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	<title>पुस्तक समीक्षा &#8211; Dastak Times |  दस्तक टाइम्स</title>
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	<description>By Dastak Times Hindi News Network</description>
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	<title>पुस्तक समीक्षा &#8211; Dastak Times |  दस्तक टाइम्स</title>
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		<title>चौपड़े की चुड़ैलें’</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Dastak Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Oct 2017 05:46:40 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दस्तक-विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[पुस्तक समीक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="300" height="250" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/pustak-300x250.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/pustak-300x250.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/pustak.jpg 545w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" />नई सदी के प्रारंभ के चार-पाँच वर्षों में हिन्दी कहानी एकदम से चेहरा बदल कर सामने आई। यह जो परिवर्तन दिखाई दिया, यह उन युवा कहानीकारों के कारण था, जो उस समय अपनी कहानियां लेकर सामने आए। आज लगभग पन्द्रह साल बीत जाने के बाद उन कहानीकारों में से कई हिन्दी की मुख्य धारा के &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="250" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/pustak-300x250.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/pustak-300x250.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/pustak.jpg 545w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /><figure id="attachment_188687" aria-describedby="caption-attachment-188687" style="width: 207px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/parul-singh_1.jpg"><img decoding="async" class=" wp-image-188687" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/parul-singh_1.jpg" alt="" width="207" height="239" /></a><figcaption id="caption-attachment-188687" class="wp-caption-text"><span style="color: #800000"><strong>-पारुल सिंह</strong></span></figcaption></figure>
<p><strong>नई सदी के प्रारंभ के चार-पाँच वर्षों में हिन्दी कहानी एकदम से चेहरा बदल कर सामने आई। यह जो परिवर्तन दिखाई दिया, यह उन युवा कहानीकारों के कारण था, जो उस समय अपनी कहानियां लेकर सामने आए। आज लगभग पन्द्रह साल बीत जाने के बाद उन कहानीकारों में से कई हिन्दी की मुख्य धारा के स्थापित कहानीकार हो चुके हैं। पंकज सुबीर का नाम भी उनमें से ही एक है। दो उपन्यासों ‘अकाल में उत्सव’ तथा ‘ये वो सहर तो नहीं’ के द्वारा पाठकों में अपने आप को अच्छे से स्थापित कर चुके हैं। पंकज सुबीर की कहानियों की भी ख़ूब चर्चा होती है। पंकज सुबीर का चौथा कहानी संग्रह ‘चौपड़े की चुड़ैलें’ नाम से प्रकाशित होकर आया है। यह पंकज सुबीर का चौथा कहानी संग्रह है। पंकज सुबीर की कहानियों को उनकी क़िस्सागो शैली के कारण पाठक ख़ूब पसंद करते रहे हैं। ये कहानियां लम्बी होने के बाद भी इसी शैली के चलते बिना बोझिल हुए पठनीयता को बरकरार रख पाती हैं। पंकज सुबीर ने अपनी कहानियों की एक भाषा भी विकसित की है, इस भाषा में कहावतों, श्रुतियों और लोकोक्तियों का खुलकर उपयोग वे करते हैं, कभी-कभी तो प्रयोग के रूप में कुछ अपनी कहावतें भी गढ़ते हैं। पंकज सुबीर की कहानियों की एक और विशेषता उनके विषयों का फैला हुआ संसार है। हर दूसरी कहानी पिछली कहानी से बिल्कुल अलग तरह के विषय पर होती है। कहानी संग्रह को पढ़ते समय पाठक इस विविधता का आनंद महसूस होता है। पंकज सुबीर ने हर कहानी संग्रह में एक रेंज पाठकों के सामने रखी है, फिर चाहे वो पहला कहानी संग्रह ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ हो, ‘महुआ घटवारिन’ हो, पिछला कथा संग्रह ‘कसाब.गांधी एट यरवदा.इन’ हो, या फिर ये नया कहानी संग्रह चौपड़े की चुड़ैलें हो। वैविध्य पंकज की कहानियों का सबसे सशक्त पक्ष है। </strong></p>
<p><strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/pustak.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-188688 aligncenter" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/pustak-300x250.jpg" alt="" width="564" height="470" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/pustak-300x250.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/10/pustak.jpg 545w" sizes="auto, (max-width: 564px) 100vw, 564px" /></a>‘चौपड़े की चुड़ैलें’ के नाम से प्रकाशित होकर आए इस कहानी संग्रह में पंकज सुबीर की नौ कहानियां हैं। शीर्षक कहानी पंकज सुबीर की चर्चित कहानी है जिस पर उनको हिन्दी का प्रतिष्ठित ‘राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान’ प्राप्त हुआ था। संग्रह की पहली कहानी ‘जनाब सलीम लंगड़े और श्रीमती शीला देवी की जवानी’ अपने लम्बे और उत्सुकता जगाने वाले नाम के कारण आकर्षित करती है। यह कहानी नया ज्ञानोदय में प्रकाशित होने के बाद काफी चर्चित रही थी। इस कहानी में पंकज के अंदर का क़िस्सागो फुल फॉर्म में दिखाई देता है। शीला देवी और सलीम लंगड़े के मिलने का प्रथम दृश्य किसी चित्र की तरह रचा गया है। उसमें क़िस्सागो शैली का जादू पाठक के सिर पर चढ़ जाता है। मरे हुए साँप की लक्ष्मण रेखा को पार करते जनाब सलीम लँगड़े और उसके बाद घनघोर बरसात, हिना का इत्र ये सब मिलकर पाठक को खेत में बने उस टप्पर में ही प्रत्यक्ष ले जाते हैं मानों। इसी प्रकार का एक दृश्य कहानी के अंत में रचा गया है। अंत का पूरा दृश्य बहुत कौशल से रचा गया है। वर्तमान समय के प्रतीक के रूप में एक उल्लू को पेड़ पर बैठा होना, घटना विशेष के समय उड़ जाना और घटना के तुरंत बाद वापस आकर बैठ जाना तथा आवाज बदल कर बोलना, यह सब बहुत गहरा कटाक्ष है वर्तमान राजनैतिक समय और समाज पर। इस कहानी