस्थिति पर गौर करते, अखबार बांचने, मॉर्निंग-वाक पर जाने का विचार तत्काल स्थगित किया। मानों याद आ गया हो जरूरी जीवन-बोध, कर्तव्य-बोध। सूखी डण्ठल से केंचुए को एक बार फिर हल्के छुआ। इस बार उसमें तीव्र प्रतिक्रिया हुई। ऐसा लगा जैसे जान बचाने के उपक्रम में उसने इस बार अपनी पूरी ताकत झोंक दी हो। केंचुआ उस सूखी डण्ठल से लिपटने लगा। </strong><br />
<strong>केंचुए में अभी जान बाकी है। ये सोच उस केंचुए की जान बचाने की गरजवश मैंने तत्काल इधर-उधर नजर दौड़ाई। बाहर लॉन में ही बिना हैण्डल वाली बाल्टी पड़ी हुई थी, जो गत रात हुई बारिश की वजह से लबालब भर गयी थी। बाल्टी के बगल में ही गमलों में पानी देने वाला टूटा मग भी पड़ा था। </strong><strong>परदु:खकातरतावश, नि:सहाय केंचुए की स्थिति-परिस्थिति को महसूस करते, बिना ज्यादा कुछ आगे-पीछे सोचे&#8230; मैंने फौरन ही बाल्टी से एक मग पानी निकाल कर घायल केंचुए पर डाल दिया। केंचुए पर पानी पड़ते, तत्क्षण ही सभी चींटियां तितर-बितर हो चहुंओर, मानों घबड़ाकर, सरपट भागने लगीं। इसी उपक्रम में मैंने केंचुए पर ताबड़तोड़ दो-तीन मग पानी और डाल दिया। </strong><strong>अब वो केंचुआ निढाल पड़ा था, पर उसमें हल्की-फुल्की हरकत अभी भी हो रही थी। सभी चींटियां वहां से जा चुकी थीं। मन में सुबह-सुबह ही कुछ अच्छा कार्य करने का भाव उत्पन्न हुआ। मेरा काम अब खत्म हो चुका था। </strong><br />
<strong>बावजूद इस सुदीर्घ क्रिया-प्रक्रिया-प्रतिक्रिया के, मैं पूरी तरह मुतमैयन अभी भी नहीं हो पा रहा था। मन में अभी भी ये आशंका बनी हुई थी कि अगर इस केंचुए को यहां यूं अकेले छोड़ दिया गया तो, वो शिकारी चींटियां कहीं दुबारा न आ जायें? दुबारा न परेशान करने लगें इस निरीह केंचुए को? अबकी बार तो वो इसके चारों ओर सिर्फ धमा-चौकड़ी ही नहीं मचायेंगी, बल्कि इसे काटते-बींधते सतायेंगी ऐसे कि हो सकता है अबकी मार ही न डालें इसे जान से?</strong><br />
<strong>ये सोच कर कि देखूं? केंचुए पर मेरी किसी क्रिया की, अगली प्रतिक्रिया क्या होती है, उसी डण्ठल से एक बार फिर उसे लॉन की तरफ ढकेलने की कोशिश की। प्रतिक्रियास्वरूप वो केंचुआ भी तेजी से लॉन की ओर खिसकते, भागने लगा। </strong><strong>मन को आह्लादित करती, केंचुए की दशा-दिशा देख, मन द्रवित हो उठा। ताबड़तोड़ तीन-चार मग पानी उस पर और डालते, मैंने उसे लॉन की तरफ जाने में मदद की। सकपकाया सा वो केंचुआ भी तेजी से अपनी जान बचाने के निमित्त गीली जमीन में घुसने&#8230;शायद लुकाने का प्रयास करने लगा। अब वहां चींटियों का नामोंनिशान नहीं था। सभी चीटिंयां तितर-बितर हो निकल गयीं थीं, अपने अगले मुकाम पर? शायद भोजन की तलाश में?</strong><br />
<a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft  wp-image-172002" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_2-241x300.jpg" alt="" width="265" height="330" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_2-241x300.jpg 241w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_2.jpg 722w" sizes="auto, (max-width: 265px) 100vw, 265px" /></a><strong>मेरी नजर पल-भर के लिए ही इधर-उधर हुई होगी कि वो केंचुआ भी अब लॉन में कहीं नहीं दिख रहा था। शायद वो भी घास में कहीं&#8230;लुकाने-छुपने में कामयाब हो गया था?</strong><br />
<strong>थोड़ा विषयान्तर करता चलूं। </strong><strong>मैं इस बात से बेखबर नहीं था कि घर के अन्दर, सुबह-सुबह ही ड्राइंग-रूम में सोफे, खिड़कियां, दरवाजे के पर्दों की धूल झाड़ते&#8230;खिड़की के उस पार से, पत्नी जाने कब से मेरी इस पूरी कवायद पर नजर रखे&#8230;खुद में जाने क्या-कुछ बड़बड़ा रहीं थीं&#8230;?</strong><br />
<strong>‘‘झिंगाऽलाला-झिंगाऽलाला&#8230;हुर्र-हुर्र&#8230;’ जिस समय श्रीमती जी मुझ पर बड़बड़ा रहीं थीं, उसी समय ड्राइंग-रूम में रखे मेरे मोबॉयल का सिंग-टोन गूंजा, जिसे श्रीमती जी ने ही रिसीव किया। </strong><strong>मैंने ध्यान दिया कि खिड़कियों और दरवाजों की धूल झाड़ते-झाड़ते ही श्रीमती जी ने अपनी बहुआयामी-बहुमुखी प्रतिभा का परिचय देते, हँसते-खिलखिलाते, फोनकत्र्ता से बातें करतीं रहींं। जितना कुछ भी मैं सुन पाया, उन बात-बतकहियों की बानगी, जेरे नजर है:-</strong><br />
<strong> ‘हां&#8230; हलो कौन?’’</strong><strong>अरे! दीदी, आप तो अपने भइय्या को जानती ही हैं कि कितने सनकी-झक्की टाइप के हैं&#8230;पता नहीं दिमाग में कब-क्या-कौन सा खब्त सवार हो जाय, कुछ कहा नहीं जा सकता?’’</strong><strong>अरे! जानती हैं, अभी परसों शाम को ऑफिस से निकले। स्कूटी स्टार्ट करने लगे। दस-पन्द्रह बार किक मारने के बाद भी जब स्कूटी स्टार्ट नहीं हुई तो देखा कि पेट्रोल वाली सूई जीरो पर अटकी हुई है? पेट्रोल खत्म है? फौरन मुझे फोन मिला दिया, कहने लगे&#8230;‘ये सब तुम्हारे ही कारण है। कल देर शाम को बाजार जाने की जिद न करती, तो इसमें आज ऑफिस आने-जाने भर का पेट्रोल था?’’</strong><br />
<strong>नहीं-नहीं! मैंने उन्हें ऑफिस जाने से पहले ही याद दिलाया था&#8230;‘स्कूटी में पेट्रोल कम है, रास्ते में पेट्रोल-पम्प पर भरवा लीजिएगा।’ जब शाम को इन्होंने मुझे बताया कि स्कूटी में पेट्रोल खत्म हो गया है, तो मैंने उन्हें फिर याद दिलाया कि, ‘मैंने तो आपको सुबह ही बोला था कि पेट्रोल भरवा लीजिएगा।’ उन्होंने हुंकारी भी भरी थी कि ‘हां, रास्ते में पड़ने वाले पेट्रोल-पम्प पर भरवा लूंगा।’ अब आप ही बताइये? स्कूटी वो चलाते हैं कि मैं? स्कूटी में पेट्रोल खत्म होने वाला है या अभी कितना है, इसकी जानकारी उन्हें होनी चाहिए कि मुझे? बताइये, मैंने कोई अजगुत बात तो कही नहीं? फिर, सरेख वो हुए कि मैं?’’</strong><strong>वही तो! जब यही सब कहते, मैंने उन्हें झिड़कते याद दिलाया कि ‘अच्छा अब जो हुआ सो हुआ। अब आप अपनी स्कूटी, लेकर बाहर निकलिए। ऑफिस के मेन-गेट से बांयीं ओर थोड़ी दूर चल कर ही तो पेट्रोल-पम्प है। स्कूटी ढकेलते, खरामां-खरामां चले जाइये, पेट्रोल भरवा लीजिए।’ इस तरह डिटेल में समझाने पर उनके दिमाग में ये बातें आईं।’’</strong><br />
<strong>बात डिपेण्डेन्सी की नहीं होती दीदी&#8230;? ये तो सरासर लापरवाही हुई न? और सुनिए, परसों सुबह-सुबह ही अपने कम्प्यूटर पर कोई काम?&#8230;हां-हां, वही लिखने-विखने वाला ही काम&#8230;? कर रहे थे कि अचानक उनके कार्डलेस-माउस ने काम करना बन्द कर दिया। काफी देर तक माउस को ठोंका-पीटा-हिलाया-डुलाया, और दुलराया भी। देखा-जांचा-परखा, तो पता चला कि उसकी बैटरी काफी पुरानी हो गयी है, इसीलिए काम नहीं कर रहा। अब इसके लिए भी मुझे ही जिम्मेदार ठहराते, कहने लगे ‘तुम्हारा अपने बच्चों पर कोई नियन्त्रण नहीं है&#8230;? बच्चे दिन-भर कम्प्यूटर पर जाने कौन-कौन से अगड़म-बगड़म-सगड़म, गेम वगैरह खेलते रहते हैं, तुम उन्हें रोक भी नहीं सकती? कम्प्यूटर पर जब भी कोई जरूरी काम करने की सोचो, तो कुछ-न-कुछ गड़बड़ाया ही रहता है?’’</strong><br />
<strong>‘‘सही बात है! आखिर बच्चे, उनके भी तो हैं? वो ही क्यों नहीं मना करके देख लेते अपने लाडलों को? क्या पता उनकी ही बातें मान जायें?’’</strong><strong>हां, फिर मैंने भी कस्स् के झाड़ दिया। जम कर सुना दिया&#8230;‘आप ही बच्चों को रोक-टोक कर देख लीजिए, क्या पता आपकी ही बात मान जायें?’’</strong><br />
<strong>‘‘ये भी तो&#8230;एक दिन जब अपना मोबॉयल लेकर ऑफिस गये थे, वहां जब बात करने के लिए जेब से मोबॉयल निकाला तो देखा&#8230;ये तो स्विच-ऑफ है। ऑन करने की कोशिश की तो ऑन ही नहीं हुआ। पता चला मोबॉयल की बैटरी तो पूरी तरह डिस्चार्ज है। चूंकि इनका मोबॉयल चालू नहीं हुआ, सो इन्होंने ऑफिस के फोन से ही मुझे फोन मिला दिया और आव देखा न ताव, बस्स फोन पर ही मुझ पर अलफ हो, आंय-बांय-शांय बतियाने लगे। चूंकि इनके ऑफिस का नम्बर तो मेरे मोबॉयल में सेभ नहीं था, सो मैं भी भौंचक्की कि ये कौन है? जो मुझसे इस तरह बकवास बातें कर रहा है? गुस्से में तो वैसे भी इनकी आवाज भर्राने लगती है, इनकी आवाज पहचान ही नहीं पायी। मैंने भी खूब कस्स् के झाड़ लगा दी।’’</strong><br />
