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	<title>परदे के पार &#8211; Dastak Times |  दस्तक टाइम्स</title>
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	<description>By Dastak Times Hindi News Network</description>
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	<title>परदे के पार &#8211; Dastak Times |  दस्तक टाइम्स</title>
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		<title>परदे के पार</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Dastak Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 16 Sep 2017 07:01:06 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दस्तक-विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[परदे के पार]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="300" height="290" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/jelon-me-300x290.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/jelon-me-300x290.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/jelon-me.jpg 346w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />जेलों में हर दिन होगी भजन संध्या देश की जेलों के अच्छे दिन आ ही गए। जेलों को लेकर अब तक आम जन के मन में रही सभी अवधारणायें समाप्त होने को हैं। कभी दिल्ली के बहुचर्चित तिहाड़ जेल में एक महिला आईपीएस अधिकारी ने कुछ ऐसे सुधार किए थे जो कि देश भर में &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="290" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/jelon-me-300x290.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/jelon-me-300x290.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/jelon-me.jpg 346w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /><h3><strong>जेलों में हर दिन होगी भजन संध्या</strong></h3>
<p><strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/jelon-me.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-181582 alignleft" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/jelon-me-300x290.jpg" alt="" width="276" height="267" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/jelon-me-300x290.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/jelon-me.jpg 346w" sizes="auto, (max-width: 276px) 100vw, 276px" /></a>देश की जेलों के अच्छे दिन आ ही गए। जेलों को लेकर अब तक आम जन के मन में रही सभी अवधारणायें समाप्त होने को हैं। कभी दिल्ली के बहुचर्चित तिहाड़ जेल में एक महिला आईपीएस अधिकारी ने कुछ ऐसे सुधार किए थे जो कि देश भर में मिसाल बने थे लेकिन अब वह गुजरे दिनों की बात हो गयी है। उन्होंने अपने जमाने में कई नये प्रयोग किए तो उसकी चर्चा भी हुई लेकिन अब जेलों में जिस तरह के बंदी आ रहे हैं उनका इतिहास देखते हुए तो लगता है कि अब किसी तरह के सुधारों या प्रयोगों की आवश्यकता ही नहीं रह गयी है। कारण यह है कि कल तक अध्यात्म की धारा का प्रवाह करने वाले कथित संत कब खुद ही धर्म के मार्ग से भटक गए पता ही नहीं चला। नतीजा यह हुआ कि उनके कर्म उन्हें भगवान कृष्ण की जन्मस्थली यानि कारागार तक ले आये। कृष्ण तो सिर्फ यहां जन्म लिए लेकिन जो अब बंद हुए हैं लगता है कि वे अपनी अन्तिम सांस भी यहीं लेंगे। लेकिन इतना तय है कि जब तक वे यहां प्रवास पर रहेंगे तब तक इस सरकारी ससुराल में भक्ति संगीत की गंगा जरूर बहेगी।</strong></p>
<h3><strong>मफलरमैन को मिली आक्सीजन</strong></h3>
<p><strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/mafalarman.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-181583 alignright" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/mafalarman-270x300.jpeg" alt="" width="259" height="288" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/mafalarman-270x300.jpeg 270w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/mafalarman.jpeg 446w" sizes="auto, (max-width: 259px) 100vw, 259px" /></a>हर बात में अपनी टांग अड़ाने के लिए देशभर में कुख्यात हो चुके मफलरमैन पिछले काफी समय से सुषुुप्तावस्था में थे और राजनीति के मानचित्र से लगभग विलुप्त ही हो गए थे। दरअसल उन दो राज्यों में जहां वे अपनी झाड़ू का कमाल दिखाने को बेकरार थे, वहां उन्हें मुंह की खानी पड़ी। बस इसी के बाद से उन्होंने एक तरह से हर मामले में ‘अंगुली’ करने की अपनी आदत को लगाम दे दी थी। उनकी निष्क्रियता से यह लगने लगा था कि हो सकता है कि वे अब भविष्य में राजनीति से ही तौबा कर लेंगे। कुछ लोग तो यहां तक कहने लगे थे कि मफलरमैन खुद अपनी झाड़ू वाली पार्टी सहित आईसीयू में भर्ती हो गए हैं। लेकिन समय का फेर देखिए देश का दिल कहे जाने वाले प्रदेश में एक सीट पर विधानसभा का उपचुनाव हुआ और इस चुनाव में एक बार फिर झाड़ू ने अपना कमाल दिखाया। तमाम कयासों को धता बताते हुए न सिर्फ जीत हासिल की बल्कि लोगों को भी एक बार फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया कि वह अभी खत्म नहीं हुए हैं और भविष्य में फिर कोई नया कारनामा दिखा सकते हैं।</strong></p>
<h3><strong>सुशासन बाबू की धड़कनें बढ़ीं</strong></h3>
<p><strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/sushasan-babu.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-181584 alignleft" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/sushasan-babu-300x250.jpg" alt="" width="286" height="238" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/sushasan-babu-300x250.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/sushasan-babu.jpg 652w" sizes="auto, (max-width: 286px) 100vw, 286px" /></a>बीते दिनों पाटलीपुत्र में विपक्षी दलों की एकता के नाम पर एक महारैला हुआ। सत्ता रूपी घासलेट यानि मिट्टी का तेल के बिना लालटेन वाली पार्टी ने बचे खुचे तेल से लालटेन की ज्वाला प्रज्जवलित की। विपक्षी दलों को एक होने और केसरिया रंग को बदरंग करने का नारा देकर एक मंच पर एकठ्ठा किया। खैर चारा बाबू की छवि काम आयी और कई दलों के नेता विचारधाराओं में एका न होने के बावजूद आये। बाढ़ की मार होने के बावजूद भारी भीड़ जुटी तो जोशीले भाषण भी हुए। लगा बस कल ही सब कुछ बदल जायेगा, लेकिन राजनीति में ऐसा अकस्मात होता नहीं है। लेकिन फिर भी उम्मीद की लालटेन तो जल ही चुकी थी। उधर, चारा बाबू एण्ड फैमली के निशाने पर सिर्फ सुषासन बाबू ही थे। कहा गया कि धोखा दिए हैं, जनता इन्हें सबक सिखा दे। अब जनता सुषासन बाबू को सबक सिखायेगी या नहीं, यह तो भविष्य ही तय करेगा लेकिन इतना तय है कि बापू के नाम पर बने मैदान में जो भीड़ जुटी और जो समर्थन देखने को मिला, उससे तो सुशासन बाबू के दिल की धड़कनें बढ़ जरूर गयीं।</strong></p>
<h3><strong>सही निर्णय बनाम गलत कदम</strong></h3>
<p><strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/sahi-nirnaya.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-181586 alignright" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/sahi-nirnaya-300x289.jpg" alt="" width="271" height="261" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/sahi-nirnaya-300x289.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/sahi-nirnaya.jpg 627w" sizes="auto, (max-width: 271px) 100vw, 271px" /></a>बीते साल नवम्बर के महीने में एक बड़ा भूकम्प इस देश में आया। इस भूकम्प से न तो अमीर अछूते रहे और न गरीब। दरअसल यह भूकम्प प्राकृतिक नहीं बल्कि मानव निर्मित था और इसके पीछे यह तर्क भी दिया गया कि इससे सिर्फ अमीरों के ही घर गिरेंगे लेकिन झोपड़ियां सुरक्षित रहेंगी। कहा गया कि अमीर और गरीब के बीच का फासला फालसे (एक फल) की तरह गायब हो जायेगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं अमीरों के पैर के नीचे और नयी-नयी लग्जरी चार पहिया गाड़ियां आ गयीं और गरीब की नौकरी ही नहीं गयी बल्कि उसकी साइकिल तक छिन गयी। गरीब रोजी-रोटी तक को मोहताज हो गया। लेकिन इस भूकम्प को लाने वाले दस महीने बाद भी अपनी पीठ खुद ही थपथपा रहे हैं। कहते फिर रहे हैं कि भूकम्प लाने का फैसला ऐतिहासिक था और अभी नहीं आने वाले समय में इसका फायदा दिखेगा। यह भी बता रहे हैं कि 99 फीसदी पैसा वापस लौट आया है और यह सब उल्टा-सीधा पैसा ही था। लेकिन अब विरोधी इसे लेकर हुक्मरानों पर हमलावर हो गए हैं और फैसले को गलत ठहराने के लिए सारे तर्क दे रहे हैं। अब देखना है कि भूकम्प लाने के मुख्य प्रायोजकों को जनता किस नजर से देखती है।</strong></p>
<h3><strong>तीन तलाक की जीत किसकी</strong></h3>
<p><strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/teen-talaq.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-medium wp-image-181589" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/teen-talaq.jpg" alt="" width="1" height="1" /></a><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/triple-talaq-620x400.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-181590 alignleft" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/triple-talaq-620x400-300x194.jpg" alt="" width="297" height="192" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/triple-talaq-620x400-300x194.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/triple-talaq-620x400.jpg 620w" sizes="auto, (max-width: 297px) 100vw, 297px" /></a>बीते दिनों सबसे बड़ी अदालत ने एक तारीखी फैसला दिया। यह फैसला ऐसा था कि कोई इसकी आलोचना नहीं कर सकता था। यदि करता तो पूरा समाज उसका दुश्मन हो जाता। ऐसे में फैसले की तारीफ करना एक तरह से मजबूरी हो गयी थी। लेकिन कई ऐसे थे जिन्हें यह फैसला रास नहीं आया था और उनका तर्क था कि यह तो उनके धर्म और उसकी मान्यताओं एवं परम्पराओं के विपरीत है। इतना ही नहीं धर्म के अलमबरदारों ने इस फैसले के खिलाफ जहर भी सार्वजनिक रूप से उगला। खैर, यहां तक तो सब ठीक था लेकिन जिस तरह अदालत के फैसले का श्रेय लेने की होड़ हुक्मरानों और उनके विरोधियों के बीच हुई, उससे हर कोई हैरान था। हुक्मरानों की ओर से इसे ऐसे दर्शाया गया जैसे कि सारा किया धरा उन्हीं का हो, लेकिन वास्तव में ऐसा था नहीं। ऐसे में फैसले की आलोचना करने वालों ने अपनी सीमायें भी लांघी और यहां तक कह डाला कि जो खुद अपनी ‘शरीके हयात’ को छोड़ आये वह दूसरों का दर्द क्या समझेंगे।</strong></p>