का प्रभाव पाठक के दिमाग पर कहानी ख़त्म होने के बाद भी बना रहता है। संग्रह की दूसरी कहानी ‘अप्रैल की एक उदास रात’ बिल्कुल अलग तरह के विषय पर लिखी गई कहानी है। इस कहानी को भी इसकी भाषा ने विशिष्ट बना दिया है। नब्बे के दशक में युवा हुई पीढ़ी को यह कहानी बहुत पसंद आएगी क्योंकि इसमें सब कुछ उनके समय का है। और उस समय को उस समय के फ़िल्मी और ग़ैर फ़िल्मी गीतों के द्वारा कहानी में दर्शाया गया है। मूल कथा के अलावा भी बहुत कुछ ऐसा है जो इस कहानी को पठनीय बना देता है। विशेषकर गर्मी की दोपहरों, उदास शामों तथा सूनी रातों का जो चित्रण है वो पाठक को बाँध लेता है। पीपल के पेड़ तथा उससे गिरते हुए पत्तों का रूपक प्रयोग में लाकर लेखक ने कहानी की मुख्य पात्र जो एक स्त्री है, का जीवन बहुत बारीकी से प्रतिबिम्बित किया है। कहानी सीधे-सीधे एक प्रतिशोध कथा है लेकिन लेखक ने उसमें रेशमी भाषा का प्रयोग करके उसे उदास प्रेम कथा में परिवर्तित कर दिया है। कहानी के संवादों में गहरी और ठहरी हुई ख़ामोशी पाठक को महसूस होती है। कहानी का अंत एकदम से चौंकाता है। अंत जिस प्रकार से होता है वह पाठक की कल्पना से परे होता है। एक गहरे रहस्य को परत दर परत उघाड़ती यह कहानी पाठक को अंत में स्तब्ध छोड़ कर समाप्त हो जाती है।</strong></p>
<p><strong>तीसरी कहानी ‘सुबह अब होती है&#8230; अब होती है&#8230; अब होती है&#8230;’ एक अपराध कथा है। हंस के रहस्य-रोमांच विशेषांक में प्रकाशित अपराध कथा। लेकिन लेखक ने इसे केवल अपराध कथा बनने से अपनी सजगता के चलते बचा लिया है। यह कहानी अपराध कथा होने के बजाय स्त्री के संघर्ष की कहानी बन जाती है। लेखक ने कहानी की मुख्य स्त्री पात्र के द्वारा संवादों के माध्यम से कई मुद्दों को, कई विमर्शों को स्वर दिया है। एकाकी जीवन जी रही वृद्ध स्त्री के उदास जीवन को लेखक ने कुशलता के साथ चित्रित किया है। कहानी पढ़ते समय पाठक उस स्त्री के साथ संवेदना के धरातल पर जुड़ जाता है। इस प्रकार कि अंत में जो कुछ होता है, उसे भी पाठक क्षमा कर देता है। कहानी अपने संवादों के चलते प्रभाव उत्पन्न करती है। उम्र के दो अलग-अलग पड़ावों पर खड़े दो व्यक्तियों के बीच के संवाद, उनके द्वंद्व और उनकी असहमतियां इस कहानी को विशिष्ट बना देती हैं। और उन सबसे ऊपर वह रहस्य जो कहानी के सबसे अंत में जाकर खुलता है, उसके खोले जाने का अंदाज़ कहानी के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है। हिन्दी में इस प्रकार की कहानियां लिखने का चलन नहीं है, यह कहानी पाठक हेतु है। </strong><br />
<strong>संग्रह की चौथी कहानी शीर्षक कहानी ‘चौपड़े की चुड़ैलें’ है। इस कहानी पर लेखक को राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान प्राप्त हुआ था। यह कहानी संग्रह की सबसे सशक्त कहानी भी है। इंटरनेट तथा मोाबइल के माध्यम से युवाओं के जीवन में घोली जा रही गंदगी की चिंता इस पूरी कहानी में है। लेकिन उसको लेकर लेखक ने जो कथा रची है वह भी कम दिलचस्प नहीं है। कहानी का पहला हिस्सा किसी फ़िल्म की तरह गुज़रता है। एक टूटी हुई खंडहरनुमा हवेली, उसके पीछे आमों का वीरान बाग, बाग में एक चौकोर बावड़ी, जिसे चौपड़ा भी कहते हैं और उसमें आवारा पत्तों की तरह बिखरे जवान होते लड़के, जो अपने सवालों के उत्तर तलाश रहे हैं। </strong></p>
<p><strong>कहानी के हिस्से में रात के अँधेरे में दिखाई देने वाली चुड़ैलों का रूपक बहुत ख़ूबसूरती के साथ गढ़ा गया है। कहानी दूसरे हिस्से में चुड़ैलें आमों के बाग से निकल कर लड़कों के साथ हवेली के अंदर पहुंच जाती है और फिर बिल्कुल नए रूप में सामने आती है। पहले हिस्से की भाषा और शैली तथा दूसरे हिस्से की भाषा और शैली में बहुत अंतर दिखाई देता है। और फिर कई सारे सवालों को पीछे छोड़कर यह कहानी समाप्त हो जाती है। लम्बे समय तक याद रहने वाली कहानियों में से है यह कहानी। ‘इन दिनों पाकिस्तान में रहता हूँ’ कहानी वर्णन की शैली द्वारा रची गई कहानी है। फ्लैश बैक में जाती है फिर वापस लौटती है और फिर जाती है। इस आवागमन में दो बदले हुए समयों की कहानी पाठक को सुनाती है। बदले हुए समय, जिनके बीच में पन्द्रह-बीस सालों का अंतराल है। कहानी असल में तेजी के साथ बदलते समय और उसके साथ बदलती मानसिकता की कहानी है। पहले जो बातें आम होती थीं, अब वो सांप्रदायिक होती हैं। पिछले कुछ सालों में हमारे समाज में सांप्रदायिकता की जड़ों ने जो पैर पसारा है, यह कहानी उसके बारे में बात करती है। बताती है कि पूर्व में क्या था और अब क्या हो गया है। कहानी का शीर्षक पढ़कर जो भ्रम पाठक के मन में पैदा होता है, वो कहानी को पढ़ कर दूर हो जाता है। कहानी को भावनात्मक स्तर पर जाकर गढ़ा गया है, इसलिए कहीं-कहीं पर ये कहानी पाठक को बेचैन कर देती है। कहानी के मुख्य पात्र भाषा की छटपटाहट, उसकी बेचैनी को पाठक अपने अंदर महसूस करने लगता है। </strong></p>
<p><strong>कहानी संग्रह की अगली कहानी ‘रेपिश्क़’ कुछ असहज करने वाली कहानी है। असल में इस कहानी के साथ सहमत होने में पाठक को कुछ समय लग सकता है। हो सकता है कि कुछ पाठक इसके साथ सहमत हो भी न पाएं। कहानी का शीर्षक जिस प्रकार का विरोधाभास उत्पन्न करता है, कहानी भी उसको साथ लेकर चलती है। कहानी बहुत संवेदनशील विषय पर लिख गई है। उसका एक दूसरा पक्ष यह कहानी उजागर करती है। यह दूसरा सच गले उतरने वाला नहीं है। कहानी के फार्मेट पर यह कहानी बिल्कुल कसी हुई कहानी है लकिन विषय के स्तर पर कुछ परेशान करती है पाठक को। इसी प्रकार एक कहानी है धकीकभोमेग, यह कहानी संग्रह की छोटी कहानियों में है। कहानी बाबाओं की दुनिया में झांकती है और वहाँ के कड़वे सच को पाठक के सामने लाती है। कहानी जिस नैरेटर के माध्यम से कही जा रही है, उसकी अपनी कहानी और अपना फ्लैश बैक कहानी के साथ आकर गूंथता है और इस विचित्र सा शब्द धकीकभोमेग जन्म लेता है। फ्लैश बैक में मंदिर में खड़े हुए कहानी के नैरेटर के कुछ दिलचस्प दृश्यों को लेखक ने रच कर कहानी की पठनीयता को बनाए रखा है। मगर फिर भी लेखक की अन्य कहानियों की तुलना में यह कहानी कहीं-कहीं कुछ सपाट हो जाती है। किस्सागोई भी कम है इस कहानी में, जबकि कहानी को नैरेशन के अंदाज में ही लिखा गया है। </strong></p>