<strong>‘‘<a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-172003 alignright" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_3-214x300.jpg" alt="" width="239" height="335" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_3-214x300.jpg 214w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_3-730x1024.jpg 730w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/07/kahani_3.jpg 756w" sizes="auto, (max-width: 239px) 100vw, 239px" /></a>फिर क्या? जनाब आ गये लाइन पर&#8230;हां नहीं तो? अचानक आवाज नरम हो गई, तो फौरन ही पहचान गई कि ‘अररे ये तो ‘वो’ हैं?’ फिर मैंने जानना चाहा कि ‘आप अपने मोबॉयल से क्यों नहीं बतिया रहे हैं? कहीं घर पर ही तो नहीं छूट गया?’ तब इन्होंने अपनी परेशानी बताते, पूरी व्यथा-कथा सुनाई।’’</strong><strong>मैंने समझाया भी, कि ‘बाऽबू को सुबह-सुबह स्कूल निकलने की जल्दी रहती है। नाश्ता करते-करते ही वो उस पर कुछ गेम-वेम भी खेलता रहता है। क्या पता&#8230;स्कूल के लिए निकलते समय आपके मोबॉयल को चार्जिंग में लगाना भूल गया होगा? पर आपको तो देखना चाहिए था न! अपनी चीज को चुस्त-दुरूस्त&#8230;अपडेट रखने की जिम्मेदारी तो आप ही की है न?’’</strong><br />
<strong>‘‘फिर कहते क्या? थोड़ी देर तक फोन पर ही झल्लाते-बड़बड़ाते रहे&#8230;‘समझी कि नहीं&#8230;? समझी कि नहीं&#8230;? तुम समझती ही नहीं&#8230;?’ कहते समझाते रहे, फिर पता नहीं क्या समझ-बूझ कर अपने आप ही शान्त हो गये।’’</strong><strong>हां&#8230;आपके भाई-साहब अभी टहलने नहीं निकले हैं।’’</strong><br />
<strong>‘‘&#8230;हां हैं तो यहीं? लॉन में जरा एक ठो जरूरी ‘रेस्क्यू-ऑपरेशन’&#8230;? में लगे हैं।’</strong><strong>आप थोड़ी देर बाद फोन करके उस ‘रेस्क्यू-ऑपरेशन’&#8230;? के बारे में उनसे, खुद्दै पूछ लीजियेगा। काहे से कि&#8230;पूरे मामले में जब-तक वो आपको&#8230;आद्योपान्त समझा नहीं लेंगे, उनके पेट में बात पचेगी भी तो नहीं?’’</strong><strong>नहीं-नहीं, हम लोगों की बातचीत उन्हें सुनाई थोड़े न दे रही होगी? इस समय वो जिस काम में मगन हैं, वो उनके लिए ‘दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण कार्य’ है। सुध-बुध भुलाए, अपने काम में बड़ी शिद्दत से मगन हैं।’’</strong><br />
<strong>अभी, परसों ही तो मैंने कहा था&#8230;‘सुबह-सुबह दरवाजा मत खोला कीजिए’&#8230;तो इन्होंने सुना&#8230;‘सुबह-सुबह ज्यादा मत बोला कीजिए?’’</strong><strong>अच्छा दीदी, रखती हूं। काम इतना सारा पड़ा है कि सांस लेने की भी फुर्सत नहीं है।’’</strong><br />
<strong>नमस्ते।’’</strong><strong>आंय़.़क्या कहा? अरे दीदी, आपकी आवाज कट-कट कर आ रही है, जरा तेज बोलिए?’’</strong><strong>आइये अब ननद-भौजाई की इस अलामत-मलामत सी अनाप-शनाप़.़? बातचीत से आगे बढ़ते हैं। </strong><strong>हाल-फिलहाल-बहरहाल, मेरा ‘कन्सर्न’ तो कुछ और ही है?</strong><br />
<strong>उस केंचुए और उन चींटियों को लेकर, आलोड़न-बिलोड़न हो रहे तमाम भाव-विचार, मेरे मन-मस्तिष्क में&#8230;अभी भी अन्तर्गुम्फित हैं? असमन्जस में अभी भी हूं कि जो ‘फूड-चेन’ बनाई है प्रकृति ने, अपने अहमकपने के तईं या कह लीजिए जाने-अनजाने&#8230;अतिउत्साह, अति-भावुकता में, कहीं भंग तो नहीं कर दिया मैंने&#8230;? </strong></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>‘जीतबो रे’</title>
		<link>https://dastaktimes.org/%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%ac%e0%a5%8b-%e0%a4%b0%e0%a5%87/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Dastak Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 18 Jun 2017 05:47:23 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दस्तक-विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="300" height="261" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/jitibo-re_1-300x261.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/jitibo-re_1-300x261.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/jitibo-re_1.jpg 520w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />कहानी ऊपर केशरिया कुर्ता, नीचे हरी, फटी मटमैली धोती, सिर पर कागज की टोपी पहने स्वतन्त्रदेव जी अवतरित हुए। कहने को तो ये आजादी की लड़ाई में शरीक होने वाले एक क्रान्तिकारी हैं, एक योद्घा जो स्वयं तो आजादी के लिए लड़ता ही है साथ में अपने सिपाहियों को समय-समय पर उत्साहित करता रहता है। &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="261" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/jitibo-re_1-300x261.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/jitibo-re_1-300x261.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/jitibo-re_1.jpg 520w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /><p><span style="color: #ff0000"><strong>कहानी</strong></span></p>
<figure id="attachment_165224" aria-describedby="caption-attachment-165224" style="width: 183px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/deepika-singh.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-165224" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/deepika-singh-258x300.jpg" alt="" width="183" height="213" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/deepika-singh-258x300.jpg 258w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/deepika-singh.jpg 337w" sizes="auto, (max-width: 183px) 100vw, 183px" /></a><figcaption id="caption-attachment-165224" class="wp-caption-text"><strong><span style="color: #800000">दीपिका सिंह</span></strong></figcaption></figure>
<p><strong>ऊपर केशरिया कुर्ता, नीचे हरी, फटी मटमैली धोती, सिर पर कागज की टोपी पहने स्वतन्त्रदेव जी अवतरित हुए। कहने को तो ये आजादी की लड़ाई में शरीक होने वाले एक क्रान्तिकारी हैं, एक योद्घा जो स्वयं तो आजादी के लिए लड़ता ही है साथ में अपने सिपाहियों को समय-समय पर उत्साहित करता रहता है। ये स्वतंत्र महाशय जी शरीर से हष्ट-पुष्ट, दिल से दिलदार, व्यवहार में स्पष्टवादी, स्वभाव से ईमानदार पर दिमाग से बीमार है। ये आजादी की लडा़ई लड़ने चले हैं। इनका शुभ नाम तो मलूकदास है, पर नाम में क्या रखा है वास्तविक रूप में मतलब तो सिर्फ काम से है। काम है देश की आजादी। सो इन्होंने अपना नाम रख लिया स्वतन्त्र, पत्नी का नाम आजादी और बेटे का नाम संघर्ष।</strong><br />
<strong>स्वतंत्र जी जब चलतें हैं देश को आजादी दिलाने तब उनका भेष उपर्युक्त वर्णित भेष ही होता है, और हाथ में होते है दो-चार पर्चे जिसमें आजादी के महत्व, लोगों को स्वतंत्रता संघर्ष के लिए प्रेरित करने वाली कुछ पंक्तियां होती है। इसलिए वह दीवार पर क्रान्तिकारियों द्वारा चिपकाए दो-चार पर्चे उखाड़कर हाथ में ले लेते हैं। साथ में होता है झन्डा जो सिपाही से छीने गये सुन्दर बेंत के डन्डे में बंधा होता है। झन्डा नहीं मिला तो क्या अपनी धोती फाड़ रंग दिया और बन गया आजादी का सुनहरा झन्डा जिस झन्डे को लहराते और पर्चों को हवा में उडाघ्ते चल पड़ते हैं स्वतंत्र जी आजादी की लौ हरदिल में जगाने।</strong><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/jitibo-re.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-165225 alignright" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/jitibo-re-300x162.jpg" alt="" width="313" height="169" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/jitibo-re-300x162.