<h3><strong>भगवा पार्टी के नए ‘नाथ’</strong></h3>
<p><strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/bagawa-parti.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="size-medium wp-image-181588 alignright" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/bagawa-parti-219x300.jpg" alt="" width="219" height="300" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/bagawa-parti-219x300.jpg 219w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/bagawa-parti.jpg 652w" sizes="auto, (max-width: 219px) 100vw, 219px" /></a>‘नाथों’ (भगवान) के भरोसे ही भगवा पार्टी के लोग आज हर महत्वपूर्ण पदों पर काबिज हैं। यह नाथ ही थे जिन्होंने इनके परिवार को दो से तीन सौ का आंकड़ा पार कराने में खासी भूमिका निभायी। वहीं इन्हीं के भरोसे देश के सबसे बड़े सूबे में भी सत्ता की चाभी हाथ में आ गयी। अब ‘नाथ’ का प्रभाव तो होना ही था सो सूबे की कमान भी एक ‘नाथ’ को सौंपी गयी। कुर्सी मिलने के बाद अब तैयारी दोबारा देश का बादशाह बने रहने की शुरू हो गयी है। ऐसे में चुनावी इम्तिहान में 80 में से 73 नम्बर पाने वाले राज्य की कमान एक बार फिर एक और ‘नाथ’ के कंधों पर डाल दी गयी है। जनेऊधारी इस नाथ को अब अपने सांगठनिक चातुर्य का परिचय देना होगा। हालांकि इस उल्टफेर में केन्द्र में मंत्री होने की हनक स्वाहा हो जाने वाली है। लेकिन अब देखना यह है कि जनेऊ और कमण्डल को साधने में यह ‘नाथ’ कितना कामयाब होगा।</strong></p>
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		<title>परदे के पार</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Dastak Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 05 Mar 2017 05:03:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दस्तक-विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[परदे के पार]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="293" height="300" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/do-anmol-ratan-1-293x300.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/do-anmol-ratan-1-293x300.jpg 293w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/do-anmol-ratan-1.jpg 358w" sizes="auto, (max-width: 293px) 100vw, 293px" />&#160; चचा के रवैये पर हैं सभी की निगाहें साइकिल वाली पार्टी में ऐन विधानसभा चुनाव से ठीक पहले जो कुछ भी घटा उससे तो कइयों के चेहरे ही उतर गए थे। लेकिन समय बीता और पार्टी में बहुत बड़ा बदलाव हो ही गया। इसके बाद साइकिल को हाथ का मिला साथ और दोनों ही &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="293" height="300" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/do-anmol-ratan-1-293x300.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/do-anmol-ratan-1-293x300.jpg 293w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/do-anmol-ratan-1.jpg 358w" sizes="auto, (max-width: 293px) 100vw, 293px" /><p>&nbsp;</p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>चचा के रवैये पर हैं सभी की निगाहें</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/chachaa-ka-ravaiya.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-147912 alignright" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/chachaa-ka-ravaiya-300x205.jpg" alt="" width="288" height="197" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/chachaa-ka-ravaiya-300x205.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/chachaa-ka-ravaiya.jpg 503w" sizes="auto, (max-width: 288px) 100vw, 288px" /></a>साइकिल वाली पार्टी में ऐन विधानसभा चुनाव से ठीक पहले जो कुछ भी घटा उससे तो कइयों के चेहरे ही उतर गए थे। लेकिन समय बीता और पार्टी में बहुत बड़ा बदलाव हो ही गया। इसके बाद साइकिल को हाथ का मिला साथ और दोनों ही कूद गए चुनावी दंगल में। इस बीच सबसे ज्यादा उपेक्षित रहे चचा की चुप्पी चर्चा का विषय रही। लेकिन सारी उठापटक के बावजूद चचा साइकिल के ही सिम्बल पर चुनाव मैदान में कूद तो गए लेकिन उनके साथ जो कुछ हुआ था उसे वह अब तक भुला नहीं पाये हैं। इसीलिए नामांकन दाखिल करते ही उन्होंने इशारों ही इशारों में बहुत कुछ तो कहा ही, यह भी कह दिया रिजल्ट आने के बाद वे नयी पार्टी बनायेंगे। हालांकि अपने बड़े भाई के नक्शे कदम पर चलते हुए वे बाद में इस बात से मुकर गए और बोले कि पार्टी तो नयी बन चुकी है। खैर, इस सब के बीच राजनीतिक गलियारों में चचा के अगले कदम को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। इसीलिए सभी की निगाहें चचा की ओर ही जाकर बार-बार ठिठक रही हैं। </strong></p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>रेप के आरोपी पुरुष हैं या महिला</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/rape-ke-aaropi.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-147913 alignleft" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/rape-ke-aaropi-300x267.jpg" alt="" width="250" height="222" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/rape-ke-aaropi-300x267.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/rape-ke-aaropi.jpg 470w" sizes="auto, (max-width: 250px) 100vw, 250px" /></a>सूबे के सबसे बड़े राजनैतिक घराने के करीबी और साइकिल वाली सरकार में मंत्री रहे एक नेता पर ‘गन्दी बात’ करने का आरोप लगा। जब सूबाई पुलिस ने भुक्तभोगी की नहीं सुनी तो इसकी शिकायत देश की सबसे बड़ी अदालत में हुई। इससे पहले कि इस मुद्दे में अदालत में बहस हो, उससे बड़ी बहस बाहर ही शुरू हो गयी। बात इस बात पर फंस गयी कि कैसे कोई महिला बलात्कार कर सकती है। इस पर सभी विद्वान वकील अपने-अपने तर्क और कुतर्क कर रहे थे। लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकल रहा था। इसी बीच एक ऐसे अधिवक्ता महोदय मौके पर पहुंचे जिन्हें विषय की पूरी जानकारी थी। उन्होंने ही स्थिति साफ की कि जिस मंत्री महोदय पर यह आरोप लगा है वह वास्तव में पुरुष हैं लेकिन उनके नाम से ऐसा लगता है कि यह किसी महिला का नाम हो। दरअसल उनका जो नाम है वह नाम पुरुषों का भी होता है और महिलाओं का भी। जब पूरे प्रकरण की परत दर परत खुली तब जाकर जिज्ञासु वकीलों को पूरी बात समझ में आयी। अच्छा हुआ समय पर पता चल गया अन्यथा तो वे ‘कन्फूज’ ही रहते।</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>राजनीति में गधों की चर्चा</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/rajneeti-me-gadhaa.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-147914 alignright" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/rajneeti-me-gadhaa-300x224.jpg" alt="" width="282" height="211" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/rajneeti-me-gadhaa-300x224.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/rajneeti-me-gadhaa-90x68.jpg 90w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/rajneeti-me-gadhaa.jpg 488w" sizes="auto, (max-width: 282px) 100vw, 282px" /></a>बीते दिनों चुनावी माहौल में भाषणबाजी के दौरान गधों की चर्चा हो गयी। इससे कोई और खुश हुआ हो या न हुआ हो, गधे बहुत खुश हुए। दरअसल साइकिल वाली पार्टी के मुखिया ने अपने चुनावी रैली में महानायक को सलाह दे डाली कि वे एक राज्य विशेष के गधों का प्रचार न करें। असल में गधे और महानायक तो बहाना थे, निशाने पर कोई और था। कुछ लोगों ने ऐसे बोल की निन्दा की तो कुछ ने चटखारे लेकर इस पर खूब प्रचार किया। मजे की बात यह है कि गधों का प्रचार करने वाले जिस महानायक की चर्चा हुई उनकी पत्नी साइकिल पर ही सवार होकर देश की सबसे बड़ी पंचायत तक पहुंची हैं। खैर, बात गधों के खुश होने की हो रही थी। सो, दो गधे आपस में इस विषय को लेकर चर्चा कर रहे थे। एक ने कहा कि राजनीति में गधे तो पहले से ही थे लेकिन मंच से उनकी चर्चा पहली बार हुई है। यही हमारे लिए ‘अच्छे दिन’ हैं।</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>मेरे दो अनमोल रतन</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/do-anmol-ratan-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-147915 alignleft" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/do-anmol-ratan-1-293x300.jpg" alt="" width="246" height="251" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/do-anmol-ratan-1-293x300.jpg 293w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/do-anmol-ratan-1.jpg 358w" sizes="auto, (max-width: 246px) 100vw, 246px" /></a>देश के सबसे बड़े समाजवादी परिवार में पिछले दिनों घर की दहलीज के भीतर ही जमकर गृह कलह हुई। चूंकि यह परिवार ही सूबे में सत्ता में था सो सत्ता पिपासु एक तरफ हो गए और शेष एक तरफ। जो सत्ता के साथ थे वे कुछ आगे ही बढ़ गए और उन्होंने बकायदा चिट्ठीबाजी तो की ही, मीडिया में भी जमकर जहर उगला। उन्होंने तो दावा तक कर दिया कि कलह के पीछे ‘सगा’ और ‘सौतेला’ ही है। कहा गया कि ‘सौतेले’ की महत्वाकांक्षा के चलते ही परिवार और पार्टी में यह सब कुछ हो रहा है। लेकिन इस पर चर्चा-कुचर्चा के बाद बात आयी गयी हो गयी। उसके बाद वह दिन भी आया जब वह काया सामने आयी जिसको कि सबसे बड़ी वजह बताया जा रहा था लेकिन उन्होंने पहली बार मीडिया के सामने जो कुछ कहा उससे तो सभी दंग रह गए। उन्होंने दोनों को अपनी दो आंखें करार दिया, जिसके बाद लोगों को फिल्मी ‘करन-अर्जुन’ की नकली मां राखी का वह डायलाग याद आ गया जिसमें कहा गया था कि मेरे तो दो अनमोल रतन।</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>बूढ़ें तरसे, कोई तो पूछे</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/budhe-tarase.