<p><strong>‘औरतों की दुनिया’ और ‘चाबी’ यह अंत की दो कहानियाँ हैं। दोनों ही कहानियां एक अलग तरह के पाठक वर्ग के लिए हैं। ‘औरतों की दुनिया’ में चाची और भतीजे के संबंधों के माध्यम से लेखक ने स्मृतियों में बसे हुए बचपन का चित्र खींचा है। कहानी बताती है कि संवादहीनता कई सारी समस्याओं की जड़ होती है। संवादहीनता को समाप्त कर दिया जाए तो संबंधों में जमी बर्फ को पिघलने में देर नहीं लगती। ‘चाबी’ कहानी पाठक को प्रारंभ होते ही उलझा लेती है। उलझन उन घटनाओं की जो एक के बाद एक हो रही हैं। पाठक इस बीच में कई बातें सोचता है, कई तरह से सोचता है, और अंत सब सोचे हुए से एकदम अलग निकल कर आता है। चौंका देना लेखक को बहुत पसंद है शायद। पंकज सुबीर का यह कहानी संग्रह उनके पिछले तीन कहानी संग्रहों की ही तरह पठनीय है। और विषय वैविध्यता से भरपूर है। इस संग्रह को पढ़ते समय पाठक को कहीं भी एकरसता महसूस नहीं होती है। पंकज सुबीर की कहानियाँ लम्बी होती हैं, इसी कारण इस कहानी संग्रह में केवल नौ ही कहानियाँ हैं। उनमें से भी प्रारंभ की पांच कहानियां बहुत लम्बी हैं, लम्बी कहानियाँ लिखने के अपने ख़तरे हैं और लेखक ने उन खतरों को उठाते हुए ये कहानियाँ लिखी है। पंकज सुबीर की पिछली कृति उपन्यास ‘अकाल में उत्सव’ था, जो बहुत चर्चित तथा सफल रहा था, ऐसे में पंकज सुबीर ने बहुत सावधानी से अपनी कहानियों का चयन करते हुए अगली कृति को पाठकों के सामने रखा है। सफलता के बाद सबसे मुश्किल होता है उसे दोहरा पाना। कहानी संग्रह की कहानियां इस दोहराए जाने का आश्वासन देती प्रतीत होती हैं। </strong></p>
<p><strong><span style="color: #800000">समीक्षक :</span> पारुल सिंह</strong><br />
<strong>डब्ल्यू-903, अमरपाली, सेक्टर-120, नोएडा, उत्तर प्रदेश 201301</strong><br />
<strong><span style="color: #800000">प्रकाशन :</span> शिवना प्रकाशन, सम्राट कॉम्प्लैक्स बेसमेंट, बस स्टैंड के सामने, सीहोर, मप्र, 466001, दूरभाष : 07562405545</strong><br />
<strong>वर्ष : 2017, मूल्य : 250 रुपये, पृष्ठ : 176</strong></p>
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		<title>पाठकों को बाँधने की ग़ज़ब की टेक्नीक का इस्तेमाल किया है डॉ. मुकेश कुमार ने</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Dastak Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 20 Sep 2017 06:45:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[पुस्तक समीक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="217" height="300" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/FAKE-ENCOUNTER-COVER-217x300.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/FAKE-ENCOUNTER-COVER-217x300.jpg 217w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/FAKE-ENCOUNTER-COVER.jpg 500w" sizes="auto, (max-width: 217px) 100vw, 217px" />पुस्तक समीक्षा- फ़ेक एनकाउंटर  लेखकः  डॉ. मुकेश कुमार प्रकाशकः  शिवना प्रकाशक, सम्राट कॉम्पलेक्स बेसमेंट, बस स्टैंड, सीहोर (म. प्र.) पृष्ठ संख्याः 312 मूल्यः 300 रु. साहित्य गंभीर होता है। शायद यही वजह है कि साहित्य के पाठक कम होते हैं। पत्रकारिता की शैली में पठनीयता होती है क्योंकि यह समाज-देश की घटनाओं पर तथ्यात्मक तौर &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="217" height="300" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/FAKE-ENCOUNTER-COVER-217x300.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/FAKE-ENCOUNTER-COVER-217x300.jpg 217w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/FAKE-ENCOUNTER-COVER.jpg 500w" sizes="auto, (max-width: 217px) 100vw, 217px" /><h4><strong>पुस्तक समीक्षा- फ़ेक एनकाउंटर </strong><br />
<strong>लेखकः  डॉ. मुकेश कुमार</strong><br />
<strong>प्रकाशकः  शिवना प्रकाशक, सम्राट कॉम्पलेक्स बेसमेंट, बस स्टैंड, सीहोर (म. प्र.)</strong><br />
<strong>पृष्ठ संख्याः 312</strong><br />
<strong>मूल्यः 300 रु.</strong></h4>
<figure id="attachment_182160" aria-describedby="caption-attachment-182160" style="width: 148px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/SHASHI-KUMAR-PANDEY-SAMIKSHAK-FAKE-ENCOUNTER.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-182160" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/SHASHI-KUMAR-PANDEY-SAMIKSHAK-FAKE-ENCOUNTER.jpg" alt="" width="148" height="191" /></a><figcaption id="caption-attachment-182160" class="wp-caption-text"><strong>(शशि कुमार पांडेय)</strong></figcaption></figure>
<figure id="attachment_182161" aria-describedby="caption-attachment-182161" style="width: 149px" class="wp-caption alignright"><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/MUKESH-KUMAR-WRITER-FAKE-ENCOUNTER.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-182161" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/MUKESH-KUMAR-WRITER-FAKE-ENCOUNTER-217x300.jpg" alt="" width="149" height="206" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/MUKESH-KUMAR-WRITER-FAKE-ENCOUNTER-217x300.jpg 217w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/MUKESH-KUMAR-WRITER-FAKE-ENCOUNTER.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 149px) 100vw, 149px" /></a><figcaption id="caption-attachment-182161" class="wp-caption-text"><strong>डॉ. मुकेश कुमार</strong></figcaption></figure>