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/jitibo-re.jpg 538w" sizes="auto, (max-width: 313px) 100vw, 313px" /></a>इनके घरवाले भी इनसे परेशान रहते हैं,पर हैं तो घर के एक सदस्य सो छोड़ा भी नहीं जा सकता। आस-पास के लोगों से पता चला कि स्वतंत्र जी अपने समय के जाने-माने क्रान्तिकारी और देशहित-चिन्तक थे। स्वाधीनता आन्दोलन की गतिविधियों में शामिल होना, कार्यक्रमों को बाधा रहित आगे बढ़ाते रहना इनका कार्य था। अंग्रेजी राज्य का समूलनाश करने के लिए जनता को एकजुट कर विद्रोह करवाना मकसद था। अंग्रेज की दमनकारी नीतियों, निर्दोष जनता पर उनका अत्याचार और शोषण का इनके ऊपर गहरा असर था। एक बार गांधी जी से प्रभावित हो ये भी चल दिए सत्य-अहिंसा की लड़ाई में। अंग्रेज एक पर लाठी चलाते तो दो आगे आते, दो पर लाठी चलती तो चार। स्वतंत्र जी भी देश की स्वतंत्रता में मदमस्त हो अपना सबकुछ भूल बढ़ गये लाठी खाने के लिए। अंग्रेजों ने कई लाठियां बरसायी। स्वतंत्र जी सब कुछ सहते रहे। हर पीड़ा को देशहित में भुला दिया। पर दिमाग तो बेचारा कमजोर था। लाठी खा-खाकर थक गया। एक जोर की लाठी दिमाग पर पड़ी और स्वतंत्र जी चारो खाने चित्त हो गये। जब होश आया तो अस्पताल के बिस्तर को इस महान क्रान्तिकारी ने सुशोभित किया हुआ था। इस महान क्रान्तिकारी की हालत देखने के लिए देश की जनता तो नहीं घरवाले और पड़ोस के कुछ लोग इन्सानियतवश खड़े थे। ठीक होतेदृ होते इन्हें कुछ याद न रहा बस याद रह गया तो आन्दोलन का वह दिन और अंग्रेजों का अत्याचार।</strong><br />
<strong>बस फिर क्या था ‘वन्देमातरम, ‘पुरजा पुरजा कट मरे कबहुं ना छाड़े खेत’ के नारे लगाते स्वतंत्र जी चल पड़ते हैं हिन्दुस्तान की गलियों और सड़कों पर। अब न उन्हें अंग्रेजों का डर था न उनकी लाठी का। अब स्वतंत्र जी साक्षात बारूद बन चुके हैं जो स्वयं तो फटता ही है दूसरों को भी फोड़ डालता है। मुझे वो दिन आज भी याद है जब स्वतंत्र जी को एक अंग्रेज सिपाही पकड़कर ले गया। उनकी पेशी अंग्रेज अफसर के सामने हुई।</strong><br />
<strong>अंग्रेज अफसर ने पूछा, ‘टुम्हारा नेम क्या है?’</strong><br />
<strong>स्वतंत्र जी बोले, ‘मेरा नाम स्वतंत्र, पत्नी का नाम आजादी, बेटे का नाम संघर्ष और देश का नाम हिन्दुस्तान। और कुछ जानना है साहब मेरे बारे में।’ </strong><strong>अंग्रेज अफसर, ‘ह्वाट अ स्ट्रैन्जमैन, टुम गलियों, सरकों पर इधर-उधर हमारे खिलाफ लोगों को भड़काटा फिरटा है, टुमको और कोई काम नहीं क्या? टुम एक दिन मारा जायेगा।’</strong><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/jitibo-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft  wp-image-165226" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/jitibo-2-300x268.jpg" alt="" width="266" height="238" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/jitibo-2-300x268.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/jitibo-2.jpg 508w" sizes="auto, (max-width: 266px) 100vw, 266px" /></a>स्वतंत्र जी, ‘मारा तो सब जायेगा, हम भी, तुम भी, ये सब भी। तुम हमारा दुश्मन है और हम सब तुमको भगा के मानेगा। तुमको तुम्हारे देश भेज के ही दम लेगा। आई एम एन अनेस्ट सोल्जर अफ माय कन्ट्री हिन्दुस्तान। तुम हमको हमारे ही देश में मारेगा पर हम तुमको अपने ही देश में मारेगा तुमको तुम्हारे देश भागने भी नहीं देगा।</strong><br />
<strong>तब तक किसी ने अंग्रेज अफसर को सूचित किया कि यह पागल है, इससे बात मत करिये साहब। अंग्रेज अफसर ने एक पागल से बातकर अपना टाईम वेस्ट करनी मूर्खता समझी और स्वतंत्र जी को भगा दिया। स्वतंत्र जी जाते-जाते आँखों ही आँखों में अंग्रेज अफसर को धमकी देते और कहते हुए चले गये कि</strong><br />
<strong>‘हम सब तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा तब तुमने हमारे ऊपर जुल्म किया अब तुम्हें हम छोड़ेगा नहीं। यमराज से बात करके तुम्हे नरक में भेजकर ही दम लेगा। तुम्हारा सूरज कभी नहीं डूबता पर हम गंगा मईया से अपनी देश की हालत बताकर तुम्हारे देश का सूरज डूबवा देगा और तुम देखता रह जायेगा अपने देश का यह सर्वनाश। तुम हमको जानता नहीं।’</strong><br />
<strong>ऐसी घटनायें आये दिन होती रहीं। धीरे-धीरे सभी स्वतंत्र जी के इस व्यवहार से परिचित हो गये। पागल की इन फिजूल की बातों पर किसी का ध्यान भी न जाता था।</strong><br />
<strong>एक दिन सभी लोगों ने लखनऊ में एक एसेम्बली करने का निर्णय लिया। स्वतंत्र जी को इससे अलग रखा गया वरना ये अंग्रेजों को जाकर इसकी पूर्व सूचना दे देते और सब कुछ होने से पहले ही रोक लग जाती। सूचना तो स्वतंत्र जी अंग्रेजों को कुछ नहीं देते अलबत्ता उन्हें धमकी जरूर दे आते कि हम बारह सितम्बर को सभा करने जा रहे हैं तुम सब में दम है तो रोक लो। फिलहाल उनको कोई जानकारी नहीं लगी।</strong><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/jitibo-re_1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-165227 alignright" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/jitibo-re_1-300x261.jpg" alt="" width="286" height="249" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/jitibo-re_1-300x261.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/jitibo-re_1.jpg 520w" sizes="auto, (max-width: 286px) 100vw, 286px" /></a>बारह सितम्बर का दिन आ गया। जगह-जगह से लोग सभा के लिए इकठ्ठे होने लगे। सभी लोगों में उत्साह था। औरतें, बच्चें, बूढ़ें सभी अपने घरों से निकल सभा में सम्मिलित हुए। हर सभा की तरह इस सभा में भी प्रमुख नेताओं ने आकर अपने-अपने विचार व्यक्त किये। गाँधी जी, नेहरू जी, सुभाषचन्द्र बोस आदि नेताओं और विचारकों के जनता के लिए-दिए गये सन्देश को बताया गया। देश के अन्य हिस्सों में आजादी के लिए हो रही तमाम गतिविधियों से लोगों को अवगत कराया गया। तब तक अंग्रेज अफसरों को भी इस सभा की सूचना मिल चुकी थी। अंग्रेज अफसर अपने असलहों और फौजों को लेकर आ चुके थे। थमस ने लोगों को चेतावनी दी कि अगर वे अंग्रेजी हुकूमत का विरोध करना नहीं छोड़ते और दस मिनट के अन्दर सभा विसर्जित नहीं हुई तो गोली चलवा दी जायेगी। पर एक भी व्यक्ति वहाँ से हिला नहीं बल्कि इस चेतावनी का असर उल्टा ही हुआ, लोगों ने और भी गर्मजोशी से अपने विचार रखे। दस मिनट बाद थमस ने अपने सिपाहियों को गोली चलाने का आदेश दे दिया। गोली चलते ही कुछ लोग शहीद हो गये, कुछ भागने लगे, कुछ लोग अन्त तक मोर्चे पर डटे रहकर सिपाहियों की गोलियों का सामना पूरी वीरता से किया। थमस की नजर सभा में लहरा रहे झण्डे पर पड़ी, वह अन्दर तक जल उठा। उसने तत्काल एक सिपाही को आदेश दिया कि झण्डे को गिरा दिया जाये। जैसे ही सिपाही ने झण्डा उतारने की कोशिश की स्वतंत्र जी एक कुशल अभिनेता की तरह मंच पर अवतरित हुए और सिपाही को एक लात मारकर गिरा दिया पर झण्डे को गिरने न दिया। तभी थमस के बन्दूक से निकली एक गोली चक्कर लगाती स्वतंत्र जी के सीने को भेदती हुई निकल गई। स्वतंत्र जी ने झण्डे को यथोचित स्थान पर लहराया और ऊंचे स्वर में गाया</strong><br />
<span style="color: #ff0000"><strong>गाजियों में बू रहेगी जब तलक ईमानकी</strong></span><br />
<span style="color: #ff0000"><strong>तख्ते लन्दन तक चलेगी तेग हिन्दुस्तान की॥</strong></span><br />
<strong><span style="color: #ff0000">और आजादी के इस वीर का शरीर धरती पर गिर पड़ा।</span> </strong><br />