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-147916 alignright" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/budhe-tarase-237x300.jpg" alt="" width="204" height="259" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/budhe-tarase-237x300.jpg 237w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/budhe-tarase.jpg 311w" sizes="auto, (max-width: 204px) 100vw, 204px" /></a>देश के सबसे बड़े सूबे की सबसे पंचायत के चुनाव हुए। चुनाव प्रचार में विभिन्न दलों के कई नामी गिरामी उड़न खटोले पर चढ़कर अपने-अपने दल की अच्छाइयां और दूसरों की बुराइयां बताने उड़ गए। लेकिन इन्हीं दलों खासकर भगवा पार्टी के कई उम्रदराज और अनुभवी नेता ‘स्टार प्रचारकों’ की सूची में नाम न होने से खासे मायूस थे, हालांकि सच बात तो यह है कि जिस तरह उन्हें पार्टी और सत्ता में दरकिनार किया गया, वे चुनाव प्रचार करना भी नहीं चाहते थे। खैर, यह तो थी उनके मन की बात लेकिन वास्तव में उन्हें शामिल न करके पार्टी की नयी पीढ़ी ने उनका एक तरह से अपमान ही किया। इससे बेहतर तो साइकिल वाली पार्टी निकली। जिसे मालूम था कि धरती पुत्र चुनाव प्रचार में नहीं जायेंगे लेकिन फिर भी उनका नाम ‘स्टार प्रचारकों’ की सूची में सर्वोपरि रहा। यह बात दीगर है कि धरती पुत्र वहीं गये जहां वे जाना चाहते थे। लेकिन इतना तो साफ है कि कई दलों के कथित रूप से वृद्धों की श्रेणी में डाले गए नेताओं के दिल पर अगली पीढ़ी की यह सोच गले नहीं उतरी और वे यही सोचते रहे कि पार्टी नहीं तो कम से कम कोई प्रत्याशी ही उनकी ‘डिमाण्ड’ प्रचार के लिए कर ले।</strong></p>
<p><strong><span style="color: #ff0000">किसकी सतरंगी होगी होली</span> </strong><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/satrangi-holi.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-147917 alignleft" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/satrangi-holi-300x180.jpg" alt="" width="309" height="185" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/satrangi-holi-300x180.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/satrangi-holi.jpg 486w" sizes="auto, (max-width: 309px) 100vw, 309px" /></a>देश के सबसे बड़े सूबे में हो रहे चुनाव के परिणाम का समय चुनाव आयोग ने बहुत छांटकर रखा है। परिणाम ठीक होली के दो दिन पहले आने हैं। मतदाताओं के रुख को कोई भी राजनैतिक दल भांप नहीं पाया है। यह बात दीगर है कि सभी अपनी-अपनी सरकार बनाने के दावे कर रहे हों। लेकिन सत्ता का असल रंग भगवा होगा, नीला होगा या फिर गठबंधन के रंगों से रंगा होगा यह तो चुनाव के परिणामों से ही साफ होगा। जाहिर है कि जिस रंग की छटा इस प्रदेश में बिखरेगी उसी की ही होली इस बार सतरंगी होने जा रही है। लेकिन राजनैतिक पण्डितों का यह भी दावा है कि इन सभी दलों की होली फीकी होने जा रही है क्योंकि सत्ता की हांडी में खिचड़ी पकने की संभावना अधिक है। ऐसे में सभी दल अपने-अपने रंगों तक ही सीमित रह सकते हैं और होली बाद एक और होली खेलने का उनके पास तब भरपूर मौका होगा जब वे आपस में मिलकर सूबे में सरकार बना लें। यानि साफ है कि सतरंगी होली सत्ता का ‘सिग्नल’ मिलने के बाद ही हो सकेगी।</strong></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>अब वही पप्पू बन गया नेता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Dastak Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 20 Feb 2017 08:54:46 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दस्तक-विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[परदे के पार]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="276" height="300" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/pappu-276x300.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/pappu-276x300.jpg 276w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/pappu.jpg 367w" sizes="auto, (max-width: 276px) 100vw, 276px" />परदे के पार क्रिकेट का मैदान छोड़ने के बाद उन्होंने भगवा पार्टी का दामन थामा और अपनी लोकप्रियता के बल पर संसद तक पहुंच गये। उधर उनकी नामाराशि पत्नी भी विधायक बन गयीं। इस बड़बोले सिख नेता को जब केन्द्र में मंत्री नहीं बनाया गया तो वह नाराज हो गए और कमल छोड़ ‘झाड़ू’ थामने &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="276" height="300" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/pappu-276x300.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/pappu-276x300.jpg 276w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/pappu.jpg 367w" sizes="auto, (max-width: 276px) 100vw, 276px" /><p><span style="color: #ff0000"><strong>परदे के पार</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/pappu.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft wp-image-145192" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/pappu-276x300.jpg" alt="" width="232" height="252" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/pappu-276x300.jpg 276w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/pappu.jpg 367w" sizes="auto, (max-width: 232px) 100vw, 232px" /></a>क्रिकेट का मैदान छोड़ने के बाद उन्होंने भगवा पार्टी का दामन थामा और अपनी लोकप्रियता के बल पर संसद तक पहुंच गये। उधर उनकी नामाराशि पत्नी भी विधायक बन गयीं। इस बड़बोले सिख नेता को जब केन्द्र में मंत्री नहीं बनाया गया तो वह नाराज हो गए और कमल छोड़ ‘झाड़ू’ थामने की भी खबरें आयीं लेकिन अंत में उन्होंने ‘पंजे’ को अपनाया। दिलचस्प बात तो यह है कि जिस नेता को उन्होंने ही ‘पप्पू’ नाम दिया था उसी ने न सिर्फ उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलायी बल्कि पंजाब में चुनाव प्रचार की कमान भी सौंप दी। लेकिन उनका वहां मुख्यमंत्री के प्रत्याशी एवं पार्टी के कैप्टन से छत्तीस का आंकड़ा है। अब देखना है कि उनकी इस पार्टी में कैसी निभती है।</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>रामपुरी खां साहब की मेहनत</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/rampuri.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-145193 alignright" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/rampuri-225x300.jpg" alt="" width="210" height="280" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/rampuri-225x300.jpg 225w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/rampuri.jpg 393w" sizes="auto, (max-width: 210px) 100vw, 210px" /></a>पिता-पुत्र के बीच चल रही उठापटक को शांत करने के लिए रामपुरी खां साहब ने मध्यस्थ की भूमिका निभायी। कभी लगता था वह सफल हो गये हैं लेकिन अगले ही पल कुछ नयी बात सामने आ जाती। लेकिन खां साहब भी कहां मानने वाले थे। साइकिल चुनाव चिन्ह बच जाने के बाद उनकी खुशी दोगुनी हो गयी। बोले, मेरे तो दोनों हाथ में लड्डू आ गया। साइकिल भी बच गयी और नेताजी भी मिल गए। दरअसल खां साहब की चिन्ता का सबब उनका बेटा था जिसे उन्होंने चुनाव मैदान में इस बार उतारा है। यदि पार्टी में टूट-फूट हो जाती तो इसका असर उनके चुनाव पर तो इतना नहीं पड़ता लेकिन बेटे के चुनाव पर असर पड़ने की पूरी संभावना थी। इसीलिए उन्होंने दोनों धड़ों को एक करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया।</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>कभी मुलायम तो कभी सख्त</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/kabhi-mulayam.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft wp-image-145194" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/kabhi-mulayam-212x300.jpg" alt="" width="163" height="230" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/kabhi-mulayam-212x300.jpg 212w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/kabhi-mulayam.jpg 533w" sizes="auto, (max-width: 163px) 100vw, 163px" /></a>साइकिल वाली पार्टी में पिछले दिनों बड़ा उलटफेर हुआ। अब तक जो मुखिया थे उन्हें जबरिया संरक्षक बना दिया गया। जिसके बाद तो रिश्तों में खटास आनी ही थी। हालांकि यह भी चर्चा आम हुई कि पार्टी में जो कुछ भी घटा उसकी पटकथा पहले ही लिख दी गयी थी। लेकिन पार्टी की नींव रखने वाले नेता को सभी को मैनेज करना था, पुत्र को भी और भाई को भी। ऐसे में वे कभी सख्त हो जाते तो कभी मुलायम। कभी कहते प्रचार करने नहीं जाऊंगा तो कभी प्रचार पर जाने की तारीखों का ऐलान कर देते। उनके रुख से कार्यकर्ता बुरी तरह भ्रमित हैं तो वहीं पार्टी के मतदान करने वाले मतदाता भी। अब तो चुनाव सिर पर हैं, ऐसे में इसका मतदान और परिणाम पर क्या असर होगा, इसकी चर्चा अब आम हो गयी है।</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>सीएम की बेटी और बहू में जंग</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/cm-kee-beti.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="size-medium wp-image-145195 alignright" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/cm-kee-beti-300x230.jpg" alt="" width="300" height="230" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/cm-kee-beti-300x230.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/cm-kee-beti-90x68.jpg 90w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/cm-kee-beti.jpg 393w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /></a>दो राजनैतिक घराने चुनावी मैदान में आमने सामने हैं। एक पूर्व मुख्यमंत्री की पुत्री हैं तो दूसरी एक अन्य पूर्व मुख्यमंत्री की पुत्रवधू। इन दोनों के बीच चुनावी जंग को लेकर विधानसभा क्षेत्र ही नहीं पूरे जिले में चर्चाएं आम हैं। दरअसल जो पूर्व मुख्यमंत्री की पुत्री हैं वह इसी सीट से वर्तमान में भी विधायक हैं लेकिन अब उन्होंने पाला बदल लिया है। वहीं जो पुत्रवधू हैं उन्होंने राजनीति में नया-नया कदम रखा है लेकिन हैं पूरे जोश में। उधर वर्तमान विधायक के पाला बदलने और पंजे का साथ छोड़ कमल थामने से क्षेत्रीय जनता नाखुश है। वहीं भगवा दल से अब तक टिकट की दावेदारी ठोक रहे नेता भी भितरघात करने की तैयारी कर चुके हैं। ऐसे में अब यह लगने लगा है कि ऐसे हालात में कहीं कोई तीसरा न बाजी मार ले जाये और यह दोनों राजनैतिक घराने टापते रह जायें।