<p><strong>साहित्य गंभीर होता है। शायद यही वजह है कि साहित्य के पाठक कम होते हैं। पत्रकारिता की शैली में पठनीयता होती है क्योंकि यह समाज-देश की घटनाओं पर तथ्यात्मक तौर पर आधारित होती है लेकिन इसमें तात्कालिकता अधिक होती है। क्या साहित्य में पत्रकारिता की तरह  पठनीयता संभव है ?  जी हाँ, ऐसा संभव है। जाने-माने टीवी पत्रकार डॉ. मुकेश कुमार ने अपनी पुस्तक फ़ेक एनकाउंटर के माध्यम से एक नया प्रयोग किया है जिसमें साहित्यिक व्यंग्य को पत्रकारिता की शैली में प्रस्तुत किया गया है और इन्हें पत्रकारीय व्यंग्य कहना उचित होगा। साहित्य में इसे एक नई शैली का समावेश माना जाना चाहिए। इस शैली की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि पुस्तक की पठनीयता पूरी तरह बरकरार है। दावे के साथ कहा जा सकता है कि यदि कोई पाठक पुस्तक पलटते हुए भी इसका एक या आधा पेज पढ़ लेगा तो वह पूरी पुस्तक पढ़े बिना नहीं रह सकता। पाठकों को बाँधने की ग़ज़ब की टेक्नीक का इस्तेमाल किया है डॉ. मुकेश कुमार ने। </strong><strong>पुस्तक पठनीय होनी चाहिए, लेखक के मन में यह बात रही है। अपने ‘लेखकीय’ में पुस्तक के बारे में बात करते हुए वे कहते भी हैं- &#8216;सीधे-सीधे कुछ लिखना न तो पठनीय होता और न ही उसमें उतना कुछ कहा जा सकता था। इसलिए काल्पनिक एवं व्यंग्यात्म इंटरव्यू का सहारा लिया।&#8217;</strong><br />
<strong>पुस्तक में समाहित जितने भी इंटरव्यू हैं, वे पूरी तरह काल्पनिक हैं। मूल चरित्र से बात करते हुए उनके मुँह से वही बातें कहलवाई गई हैं जो उनके मन में हो सकती हैं। ये इंटरव्यू अलग तरह के हैं यानी जन-सम्पर्क टाइप के नहीं हैं बल्कि पोल-पट्टी खोलने वाले हैं। ये पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे हैं तथा पाठकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलती रही जिसकी बदौलत लेखक ने इतने फ़ेक इंटरव्यू किए। इसके साथ ही कई लोगों की नाराजगी भी झेलनी पड़ी, जैसा कि लेखक ने ‘लेखकीय’ में बताया है। अब ये सारे इंटरव्यू जिनकी संख्या 67 हैं, एक साथ पुस्तक के रूप में छपे हैं तो इसके लिए निस्संदेह डॉ. मुकेश कुमार को पत्रकारीय व्यंग्य शुरू करने का श्रेय मिलेगा। पत्रकारीय शैली में लिखे गए ये व्यंग्य इतने धारदार हैं कि कुछ लोग अदालत का दरवाजा भी खटखटा सकते हैं। इसके लिए लेखक को तैयार रहना पड़ेगा। यह इस पुस्तक का साइड इफेक्ट हो सकता है।</strong><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/FAKE-ENCOUNTER-COVER.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-182162 aligncenter" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/FAKE-ENCOUNTER-COVER-217x300.jpg" alt="" width="333" height="460" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/FAKE-ENCOUNTER-COVER-217x300.jpg 217w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/FAKE-ENCOUNTER-COVER.jpg 500w" sizes="auto, (max-width: 333px) 100vw, 333px" /></a>लेखक ने पुस्तक में सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक समेत तमाम तरह की विडम्बनाओं पर करारा प्रहार किया है। इसके लिए उन्होंने हर क्षेत्र के चरित्रों का सहारा लिया है। यही वज़ह है कि इनके इंटरव्यू में नरेंद्र मोदी, सोनिया गाँधी, लालू यादव, दिग्विजय सिंह, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव, शिवराजसिंह चौहान, शत्रुघ्न सिन्हा, अरविंद केजरीवाल जैसै नाम हैं तो अमिताभ बच्चन, अनुष्का शर्मा, गुलाम अली, अदनान सामी के भी नाम हैं। इतना ही नहीं लेखक ने बराक ओबामा, नवाज शरीफ, मुशर्रफ, साक्षी महाराज, विराट कोहली जैसे चरित्रों को भी चुना है। कहने का तात्पर्य है कि हर क्षेत्र के चरित्र और वहाँ मौजूद समस्याओं पर फ़ेक एनकाउंटर का अटैक साफ दिखाई देता है। </strong><strong>पूरी पुस्तक पढ़ने के बाद एक बात साफ हो जाती है कि लेखक समाज, देश तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्याप्त समस्याओं का पूरी तरह सफाया चाहता है। उनके मन में एक टीस है, पीड़ा है, एक बेचैनी है जो पर इंटरव्यू में उजागर होती है। लेखक अपनी बात यानी लोगों की समस्याओं को हर व्यक्ति तक पहुँचाना चाहते हैं, इसके साथ ही, वह लोगों को जागरूक भी करना चाहते हैं। इसी बात को ध्यान रखते हुए वे साधारण शब्दों में असाधारण बात कहते हैं जो पाठक के साथ ही पूरी व्यवस्था को झकझोरती है। </strong><strong>इंटरव्यू के शीर्षक इतने तीखे और व्यंग्यात्मक हैं कि वे प्रहार करते हुए पूरी बात कह देते हैं, जैसे- मैं तो तिहाड़ में ही मज़े में हूँ- सहाराश्री, हम तो कहेंगे वंशवाद जिंदाबादः लालू, इश्क ने हमको निकम्मा कर दियाः कोहली, इंडिया मेरे लिए घर नहीं मार्केट हैः पिच्चई, गुजरात मॉडल नहीं अडानी मॉडल बोलिएः हार्दिक पटेल।</strong><br />
<strong>डॉ. मुकेश कुमार व्यंग्य करने में बड़े माहिर हैं। वे कब, कहाँ, कैसे व्यंग्य कर देंगे किसी को नहीं पता। अरुण जेटली के साथ फ़ेक एनकाउंटर में कहते हैं- ‘उनको तमाम बड़े रोग हैं जो किसी बड़े आदमी को होने चाहिए। मधुमेह और हृदय रोग ने तो उन्हें उसी तरह जकड़ रखा था जैसे कि बीजेपी को मोदीमेनिया ने और काँग्रेस को राहुलफोबिया ने।’</strong><br />
<strong>पुस्तक की भूमिका ‘नवभारत टाइम्स.कॉम’ के सम्पादक नीरेंद्र नागर ने लिखी है। डॉ. मुकेश के व्यंग्य पर उन्होंने बहुत सटीक टिप्पणी की है- ‘मुकेश के फ़ेक इंटरव्यू में ख़ासियत यह है कि उनमें गहरा होमवर्क किया हुआ दिखता है। यह सच है कि ये इंटरव्यू समय और विषयविशेष पर लिखे गए हैं लेकिन सवाल-जवाब केवल उस समय और उस विषयविशेष पर सीमित नहीं रहते। यदि जवाब में कोई प्रतिप्रश्न निकल रहा है जो पाँच साल पहले की किसी घटना से जुड़ा हो तो वह भी पूछा जाता है।‘ </strong><strong>भाषाय़ी विविधता का निर्वाह लेखक ने पुस्तक में बखूबी किया है। जिस प्रांत, क्षेत्र के चरित्रों को लिया गया है, जवाब में वहाँ की भाषा साफ दिखाई देती है। ममता बैनर्जी बांग्ला मिश्रित हिन्दी मे जवाब देती हैं- ‘गोस्सा क्यों नहीं आएगा? पूरी जवानी बोरबाद करके हम पावर में आया। सोचा बंगाल के लिए कुछ कोरेगा, मगर सब लोग मेरे पीछे लग गया है।‘ जसोदा बेन अपनी बात गुजराती में बताती हैं तो लालू यादव ठेठ भोजपुरी मिश्रित हिन्दी में कहते हैं- ‘बिहार चलाने का मैनडेट मिला है त हम बिहार चलाएंगे न भाई।’ </strong><strong>पुस्तक की भाषा सरल तथा साफ-सुथरी है। कहीं भी कठिन शब्द संप्रेषणीयता में बाधक नहीं बनते। वाक्य छोटे-छोटे हैं। लेखक का भाषा पर पूरा अधिकार है। उन्होंने भाषा को भावों के अनुसार बहुत ही चतुराई से प्रयोग किया है। पूरी पुस्तक में भाषा भावों को लेकर बेरोक-टोक तीर की तरह चलती है जो पाठक को अपनी तरफ आकर्षित करती है। पुस्तक की छपाई भी अच्छी तथा आकर्षक है। आकार, प्रिंटिंग, पेपर की दृष्टि से पुस्तक का लुक बहुत अच्छा दिख रहा है। आशा की जाती है कि पुस्तक पाठकों को भाएगी, पसंद आएगी लेकिन उन चरित्रों के दिलो-दिमाग को कचोटेगी जिनके माध्यम फ़ेक एनकाउंटर की बातें कहलवाई गई हैं। पुस्तक की गुणवत्ता तथा पृष्ठों के हिसाब से पुस्तक की कीमत अधिक नहीं है। </strong></p>