<span style="color: #800000"><strong>(लेखिका, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से जुड़ी हैं)</strong></span></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>यहाँ सब ठीक है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Dastak Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 07 Jun 2017 09:04:18 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दस्तक-विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="300" height="227" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/kahani_1-300x227.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/kahani_1-300x227.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/kahani_1-768x580.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/kahani_1-90x68.jpg 90w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/kahani_1.jpg 907w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />कहानी पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार के अंचल में नई-नई तरक्की का दौर है, अब वाराणसी से सत्यकाम के गाँव सीहर तक बस जाने लगी है, लेकिन आखिरी बस अपराह्न दो बजे होती है। उत्तर प्रदेश की बस राज्य की सीमा तक जाती है सवारियों को वहाँ से आगे ले जाने के लिए अब &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="227" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/kahani_1-300x227.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/kahani_1-300x227.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/kahani_1-768x580.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/kahani_1-90x68.jpg 90w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/kahani_1.jpg 907w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /><p><span style="color: #ff0000"><strong>कहानी</strong></span></p>
<figure id="attachment_162865" aria-describedby="caption-attachment-162865" style="width: 175px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/suneel-srivastava.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-162865" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/suneel-srivastava-233x300.jpg" alt="" width="175" height="225" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/suneel-srivastava-233x300.jpg 233w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/suneel-srivastava.jpg 245w" sizes="auto, (max-width: 175px) 100vw, 175px" /></a><figcaption id="caption-attachment-162865" class="wp-caption-text"><strong><span style="color: #ff0000">सुनील कुमार श्रीवास्तव</span></strong></figcaption></figure>
<p><strong>पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार के अंचल में नई-नई तरक्की का दौर है, अब वाराणसी से सत्यकाम के गाँव सीहर तक बस जाने लगी है, लेकिन आखिरी बस अपराह्न दो बजे होती है। उत्तर प्रदेश की बस राज्य की सीमा तक जाती है सवारियों को वहाँ से आगे ले जाने के लिए अब बिहार की अपनी बसें हैं, लेकिन शाम पाँच बजे के बाद कोई बस नहीं जाती। </strong><strong>सड़क काफी टूट चुकी है और लंबी-लंबी दूरियों तक कच्ची सड़क का रूप ले चुकी है। दोनों ओर छोटे-छोटे गाँवों के बीच धान के खेत फैले हुए हैं। सूर्यास्ती के साथ-साथ इस समूचे अंचल में एक सन्नाटा भरा अंधकार घिरने लगता है और हवा के चलने से एक पोशीदा आवाज सुनाई पड़ने लगती है। पास के कस्बे से होकर गाँव में बिजली के तार अब खिंच गए हैं, लेकिन बिजली खास इनायत की तरह कभी-कदास ही आती है, और तब गाँव के नौजवानों और बच्चों की जिंदगी में इससे रोशनी के कुछ रंग बनने लगते हैं और माहौल उत्सव जैसा हो जाता है। बाकी वक्त में जब सारा आलम मायूस अंधेरे की गिरफ्त में होता है, दिन जल्दी खत्म हो जाते हैं और ढिबरियों और लालटेनों की पीली रोशनी में रातें बेहद बीमार और कमजोर नजर आने लगती हैं। </strong><br />
<strong>गावों की सड़कें जो कि अब इस अंचल के संचारतंत्र की खास धमनी की तरह गाँवों से लगी हुई हैं, गाँवों के साझे और रोजमर्रा के जीवन से भी अभिन्न रूप से जुड़ी है, और अब गलियारों, चौपाल और कुछ हद तक आँगनों का भी काफी हिस्सा गाँवों से लगी हुई सड़क के फैलाव, कगारों और पुलियों में जज्ब हो चुका है। </strong><br />
<strong>सत्यकाम बंबई से इस बार बच्चों की छुट्टियों में सपरिवार गाँव आए तो काफी बदलाव नजर आया। सुबह बच्चों को लेकर सड़क पर निकले। मालूम हुआ कि तड़के भोर से बिजली भी आ चुकी है। सड़क की दूसरी ओर धान के खेतों के बीच एक द्वीप बनाता निझावन सिंह का ट्यूबवेल है जिसके गिर्द मौसमी सब्जी की क्याारियाँ हैं, ट्यूबवेल अपनी रफ्तार में था और कई लोग धरती की कोख से निकलते ताजे गुनगुने जल में स्नान का आनंद ले रहे थे। सत्यकाम ने भी यहीं नहाने धोने का कार्यक्रम बनाया। बच्चे खुश हो गए।</strong><br />
<strong>ट्यूबवेल तक जाने में उनकी कुछ लोगों के साथ दुआ-सलाम हुई। वली सिंह उधर से ही लौट रहे थे, उन्हें रोक कर राम-राम की, बोले- सुना, आप रात में आए, सब ठीक तो है? आप तो गाँव को भूल ही गए? ऐसे भी कोई अपनों पर नाराज होता है? </strong><strong>सत्यकाम ने कुशल बताई। वली सिंह ने फिर टोह ली &#8211; अब तो तरक्की, हो गई है? सुना है पे कमीसन में सैलरी में काफी इजाफा हो गया है? </strong><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/kahani_1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="size-medium wp-image-162866 alignright" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/kahani_1-300x227.jpg" alt="" width="300" height="227" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/kahani_1-300x227.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/kahani_1-768x580.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/kahani_1-90x68.jpg 90w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/kahani_1.jpg 907w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /></a>सत्यकाम को काफी अटपटा लगा, प्रसंग बदलते हुए बताया कि किस तरह शहरों में महंगाई ने हालत खराब कर रखी है। उनका छोटा बेटा उँगली पकड़ कर खड़ा था, कौतूहल से उनकी बातें सुन रहा था। वली सिंह उसके सिर पर हाथ फेरने लगे, बोले यहाँ से तो अच्छा ही है। कम से कम चैन की नींद तो है। यहाँ तो सुनेंगे कि आप महीने का इतना पाते हैं, तो आपके बच्चे को ही उठा ले जाएँगे। बहुत खराब हालत है। </strong><br />
<strong>बेटे ने अपनी कलाई पर पिता के पंजों का कसाव महसूस किया और हाथ छुड़ाना चाहा। वली सिंह कोई धुन छेड़ते आगे बढ़ गए थे। सत्यकाम कुछ देर अवाक खड़े रहे। </strong><strong>सत्यकाम ट्यूबवेल पर पहुँचे तो चर्चा गर्म थी। उनसे भी हाल-चाल होने लगी। बेचन पांडे एक तरफ बैठे थे। खसखसी दाढ़ी और लाल आँखों में कुछ अशांत लगे, खैनी ठोंकते हुए बोले भैया, हम लोगों का भी कुछ वसीला शहर में ही लगवा देते तो अच्छा रहता। यहाँ क्या है? न पानी है, न खेती है। ऊपर से कब जान-जिंदगी पर बन जाए ये अलग? </strong><br />
<strong>सत्यकाम ने पूछा &#8211; क्यों, किसी से अदावत चल रही है क्या?  </strong><strong>बेचन पांडे ने दाँतों की जड़ में खैनी जमाते हुए तल्खी से देखा। दो क्षण रुक कर थोड़ा सहज हुए, बोले &#8211; अब भैया, आपको भी ख्याल खबर होगी, जुगों बाद तो आपके दर्शन भये हैं गाँव में? जान-जोखिम के लिए जाती दुश्मनी वाली बातें अब पुरानी हो गईं हैं। अब तो बस जात चिन्हा दो और जान से जाओ। हे शंकर हे शंकऱ.़ कहते हुए पांडे जी उद्विग्नता से घुटनों पर हाथ रख कर उठ खड़े हुए और कछारों की ओर चल दिए। </strong><br />
<strong>उनके कुछ दूर निकल जाने के बाद घुरऊ सिंह ने सन्नाटा तोड़ा, पांडे जी की ओर तिरछी नजर से देखा, आवाज नीची कर बोले- थोड़ा सनक गए हैं। दो महीने हो गए, बेटे का अपहरण हो गया है। हाकिम से लेकर मिनिस्टर तक दौड़-धूप में परेशान हैं बिचारे। सत्यकाम का कलेजा जैसे हलक में फँस गया, बोले, बेटा? </strong><br />
<strong>सयाना बेटा है? घुरऊ सिंह ने बताया। शादी-ब्याह की बातचीत चल रही थी, सरे-साँझ कछार के पास जीप में कुछ लोग आए, जबरदस्ती उठा कर ले गए। इनका सूद-वूद पर भी तो काफी पैसा चलता है इधर दो-चार गाँवों में। </strong><br />
<strong>मुन्ना शुकुल लुंगी में साबुन लगा रहे थे, कान इधर ही थे, हाथ रोककर बोले &#8211; इधर नई लहर चली है। जात-कुजात, ऊंच-नीच का सब पैमाना ही उल्टा हो रहा है। बड़ा टेंशन है। रात-बिरात सड़क पर कोई नहीं निकलता, न किसी के पूछने पर कोई जात बताता है। </strong><br />