</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>पप्पू और बबुआ की जोड़ी</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/pappu_babuaa.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft wp-image-145196" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/pappu_babuaa-264x300.jpg" alt="" width="236" height="268" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/pappu_babuaa-264x300.jpg 264w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/pappu_babuaa.jpg 393w" sizes="auto, (max-width: 236px) 100vw, 236px" /></a>पिछले दिनों ‘साइकिल’ को पकड़ने के लिए जब हाथ कम पड़ गए तो फिर पार्टी ने ‘पंजे’ का सहारा लिया। उसके बाद दोनों ही दलों के युवराज मिले और साथ ही साथ रोड शो भी किया। एक दल के युवराज को पप्पू की संज्ञा मिली हुई है तो दूसरे को बबुआ की। दोनों के मिलन की तुलना गंगा-यमुना के मिलन से की गयी। वहीं दोनों की जोड़ी को देखकर कुछ लोगों को कामिक्स के उन दो पात्रों की याद ताजा हो गयी जो मोटू और पतलू के नाम से प्रसिद्ध हैं। मोटू और पतलू की जोड़ी की तर्ज पर जब युवराजों की यह जोड़ी सड़कों पर ‘यूपी को यह साथ पसन्द है’ स्लोगन के साथ निकली तो लोग कयास लगाने लगे कि पप्पू और बबुआ की जोड़ी चुनाव में क्या रंग लाती है।</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>टिकटों को लेकर कलह</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/tickut-ghamasaan.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-145197 alignright" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/tickut-ghamasaan-228x300.jpg" alt="" width="195" height="257" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/tickut-ghamasaan-228x300.jpg 228w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/tickut-ghamasaan.jpg 393w" sizes="auto, (max-width: 195px) 100vw, 195px" /></a>चाहे सत्तारूढ़ दल हो या फिर भविष्य में सत्ता में आने के दावे करने वाला दल हो, सभी टिकटों के बंटवारे के बाद भी चैन से नहीं हैं। हर दल के कार्यालय में विरोध हो रहा है। स्थिति यह है कि हर कोई अपने विरोधी से नहीं बल्कि अपनों से लड़ रहा है। हर तीसरे विधानसभा सीट पर एक बागी ताल ठोंकता आसानी से देखा जा सकता है। सोशल मीडिया में तो एक दल के सूबाई मुखिया को तो मुंह पर गाली देते वीडियो तक वाइरल हुआ। साइकिल में भी वही स्थिति है जो कमल में है। कुछ बागी तो आत्मदाह तक करने पर आमादा हो गए लेकिन पार्टियों को दूसरे दलों से आये नेता ज्यादा भा रहे हैं। भगवा पार्टी ने तो अपने सात बार के विधायक तक का टिकट काट दिया। कुछ यही हाल साइकिल की सवारी करने वालों की भी हुई। अब वे तो दूसरे दलों में शामिल होकर अपने ही पुरानों को चुनौती देते दिख रहे हैं।</strong></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
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		<title>परदे के पार</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Dastak Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 07 Feb 2017 05:38:10 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[ज्ञान भंडार]]></category>
		<category><![CDATA[परदे के पार]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="221" height="300" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/cycle-221x300.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/cycle-221x300.jpg 221w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/cycle.jpg 271w" sizes="auto, (max-width: 221px) 100vw, 221px" />‘साइकिल’के मुख्यालय पर लगी ‘दंगल’ बड़ा दिन यानि क्रिसमस के मौके पर मिस्टर परफेक्शनिस्ट कहे जाने वाले बॉलीवुड के एक हीरो की फिल्म रिलीज हुई। फिल्म का नाम था ‘दंगल’। इस फिल्म के रिलीज होते ही उप्र में इसे मनोरंजन कर से मुक्त कर दिए जाने की घोषणा हो गयी। यह फिल्म मल्टीप्लेक्स के साथ-साथ &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="221" height="300" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/cycle-221x300.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/cycle-221x300.jpg 221w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/cycle.jpg 271w" sizes="auto, (max-width: 221px) 100vw, 221px" /><p><span style="color: #ff0000"><strong>‘साइकिल’के मुख्यालय पर लगी ‘दंगल’</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/cycle.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft  wp-image-142344" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/cycle-221x300.jpg" alt="" width="168" height="228" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/cycle-221x300.jpg 221w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/cycle.jpg 271w" sizes="auto, (max-width: 168px) 100vw, 168px" /></a>बड़ा दिन यानि क्रिसमस के मौके पर मिस्टर परफेक्शनिस्ट कहे जाने वाले बॉलीवुड के एक हीरो की फिल्म रिलीज हुई। फिल्म का नाम था ‘दंगल’। इस फिल्म के रिलीज होते ही उप्र में इसे मनोरंजन कर से मुक्त कर दिए जाने की घोषणा हो गयी। यह फिल्म मल्टीप्लेक्स के साथ-साथ सिंगल स्क्रीन वाले सिनेमाघरों में भी लगी, लेकिन इसी के साथ ही इस फिल्म का टाइटिल सूबे में सत्तारूढ़ पार्टी के अंदरखाने में चरितार्थ होता दिखा। साइकिल वाली पार्टी में ‘दंगल’ पार्टी में वर्चस्व और टिकट बंटवारे में को लेकर अब चरम पर पहुंच चुका है। या यूं कहें कि अब आर-पार का समय भी आ गया है। कारण यह है कि साइकिल वाली पार्टी की छवि में जो सुधार हुआ है उसके पीछे सरकार के मुखिया का ही चेहरा है। यही वजह है कि सरकार के मुखिया अब यह चाहते हैं टिकट बंटवारे में उनका खास दखल हो, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। उन्होंने जो सूची और अपनी आपत्ति पार्टी मुखिया को दी उसे दरकिनार कर नए सिरे से उम्मीदवारों का एलान हो गया। जाहिर है सरकार के मुखिया की अनदेखी हुई और ‘चाचा’ और ‘अंकल’ बाजी मार ले गए।</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>नोटबंदी पर रामपुरी चाकू का खौफ</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/notebandi.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignright  wp-image-142345" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/notebandi-245x300.jpg" alt="" width="198" height="242" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/notebandi-245x300.jpg 245w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/notebandi.jpg 301w" sizes="auto, (max-width: 198px) 100vw, 198px" /></a>बीते दिनों देश में नोटबंदी करने का बड़ा फैसला हुआ। जाहिर है किसी को यह फैसला रास आया तो किसी को नहीं। यह फैसला रास आये इसलिए इसे देशभक्ति से भी जोड़ा गया लेकिन शुरुआती दिनों में तो यह झांसा चल गया लेकिन बाद में जब परेशानी बढ़ी तो आलोचनाओं का भी पहाड़ खड़ा हो गया। ऐसे में हमेशा मुल्क के ‘बादशाह’ पर हमेशा हमलावर रहने वाले रामपुरी खां साहब कहां चूकने वाले थे। उन्होंने हर मौके पर अपने व्यंग्य बाण चलाकर तंज करने से गुरेज नहीं किया। इसी दौरान एक रैली में बादशाह ने जो खुद को कभी मुल्क का चौकीदार तो कभी सेवक बताते नहीं थकते थे, खुद को झोला लेकर आया फकीर करार दिया। बस फिर क्या था, खां साहब को रामपुरी चाकू को धार देने का मौका मिल गया। बोले, जब यह फकीर जायेगा तो इसके झोले की तलाशी जरूर ली जायेगी। इसी बीच सूबे की सबसे बड़ी पंचायत का सत्र शुरू हो गया। ऐसे में खां साहब कोई मौका नहीं चूकना चाहते थे। उन्होंने पहले से ही अपने तंज भरे लफ्जों को जहर में भिगो दिया था। लेकिन भगवा दल वाले भी तैयार थे, सो उन्हें सदन में बोलने ही नहीं दिया।</strong></p>
<p><strong><span style="color: #ff0000">किससे करें मन की बात</span> </strong><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/man-kee-baat.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-142346 alignleft" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/man-kee-baat-300x235.jpg" alt="" width="250" height="196" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/man-kee-baat-300x235.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/man-kee-baat.jpg 470w" sizes="auto, (max-width: 250px) 100vw, 250px" /></a>नोटबंदी करने वाली पार्टी के नेता इन दिनों हलकान हैं। पार्टी कह रही है कि लोगों को नोटबंदी के फायदे समझायें लेकिन चाहे विधायक हों, कार्यकर्ता हों या फिर पदाधिकारी, कोई भी इसकी हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। कारण यह है कि ये सभी जमीनी सच्चाई से वाकिफ हैं। विधायक तो दबी जुबान में यह तक कह रहे हैं कि जब माननीय ही नहीं रहेंगे तो फिर क्या होगा। अभी अगर नोटबंदी के गुण दोष समझाने निकलें तो जूतों की बारिष होने की संभावना प्रबल है। हालांकि जमीनी सच्चाई पार्टी आलाकमान को भी पता है लेकिन बावजूद इसके उन्होंने सूबे के सबसे बड़े प्रदेश के सभी 73 सांसदों की बैठक बुलायी और ताकीद किया कि जनता की बीच जायें और नोटबंदी की अच्छाई लोगों को बतायें। आलाकमान के खौफ के आगे कोई भी सांसद नहीं बोला। लेकिन हिम्मत जुटाकर एक सांसद ने सिर्फ इतनी गुजारिश की कि जब वे नोटबंदी की गुणों का बखान करने जायें तो पहली बार आलाकमान उनके साथ हों। बाद में ऐसे ही पार्टी के नेताओं और पदाधिकारियों ने आपस में ही यह कहते दिखे कि अब बताओ हम अपने मन की बात किससे करें।</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>‘नोटबंदी’ किसी के लिए मौका तो किसी के लिए नुकसान</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/notebandi-nuksaan.