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	<title>नदियों को नहीं हमें नदियों से जुड़ना होगा : राजेन्द्र सिंह &#8211; Dastak Times |  दस्तक टाइम्स</title>
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	<description>By Dastak Times Hindi News Network</description>
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		<title>नदियों को नहीं हमें नदियों से जुड़ना होगा : राजेन्द्र सिंह</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Ranjeet Gupta]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 May 2016 08:23:33 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[ज्ञान भंडार]]></category>
		<category><![CDATA[नदियों को नहीं हमें नदियों से जुड़ना होगा : राजेन्द्र सिंह]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="293" height="300" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/05/rajendra-singh-293x300.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/05/rajendra-singh-293x300.jpg 293w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/05/rajendra-singh.jpg 334w" sizes="(max-width: 293px) 100vw, 293px" />इस वक्त सूखे और पानी की समस्या न केवल महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बुंदेलखंड बल्कि पूरे देश में विकराल रूप धारण कर चुकी है। इस समस्या पर दशकों से काम कर रहे भारत के जल मानव ‘वाटर मैन’ के नाम से प्रसिद्ध और स्टॉकहोम वाटर प्राइज 2015 जिसे जल संरक्षण क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार भी कहा &#8230;]]></description>
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<p><strong>इस वक्त सूखे और पानी की समस्या न केवल महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बुंदेलखंड बल्कि पूरे देश में विकराल रूप धारण कर चुकी है। इस समस्या पर दशकों से काम कर रहे भारत के जल मानव ‘वाटर मैन’ के नाम से प्रसिद्ध और स्टॉकहोम वाटर प्राइज 2015 जिसे जल संरक्षण क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार भी कहा जाता है, से सम्मानित जल संरक्षक राजेंद्र सिंह से कप्तान माली ने देश में चल रहे इस सूखे की स्थिति पर विचार-विमर्श किया। साक्षात्कार के कुछ अंश।</strong><br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>महाराष्ट्र में सूखे की स्थिति पर आपके क्या विचार हैं?</strong></span><br />
<strong>हमारे विकास की नीति इस समय गलत दिशा में चल रही है। हमने गलत फसल चक्र को अपना लिया है। जहाँ हमें कम पानी की खपत वाली फसलें लगानी चाहिए थी वहां हम ज्यादा पानी उपभोग करने वाली फसलें जैसे गन्ना, कपास इत्यादि की खेती कर रहे हैं। महाराष्ट्र सरकार जिसे पानी के बांध बनाने चाहिए थे, जल संरक्षण पर ध्यान देना चाहिए था, भूजल स्तर को बढ़ाने के कार्यों में लगना चाहिए था, वे उसकी जगह पर वह रिज़र्व पुलिस, सेना की फौज तैयार कर रही हैं। आप देख लीजिये राजस्थान में महाराष्ट्र से तीन गुना कम वर्षा होती है पर वहां इतनी विकट सूखे की स्थिति नहीं है जितनी महाराष्ट्र में है, राजस्थान में कोई किसान आत्महत्या नहीं कर रहा है। महाराष्ट्र का मराठवाड़ा इलाका ज्यादा पानी की लहपत वाली फसलों को सींचने के लिए जमीन से ज्यादा पानी निकालने के कारण इस सूखे का सामना कर रहा है। राज्य सरकार को बढ़ चढ़ कर सूखे की स्थिति से निपटने के लिए पहले से ही सुचारू रूप से प्रयास करने चाहिए थे।</strong><br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>आप देश की कृषि व्यवस्था और प्रणाली को कहाँ तक इन सूखे की स्थितियों के लिए जिम्मेदार मानते हैं?</strong></span><br />