<strong>मड़ई में खाट पड़ी थी। निझावन सिंह का भतीजा वहां बैठा इनकी बातों का मजा ले रहा था, उसने कंबल हटा कर बंदूक दिखाई, बोला &#8211; हर घड़ी बड़े इंतजाम से रहना पड़ता है, चाचा। </strong><strong>सत्यकाम बच्चों सहित यथाशीघ्र स्नान निपटा कर घर आ गए। </strong><strong>सारे दिन उनका मन बहुत उचाट बना रहा। शाम को उन्हें चौधरी लोगों की देहरी पर मिलने जाना था, उसे मुल्तवी कर दिया। छत के ऊपर चहलकदमी करते रहे। सुखरंजन भैया खलिहान से लौटे, तो यह जानकार कि सत्यकाम छत पर हैं, वही आ गए। पूछा- तबियत कुछ ठीक नहीं है क्या? </strong><br />
<strong>सत्यकाम का ध्यान भंग हुआ, बोले &#8211; ऐसा कुछ नहीं। चौधरी लोगों के यहाँ हो आना चाहता था, सोचा, कल सुबह हो आऊँगा। सुखरंजन सिर झुका कर बोले- अब वहाँ कौन है? पिछले साल बड़े चौधरी को गोली मार दी गई। दोनों छोटे भाई अब पटना में बस गए हैं, प्रापर्टी बिजनेस का काम शुरू कर दिया है। खेती-बाड़ी सब धीरे-धीरे खत्म हो रही है। </strong><strong>सत्यकाम हैरत में हो कर सुनते रहे। भाभी शाम का कलेवा लेकर आईं। दोनों के लिए कलेवा लगा कर पंखा झलते हुए बोलीं &#8211; बबुआ जी, पुरानी बातें जी से निकाल दीजिए और अब थोड़ी बहुत यहाँ की सुधबुध लीजिए। एक बार मेहमान की तरह आ कर चले जाने से काम नहीं चलेगा बबुआ जी। महीने-दो महीने की छुट्टी लेकर आइए, कुछ खेती-गृहस्थी में भी हाथ बटाइए। आपके भैया अकेले दम हलकान होते रहते हैं। आपका थोड़ा सहारा हो, तो इनके लिए बहुत हो। </strong><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/kahani_2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="size-medium wp-image-162867 alignleft" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/kahani_2-300x243.jpg" alt="" width="300" height="243" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/kahani_2-300x243.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/kahani_2.jpg 519w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /></a>सुखरंजन सिर झुकाकर खाने में लगे थे, हाथ रोककर बोले- रामाशीश राय के घर की हालत तुमने देखी ही थी। कल उनके यहाँ होकर आना। जबसे भाइयों ने मिल कर नया ट्रैक्टर खरीदा है, खेती और घर की दशा बिल्कुल बदल गई है। अगर एक जेट ट्रैक्टर यहाँ अपने पास हो जाए, तो हमारे खेत उनसे बीस साबित हों। लड़कों का मन पढ़ने-लिखने में बिल्कुल नहीं है। ट्रैक्टर हो, तो ऑफ-सीजन में ईंटों वगैरह के काम में बहुत आमदनी है। </strong><br />
<strong>सत्यकाम कलेवा पहले ही खत्म कर चुके थे। मुंडेर से लगे, शून्य में देखते रहे। नीचे दूर तक गाँव एक आँगन की तरह फैला हुआ था। रात को सोने से पहले सुमन दूध का ग्लास देने आई, तो पास बैठ कर बोली- आज दिन भर कई घरों की औरतें आती-जाती रहीं। आपने यहाँ के हाल-चाल सुने? हमें तो बेहद डर लगने लगा है। इन छुट्टियों में यहाँ आने की बजाय बच्चों को वहीं कंप्यूटर कोर्स ही करवा दिया होता। लौटने का कब प्रोग्राम बना रहे हैं? </strong><br />
<strong>अगर वाराणसी को इस अंचल का सिर कहें तो मुगलसराय का दर्जा दिल से कम नहीं है। रेलवे जंक्शन होने के कारण इसका खास व्यावसायिक महत्व हो गया है। देश का प्रमुखतम व्यावसायिक मार्ग जीटी रोड इस जंक्शन से होते हुए गुजरता है और इस अंचल की उक्तियों, गीतों, कहानियों और चुटकुलों में समा चुका है कपड़े, फल-सब्जियाँ और गृहस्थी की आम जरूरत की चीजें यहाँ प्रचुर और सस्ती हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार के आसपास के तमाम गाँवों की रोजमर्रा की खरीदारी का प्रमुख बाजार होने के साथ-साथ ब्याह-शादी और तीज-त्यौहार के समेत अवसरों पर इसकी शक्ल में एक निजी सांस्कृतिक रंग चढ़ जाता है और इसकी हाटों और गलियों में रंग-बिरंगे ट्रैक्टरों में भरे नौजवानों और नव-विवाहितों की जोड़ियों की रेलमपेल हो जाती है। इस अंचल का आधुनिकता और नवप्रवृत्तियों का प्रवेश द्वार भी यही है। सजावटी सामानों, इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं और परिधानों का बंबई और दिल्ली का नवीनतम फैशन यहीं से होकर इस अंचल के गाँवों की ओर रुख करता है। </strong><br />
<strong>सुखरंजन को त्योहार की कुछ रस्मी खरीदारियाँ निपटानी थीं, सत्यकाम का भी इस अंचल में थोड़ा घूम आने का मन था, तो तय हुआ कि वे और सत्यकाम मुगलसराय हो आएँ। सुबह पाँच बजे की बस से वे चले गए। दोपहर तक खास-खास खरीदारी कर लेने के बाद अभी लगा कि काफी फुटकर चीजें रह गई हैं और वापसी की बस का वक्त हाथ से निकलता जा रहा है। गाँव से कुछ लड़के पढ़ाई-लिखाई के सिलसिले में यहाँ रहते थे, वहाँ रुकने का इंतजाम था, लेकिन सत्यकाम की मनोदशा रुकने की बिलकुल नहीं थी। सुमन और बच्चे गाँव की रवायत से बहुत वाकिफ नहीं थे और उन्हें उनकी जरूरत पड़ सकती थी। अत: तय हुआ कि वे घर लौट जाएँ, सुखरंजन सारी चीजें ले-लिवाकर कल आ जाएँगे। </strong><br />
<strong>इस बातचीत में यूपी बार्डर के लिए डेढ़ बजे एक लॉरी मिलते-मिलते टूट गई। कोई पन्द्रह मिनट बाद दूसरी बस आकर लगी। सत्यकाम को जगह मिल गई और वे बैठ गए। पाँच बजे तक बार्डर पहुँच जाने के लिए अभी काफी वक्त था। सत्यकाम ने राहत की सांस ली। दिन भर की थकान से सत्यकाम की देह टूट रही थी। उन्हें झपकी आ गई। बीच-बीच में लगता कि बस चल रही है, कभी रुक जाती है सवारियाँ बुरी तरह ठुँसी हुई थीं और काफी शोरगुल था। शोर एकरस हो तो पाश्र्व संगीत का रूप ले लेता है। सत्यकाम को मजे की नींद आ रही थी। करीब घंटे भर बाद वे चैतन्य हुए। यह जायजा लेने के लिए कि बार्डर कितनी दूर रह गया है, उन्होंने खिड़की से बाहर झाँककर देखा और बुरी तरह घबरा गए। यह तो मुगलसराय ही है। बस जीटी रोड पर थी। आगे जहाँ तक नजर जाती थी, रुकी हुई ट्रकों, बसों और ट्रैक्टरों का कारवाँ था। बस ट्रैफिक-जाम में फँस गई थी। कई खोमचेवाले इर्द-गिर्द जमा हो गए थे और यात्रियों में उनकी चीजें बिक रही थीं। बस देर-देर बाद दो-चार मिनटों के लिए चलती, फिर रुक जाती। जब मुगलसराय की सीमा से वे बाहर निकले तो पाँच बज रहे थे। ट्रैफिक-जाम का प्रभाव अभी तक था। स्वाभाविक आवागमन अभी शुरू नहीं हुआ था। बस काफी धीरे चल रही थी। </strong><br />
<strong>कुछ-एक सवारियों ने उनकी परेशानी को भाँपा। एक बुजुर्ग ने पूछा &#8211; कहाँ जाना है ? </strong><strong>सत्यकाम ने तफसील बताई। यह सुनकर कि उन्हें सीमा के आगे से बिहार की बस पकड़नी है, आगे के कई यात्रियों ने तुरंत पलट कर पीछे देखा। बुजुर्ग ने शंका की- अब तो अबेर हो गई है। बस कहाँ मिलेगी? </strong><strong>किसी ने राय दी- अभी मुगलसराय बहुत पीछे नहीं छूटा है, यहीं से वापस लॉरी पकड़ लीजिए। किसी होटल में रुक जाइए। </strong><strong>सत्यकाम विचलित होने लगे। सोचा- रुक ही गया होता तो ठीक था। बच्चों का ख्याल आया, मन में दृढ़ता आई। उन्होंने कहा- देखें, कुछ न कुछ साधन तो मिलेगा ही। जाना जरूरी है। </strong><br />
<strong>कई लोग उन्हें कौतूहल से देखने लगे। कहीं बाहर से आ रहे हैं? बिहार में रिश्तेदारी है? इधर कहीं गाँव-कस्बे में कोई पहचान है? बार्डर पर कोई जानता है? सत्यकाम प्रश्नों से परेशान होने लगे। बोले, मेरे लिए चिंता की बात नहीं है। यहीं का हूँ। जरूरी हुआ तो पैदल भी जा सकता हूँ। उनके खुद के शब्द उनके कानों में देर तक गूँजते रहे।</strong><br />
<strong>बार्डर से पहले पड़ने वाले आखिरी कस्बें को पार करते-करते अंधेरा छाने लगा। आगे बार्डर तक बिल्कुल ग्रामीण अंचल था और खस्ता हाल सड़क थी। सड़क के दोनों ओर गाँवों में सन्नाटा था। फिर भी वे उत्तर प्रदेश की सीमा में थे, यह विचार एक रोशनी की तरह उनके साथ था। वे कस्बे से कोई आठ-दस किलोमीटर आगे आ गए। अचानक बस घरघरा कर रुक गई। यात्रियों में खुसर-पुसर होने लगी। किसी ने कड़ककर कंडक्टर से पूछा &#8211; क्यां बात है भाई? बस क्यों रोक दी? </strong><br />