<h4><strong>-शशि कुमार पांडेय, सी 7/169 यमुना विहार, दिल्ली, मो. 9716204602</strong></h4>
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		<title>अंत: तक झकझोरती ही नहीं बल्कि सोचने पर विवश करती हैं कहानियां</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Dastak Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 18 Sep 2017 09:29:40 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दस्तक-विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[पुस्तक समीक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="300" height="231" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/ajeeb-ladaki-300x231.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/ajeeb-ladaki-300x231.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/ajeeb-ladaki-90x68.jpg 90w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/ajeeb-ladaki.jpg 472w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" />परितोष कुमार &#8216;पीयूष&#8217; वो अजीब लड़की&#8217; (कहानी संग्रह) प्रियंका ओम की पहली पुस्तक है। कुंठित मानसिकता के सारे ठिकानों पर धावा बोलती हुई, तमाम पोषित सामाजिक वर्जनाओं को खंडित करती यह संग्रह पाठकों के बीच अपनी ठोस जमीन तैयार कर चुकी है। फिलवक्त तंजानिया (अफ्रीका) में रह रहीं प्रियंका ओम अंग्रेजी साहित्य में स्नातक फिर &#8216;सेल्स &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="231" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/ajeeb-ladaki-300x231.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/ajeeb-ladaki-300x231.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/ajeeb-ladaki-90x68.jpg 90w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/ajeeb-ladaki.jpg 472w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /><h3><strong>परितोष कुमार &#8216;पीयूष&#8217;</strong></h3>
<p><strong>वो अजीब लड़की&#8217; (कहानी संग्रह) प्रियंका ओम की पहली पुस्तक है। कुंठित मानसिकता के सारे ठिकानों पर धावा बोलती हुई, तमाम पोषित सामाजिक वर्जनाओं को खंडित करती यह संग्रह पाठकों के बीच अपनी ठोस जमीन तैयार कर चुकी है। </strong><strong>फिलवक्त तंजानिया (अफ्रीका) में रह रहीं प्रियंका ओम अंग्रेजी साहित्य में स्नातक फिर &#8216;सेल्स एण्ड मार्केटिंग&#8217; में एमबीए तक पढ़ी, बिहार(भारत) की मूल निवासी हैं। क्षणिक मुलाकात भर में अपने व्यक्तित्व वा खुले विचारों की लोगों पर अमिट छाप छोड़ने वाली यह युवा लेखिका बेहद संवेदनशील, शालीन, सामाजिक और आज के समय की एक स्पष्टतावादी जागरूक महिला है। अपने आस-पास में चल रहे हर सूक्ष्म से सूक्ष्म घटनाक्रमों पर उनकी पैनी नजर होती है। </strong><br />
<strong>प्रियंका ओम उन मुठ्ठी भर कथाकारों में से है जो &#8216;सच को सच&#8217; और &#8216;झूठ को झूठ&#8217; कहने का हौसला बुलंदी के साथ रखते हैं। और यही वजह है की उनकी तमाम कहानियों में थोपे हुए कथ्य और जबरन घसीटाते पात्रों की झलक लेशमात्र भी नहीं मिलती। उनकी कहानियाँ परिवार, रिश्ते, परिवेश, सोशल मीडिया, गाँव, शहर, बाज़ार से गुजरते हुए वर्तमान समय तथा उनमें व्याप्त विडंबनाओं के साथ स्त्री-पुरुष के बीच संबंधों की बारीकियों का गहन पड़ताल करती है। </strong><br />
<strong>इस संग्रह में कुल चौदह कहानियां हैं, सभी कहानियां उतनी ही अलहदा और अपनी सी कहानी लगती है, जो पाठक को अंत: तक झकझोरती ही नहीं बल्कि सोचने पर विवश करती हैं। और यही एक रचनाकार की वास्तविक सफलता भी है कि सायास ही पाठकों का रचनाओं से जुड़ाव हो जाना, पाठकों को ऐसा प्रतीत होने लगना कि अरे यह घटना तो हमारे पास की है, घटने का शिकार तो हमारा परिवार भी रहा है, कहानियों में पाठक को लगे वही पात्र है उसकी ही कहानी है।</strong><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/ajeeb-ladaki.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-181831 aligncenter" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/ajeeb-ladaki-300x231.jpg" alt="" width="543" height="418" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/ajeeb-ladaki-300x231.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/ajeeb-ladaki-90x68.jpg 90w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/09/ajeeb-ladaki.jpg 472w" sizes="auto, (max-width: 543px) 100vw, 543px" /></a>बहरहाल, संग्रह की पहली कहानी &#8216;सौतेलापन&#8217; एक जीवंत सी कहानी प्रतीत होती है। हाँ, वही सौतेलापन जिसकी भयावह त्रासदी से आज भी हमारा सभ्य मानव समाज पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है, आज भी समाज के कई परिवारों में माता-पिता के मन में व्याप्त है, और मासूम, निश्छल वा अबोध बच्चे इसका शिकार होते जा रहें हैं। यहाँ सोचने पर हम विवश हैं! कि आखिर ऐसा क्या है जो एक ही गर्भ में नौ महीने तक पले बच्चों में से किसे एक से ज्यादा प्यार, ज्यादा ममत्व और अपने ही दूसरे बच्चे से कम क्यों? हम अकसर अपने समाज में देखते आयें हैं एक परिवार में अगर तीन चार या दो बच्चे हैं तो उनमें से एक से ज्यादा प्यार किया जाता है, दूसरे से कम! दोनों तो या सभी आपके ही बच्चे हैं तो फिर ऐसा सौतेलापन क्यों? एक के हिस्से में दूध और दूसरे के हिस्से में पानी क्यों? इन्हीं तमाम उलझे हुए सवालों के जवाब तलाशती हुई लेखिका &#8216;सौतेलापन&#8217; शीर्षक कहानी की जीवंत रचना कर बैठती है, जो हमें अपने ही तथाकथित विकसित समाज के एक विद्रुप सच को इस कहानी के माध्यम से परत दर परत उकेर कर हमारे सामने रखती है। लेखिका कितनी डूब कर कहानी के बरक्स सौतेलेपन की विद्रुपताओं से आत्मसात कराकर और इस कुकृत्य के दुष्प्रभावों से पाठकों को सतर्क करना चाहती है, इस कहानी के अंश में हम साफ साफ महसूस कर सकते हैं-</strong><br />