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignright  wp-image-142347" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/notebandi-nuksaan-300x264.jpg" alt="" width="263" height="231" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/notebandi-nuksaan-300x264.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/notebandi-nuksaan.jpg 418w" sizes="auto, (max-width: 263px) 100vw, 263px" /></a>देश की हुकूमत ने 1000 और 500 के नोटबंद करने का अचानक ऐलान क्या कर दिया, पूरे देश में भूचाल आ गया। पहले तो किसी भी राजनीतिक दल ने खुलकर इसका विरोध नहीं किया क्योंकि उन्हें यह लग रहा था कि यदि विरोध किया तो कालाधन रखने वालों का समर्थक होने का ठप्पा लग जाएगा, लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, इस निर्णय के खिलाफ स्वर भी मुखर होने लगे। यह तो दिखा ही कि इस फैसले से आम जनता खासी परेशान हुई। ऐसे में कुछ राजनीतिक दलों को यह एक बड़ा मुद्दा नजर आने लगा। लगा कि यदि हालात ऐसे ही रहे तो जिनकी आंखों पर देशभक्ति की पट्टी बांध दी गयी है वे भी इस निर्णय के खिलाफ मुखर हो जाएंगे और तब इसका राजनीतिक फायदा लेने में आसानी होगी। इसी सोच के चलते सूबे की साइकिल वाली सरकार के मुखिया को भी अपनी वापसी अब आसान दिखने लगी। इसीलिए उन्होंने कई सरकारी और गैर सरकारी कार्यक्रमों में यह कहा भी कि यह हमारे लिए एक सुअवसर है। यदि सभी एकजुट हो जाएं और नोटबंदी से हैरान-परेशान लोगों को तैयार करें तो सत्ता में वापसी संभव है।</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>गले की फांस, कैसे करें विरोध</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/gale-kee-phanse.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-142348 alignleft" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/gale-kee-phanse-222x300.jpg" alt="" width="178" height="241" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/gale-kee-phanse-222x300.jpg 222w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/gale-kee-phanse.jpg 261w" sizes="auto, (max-width: 178px) 100vw, 178px" /></a>देश की सरकार कई दलों से मिलकर बनी है। हालांकि इस सरकार का नेतृत्व जिस भगवा पार्टी के हाथों में है वह खुद बहुमत में होने बावजूद पूर्व में किए गए गठबंधन का धर्म निभा रही है। केन्द्र की सरकार खुद को गठबंधन की ही सरकार बता रही है, लेकिन इस सरकार के मुखिया द्वारा अचानक नोटबंदी का फैसला लिए जाने के बाद गठबंधन में शामिल दल अब पशोपेश में हैं कि वह क्या करें। अभी तो सत्ता में हैं, लेकिन इस फैसले के कारण जो आर्थिक चोट पहुंची है उसका क्या करें। विरोध करें तो फंस जाएंगे। समर्थन करेंगे तो भविष्य की राजनीति अंधकारमय है। जाहिर है यह ऐसी गले की फांस है जो उगली जा रही है और न ही निगली। केवल सत्तापक्ष ही नहीं, विपक्ष भी इसी गुणा-भाग के चलते एकजुट नहीं हो पा रहा है, जबकि इस दिशा में कोशिशें जारी हैं। बात फिर वहीं आकर अटक जाती है कि बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन। ऐसे में बंगाल की दीदी ने बड़ी हिम्मत दिखाई और खुलकर मोर्चा लिया, लेकिन उनका साथ देने का वादा कर कई दल मुकर गए। यूपी की बहनजी ने भी पांव आगे बढ़ाकर अनजाने डर से वापस खींच लिए।</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>कोई जप रहा नमो-नमो तो कोई कुछ और</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/namo-namo.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignright  wp-image-142349" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/namo-namo-153x300.jpg" alt="" width="130" height="255" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/namo-namo-153x300.jpg 153w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/namo-namo-521x1024.jpg 521w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/02/namo-namo.jpg 737w" sizes="auto, (max-width: 130px) 100vw, 130px" /></a>यह सोशल मीडिया का ही करिश्मा था जिसने कि साल 2014 में इस व्यक्ति विशेष के पक्ष में बड़े पैमाने पर माहौल तैयार किया। इसके लिए बकायदा कभी न पीने वाले ‘पीके’ की मदद ली गयी। बात ‘क्लिक’ कर गई और चाय वाला सीएम से पीएम की कुर्सी तक पहुंच गया। 2014 में चुनाव प्रचार के दौरान भी बड़ी-बड़ी बातें, वायदे और आश्वासन दिए गए, लेकिन फिलहाल आम लोगों को इसका अब भी इंतजार है। इस बीच देश की सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए बड़े नोट अचानक बंद कर दिए। जाहिर है कि इसकी प्रशंसा या आलोचना उसी सोशल मीडिया पर जरूर होनी थी, जहां से इस सरकार के पक्ष में माहौल बना था। सो, ऐसा हुआ भी, लेकिन शुरुआती दिनों में प्रशंसा करने वाले भी अन्तत: हांफते नजर आए और उन्होंने आलोचनाओं के कमेंट और ट्वीट पर ‘रीएक्ट’ करना कम कर दिया। जाहिर है कि जमीनी सच्चाई यानि ‘ग्राउण्ड रियलिटी’ जानने के बाद कई नमो भक्तों की निष्ठा भी डोल गयी। अब ऐसे भक्तों ने कमेंट करने से परहेज करना शुरू कर दिया है।</strong></p>
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			</item>
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		<title>ये कैसे जनप्रतिनिधि</title>
		<link>https://dastaktimes.org/%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%bf/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Ranjeet Gupta]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 04 Aug 2016 05:51:24 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दस्तक-विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[परदे के पार]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="255" height="266" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/08/ser-par-sava-ser.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" />परदे के पार दिल्ली की जनता इन दिनों ‘कन्फूज’ है। उसे समझ में नहीं आ रहा है उसने चुनावों में जनप्रतिनिधि चुनकर भेजे थे कि अपराधी। आयेदिन किसी न किसी की गिरफ्तारी की खबर सामने आना आम बात हो गयी है। अब तक ऐसे दस जनप्रतिनिधि जेल यात्रा कर चुके हैं। हालांकि इन सबसे एक &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="255" height="266" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/08/ser-par-sava-ser.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" /><p><span style="color: #ff0000;"><strong>परदे के पार</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/08/ye-kaise-pratinidhi.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft wp-image-110464 " src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/08/ye-kaise-pratinidhi.jpg" alt="ye kaise pratinidhi" width="159" height="202" /></a>दिल्ली की जनता इन दिनों ‘कन्फूज’ है। उसे समझ में नहीं आ रहा है उसने चुनावों में जनप्रतिनिधि चुनकर भेजे थे कि अपराधी। आयेदिन किसी न किसी की गिरफ्तारी की खबर सामने आना आम बात हो गयी है। अब तक ऐसे दस जनप्रतिनिधि जेल यात्रा कर चुके हैं। हालांकि इन सबसे एक तरह से मफलरमैन और उनके खास सिपहसालार खासे खुश हैं। कहते घूम रहे हैं कि यह आजादी की दूसरी लड़ाई है। जिस तरह अंग्रेजों ने जुल्म करते हुए तमाम देशभक्त हिन्दुस्तानियों को सलाखों के पीछे डाल दिया था, कमोबेश वही दृश्य आज परिलक्षित हो रहा है। इस बार अंग्रेज मुकाबिल नहीं हैं लेकिन फिर भी यह आजादी की दूसरी लड़ाई है क्योंकि देश की सत्ता एक ‘डिक्टेटर’ के हाथ में है। यह बात भी गौरतलब है कि इस बार जो जेल यात्रा कर रहे हैं, उनमें से कोई छेड़छाड़, तो कोई महिलाओं से बदसलूकी तो कोई अपनी ही पत्नी को प्रताड़ित करने का आरोप है। </strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>सेर पर सवा सेर</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/08/ser-par-sava-ser.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignright  wp-image-110465" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/08/ser-par-sava-ser.jpg" alt="ser par sava ser" width="196" height="204" /></a>रामपुरी खां साहब जब किसी के खिलाफ गांठ बांध लेते हैं तो बस उसके पीछे नहा-धोकर पड़ जाते हैं। लाट साहब ने एक बिल क्या रोका लिया, खां साहब उनके पीछे पड़ गए। आयेदिन उन पर कटाक्ष करने से वे बाज नहीं आ रहे हैं। एक बार तो हालत यह हो गयी कि लाट साहब ने पार्टी मुखिया तक से उनकी शिकायत कर दी लेकिन खां साहब कहां मानने वाले थे। उन्होंने पूर्व की भांति हमले जारी रखे। एक बार तो यहां तक कह गये कि लाट साहब उनकी हत्या तक करा सकते हैं। उनकी यह बात तो बहुतों के गले नहीं उतरी लेकिन अब खां साहब को अपनी रामपुरी चलानी थी, सो चला दी। इस बारे में जब खबरनवीसों ने लाट साहब से पूछा तो वे भी कहां चूकने वाले थे, तपाक से बोले- सरकार के मुखिया से कहकर ‘सिक्यूरिटी’ बढ़वा देंगे। जरूरत पड़ी तो देश की सरकार से वे खुद अनुरोध करके उन्हें ‘फुल प्रूफ सिक्यूरिटी’ दिला देंगे। लाट साहब ने इतने करीने से खां साहब पर कटाक्ष किया कि हर कोई दंग रह गया।</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>शोर के बीच नींद यानि </strong><strong>वल्र्ड रिकार्ड</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/08/shor-ke-beech-need.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft wp-image-110467 " src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/08/shor-ke-beech-need-300x214.jpg" alt="shor ke beech need" width="227" height="162" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/08/shor-ke-beech-need-300x214.