<strong>बस का चालक दल आपस में बातें करता रहा। पता चला, पेट्रोल खत्म- हो गया है। सत्यकाम ने घड़ी में समय देखा रात के आठ बजने वाले थे। यात्रियों में आपस में पूछताछ चल रही थी। पिछले कस्बे में ही उत्तर प्रदेश का आखिरी पेट्रोल पंप था। वहाँ नाके पर मजिस्ट्रेट चेकिंग चल रही थी। ठसम-ठस सवारियाँ भर लेने के एवज में चालान कट रहे थे। चालक दल उससे बचकर बस को बाईपास से लाया था, इसलिए पेट्रोल नहीं लिया जा सका। अनुमान था कि रिजर्व में बार्डर तक तो पहुँच ही जाएगी। बार्डर अभी लगभग आठ किलोमीटर आगे था। तभी उधर से एक लॉरी आई। कंडक्टर एक खाली पीपा लेकर लरी पर सवार हो गया। दूसरी बस से पेट्रोल लेकर लौटने में उसे घंटा भर लग सकता है। यात्री बस में से बाहर आ गए और गोल बना-बना कर सड़क पर बैठ गए। आधे घंटे यूँ ही बीत गए। तभी कस्बे की तरफ से एक मिनी बस आती दिखाई दी। यात्री गोल तोड़कर उठ खड़े हुए। स्थिति को भाँप कर मिनी बस का कंडक्टर गेट पर खड़े होकर आवाजें लगाने लगा- बीस रुपए सवारी-बीस रुपए सवारी़.़ वह स्थिति का चार गुना फायदा उठाना चाहता था। कुछ यात्री उसमें चले गए। सत्यकाम ने भी उस मिनीबस को गनीमत समझा। नौ बजते-बजते वे बार्डर पहुँच गए। यात्री उतरकर शीघ्रता से अगल-बगल के गाँवों की राह लगे जो चंद कदमों के फासले पर थे। </strong><br />
<strong>सर्द मौसम में गाँवों के जीवन में यह </strong><strong>खा-पीकर सो जाने वाला समय था। आगे बिहार का बीहड़ था और सत्यकाम को उसमें जाना था। साधन कोई नहीं। बस होती तो कोई घंटे भर में गाँव पहुँच जाते। तेज रफ्तार चलें तो दो-ढाई घंटों में पैदल भी पहुँच सकते हैं। बार्डर पर चंद गुमटियाँ चाय-नाश्ते की हैं, जो लगभग बंद हो चुकी थीं। </strong><br />
<strong>एक दुकानवाला दुकान की आखिरी झाड़ू-बुहारी कर चारपाई लगाने की जुगत में था। सत्यकाम ने आगे जाने के साधन के बारे में उससे जायजा लेना चाहा। गाँव का नाम बताया। दुकानवाला हैरत से उन्हें देखने लगा। बोला- परदेशी हैं भैया? कहाँ इस बेला में जाने की बात कर रहे हैं? हम तो कहेंगे, हनुमान जी का नाम लेकर यहीं विश्राम कीजिए, सबेरे की बस से निकल जाइएगा। सत्यकाम ने आग्रह किया- जाना जरूरी है, अगर किसी से एक साइकिल मिल सकती तो मैं सुबह वापस भिजवा देता। </strong><br />
<strong>दुकानवाला घबराया, तेजी से सिर हिला कर बोला &#8211; इस वक्त साइकिल? जो हो भी, तो कोई क्यों व आपको देकर इल्जाम सिर पर लेगा? हमारी मानें भैया, कैसा भी जरूरी हो इस वक्त जाने लायक नहीं है। </strong><strong>सत्यकाम थोड़ा विचलित हुए। लेकिन अब यहाँ तक आकर यहाँ रुक जाने में कोई तुक नहीं था। उनके और बच्चों के बीच अब सिर्फ एक निरीह साधनहीनता का फासला था। अचानक शौर्य की एक तेज प्रकाश किरण उनके हृदय में फूटने लगी। बिजली की तरह एक विचार उनके मन में आया। उन्होंने उस बूढ़े से पूछा- बार्डर पुलिस का कैम्प किधर है? मैं उनसे बात करता हूँ। </strong><strong>बूढ़े ने गुमटी से बाहर आकर रास्ता दिखाया &#8211; ये पूरब-उत्तर का कोना पकड़ लीजिए। पाँच-सात मिनट में गुमटी मिलेगी। वही है।</strong><br />
<strong>सत्यकाम थोड़ी देर चले ही थे कि पीछे से एक मोटरसाइकिल आती दिखी। उन्हें आशा बँधी। लिफ्ट देने के लिए इशारा किया। उसने दूर से ही उन पर तेज ताड़ती हुई नजर डाली और रफ्तार बढ़ा कर सर्र से निकल गया। वे हैरान रह गए। </strong><strong>बार्डर पुलिस की गुमटी के पास सुनसान छाया हुआ था। उन्होंने नजदीक पहुँच कर आवाज दी &#8211; यहाँ ड्यूटी पर कौन है? </strong><strong>सुनकर एक व्यक्ति बनियान और लुंगी पहने बाहर आया। सत्यकाम की ओर सावधान भाँपती सी नजर डालते हुए बोला &#8211; सुस्वागतम, आया जाय। </strong><strong>सत्यकाम ने पूछा &#8211; आप ही यहाँ इंचार्ज हैं? </strong><br />
<strong>सत्यकाम के लहजे से वह प्रभावित लगा। उसने उन्हें अंदर आने का इशारा किया, बोला &#8211; इंचार्ज भी मिल जाएँगे, आएँ, पहले बैठा जाए। फिर किसी को चाय के लिए आवाज दी।</strong><br />
<strong>बगल की गुमटी से राइफल और टार्च लिए दो जवान बाहर निकले। एक आकर वहाँ खड़ा हो गया और दूसरा आदेश-पालन के लिए दूसरी ओर चला गया जिधर शायद कोई दुकान थी। अंदर दो-तीन लकड़ी की कुर्सियाँ पड़ी थीं। एक पर खाकी कमीज और लुंगी में गोरे से एक व्यक्ति बैठे हुए थे। उन्हें लगा, शायद यही इन्चार्ज हैं। सत्यकाम ने अपने गाँव का नाम-पता बताकर परिचय दिया। परिचय पत्र हमेशा कमीज की जेब में रखने की आदत थी, उसे निकाल कर दिखाया, कहा- चाय की तकलीफ न करें। इस समय कोई साधन नहीं है, न मिलने की उम्मीद है, अत: मुझे पैदल ही प्रस्थान करना होगा। मेरा फर्ज था, आपको रिपोर्ट कर दूँ। </strong><br />
<strong>इन्चार्ज उठ कर खड़े हो गए। उनकी ओर एक कुर्सी खींच कर बोले- जरा भी चिंता न किया जाए। हम लोग किसलिए हैं? आपको सुरक्षित गाँव पहुँचाया जाएगा। चाय पिया जाय। </strong><strong>चाय आ गई थी और दोने में बर्फी के टुकड़े। उनकी चिंता यथावत बनी हुई थी, बोले &#8211; साधन तो कोई है नहीं, मुझे पैदल ही निकलना पड़ेगा। जितना रुकूँगा उतनी ही देर होगी। </strong><strong>इन्चार्ज के सहयोगी हवलदार ने पीछे दीवार से टिकी मोटरसाइकिल की ओर इंगित कर सत्यकाम से कहा- यह देख रहे हैं ? </strong><strong>सत्यकाम ने कहा &#8211; जी हाँ, मोटरसाइकिल है। </strong><strong>वे हिसाब लगाकर बोले &#8211; कोई दस किलोमीटर आपका गाँव है और कोई साधन न हुआ तो इस फटफटिया से आपको छोड़कर आएँगे। एक लीटर तेल की तो बात है। ये लिया जाए। उन्होंने आश्वस्त करते हुए बर्फी का दोना आगे बढ़ाया। </strong><br />
<strong>सत्यकाम ने एक टुकड़ा उठाया, चखा। सोंधे गुड़ में पगे खोये का खुशबूदार जायका नथनों में भर गया। चाय की चुस्की ली। </strong><strong>इस बीच इन्चार्ज के इशारे पर दोनों जवान राइफल कंधों से लटकाए हाथों में जलती टार्चें लेकर बीच सड़क पर खड़े हो गए। थोड़ी देर में एक स्कूटर गुजरा। दो सवारियाँ थीं, उन्हें जाने दिया। एक मारुति वैन आई। उन्होंने टार्च का सिग्नल देकर रोका। वैन के ड्राइवर से कुछ बातें की। इन्चार्ज सत्यकाम के पास आकर बोले &#8211; आपके गाँव के पड़ोस की गाड़ी है। साथ में चले जाएँ। उनको आपके घर तक छोड़ने के लिए कह दिया गया है। </strong><br />
<strong>सत्यकाम उनको धन्यवाद देकर उस वैन में आ गए। वैन में चार लोग थे। दो उतर कर पीछे चले गए। ड्राइवर गाड़ी का मालिक था। उसने बगल में जगह बनाई। दूसरा व्यक्ति खिड़की से लगा बैठा रहा। उनके बैठते ही गाड़ी चल पड़ी। पाँच-सात मिनटों तक कोई कुछ नहीं बोला। सत्यकाम ने बातचीत शुरू की। पूछा &#8211; इतनी रात को कैसे लौट रहे हैं? </strong><br />
<strong>वे बोले &#8211; सुबह खेतों पर काम लगाना है। खाद लेकर लौटते में देरी हो गई है। </strong><strong>सत्यकाम ने अपने देर से लौटने की तफसील बताई। प्रसंगवश मोटरसाइकिल वाले व्यक्ति का उल्लेख किया, जो हाथ देने पर भी उनके लिए नहीं रुका था। वैन के चालक ने तुरंत गाड़ी की रफ्तार बढ़ा दी, बोला &#8211; हम भी नहीं रुकते, अगर दरोगा जी न रोकते। आपको शायद कुछ मालूम नहीं। यहाँ इस बेला में किसी को हाथ दीजिएगा तो वो बिल्कुल न रुकेगा। अभी परसों दो गाड़ियाँ लुट चुकी हैं इसी मोड़ पऱ.</strong><strong>साथ के व्यक्ति ने टार्च की रोशनी के साथ-साथ सड़क के दोनों किनारों पर खोजती हुई नजर दौड़ाई। गाड़ीवाले का सचेत पाँव </strong><strong>एक्सीलरेटर पर बना रहा।</strong><br />
<strong>चाँदनी की दूधिया रोशनी में लम्हे, गाँव और खेत हवाओं के सर्द शरारों को चीरते हुए पीछे भागते रहे। काफी वक्त यूँ ही बीत गया। अब गाड़ीवाले के गाँव का मोड़ सामने था। यह गाँव आस-पास कई गाँवों में जाने वाले कच्चे रास्तों का जंक्शन है। इसमें अब कहीं-कहीं से एक कस्बे की शक्ल निकलने लगी है। कुछ चाय और पान की गुमटियाँ, कुछ ताजी सब्जी की दुकानें सड़क के दोनों ओर हैं जो इस वक्त बंद थीं। एक-दो आवारा कुत्ते इधर-उधर फिर रहे थे। यहाँ से सत्यकाम का गाँव बस दो-ढाई किलोमीटर था। चालक ने गाड़ी रोकी और सत्यकाम से मुखातिब होकर बोला- आपको गाँव तक छोड़ देते, लेकिन अभी जाकर खाद की कूरियाँ लगवानी हैं। वैसे भी आपका गाँव सामने है और आपका ही इलाका है। </strong><br />