<strong>&#8221; सौतेलापन नाम की बिमारी चुपचाप नहीं आती। इसके लक्षण शुरुआती दिनों में ही दिखने लगते हैं। न ही ये एड्स की तरह होती है। जी इसमें शरीर के अंत का खतरा नहीं होता, बल्कि आत्मा मर जाती है!&#8221;(पृष्ठ सं.13/सौतेलापन)</strong><br />
<strong>संग्रह में आगे बढ़ते हैं- लावारिस लाश, मृगमरीचिका, वो अजीब लड़की, लालबाबू, ईमोशन एक से बढ़कर एक कहानियाँ हैं। यहाँ यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि प्रियंका ओम की बोल्ड कहानियों में सहादत हसन मण्टो, इश्मत चुगताई से लेकर समकालीन कथाकार सूरज प्रकाश तक के कहानियों की झलक कहीं न कहीं मिलती है।</strong><br />
<strong>इनकी कहानियों में भाषा पक्ष में कसावट के साथ-साथ पात्रों के बीच वार्तालाप का तरीका अद्भुत है जो इनकी लेखनी को पूर्व से चली आ रही या ढोये जा रहे शिल्प से पृथक कर एक अलग पहचान देती है।</strong><br />
<strong>लावारिस लाश एक ऐसी लड़की की कहानी है जिसका जन्म कुँवारी माँ के गर्भ से होता है और उसे जन्मने के बाद ऑरफेन्ज के दरवाजे पर छोड़ दिया जाता है। और एक वार्डन की देखरेख में वह बड़ी होती है, इस रिश्ते को बड़ी गंभीरता के साथ इस कहानी में लेखिका ने पिरोया है। ऑरफेन के बाद का सफर भी पढ़ना काफी दिलचस्प है जहाँ कदम कदम पुरुषों की मानसिकता, यौन लौलुपता और कुंठा पर जबरदस्त प्रहार करती हुई लेखिका समय के यथार्थ को बड़ी बेबाकी से सामने लाती है।इस कहानी के कुछ अंश से गुजरते हैं-</strong><br />
<strong>&#8220;पिछड़े हुए पुरुष शरीर और पहनने वाले कपड़े में फर्क नहीं समझते। जब तक नयी रहती है उसके कलफ लगे सम्मोहन में होते हैं&#8230;।&#8221; (पृष्ठ सं-30/लावारिस लाश)</strong><br />
<strong>&#8220;औरत की सबसे बड़ी क्वालिफिकेशन उसका शरीर है। प्रिंटेड वाली डिग्रियां सिर्फ कागज का टुकड़ा होती हैं, जो फ़ाइल की खूबसूरती के लिए होती हैं, जिसे खूबसूरत लड़कियां अपने सीने से लगाकर वॉक इन इन्टरव्यू के लिए तैयार रहती हैं। इन्टरव्यूअर के सामने जब वो फ़ाइल सीने से हटाकर सामने टेबुल पर रखती है तो उसकी फाइल से पहले उसके सीने की उभार का मुआइना होता है&#8230;।&#8221; (पृष्ठ सं- 31/लावारिस लाश)</strong><br />
<strong>पुरुषों के धोखे, प्रेम के झाँसे देकर इजाजत से यौन सुख प्राप्त करना आज भी हमारे समाज में किस तरह बदस्तूर जारी है, अपने ही प्रेमी द्वारा उसे इस बात पर रिजेक्ट कर दिया जाता है कि वह ऑर्फेन है, उसकी कोई जाति नहीं कोई धर्म नहीं। अपने रिजेक्शन पर वह कहती है- &#8220;सोते वक्त तो धर्म नहीं पूछा था तुमने?&#8221;</strong><br />
<strong>&#8220;शारीरिक संबंध बनाना और बात है और पारिवारिक सम्बंध बनाना अलग बात है&#8221;,</strong><br />
<strong>लड़के ने यह कहकर बात साफ कर दी थी।(पृष्ठ सं- 36/लावारिस लाश)</strong><br />
<strong>&#8216;फिरंगन से मोहब्बत&#8217; एक स्पेनिश लड़की &#8216;डल्स&#8217; और एक भारतीय लड़के के बीच की एक संस्मरणात्मक कहानी है, जिनकी दोस्ती फेसबुक के जरिये होती है। डल्स कुछ दिनों के लिए भारत भ्रमण पर आती है वहीं वह भारतीय लड़का डल्स की गाइड बनकर साथ रहता है। दो अलग-अलग भाषा, संस्कृति और देश के हैं वो दोनों, उनके बीच के बेतकल्लुफी, संबंध और संवेदनाओं का खुला जिक्र इस कहानी में है।</strong><br />
<strong>&#8220;कई बार उसके पारदर्शी कपड़ों से झांकते उसके अंत: वस्त्र मेरे अंदर के पुरुष को झकझोर कर रख देते हैं। लेकिन मैं मर्द और जानवर के बीच के फर्क को नहीं मिटाना चाहता।&#8221; (पृष्ठ सं- 66/फिरंगन से मोहब्बत)</strong><br />
<strong>&#8220;रात की चाँदनी में चमकती हुई सफ़ेद रेत पर उसका चमकीला शरीर मेरे ऊपर था&#8230;.हमारे हाथ एक दूसरे के शरीर के सारे रहस्य को बेपर्दा कर रहे थे। मैं&#8230;..पहनने ही वाला था कि उसने कहा &#8216;मैं प्रस्टीच्यूट हूँ&#8217;।&#8221; (पृष्ठ सं- 69/फिरंगन से मोहब्बत)</strong><br />
<strong>&#8216;लालबाबू&#8217; ढ़ेर सारे सदस्यों से भरे एक ग्रामीण परिवेश वाले परिवार की कहानी है जहां लालबाबू एवं छोटकी चाची के साथ-साथ लालबाबू एवं घर आयी नयी दुल्हन के बीच चल रहे गुप्त रिश्तों की बारीकियों एवं यौनाकर्षण को दिखाया गया है। लालबाबू को कहानी का मुख्य पात्र बनाकर उसके द्वारा एक समय, परिवेश और बड़े कुनवे में रिश्तों का गूढ़ चित्रण किया गया है।</strong><br />
<strong>&#8220;चाची कौन सी रेखा थी जो इतना बड़ा जोखिम ले लिया। लेकिन ऊ हमको अमिताभ से कम कहाँ समझती थी। &#8230;.उस दिन भी उसी ने कहा था आज रात को आ जाओ लल्ला, तुहार चच्चा तो खेत पर ही सोयेंगे फसल की रखवाली के लिए।&#8221; (पृष्ठ सं- 120/लालबाबू)</strong><br />
<strong>&#8220;मैया के साथ भंशा में ऐसी जुगत लगाई कि एक ही आँगन के दूसरे कोने में खाना पकाती अदितवा की कनियाँ को सारा दिन ताड़ते रहते।&#8221; (पृष्ठ सं- 121/लालबाबू)</strong><br />
<strong>इसी तरह आगे इमोशन भी एक स्वत: बनी कॉल गर्ल की बेहतरीन कहानी है। पूरे संग्रह में यह कहानी सबसे ज्यादा प्रभावित करती है। हमारे समाज के कई आयामों को खोलती यह कहानी पाठकों को भीतर तक झकझोर कर रख देती है।</strong><br />
<strong>&#8220;क्योंकि मुझे पूरा यकीन है एक मर्द का ईमान औरत के ब्लाउज में छिपा होता है।&#8221;</strong><br />
<strong>सभ्य आचरण के बहाने से मर्द मेरी मदद करने आते हैं और तय हो जाता है उसी वक्त, कहाँ और कितने दिन!&#8221;(पृष्ठ सं- 142/इमोशन)</strong><br />
<strong>&#8220;जब पापा काम के सिलसिले में बाहर गये थे तब पापा के बॉस घर आये थे।&#8230;डाइनिंग टेबल पर जूठे बरतन के साथ शराब के खाली ग्लास भी पड़े थे। बॉस का डिनर शूट वहीं सोफे पे पड़ा था मम्मी के बेडरूम से चूड़ी बजने की आवाज आ रही थी।</strong><br />
<strong>पापा सुबह सुबह आ गये थे&#8230;आते ही मम्मी से पूछा था &#8216;डन&#8217;?</strong><br />
<strong>मम्मी ने कहा था &#8216;डन डना डन&#8217;।&#8221; (पृष्ठ सं- 148/इमोशन)</strong><br />