<strong>किसी भी देश का फसल चक्र उसके वर्षा चक्र से जुड़ा होना चाहिए। इस ओर कृषि मंत्रालय, राज्य सरकार, स्थानीय प्रशासन को आगे आकर मिलकर कृषि प्रणाली को वर्षा चक्र से जोड़ना चाहिए और इसके लिए हमें किसी विदेशी संस्था या एक्सपट्र्स की मदद नहीं चाहिए बल्कि हमें हमारी जड़ों की तरफ मुड़ना चाहिए। जहाँ कम पानी की प्राकृतिक उपलब्धता है वहां हमें कम पानी वाली फसलें उगानी चाहिए और भूजल का कम से कम दोहन किया जाना चाहिए और उसे निरंतर पुनर्जीवित भी करते रहना चाहिए।</strong><br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>इस समय बुंदेलखंड भी भीषण सूखे की चपेट में है इस पर आपकी क्या टिपण्णी है?</strong></span><br />
<strong>उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का बुंदेलखंड का इलाका विंध्य पर्वत शृंखला का भाग है वहां पर जंगल थे और जंगलों से जीवन चलता था। वहां खेती न के बराबर होती थी। आज इन इलाकों में खेती के लिये खुले कुंए खोदकर भूजल का अंधाधुंध दोहन किया गया है और उस भूजल को पुन: ऊपर उठाने के लिए कुछ भी नहीं किया गया जिसके कारण वहां मिट्टी का क्षरण हो रहा है। बुन्देलखंड की स्थिति आज इस हद तक पहुंच चुकी है कि पानी की किल्लत की वजह से वहां के नौजवान अपने बूढ़े माता पिता को जंगलों और गांवों में छोड़कर शहरों में विस्थापित हो रहे हैं।</strong><br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>पूर्व प्रधानमंत्री अटल वाजपेयी की सरकार ने देश की सूखे की स्थिति और नदियों के जल का सम्पूर्ण उपयोग करने के लिए नदियों को जोड़ने वाली महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट पर जोर दिया था, इस प्रोजेक्ट की कल्पना को आप कितना कारगर मानते हैं?</strong></span><br />
<strong>देखिये, जल संसाधन पर केंद्र, राज्य और स्थानीय प्रशासन तीनों का अधिकार होता है। पानी के बंटवारे को लेकर उठने वाले विवादों को हमारी न्यायपालिका भी समाधान नहीं कर पायेगी। हम अब तक करीब 30 वर्षों में सतलज यमुना व्यास नदी, कृष्णा-कावेरी- कोयना नदियों के साझा विवाद को नहीं सुलझा पाये तो आगे अन्य नदियों को जोड़कर नए विवाद क्यों खड़े करें। हमें विवाद नहीं समाधान तैयार करने हैं। स्वयं अटल जी भी इस समस्या का समाधान नहीं निकाल पाये। मेरा कहना है कि हमें नदियों को जोड़ने की जगह हमें नदियों से जुड़ना चाहिए। हमने अपने 32 वर्षों के सतत प्रयास से राजस्थान में रेगिस्तान की सात नदियों को भूजल को सतत भरते हुए पुनर्जीवित कर दिया है जो विलुप्त हो चुकी थीं। जब यह कार्य राजस्थान जैसे रेगिस्तानी इलाके में किया जा सकता है तो महाराष्ट्र या अन्य राज्यों में क्यों नहीं किया जा सकता?</strong><br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>इस समय आप जल संरक्षण के लिए किस प्रकार के प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहे हैं और आपकी भविष्य की क्या योजनाएं हैं?</strong></span><br />
<strong>इस समय हम पूरे देश में जल साक्षरता के लिए जल सत्याग्रह नाम से एक अभियान चला रहे हैं जिसका मुख्य उद्देश्य उसका मूल अधिकार पीने का जल मिले और जल सुरक्षा अधिकार अधिनियम बने जिससे भूजल का शोषण और प्रदूषण रुके। भारत सरकार भूजल अधिनियंत्रण अधिनियम बनाये। इसकी पहल हम 17 अप्रैल को बिहार के चंपारण जिले से शुरू कर चुके हैं और हम अब पूरे देश में इस अभियान को लेकर जागरण मुहिम निकालेंगे। </strong><strong>5 मई को हम दिल्ली में पूरे भारत से आये जल संरक्षकों की एक सभा में पूरे साल की रूपरेखा तैयार करेंगे। इस पूरे अभियान का मुख्य उद्देश्य जल के बारे में राज्य और समाज की जवाबदेही सुनिक्षित करना है। राज्य, पंचायत, केंद्र सभी मिलकर पूरे देश में पानी के सभी स्रोत, भंडारण को पहचान कर उसका एक रिकॉर्ड बनायें और उसे राजपत्रित भी करें। नदियां समाज की हैं और उनके सुरक्षा और संवर्धन की जिम्मेदारी समाज की है, इसलिए इसके तीनों भागीदारों को मिलकर इसे बचाना होगा और इन्हें पुनर्जीवित करना होगा। हमें वर्षा जल को सहेजना होगा, पानी के अपव्यय को रोकना होगा और वर्षचक्र का पालन करते हुए फसल चक्र को इससे जोड़ना होगा। ’</strong></p>
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