<strong>सत्यकाम ने उतरकर गाड़ीवाले का धन्यवाद किया, बोले- आपको पहले ही देर हो चुकी है। अब सामने मेरा गाँव है। मुझे कोई दिक्कत नहीं होगी। मैं चला जाऊँगा। </strong><strong>गाड़ी दाहिनी ओर मुड़ी और गाँव में ओझल हो गई। सत्यकाम ने घड़ी देखी, इस वक्त रात के दस बज रहे थे। चाँदनी अपनी पूरी शोभा में थी। वातावरण में ठंड की सिहरन थी। सड़क के दोनों ओर पीपल और इमली के घने पेड़ थे, जिनकी ओट में दाहिनी तरफ से एक बुलेट मोटरसाइकिल भद-भद करती हुई आई और सड़क की दाहिनी कगार पर खड़ी हो गई। इंजन को चालू रखे हुए ही सवार ने उतर कर सीट को थोड़ा दुरुस्त किया और वापस बैठ गया। सत्यकाम को लगा, वह शायद उनके गाँव की तरफ की सड़क से ही जाने वाला है। आवाज देने की कोशिश की- भाई साहब़.़, उसने शायद सुना नहीं, गियर लगाया, एक्सीलरेटर दिया और चला गया। </strong><strong>उसी समय बाईं तरफ की ढलान से हाथ में लोटा लिए हुए एक व्यक्ति चुस्त कदमों से नजदीक आया। सत्यकाम से दरियाफ्त कर, कि वे बगल के गाँव में जा रहे हैं, चेहरे पर एक व्यंग्य भरी मुस्कान लाकर बोला &#8211; भाई साहब कह कर किसको आवाज दे रहे थे? </strong><strong>उन्होंने कहा &#8211; जो अभी मोटरसाइकिल से गए। </strong><strong>लोटेवाले ने पूछा &#8211; उन्हें जानते हैं? </strong><strong>सत्यकाम ने नकार में सिर हिलाया। उसने छिपे स्वरों में डाँट पिलाई &#8211; परदेसी हैं का? पाँव दबाकर चुपचाप निकल जाइए। रास्ता में बोलारी मत कीजिए किसी से। </strong><br />
<strong>सहसा सत्यकाम को ख्याल आया कि उस मोटरसाइकिल वाले ने खूब पी रखी थी और गाड़ी की सीट पर अपनी जाँघों के नीचे वह जिस चीज को दुरुस्त कर रहा था वह एक दुनाली बंदूक थी। उन्होंने तेजी से रास्ता पकड़ा। </strong><br />
<strong>वे इस रास्ते को खूब पहचानते हैं। बचपन का बहुत ही प्यारा हिस्सा इससे होते हुए गुजरा है। बाईं ढलान से चंद कदमों के फासले पर वह रहा इमली का झुरमुट। वो आया नहर का पुल। बस अब सामने था उनका गाँव। सड़क से लगी बँसवार, पान की गुमटी, पूर्वी तालाब और श्रीराम मंदिर, गाँव की पगडंडी, बीच का गलियारा और ये उनका घर। तीस-पैंतीस मिनट बचपन की मीठी स्मृतियों से सराबोर कब बीत गए, पता ही न चला। दो-तीन बार द्वार खटखटाने पर सुशांत ने छत पर आकर उन्हें पहचाना, पुकारकर घबराहट से कहा- आप चाचा, इतनी अबेर? अकेले? </strong><br />
<strong>उन्होंने कहा &#8211; हाँ, देर हो गई। तुम्हारे पापा सामान लेकर कल आएँगे। </strong><strong>बाईं ओर शिवजतन कहाँर की मड़ई में दो लोग सोए हुए थे, चौंक कर उठ बैठे, बातें करने लगे। दाहिनी तरफ पोखर से लगे मकान की छत से निझावन सिंह की आवाज आई &#8211; क्या है, शिवजतन? उधर सब ठीक तो है? </strong><strong>बच्चे सत्यकाम की प्रतीक्षा में सोए नहीं थे, घर का दरवाजा खोलकर दौड़े आए उन्होंने उन्हें अंक में समेट लिया, पोखर की तरफ देखकर आवाज दी &#8211; मैं हूँ काका, यहाँ सब ठीक है। </strong><strong>सुमन आँगन में रुआँसी खड़ी थी, सत्यकाम पास जा कर उनकी पीठ थपथपा कर बोले &#8211; सब ठीक है भाई, बस कल भैया आ जाएँ तो लौट चलते हैं।</strong></p>
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		<title>शोध</title>
		<link>https://dastaktimes.org/%e0%a4%b6%e0%a5%8b%e0%a4%a7/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Dastak Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 03 Mar 2017 08:31:17 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दस्तक-विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="300" height="195" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/shodh_1-300x195.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/shodh_1-300x195.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/shodh_1.jpg 394w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />कहानी जिस दिन सर चिता पर धू-धू जल रहे थे वह पाँच सितम्बर का दिन था। ऊपर आसमानों के न जाने किन खोखलों में वह धुंआ समाता जा रहा था। चिता से कुछ दूर बैठी वह, जब भी लकड़ियों के चिटकने की आवाज़ सुनती तो उसकी आँखों से बूंदे ढुलक जातीं। बूंदों में अतीत के &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="195" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/shodh_1-300x195.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/shodh_1-300x195.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/shodh_1.jpg 394w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /><p><span style="color: #ff0000"><strong>कहानी</strong></span></p>
<figure id="attachment_147491" aria-describedby="caption-attachment-147491" style="width: 194px" class="wp-caption alignright"><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/sonam-singh.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-147491" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/sonam-singh-250x300.jpg" alt="" width="194" height="232" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/sonam-singh-250x300.jpg 250w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/sonam-singh-768x922.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/sonam-singh.jpg 800w" sizes="auto, (max-width: 194px) 100vw, 194px" /></a><figcaption id="caption-attachment-147491" class="wp-caption-text"><span style="color: #800000"><strong>सोनम सिंह</strong></span></figcaption></figure>
<p><strong>जिस दिन सर चिता पर धू-धू जल रहे थे वह पाँच सितम्बर का दिन था। ऊपर आसमानों के न जाने किन खोखलों में वह धुंआ समाता जा रहा था। चिता से कुछ दूर बैठी वह, जब भी लकड़ियों के चिटकने की आवाज़ सुनती तो उसकी आँखों से बूंदे ढुलक जातीं। बूंदों में अतीत के चित्र झलकते जाते। अनायास उसे सर के साथ का पहला दिन याद हो आया जब शोध में रजिस्ट्रेशन लेने के बाद वह पहली बार सर से मिलने गई। केबिन में घुसते ही उन्होंने सवाल दागा-‘आओ बच्चा, कैसी हो? जिंदा हो?’ उसे अजीब लगा पर सर ठहाका लगाते रहे। फिर बड़ी देर तक वे शोध के टॉपिक पर बात करते रहे। इसके बाद तो वह लगभग रोज विभाग जाती, केबिन में कुछ देर बैठती और साहित्य के नए विचारों से अवगत होती।</strong><br />
<strong>वह एक सुंदर और मेधावी छात्रा थी, विभाग के कई गुरुजन उसे अपने अंडर में रिसर्चभी कराना चाहते थे पर उसने सबको ना करते हुए सर को ही गाइड चुना था। पर उसे पता न था कि यह विभाग के गुरुओं के मन में एक अजीब ईष्र्या का कारण बन जाएगा।</strong><br />
<strong>मुँह में पान की जुगाली करते कुशवाहा सर ने पहला ताना मारा था- ‘का हो गुरु, तोहार स्कॉलरवा त बहुते स्मार्ट हौ, गुलरी के फूल जईसन, पर हमहन के किस्मत में कहाँ वइसन स्कॉलर भाई।‘ इस पर मिश्रा सर ने चुटकी ली- ‘अरे भाई! बात समझिए, इनके भीतर ज्ञान के अलावे कुछ अन्य तत्त्व भी मौजूद हैं। इनकर आ हमहन क तुलनै का बा।‘</strong><br />
<strong>बात में छुपी कुटिलता को समझते हुए भी सर मुस्कुरा भर दिए।</strong><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/shodh_1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft size-medium wp-image-147492" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/shodh_1-300x195.jpg" alt="" width="300" height="195" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/shodh_1-300x195.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/shodh_1.jpg 394w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /></a>सबसे बेपरवाह सर धीरे-धीरे साहित्य जगत पर भी अपनी छाप छोड़ रहे थे। प्राय: हर विधा में उनकी लेखनी सराही जाने लगी थी । इस कारण इधर विभाग में सो कॉल्ड विद्वानों की बेचैनी और भी बढ़ती जा रही थी। वे धीरे-धीरे नीचता पर उतरते गए और बाद में उसके तथा सर के बीच सम्बन्धों पर ऊंगली उठाने लगे। विभाग का यह कारगर फार्मूला भी था कि जब किसी पर कोई आरोप न लग सके तो उसके चरित्र को लांछित करो, व्यक्ति खुद डगमगा जाएगा। वैसे सर इन सब बातों की कहाँ परवाह करने वाले थे। वह जब कभी परेशान होकर इन अफवाहों के विषय में वह सर से कहती, तो वह कहते-‘लोगों का तो काम है कहना, वे कुछ कहेंगे नहीं तो जियेंगे कैसे, जीने दो उन्हें।‘</strong><br />