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/08/shor-ke-beech-need-350x250.jpg 350w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/08/shor-ke-beech-need.jpg 372w" sizes="auto, (max-width: 227px) 100vw, 227px" /></a>पिछले दिनों देश की सबसे बड़ी पंचायत में दलितों के उत्पीड़न को लेकर गर्मागर्म बहस चल रही थी। विपक्षी पूरे दमखम से सरकार पर चढ़ाई कर रहे थे। खूब हंगामा हो रहा था। शोर इतना था कि लोग पड़ोसी की बात नहीं सुन पा रहे थे कि कौन क्या कह रहा है। ऐसे में देश की सबसे पुराने राजनैतिक दल के युवराज बड़े इत्मीनान से झपकी ले रहे थे। उन्हें इसका भान भी नहीं था कि कैमरा उन्हें इस अवस्था में ‘कैच’ कर रहा है। खैर, बाद में जब उनकी यह तस्वीर मीडिया की सुर्खियां बनीं तो उनके सिपहसालारों ने बचाव में कमान संभाल ली। एक ने कहा कि वे सो नहीं रहे थे बल्कि चिन्तन कर रहे थे, तो वहीं किसी ने कुछ दलील दी। सबकी बातें सुनकर कटाक्ष करने में माहिर सत्ताधारी दल के नेता बोले कि युवराज का तो नाम गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड में शामिल कराया जाना चाहिए कि आखिर इतने शोर-शराबे और हंगामें में कोई सो कैसे सकता है। यह तो अपने आप में एक रिकार्ड है।</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>भीड़ कैसे बदलेगी वोट में</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/08/bheed-kaise-badalegee-vot-me.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignright  wp-image-110469" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/08/bheed-kaise-badalegee-vot-me-250x300.jpg" alt="bheed kaise badalegee vot me" width="181" height="217" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/08/bheed-kaise-badalegee-vot-me-250x300.jpg 250w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/08/bheed-kaise-badalegee-vot-me.jpg 613w" sizes="auto, (max-width: 181px) 100vw, 181px" /></a>फिल्मी दुनिया के रूपहले पर्दे पर जिनका नाम बहुत बड़ा है लेकिन राजनीति में उनकी छवि जुझारू तो जरूर है लेकिन उनमें यह माद्दा नहीं है कि वोट दिलवा सकें। हां, भीड़ वो मजे की जुटा सकते हैं, आखिर फिल्मी चेहरा जो ठहरे। बावजूद इसके देश की सबसे पुरानी पार्टी ने यूपी जैसे महत्वपूर्ण प्रदेश में उन पर ही दांव खेला है। यही नहीं, दिल्ली प्रदेश पर लगातार तीन बार शासन करने वाली तेजतर्रार नेत्री को मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में भी पार्टी ने आगे कर दिया। ऊपर से प्रदेश प्रभारी के रूप में एक मुस्लिम चेहरा पहले ही आगे किया जा चुका था। पर अब सवाल यह है कि भीड़ जुटाने के लिए फिल्मी चेहरा भी है, प्रदेश प्रभारी के रूप में मुस्लिमों पर डोरे डालने के भी दांव ठीक है, साथ ही ब्राह्मणों को रिझाने के लिए मुख्यमंत्री का नाम भी आगे कर दिया गया है पर दिक्कत यह है कि भीड़ तो जुट जायेगी पर वह वोट में ‘कन्वर्ट’ कैसे होगी, इसका फार्मूला तो मैनेजमेंट गुरु भी साफ-साफ नहीं बता पा रहे हैं। </strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>अकेले पड़े सुशासन बाबू</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/08/akele-pade-sushasan-babu.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft wp-image-110470 " src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/08/akele-pade-sushasan-babu-300x293.jpg" alt="akele pade sushasan babu" width="231" height="226" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/08/akele-pade-sushasan-babu-300x293.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/08/akele-pade-sushasan-babu.jpg 323w" sizes="auto, (max-width: 231px) 100vw, 231px" /></a>बिहार की सत्ता पुन: हासिल करने में कामयाब रहे सुशासन बाबू के निशाने पर अब उप्र है लेकिन बिहार में उनकी नाव के खेवनहार रहे उनके सहयोगी दल उप्र में उनके लिए अपनी ‘लालटेन’ जलाने को तैयार नहीं हैं। दरअसल वे ‘लालटेन’ लेकर इसलिए यूपी में नहीं निकलना चाहते क्योंकि उनकी राह में रिश्तेदारी बड़ा अड़ंगा है। भले ही चुनावी मंच हो पर अपने ही समधी की आलोचना करना कहां तक उचित होगा, बस इसी बात को लेकर ‘बुड़बक’ के तकिया कलाम वाले नेताजी चुप हैं। उधर, सुशासन बाबू लगातार उनके समधी और उनकी पार्टी पर आरोपों की बौछार करने से गुरेज नहीं कर रहे हैं। हालांकि सुशासन बाबू यूपी में कोई बहुत बड़ा तीर मार लेंगे, इसे लेकर तो विद्वानों में भी मतभेद है लेकिन फिर भी वे कोई मौका हाथ से गंवाना नहीं चाहते हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि बिहार में जिन्होंने गलबहियां डाल रखी हैं, वे यूपी में ऐसे किसी प्रयोग से दूर रहना चाहते हैं। ऐसे में सुशासन बाबू को समझ में नहीं आ रहा है कि वे क्या करें। साफ है कि जो बिहार में साथ थे, वे यूपी आते-आते बेगाने से हो गए हैं।</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>काश मैंने भी पेंच लड़ाये होते</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/08/kash-maine-bhi-pech-ladaye-hote.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignright  wp-image-110471" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/08/kash-maine-bhi-pech-ladaye-hote.jpg" alt="kash maine bhi pech ladaye hote" width="192" height="250" /></a>पिछले दिनों फिल्मी पर्दे का सुल्तान एक और मामले में पाक साफ बरी हो गया। इससे पहले भी सुल्तान ने मुम्बई में चल रहे एक मामले में धोबी पछाड़ दांव लगाया तो वहां भी वे निर्दोष साबित हुए। लगातार मिल रही राहत के बाद अब यह चर्चा आम हो गयी है कि मुल्क के बादशाह से गर नजदीकियां हों तो राहें बहुत आसान हो जाती हैं। गुजरात में इस दबंग सुल्तान ने बादशाह के साथ पतंग उड़ायी थी और पेंच भी लड़ाये थे। सुल्तान के वालिद ने भी बादशाह की शान में कसीदे पढ़ने में देर नहीं लगायी। अब तो कई और दागियों को यह लगने लगा है कि काश उन्होंने भी बादशाह के साथ पतंग के पेंच लड़ाये होते। यदि ऐसा हुआ होता तो वे भी अपने तमाम केसों से बरी हो गए होते। लेकिन यह भी सच है कि हर किसी का ऐसा सौभाग्य नहीं होता क्योंकि हर कोई सुल्तान नहीं होता। हो सकता है कि इस घटना के बाद कई औरों की आस्था पतंगबाजी में बढ़ जाये।</strong></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>परदे के पार</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Ranjeet Gupta]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 14 Jul 2016 05:50:23 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दस्तक-विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[परदे के पार]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="300" height="282" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/chacha-bhatija-300x282.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/chacha-bhatija-300x282.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/chacha-bhatija.jpg 423w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />चचा-भतीजे के बीच खुली जंग यूं तो चचा और भतीजा का रिश्ता अपने आप में बड़ा अनूठा होता है। भतीजे की जो इच्छायें बाप पूरी नहीं करता है उसे चुपके से उसका चचा पूरी कर देता है। यूपी की सियासत में भी एक चचा और भतीजे के किस्से आजकल आम हैं। लेकिन यहां भतीजा चचा &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="282" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/chacha-bhatija-300x282.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/chacha-bhatija-300x282.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/chacha-bhatija.jpg 423w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /><p><span style="color: #ff0000;"><strong>चचा-भतीजे के बीच खुली जंग</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/chacha-bhatija.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft wp-image-107908" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/chacha-bhatija-300x282.jpg" alt="chacha bhatija" width="227" height="213" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/chacha-bhatija-300x282.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/chacha-bhatija.jpg 423w" sizes="auto, (max-width: 227px) 100vw, 227px" /></a>यूं तो चचा और भतीजा का रिश्ता अपने आप में बड़ा अनूठा होता है। भतीजे की जो इच्छायें बाप पूरी नहीं करता है उसे चुपके से उसका चचा पूरी कर देता है। यूपी की सियासत में भी एक चचा और भतीजे के किस्से आजकल आम हैं। लेकिन यहां भतीजा चचा से नाराज है तो चचा भतीजे से। दरअसल दोनों की ही अपनी कमजोरियां हैं। चचा को उम्मीद थी कि जब यूपी में सरकार बनाने की स्थिति आयेगी तो उन्हें ही मुख्यमंत्री के रूप में आगे किया जायेगा लेकिन पिता पर पुत्र मोह हावी हुआ और मुख्यमंत्री की दौड़ से चचा आउट हो गए। खैर मुख्यमंत्री के बाद वे नम्बर दो कहलाने लगे। सरकार के अब तक के कार्यकाल में कई मौके आये जब दोनों के बीच कुछ विषयों पर विवाद देखा गया लेकिन एक बाहुबली की पार्टी के विलय को लेकर भतीजे ने जिस तरह का रवैया अपनाया उससे चचा खासे आहत हो गए। नतीजा यह हुआ कि दोनों के बीच तल्खी खासी बढ़ गयी है। चचा-भतीजे के बीच चल रही अनबन के बीच सत्ता के गलियारों में चर्चाओं का बाजार भी गर्म है। हर कोई अपने-अपने तरीके से इसकी व्याख्या कर इसका क्या परिणाम होगा यह बता रहा है।</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>दिल्ली में भी हो जनमत संग्रह</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/delhi-me-janmat-sangrah.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignright wp-image-107909 " src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/delhi-me-janmat-sangrah-289x300.jpg" alt="delhi me janmat sangrah" width="241" height="251" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/delhi-me-janmat-sangrah-289x300.jpg 289w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/delhi-me-janmat-sangrah.jpg 303w" sizes="auto, (max-width: 241px) 100vw, 241px" /></a>ब्रिटेन में जनमत संग्रह क्या हुआ, दिल्ली के मफलरमैन को एक नया आइडिया मिल गया। अब उन्होंने भी दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए यहां भी जनमत संग्रह कराने का शिगूफा छोड़ा है। उनके इस फैसले की अब चौतरफा निन्दा हो रही है लेकिन उनका सुर नहीं बदला है। उनकी इस जिद पर भगवा पार्टी के एक नेता ने चुटकी ली कि अगर जनमत इस बात का हो कि दिल्ली की जनता ने कहीं उन्हें चुनकर कोई गलती तो नहीं कर दी। जब इसका फैसला आयेगा तो उन्हें खुद ही अहसास हो जायेगा कि वे कितने पानी में हैं। आन्दोलन करने और सरकार चलाने में बहुत अन्तर है। लेकिन मफलरमैन और उनकी टीम को इससे फर्क नहीं पड़ता कि कोई क्या कह रहा है। वे तो बस अपनी ही धुन में हैं और रह-रहकर देश के सबसे बड़े सेवक को ललकार रहे हैं। </strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>ऐसा वृक्ष तो कोई न लगाये</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/rambriksh.