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	<title>केन बेतवा लिंक परियोजना &#8211; Dastak Times |  दस्तक टाइम्स</title>
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	<description>By Dastak Times Hindi News Network</description>
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		<title>केन-बेतवा परियोजना के खिलाफ फिर भड़का विरोध, जेल से रिहा होते ही किसानों-आदिवासियों ने दोबारा शुरू किया &#8216;चिता आंदोलन&#8217;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Dastak Desk]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 07 Jul 2026 12:07:54 +0000</pubDate>
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<p><strong>छतरपुर:</strong> बुंदेलखंड की बहुप्रतीक्षित केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के विरोध में किसानों और आदिवासी समुदाय ने एक बार फिर आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है। छतरपुर जिले में केन नदी की सहायक बरना नदी के किनारे परियोजना से प्रभावित ग्रामीणों ने दोबारा &#8216;चिता आंदोलन&#8217; शुरू कर दिया है। आंदोलन का नेतृत्व जय किसान संगठन कर रहा है। संगठन का आरोप है कि प्रशासन ने पहले किए गए आश्वासनों को लागू नहीं किया, जिसके चलते आंदोलन फिर से शुरू करना पड़ा।</p>



<p><strong>जेल से रिहाई के बाद आंदोलन ने पकड़ी रफ्तार</strong></p>



<p>जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर ने बताया कि अप्रैल 2026 में प्रशासन के आश्वासन के बाद आंदोलन को अस्थायी रूप से स्थगित किया गया था। उनका आरोप है कि इसके बाद प्रभावित परिवारों की समस्याओं का समाधान करने के बजाय आंदोलन से जुड़े लोगों के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज किए गए और उन्हें जेल भेज दिया गया।</p>



<p>उन्होंने दावा किया कि जमानत पर रिहा होने के बाद भी 250 से अधिक लोगों के खिलाफ नए मामले दर्ज किए गए। उनका कहना है कि सरकार से किए गए वादों को लागू कराने और प्रभावित परिवारों के अधिकारों की मांग को लेकर आंदोलन दोबारा शुरू किया गया है।</p>



<p><strong>ग्राम सभा और सहमति की प्रक्रिया पर उठाए सवाल</strong></p>



<p>आंदोलनकारी नेताओं का आरोप है कि परियोजना से प्रभावित गांवों में कानूनी प्रावधानों के अनुरूप ग्राम सभाएं आयोजित नहीं की गईं। उनका कहना है कि स्थानीय समुदायों की सहमति लिए बिना परियोजना को आगे बढ़ाया जा रहा है। साथ ही सामाजिक प्रभाव आकलन रिपोर्ट भी सार्वजनिक नहीं किए जाने का आरोप लगाया गया है।</p>



<p>अमित भटनागर ने कहा कि प्रभावित लोग किसी प्रकार की राहत या अनुग्रह राशि की मांग नहीं कर रहे हैं। उनकी मांग केवल इतनी है कि सरकार परियोजना से जुड़ी सभी कानूनी प्रक्रियाओं और अपने ही बनाए नियमों का पालन करे।</p>



<p><strong>क्या है केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना?</strong></p>



<p>केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना को केंद्र सरकार ने दिसंबर 2021 में 44,605 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत के साथ मंजूरी दी थी। प्रधानमंत्री ने दिसंबर 2024 में इस परियोजना का शिलान्यास किया था।</p>



<p>इस परियोजना का उद्देश्य केन और बेतवा नदियों को जोड़कर बुंदेलखंड के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में सिंचाई और पेयजल की उपलब्धता बढ़ाना है। सरकार के अनुसार इससे मध्य प्रदेश के नौ और उत्तर प्रदेश के चार जिलों को लाभ मिलेगा।</p>



<p><strong>परियोजना से मिलने वाले प्रस्तावित लाभ</strong></p>



<p>सरकारी आंकड़ों के अनुसार परियोजना के माध्यम से 10.62 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होगी। इसके अलावा करीब 62 लाख लोगों को पेयजल मिलेगा। परियोजना से 103 मेगावाट जलविद्युत और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन का भी लक्ष्य रखा गया है।</p>



<p><strong>विस्थापन और पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर बढ़ी चिंता</strong></p>



<p>सरकारी अनुमान के मुताबिक इस परियोजना से करीब 6,600 परिवार प्रभावित होंगे और लगभग 45 लाख पेड़ों पर असर पड़ सकता है। परियोजना के तहत पन्ना टाइगर रिजर्व के भीतर केन नदी पर दौधन बांध के निर्माण का प्रस्ताव है, जिसे लेकर पर्यावरण संरक्षण से जुड़े समूह लगातार चिंता जता रहे हैं।</p>



<p>पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि बांध बनने से 9,000 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र जलमग्न हो सकता है, जिसमें पन्ना टाइगर रिजर्व का बड़ा हिस्सा शामिल है। उनका दावा है कि इससे बाघ, घड़ियाल, गंगा डॉल्फिन, गिद्ध, चिंकारा, भेड़िये समेत कई वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास प्रभावित हो सकते हैं।</p>



<p><strong>विशेषज्ञों ने पर्यावरणीय मंजूरियों पर भी उठाए सवाल</strong></p>



<p>जल नीति से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि परियोजना के लिए पर्यावरण और वन स्वीकृति से संबंधित कुछ शर्तों के पालन को लेकर सवाल बने हुए हैं। उनका दावा है कि वन स्वीकृति की कुछ शर्तों के तहत पेड़ों की नई गणना और अन्य आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी की जानी थीं। ऐसे में उन्होंने निर्माण कार्य की मौजूदा स्थिति को लेकर भी सवाल उठाए हैं।</p>



<p><strong>सरकार का दावा, बुंदेलखंड के जल संकट का मिलेगा स्थायी समाधान</strong></p>



<p>केंद्र और राज्य सरकार का कहना है कि केन-बेतवा परियोजना बुंदेलखंड में लंबे समय से बनी जल संकट की समस्या के समाधान की दिशा में अहम कदम है। सरकार का दावा है कि इससे सिंचाई, पेयजल, बिजली उत्पादन और क्षेत्रीय विकास को नई गति मिलेगी। वहीं दूसरी ओर प्रभावित ग्रामीण, किसान संगठन और पर्यावरण से जुड़े समूह पुनर्वास, कानूनी प्रक्रियाओं और पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर लगातार अपनी आपत्तियां दर्ज करा रहे हैं।</p>



<p></p>
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