<strong>धीरे-धीरे अफवाहें विभाग के बाहर भी फैलने लगीं। लगभग हर व्यक्ति उसे एक अजीब नजरों से घूरता हुआ मिलता। सर पर भी इन अफवाहों का असर शायद पड़ने लगा था। वह चीजों को भुलने लगे थे, कभी क्लास देर से पहुँचते, तो कभी मोबाइल घर छोड़ आते, कभी कोई किताब। कभी पूछो तो कहते उम्र का असर है।</strong><br />
<strong>उसे याद हो आया वह दिन जब विभाग के कुछ आचार्यगण मंडली बनाकर आपस में हंसोड़ कर रहे थे और वह चुपचाप कोने में बैठी उनकी बातें सुन रही थी। एक आचार्य कह रहे थे- ‘आजकल गुरु भक्ति तो खत्म ही समझिए। </strong><br />
<strong>एक चेले से गोदान लाने को कहा, आज तक नहीं लाया। अब गुरु ही जा के किताब भी खरीदें फिर पढ़ायें भी तो यह कैसे हो सकता है। कल मिलता है तो कहता हूँ गाइड बदल लो अपना। किताब और ज्ञान दोनों हम नहीं दे सकते भाई।’ इस पर दूसरे आचार्य बोले- ‘अरे! तो आप गलत न करते हैं, हम तो तीस-चालीस किताब का एगोलिस्ट ही बना कर रख लिए हैं, जइसहीं कौनो विद्यार्थी सवाल पूछता है लिस्टवा मुंह पर चिपका देते हैं, पहिले इतना पढ़ो फिर आगे बात करना। इहे उपाय आप भी करिये फिर देखिएगा कईसे शोध जोर पकड़ता है।’ सब हँसने लगे कि तभी एक गुरु जी गंभीर वाणी में बोले- ‘मेरी समस्या का समाधान है क्या किसी के पास? मेरी एक शोध छात्रा है, पढ़ने में तो ठीक है, पर सेवा भाव नहीं है। हम यह कैसे पैदा करें उसके भीतर, ज़रा सलाह दें आप सब।’ इतना सुनते ही बगल में बैठीं आचार्या को जैसे आग लग गई- ‘इसीलिए तो हम छात्राओं को नहीं लेते हैं रिसर्च में। भईया कौन दुनिया भर के चकल्लस में फंसे।‘ तभी एक आचार्य ने इशारे से एक विद्यार्थी को बुलाया और सबसे उसका परिचय कराते हुए कहा- ‘बहुत प्रतिभवान विद्यार्थी है, अच्छी कविताएँ लिखता है, बहुत आगे जाएगा। जाओ बेटा, पाँच जगह चाय लेते आओ तो, और सुनो, गर्मा-गरम हो तभी लाना। ‘थोड़ी ही देर में वह विद्यार्थी ट्रे में चाय लिए हुए आया। प्रसन्नवदन, चाय की चुस्की लेते आचार्य ने सबको सुनाते कहा- ‘देखा! ऐसे न शिष्य होने चाहिए, आज्ञाकारी।‘</strong><br />
<strong>उनकी बातें सुनकर उसका मन वितृष्णा से भर गया था। उसने जाकर सर से सारी बातें बतायीं।</strong><br />
<strong>सोच में डूबते हुए सर ने कहा-‘व्यवस्था को बदलने के लिए व्यवस्था में घुसना जरुरी है।‘ </strong><br />
<strong>‘जी सर, लेकिन व्यवस्था बदलती कहाँ है, व्यवस्था वही रह जाती है लोग बदल जाते हैं।‘- उसने शंका की ।</strong><br />
<strong>‘पूरी की पूरी व्यवस्था बदले यह जरूरी नहीं है, पर व्यक्तिगत स्तर पर इसके लिए प्रयास तो किया जा सकता है। एक-एक व्यक्ति से मिलकर ही तो पूरी व्यवस्था बनती है।‘-सर अभी भी उसी सोच में थे।</strong><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/shodh_2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="size-medium wp-image-147493 alignright" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/shodh_2-169x300.jpg" alt="" width="169" height="300" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/shodh_2-169x300.jpg 169w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/shodh_2-768x1363.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/shodh_2-577x1024.jpg 577w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/shodh_2.jpg 800w" sizes="auto, (max-width: 169px) 100vw, 169px" /></a>इस बार उसने तर्क किया- ‘व्यवस्था, परम्परा बन चुकी है सर&#8230; लगभग जड़.. ऐसा नहीं है की बस शिक्षकों की ही गलती है, विद्यार्थी भी इसके लिए जिम्मेदार हैं, पर अधिकांश विद्यार्थियों की मजबूरी यह है कि अगर व्यवस्था में नहीं ढले तो यहाँ से फ़ेंक दिए जाएंगे।‘</strong><br />
<strong>उसका यह तर्क सुन सर पहले तो उदास हो गए, पर दुबारा संयत होते हुए बोले- ‘तुम ठीक कह रही हो, पर हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहने, व्यवस्था को कोसते रहने से तो कोई बदलाव होने वाला नहीं है। अँधेरे का विरोध करने के लिए एक चिंगारी भी बहुत है। अँधेरे और उजाले का युद्ध चलता रहता है, जरूरत होती है यह तय करने की कि हम अँधेरे के खिलाफ हैं कि उजाले के पक्ष में। ‘इतना कह सर कुछ काम से बाहर निकले। उन्हें देख एक आचार्य ने आँख मारते हुए कहा-‘का भाई! आज फोनवे पर ड्रेस डिसाइड हुआ था का?’ सर ने गुस्से में कहा-‘क्या मतलब?’ आचार्य ने फिर कुरेदा- ‘अरे गुरु मतलब इ की आज बड़ा मैचिंग-मैचिंग है।’ सर ने गुस्से में कहा-‘दिमाग खराब है क्या आपका?’ सर उसी गुस्से में केबिन में वापस आये और उससे सीधे कहा- ‘अब विभाग कम आया करो तुम ।‘वह समझ गयी थी इसके पीछे की वजह।वह बाहर निकल गई। दूसरे दिन जब सर विभाग पहुंचे, तो दो गुरुजन उन्हें सुनाते हुए ऊंची आवाज में बोल रहे थे- ‘का बात ह हो, आज कल इनकी रिसर्च स्कॉलरवा विभाग में दिख नहीं रही है। ‘तो दूसरे ने कहा-‘अरे गुरु ई कुल तू ना समझबा। अब विभाग आवे के जरूरते का ह, बहरवे सेटिंग होई जात होई।‘</strong><br />
<strong>यह सुनसर बस उदास नजरों से उन दोनों को देखते भर रह गए थे।</strong><br />
<strong>उसे याद आया चार सितम्बर का दिन जब वह आखिरी बार सर से मिली थी। उसने कहा- ‘सर मैं एक कहानी लिख रही हूँ, जिसमें एक लड़की अपनी परिस्थितियों से तंग आकर आत्महत्या कर लेती है। पर मैं यह समझना चाहती हूँ कि मन में आत्महत्या का तर्क कैसे बनता है?</strong><br />
<strong>उसकी बात सुन बड़ी देर तक सर अनमने खिड़की की ओर देखते रहे । फिर सहज हो बोले- ‘एक तरफ से देखो तो आत्महत्या कायरता है, आत्महत्या कई बार हत्या भी होती है, पर दूसरी तरफ से देखो तो वह बदलाव की सम्भावना भी है। आत्महत्या कभी-कभी धमाका भी बन सकती है।</strong><br />
<strong>सर का जवाब सुन वह सन्न रह गई, फिर बात बदलते हुए बोली- ‘सर कल पाँच सितम्बर है, शिक्षक दिवस, आपके लिए क्या गिफ्ट लूँ?’</strong><br />
<strong>कुछ देर सोचने के बाद सर ने उसे एक अजीब जवाब दिया- ‘देखो, ये सब दिखावा है। गुरु उरु एक सीमा के बाद कुछ नहीं होता। असली गुरु होता है अपना विवेक, वही सच्चा मार्गदर्शक है। गुरु हमेशा साथ नहीं रहता, एक समय समाज भी तुम्हारे विरुद्ध खड़ा हो जाता है, उस समय तुम्हारी खुद की समझ, विवेक ही तुम्हारा साथ देता है। किसी के आगे कभी मत झुकना, अपना गुरु स्वयं बनो, अपना शोध स्वयं करो। जब भी तुम किसी और की सुनोगी कमजोर पड़ोगी। अपना रास्ता खुद चुनो। अपने भीतर के गुरु से साक्षात्कार करो। मेरे जैसे गुरु कब साथ छोड़ कर चल दें कोई भरोसा नहीं।‘ </strong><br />
<strong>यह कह सर उठे, उसे ‘खुश रहो’ कहा और और बिना कोई बात सुने कमरे से बाहर निकल गए। दरवाजा इतनी ज़ोर से बंद किया जैसे लगा की यह दरवाजा अब कभी नहीं खुलेगा। उस रात बड़ी देर तक उसे नींद नहीं आई। सर की ही बातें घूमती रहीं। देर सुबह जब वह उठी तो अखबार के एक कोने में छपी खबर पर उसकी आँखें टिकी रह गईं- ‘प्रसिद्ध लेखक और हिंदी के आचार्य डॉ. विक्रांत कश्यप की गंगा में डूबकर मौत।‘ खबर पढ़ उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया, उसने मोबाइल उठाया जैसे की कोई उम्मीद किसी कोने में बची रह गयी हो.. ऑन करते ही मैसेज चमका- ‘अपना शोध जारी रखना&#8230;’</strong><br />
<span style="color: #800000"><strong>(लेखिका बीएचयू के हिन्दी विभाग की शोध छात्रा हैं।)</strong></span></p>
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