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft size-medium wp-image-107910" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/rambriksh-191x300.jpg" alt="rambriksh" width="191" height="300" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/rambriksh-191x300.jpg 191w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/rambriksh.jpg 398w" sizes="auto, (max-width: 191px) 100vw, 191px" /></a>पिछले दिनों यूपी की एक धार्मिक नगरी में बड़ा ही गजब हुआ। यदुवंशी भगवान माधव की जन्मभूमि में एक सरकारी बाग पर एक सिरफिरे ने जो तांडव किया उससे तो कंस भी शरमा जाये। सरकार भी ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए धरती को हरा-भरा करने का हर जतन कर रही है। वहां भी खासी हरियाली की गयी थी। लेकिन इस धरती पर जो वृक्ष दो साल पहले रोपित किया गया वह तो बजाये आक्सीजन देने के उल्टे लोगों की आक्सीजन का हरण करने लगा। सरकारी खाद और पानी क्या मिला, वृक्ष दिनों दिन बड़ा और मजबूत होता गया, उसकी शाखायें भी बहुत हो गयीं। नतीजा यह हुआ कि उसे गुमान हो गया कि उसके आगे सब बौने हैं। वह देश के प्रथम नागरिक की ही नागरिकता को चुनौती देने लगा। जिला प्रशासन ने जब-जब इस वृक्ष की जड़ों में मठ्ठा डालने की कोशिश की तो उसे उच्च पदों पर बैठे लोगों ने रोक दिया। उसके बाद जो कुछ हुआ उससे दो अफसरों की शहादत देनी पड़ी। पर सवाल अब भी अनुत्तरित राम नामी इस वृक्ष को आखिर खाद पानी सरकार का कौन कद्दावर खद्दरधारी सुलभ करा रहा था।</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>स्वामी ही सिर्फ चर्चा में</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/swami-hee-charcha-me.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignright wp-image-107912 " src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/swami-hee-charcha-me-300x291.jpg" alt="swami hee charcha me" width="249" height="242" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/swami-hee-charcha-me-300x291.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/swami-hee-charcha-me.jpg 454w" sizes="auto, (max-width: 249px) 100vw, 249px" /></a>इन दिनों चाहे देश की राजधानी हो या फिर यूपी की। चर्चा सिर्फ स्वामियों की हो रही है। दिमाग पर ज्यादा जोर मत डालिये, दरअसल यह धार्मिक लोग नहीं हैं ये सभी विशुद्ध रूप से राजनीतिज्ञ हैं। दोनों ही बयान बहादुर हैं। एक स्वामी से केन्द्र सरकार हलकान है तो दूसरे से यूपी का एक बड़ा राजनैतिक दल। दिल्ली वाले स्वामी के निशाने पर कब कौन आ जाये कोई भरोसा नहीं। लेकिन जब कभी कोई उनके निशाने पर आ जाता है तो फिर वे उसके पीछे ही पड़ जाते हैं। देश के सबसे उम्रदराज राजनैतिक दल के आलाकमान को तो उन्होंने कोर्ट तक खींचने में भी कोई कसर बाकी नहीं रख छोड़ी। उसके बाद उन्होंने देश की आर्थिक गतिविधियों को नियंत्रित करने वाले बैंक के मुखिया की ओर रुख किया तो वे भी पनाह मांग गए। बाद में उन्होंने देश के अर्थ मंत्री से ही पंगा ले लिया। वहीं लखनऊ वाले स्वामी ने अपनी ही पुरानी पार्टी की मुखिया को चुनौती दे डाली। यहां तक कह गए कि वे उनकी राजनीति खत्म कर देंगे। हालांकि उनके ही समाज में उनकी कोई खास पूछ नहीं है। लेकिन कहने में क्या हर्ज है। फिलहाल यूपी के स्वामी पैदल हैं और राजनैतिक मंच की तलाश में हाथ-पांव मार रहे हैं।</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>बुरे फंसे सुशासन बाबू</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/buru-fanse.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft size-medium wp-image-107913" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/buru-fanse-300x187.jpg" alt="buru fanse" width="300" height="187" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/buru-fanse-300x187.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/buru-fanse.jpg 471w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /></a>स्वच्छ और जवाबदेह प्रशासन, जंगलराज की मंगलराज ऐसे तमाम वादे करके फिर से सत्ता हासिल की थी सुशासन बाबू ने। लेकिन पिछले दिनों उनके राज्य के टॉपरों की जब पूरे देश में चर्चा हुई तो उन्हें कोई जवाब नहीं सूझा। वहीं कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर भी सुशासन बाबू फेल नजर आ रहे हैं। ऐसा लगता ही नहीं है कि वहीं पुराने वाले कुमार साहब हैं। पत्रकार, इंजीनियर, डाक्टर सभी हिंसा का शिकार हुए। रंगदारी से कोई भी अछूता नहीं है। हालत तो यह हो गयी है कि पुलिस के एक बड़े अधिकारी से भी बेखौफ बदमाशों ने रंगदारी मांग ली तो वहीं एक जिलाधिकारी को जान से मारने की धमकी मिली है। अब सुशासन बाबू विपक्ष के निशाने पर हैं। हर कोई उन्हें ही निशाने पर ले रहा है। उनके बचाव में उनके ही दल के लोग अन्य राज्यों में हो रही आपराधिक घटनाओं का हवाला दे रहे हैं। लेकिन दूसरों का उदाहरण देकर सुशासन बाबू बच नहीं सकते हैं। अभी तक विपक्षी उनके खिलाफ थे लेकिन अब जनता भी उनसे जवाब तलब करने लगी है। साफ है कि प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने वाले सुशासन बाबू की मुख्यमंत्री की ही कुर्सी डोल रही है।</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>भगवा दल के वामपंथी सांसद</strong></span><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/bhagawa-dal.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignright wp-image-107914 " src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/bhagawa-dal-300x296.jpg" alt="bhagawa dal" width="244" height="241" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/bhagawa-dal-300x296.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/bhagawa-dal.jpg 508w" sizes="auto, (max-width: 244px) 100vw, 244px" /></a>भगवा पार्टी में यूं तो कई और दलों के लोग भी शामिल हो गये हैं लेकिन दो साल पहले एक वामपंथी सोच वाले नेता ने जब भगवा पार्टी की ओर रुख किया था तब लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ था। हालांकि वे अपनी वामपंथी सोच के कारण विधायक रह चुके हैं लेकिन भगवा रंग में रंगते ही वे सांसद बन गए। कई कार्यक्रमों में उन्हें अतिथि के रूप में आमंत्रित भी किया जाने लगा। पिछले दिनों ऐसे ही उन्हें एक सरकारी कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था। वहां जब उन्हें सम्बोधन के लिए बुलाया गया तो वह यह भूल गए कि यह सरकारी कार्यक्रम है। शुरू हुए तो रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। ऐसा लग रहा था कि वे सरकारी कार्यक्रम में नहीं बल्कि किसी चुनावी सभा को सम्बोधित कर रहे हों। अपने भाषण में उन्होंने सूबाई सरकार की जमकर धज्जियां उड़ायीं। वहीं मंच पर एक केन्द्रीय मंत्री भी मौजूद थे। बोलते-बोलते जब उनकी आंखें उनसे मिलीं तो उन्हें यह अहसास हुआ कि वे कुछ ज्यादा ही बोल गए हैं। फिर किसी तरह उन्होंने अपने आप को सहेजा और अपनी वाणी को विराम दिया।</strong></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>परदे के पार</title>
		<link>https://dastaktimes.org/%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%a6%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b0-2/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Ranjeet Gupta]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 20 Jun 2016 05:56:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दस्तक-विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[परदे के पार]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="211" height="300" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/sushasanan-babu-211x300.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/sushasanan-babu-211x300.jpg 211w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/sushasanan-babu.jpg 371w" sizes="auto, (max-width: 211px) 100vw, 211px" />दीदी की क्रेडिबिलिटी दांव पर बात बंगाल वाली दीदी की नहीं हो रही है। उनकी तो चुनाव बाद जय-जयकार ही हो रही है। दरअसल एक दीदी यूपी में भी हैं और देश की सबसे पुरानी पार्टी से संबंध रखती हैं। उनके पिता कद्दावर नेता थे और सूबे की कमान भी उन्होेंने संभाली थी। दीदी के &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="211" height="300" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/sushasanan-babu-211x300.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/sushasanan-babu-211x300.jpg 211w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/sushasanan-babu.jpg 371w" sizes="auto, (max-width: 211px) 100vw, 211px" /><p><span style="color: #ff0000;"><strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/didi-credibiligy.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignright  wp-image-104578" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/didi-credibiligy-203x300.jpg" alt="didi credibiligy" width="178" height="263" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/didi-credibiligy-203x300.jpg 203w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/didi-credibiligy.jpg 432w" sizes="auto, (max-width: 178px) 100vw, 178px" /></a>दीदी की क्रेडिबिलिटी दांव पर</strong></span><br />