<strong>हिन्दी साहित्य में &#8216;वो अजीब लड़की&#8217; प्रियंका ओम का बेशक पहला हस्तक्षेप है लेकिन उनकी कहानियों में परिपक्वता की कमी नहीं। जरूरत है तो थोड़ी और गंभीरता की, बोल्डनेस या सपाटबयानी का यह कतई मतलब नहीं की हम सारी सीमाएँ लाँघ दें। इस संग्रह की कहानियों में कहीं-कहीं पर अति बोल्डनेश के प्रयोग ने कथ्य की मारकता को निश्चित ही प्रभावित किया है। कहनी की जल्दबाजी और आतुरता भी कथ्यों की गोपनीयता के संवहन को कमजोर बनाते हैं। बहरहाल, लेखिका की यह पहली पुस्तक है, उनमें गद्य रचने की सलाहियत है, प्रचुर मात्रा में शब्द हैं, अपने शिल्प के साथ भाषा पर अच्छी पकड़ भी है। कहानियों को थोड़ा वक्त देंगी तो जल्द ही अपनी मंजिल साध लेंगी। </strong></p>
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		<title>मध्यवर्गीय जन-जीवन की करुण-गाथा ‘मझधार’</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Dastak Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 07 Jun 2017 09:49:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दस्तक-विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[पुस्तक समीक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="233" height="300" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/book-233x300.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/book-233x300.jpg 233w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/book-768x987.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/book-797x1024.jpg 797w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/book.jpg 860w" sizes="auto, (max-width: 233px) 100vw, 233px" />पुस्तक समीक्षा भारतीय समाज में अनेक विविधता व्याप्त है उन्हीं के बीच मध्यवर्गीय जन-जीवन अपने आपको साबित करने के प्रयास में खुद से ही सवाल करता हुआ कहता है- क्या किसी ने अपने जीवन में खुद को या अपनेइर्द-गिर्द रहने वालों में से किसी को पूर्ण तृप्त कर पाया है? ऐसा लगता है, हम जीने का &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="233" height="300" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/book-233x300.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/book-233x300.jpg 233w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/book-768x987.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/book-797x1024.jpg 797w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/book.jpg 860w" sizes="auto, (max-width: 233px) 100vw, 233px" /><p><strong><span style="color: #ff0000">पुस्तक समीक्षा</span></strong></p>
<figure id="attachment_162889" aria-describedby="caption-attachment-162889" style="width: 113px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/amar-bahadur.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="size-full wp-image-162889" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/amar-bahadur.jpg" alt="" width="113" height="114" /></a><figcaption id="caption-attachment-162889" class="wp-caption-text"><strong><span style="color: #800000">अमर बहादुर सिंह</span></strong></figcaption></figure>
<p><strong>भारतीय समाज में अनेक विविधता व्याप्त है उन्हीं के बीच मध्यवर्गीय जन-जीवन अपने आपको साबित करने के प्रयास में खुद से ही सवाल करता हुआ कहता है- क्या किसी ने अपने जीवन में खुद को या अपनेइर्द-गिर्द रहने वालों में से किसी को पूर्ण तृप्त कर पाया है? ऐसा लगता है, हम जीने का अभिनय कर रहे है। वह पुन: कहता है- हम एक ऐसे बिंदु पर खड़े हैं, जहां से दोनों किनारे हमारी पहुंच से बाहर हैं। बहुत हाथ-पांव मारते हैं पर फायदा कुछ नहीं होता। इस प्रकार के जीवन और उससे जुड़ी जिजीविषा को रेखांकित करता हुआ सच्चिदानंद चतुर्वेदीजी का दूसरा महत्वपूर्ण उपन्यास हमारे सम्मुख मझधार के रूप में आता है। मझधार उपन्यास की पृष्ठभूमि मध्यवर्ग की उन तमाम ऊहापोह को उद्घाटित करने में जहां निर्मोही जीवन की गति और उसमें भी कुछ न प्राप्त हो सकने की स्थिति में आपने आपको एक अजीब बाध्यता के साथ रखने में मजबूर क्यों? कि स्थिति के साथ हमारे सम्मुख मजबूती से प्रगट होने में ज्यादे कामयाब हुआ है।</strong><br />
<strong> <a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/book.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-162891 alignright" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/book-233x300.jpg" alt="" width="214" height="276" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/book-233x300.jpg 233w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/book-768x987.jpg 768w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/book-797x1024.jpg 797w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/06/book.jpg 860w" sizes="auto, (max-width: 214px) 100vw, 214px" /></a>आज का समाज अनेक चुनौतियों का एक साथ मुकाबला कर रहा है। परिवर्तन और विकास के एजेंडे पर सब कुछ बड़ी तेजी से बदल रहा इसके बावजूद उपन्यास का इस पर बहुत ज्यादा ध्यान न देकर समाज के भीतर उस आईने में झांकने का प्रयास करता है जो देखने में तो एकदम चकाचक है मगर अंदर से उतना ही विद्रूप और खोखला। मध्यवर्गीय जीवन जगत के इन्हीं विद्रूपताओं खोखलेपन के मूल कारणों की तलाश में निकला यह उपन्यास मध्यवर्गीय जीवन-धारा में निर्बाध गति से बहता हुआ अपने आपको इस धारा के बीच खड़ा करके अपने जीवन को बूँद-बूँद रिसता हुआ देखने के लिए जैसे अभिशप्त हो।</strong><br />