<strong>बात बंगाल वाली दीदी की नहीं हो रही है। उनकी तो चुनाव बाद जय-जयकार ही हो रही है। दरअसल एक दीदी यूपी में भी हैं और देश की सबसे पुरानी पार्टी से संबंध रखती हैं। उनके पिता कद्दावर नेता थे और सूबे की कमान भी उन्होेंने संभाली थी। दीदी के एक भइया हैं जो पड़ोसी राज्य की कमान संभाल चुके हैं। वैसे तो वे भी इसी दल में थे लेकिन उनका बीते दिनों मन बदल गया तो वे बगावती हो गए। पार्टी हाईकमान को ही चुनौती दे डाली और हालत यह कर दी कि पहाड़ की सरकार जमीन पर आ जाये लेकिन वैसा हुआ नहीं। अब दिक्कत यह है कि भइया की कर्मों की सजा कहीं दीदी का न मिले, इसे लेकर दीदी परेशान हैं। अब वे हर तरह से इस प्रयास में हैं किसी तरह उनकी ‘क्रेडिबिलिटी’ ‘पंजे’ में बनी रहे। सो पिछले दिनों उन्होंने अपनी निष्ठा को साबित करने के लिए भगवा पार्टी के एक चर्चित प्रवक्ता के खिलाफ मामला दर्ज कराया। उन्हें निशाना पर लेना तो सिर्फ बहाना था, वास्तव में वे यह संदेश देना चाह रहीं थीं कि उनके भइया जरूर भगवा पार्टी के हाथों खेल रहे हों पर वे खुद ऐसी नहीं हैं।</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/rampuri-chhaku.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft  wp-image-104579" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/rampuri-chhaku-210x300.jpg" alt="rampuri chhaku" width="157" height="224" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/rampuri-chhaku-210x300.jpg 210w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/rampuri-chhaku.jpg 398w" sizes="auto, (max-width: 157px) 100vw, 157px" /></a>फिर लहरायी रामपुरी चाकू</strong></span><br />
<strong>यूं तो वे बात-बात पर अपनी रामपुरी चाकूनुमा जुबान से हमले करते रहते हैं लेकिन इस बार तो जो कुछ हुआ वह तो रामपुरी खां साहब को कतई पसंद नहीं आया लेकिन मरता क्या न करता। फिलहाल तो उन्होंने यह कहकर अपनी भड़ास निकाली कि पार्टी का जो मालिक है, मर्जी उसकी ही चलेगी। लेकिन वे आगे भी शांत रहेंगे और कुछ नया नहीं कर गुजरेंगे, इसे लेकर संदेह है। दरअसल खां साहब और प्रोफेसर साहब के न चाहते हुए भी एक तरह से उनके खांटी दुश्मन को साइकिल पर बैठाकर राज्यसभा भेजने का फैसला हुआ। बस फिर क्या था दोनों ने ही मीटिंग से बहिर्गमन कर अपनी प्राथमिक आपत्ति दर्ज करायी। लेकिन पार्टी मुखिया ने वही किया जो उन्हें करना था। इस दौरान सूबे की सरकार की कमान संभालने वाले युवा ने भी अपने होंठ सिले रखे और कोई प्रतिक्रिया न तो मीटिंग में दी और न बाहर। साफ है कि सब कुछ ठीक नहीं है। डर यह है कि रामपुरी खां साहब अब सोते-जागते इशारों-इशारों में पार्टी पर व्यंग्यबाण चलायेंगे तो क्या होगा? ऐसे में चुनावी साल में सार्वजनिक मंचों से पार्टी की फजीहत होना तय है।</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/profesor-digree.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignright  wp-image-104580" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/profesor-digree-219x300.jpg" alt="profesor digree" width="171" height="234" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/profesor-digree-219x300.jpg 219w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/profesor-digree.jpg 462w" sizes="auto, (max-width: 171px) 100vw, 171px" /></a>प्रोफेसरों की डिग्री भी निशाने पर</strong></span><br />
<strong>पिछले दिनों देश के प्रधान सेवक की शैक्षिक योग्यता और डिग्री को लेकर मफलरमैन ने भगवा पार्टी को असहज कर दिया था। यह मामला अभी शांत नहीं हुआ है। लेकिन इस बीच यूपी के दो प्रोफेसरों की डिग्री को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। कहा जा रहा है कि प्राइमरी स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक को कभी प्रोफेसर नहीं कहा जाता। ऐसे में धरतीपुत्र के भ्राताश्री कैसे अपने नाम के आगे प्रोफेसर लगाते हैं। इनके अलावा एक और नेता हैं जो कि सूबाई सरकार में वजीर भी हैं और वह भी खुद को आईआईएम का प्रोफेसर बताते हैं। अब जानकारों का कहना है कि आईआईएम जैसे संस्थानों में वर्षों पढ़ाने के बाद ही कोई प्रोफेसर बनता है और इन्होंने तो अल्प अवधि के लिए ही वहां शिक्षण कार्य किया है। फिर यह कैसे प्रोफेसर। खबर है कि झाड़ू वाली पार्टी अब झाड़ू लेकर इन दोनों के पीछे पड़ने वाली है ताकि इनकी भी असलियत जनता के सामने लायी जा सके। इसके लिए बकायदा आरटीआई तैयार कर ली गयी है और जल्द ही इसके पीछे लोग नहा-धोकर और सफेद टोपी लगाकर पीछे पड़ने वाले हैं। इससे कुछ लोगों का ज्ञान बढ़ना तय है तो कुछ की कलई खुलना।</strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;"><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/sushasanan-babu.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft wp-image-104581 " src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/sushasanan-babu-211x300.jpg" alt="sushasanan babu" width="181" height="257" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/sushasanan-babu-211x300.jpg 211w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/sushasanan-babu.jpg 371w" sizes="auto, (max-width: 181px) 100vw, 181px" /></a>सुशासन बाबू की परेशानी</span> </strong><br />
<strong>तमाम कोशिश करने के बाद बिहारी सुशासन बाबू ने चुनावी जंग तो जीत ली लेकिन असली जंग अब सरकार चलाने के दौरान हो रही है। आयेदिन हो रही आपराधिक घटनाओं ने सूबाई सरकार की नींदें हराम कर दी हैं। तर्क यह दिया जा रहा था कि सूबे में मदिरा पर प्रतिबंध से अपराधों में कमी आयेगी लेकिन सत्तारूढ़ दल के ही जनप्रतिनिधि के यहां से जब शराब का जखीरा बरामद हुआ तो अब इसका दोष वे किसके सिर पर मढ़ सकते थे। इतना ही नहीं उनके पुत्र की कार को जब आगे जा रहे वाहन ने रास्ता नहीं दिया तो उसने गोली चलाकर जान ले ली। अभी इन्हीं झंझावतों से सरकार जूझ रही थी कि एक खबरनवीस की हत्या हो गयी। बस फिर क्या था, विपक्ष को मौका मिल गया सुशासन बाबू को घेरने का। तब उनकी ओर से गिनाये जाने लगे भगवा पार्टी के शासित राज्यों के अपराध। लेकिन यह कोई तर्क नहीं होता कि मेरी कमीज सफेद की तुम्हारी। अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब तो खुद को ही देना पड़ता है। सुशासन बाबू शराबबंदी पर तो अपनी पीठ ठोंक रहे हैं लेकिन बढ़ते अपराधों पर जब विपक्ष उनसे जवाब मांग रहा है तो उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा।</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/gale-kee-haddi.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignright  wp-image-104582" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/gale-kee-haddi-300x300.jpg" alt="gale kee haddi" width="213" height="213" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/gale-kee-haddi-300x300.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/gale-kee-haddi-150x150.jpg 150w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/gale-kee-haddi-200x200.jpg 200w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/gale-kee-haddi.jpg 387w" sizes="auto, (max-width: 213px) 100vw, 213px" /></a>गले की हड्डी बनी बगावत</strong></span><br />
<strong>सोचा था क्या और क्या हो गया। स्थिति यह हो गयी कि माया मिली न राम। दरअसल पहाड़ में जिस तरह की राजनीति पिछले दिनों हुई उसे देखते हुए यह बात बिल्कुल सटीक बैठती है। पहाड़ की सरकार पर उस समय खतरे के बादल मंडराने लगे थे जब मंत्रिमण्डल के ही कुछ सदस्यों व सत्तारूढ़ दल के चुनिंदा विधायकों ने बगावती तेवर अपना लिए। अब इस घटनाक्रम के पीछे भगवा पार्टी थी या यह विशुद्ध रूप से बागी विधायकों का अपना फैसला था, यह अभी तक तय नहीं हो पाया है। लेकिन जब बगावत हो ही गयी तो भगवा पार्टी ने बहती गंगा में हाथ धोने में कोई कोरकसर बाकी नहीं रखी। लेकिन न्याय की देवी ने यह सिद्ध कर दिया कि भगवा पार्टी का फैसला गलत था। चलिये यहां तक तो ठीक रहा लेकिन अब दिक्कत इन बागियों को ‘एडजस्टमेंट’ को लेकर थी। जो कि अब पार्टी के लिए गले की हड्डी बन चुके थे। इन्हें अपनाया जाये या फिर हवा में तैरने के लिए छोड़ दिया जाये, इसे लेकर खासी माथापच्ची भी हुई। कुछ महीनों बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में इस पूरे घटनाक्रम का क्या असर रहेगा, यह सोचकर सभी का कलेजा मुंह को था।</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/bade-waale-kabil.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft wp-image-104583 " src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/bade-waale-kabil-268x300.jpg" alt="bade waale kabil" width="220" height="246" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/bade-waale-kabil-268x300.jpg 268w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/06/bade-waale-kabil.jpg 470w" sizes="auto, (max-width: 220px) 100vw, 220px" /></a>यह तो बड़े वाले काबिल हैं</strong></span><br />
<strong>पहले एक सीएम को कथित रूप से पीएम की कुर्सी तक पहुंचाने को लेकर इनकी चर्चा हुई। कहा गया कि इनके ही मैनेजमेंट के कारण यह संभव हुआ। इसके बाद मैनेजमेंट गुरू ने दूसरे घर की ओर रुख किया और पीएम के धुर विरोधी के कैम्प में जा खड़े हुए। खैर वहां भी विधानसभा के जब चुनाव हुए तो मैनेजमेंट गुरु जिन साहब के साथ थे उन्हें ही सत्ता मिली। कहा जाने लगा कि मैनेजमेंट गुरु जिनके साथ सत्ता उनके हाथ। उनकी इस चुनाव जिताऊ योग्यता से प्रभावित होकर देश की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी ने उन्हें उप्र के लिए ‘हायर’ कर लिया। जबकि उप्र में परिस्थितियां बिल्कुल विपरीत हैं। दरअसल मैनेजमेंट गुरु ने जिस दल को ‘वेंटीलेटर’ से उठा कर दौड़ाने का ठेका लिया वह सूबे की सत्ता से पिछले दो दशक से बाहर है। इस बीच उनका एक सुझाव पंजे वाली पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को ही रास नहीं आया। दरअसल इन्होंने एक सीएम को पीएम बनाया तो दूसरे को दोबारा सीएम बनाया लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उनके अन्दर पीएम मैटीरियल है। वहीं उन्होंने जो पैदाइशी पीएम मैटीरियल है उसे सीएम के रूप में प्रेजेन्ट करने का सुझाव दे दिया। तभी तो उन्हें पार्टीजन कहने लगे कि यह तो बड़े वाले काबिल हैं।</strong></p>
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