<strong>उपन्यास की बनावट विश्लेषण की पृष्ठभूमि के बाद अगर देखा जाय तो इस उपन्यास का कथ्य अपने आप में कोई अनोखा प्रयोग भले ही न हो लेकिन अपने विषय एवं अपने मंतव्य को अंत तक बांधे हुए आगे बढ़ने में सक्षम है। इसके पीछे दो वजह साफ देखी जा सकती है। पहला ये कि इसके पात्र अपनी-अपनी घायल जिजीविषा का परिक्रमा करते हुए, विभिन्न ऊहापोहों में फसें हैं। जिनकी पहचान कराने की जहमत लेखक को नहीं उठानी पड़ती वो स्वत: ही जाने-पहचाने लगतें, पाठकों की जिज्ञासा उनकी जिजीविषा से सीधे जुड़ते दिख जाते हैं। दूसरी वजह है भाषा का निर्वाध गति से पाठको से सीधे मुखाबित होना, जिसकी चाल कही भी अटपटी नहीं लगती बल्कि सीधे संप्रेषित होती है। अपने कथन में लोकभाषा का प्रयोग इस उपन्यास के पात्रों को उनके देश के साथ प्रस्तुत करती है। एक कुशल उपन्यासकार अपनी भाषा और उसके संप्रेषण को लेकर हमेशा सचेत रहता है। सच्चिदानंद जी की भाषा अपने कथ्य के अनुरूप अपने वाक्य का विन्यास तय करती उपन्यास के अन्तर्वस्तु को रेखांकित करती हुई चलती है।</strong><br />
<strong>उपन्यास के शुरुआत में ही हम पाते है कि एक मध्यवर्गीय परिवार के जीवन में कैसे घटनाएं शोक और सुख के बीच घटित होती हैं। इन्हीं घटनाओं से रूबरू कराते हुए उसकी मूल छटपटाहट और वेदना को इस प्रकार से प्रस्तुत उपन्यास में गुम्फित किया गया है कि जैसे वो हमारे आस-पास का ही या यूँ कहें हमारी निर्मिति का-ही समाज हो, जिसमें अनेक उतार-चढ़ाव देखने सुनने को मिलता है। भारतीय मध्यवर्ग को लेकर आजादी के पहले और आजादी के बाद कई उपन्यास रचे गए जिसमें अनेक मार्मिक प्रसगों/घटनाओं के माध्यम से सामाजिक चेतना और वर्ग विभेद को लेकर चिंता एवं विचार लेखकों द्वारा समय-समय पर प्रगट किया गया लेकिन परिवार जो एक इकाई है समाज की उसकी संरचना के बीच से गुजरते हुए ‘मझधार’ जैसे उपन्यास की निर्मिति शायद ही हुई हो, अगर कुछ लिखा गया है तो वर्तमान परिदृश्य को ध्यान में रखक रही लिखा गया है, कुछ कालजयी रचनाएं भी हैं जिन की चर्चा कही और की जाय तो बेहतर रहेगा। ‘मझधार’ जैसे उपन्यास की कथा बुनना, लेखक की लेखकीय परिपक्वता को उद्घाटित करता है।</strong><br />
<strong>एक से लेकर तैतीस उपबंधों में बंधी कथा नये-नये प्रश्न तो जरूर खड़ी करती है परन्तु इन प्रश्नों के बीच समाधान की बात न कर वह उन्हें पाठकों के विचाराधीन छोड़कर आगे बढ़ जाती है। इसमें और कहा जाय तो कथा अपने आपको सीमित दायरे से बाहर निकाल ने की पुरजोर कोशिश तो करती है लेकिन सामाजिक बेड़ियों को पूरी तरह से अतिक्रमित नहीं कर पाती और ये कहती हुई चलती है कि हम (मध्यवर्ग) कभी पूरे नहीं होते और विडम्बना यह कि अपने का आधा होना भी स्वीकार न हीं करते घर में है तो बाहर जाना चाहते हैं, बाहर हैं तो घर लौटना, और जब अंतिम बार, संयोग से, घर लौटने की बारी आती है तो जाना ही नहीं चाहते। आधे-पूरे का नाटक हम तभी तक कर पाते है, जब तक हमारी जिजीविषा हमारा साथ देती है। इन्हीं आधे-अधूरे/पूरे के बीच कथा अपने मर्म के साथ हमें अपने आपसे जोड़ते हुए आगे निकलती है। जिसमें कई हमारे जाने पहचाने पात्र सहसा हमारी आँखों के सामने दृश्यमान हो जाते है, वे हमारे ही चिर-परिचित बन बैठते है, उन्हेंअलगाना समाज को अलगाने जैसा लगने लगता है।</strong><br />
<strong>खैर, अपने आपको कई आयामों से जोड़ते हुए उपन्यासकार मध्यवर्गीय जीवन की दास्तां को उजागर करते हुए उसकी निरीहता को प्रस्तुत करने में पूरी तरह कामयाब होते हैं। प्रस्तुत उपन्यास में भाषा का प्रयोग प्रसंगानुकूल और सार्थक शब्दावली के साथ एक बड़े समाज की समझ को विकसित करने में समर्थ है, लेखक के विचार अपने पके/तपे अनुभव के साथ उपन्यास में पूरी मुश्तैदी के साथ मौजूद है जो उसके वजूद को मजबूती देता है। अमन प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक को मेरी तरफ से सफल उपन्यास मानने में कोई हिचकिचाहट नहीं है, इस प्रकार के उपन्यास आज के बदलते वैश्विक परिदृश्य एवम भारतीय समाज के लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं। </strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000">समीक्षित पुस्तक- मझधार (उपन्यास), लेखक- सच्चिदानन्द चतुर्वेदी, अमन प्रकाशन, कानपुर।</span> </strong><br />
<span style="color: #800000"><strong>(लेखक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में प्रोजेक्ट फेलो हैं।)</strong></span></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>बिना मुंडेर की छत पर जीने की उद्दाम आकांक्षा</title>
		<link>https://dastaktimes.org/%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%9b%e0%a4%a4-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Dastak Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Apr 2017 05:11:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दस्तक-विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[पुस्तक समीक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="160" height="264" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/04/bina-muder.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" />पुस्तक समीक्षा- कुमार मंगलम हिंदी का प्रकाशन जगत अब बदल रहा है ’ इन प्रकाशकों पर बेस्ट सेलर्स का इतना दबाव है कि उसके चक्कर में ये चलताऊ ढंग के पुस्तकों के प्रचार में लगे हैं ’ जब पुस्तकों की विज्ञप्ति हमें निराश करती है तो लेखक के साथ-साथ प्रकाशक की विश्वसनीयता पर संदेह होने &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="160" height="264" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/04/bina-muder.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" /><p><strong><span style="color: #ff0000">पुस्तक समीक्षा- कुमार मंगलम</span> </strong><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/04/kumar-mangalame.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft size-full wp-image-153436" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/04/kumar-mangalame.jpg" alt="" width="108" height="97" /></a>हिंदी का प्रकाशन जगत अब बदल रहा है ’ इन प्रकाशकों पर बेस्ट सेलर्स का इतना दबाव है कि उसके चक्कर में ये चलताऊ ढंग के पुस्तकों के प्रचार में लगे हैं ’ जब पुस्तकों की विज्ञप्ति हमें निराश करती है तो लेखक के साथ-साथ प्रकाशक की विश्वसनीयता पर संदेह होने लगता है ’ विश्व पुस्तक मेला 2017 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित शाजी ज़मां का उपन्यास ‘अकबर’, वाणी से प्रकाशित ‘पतनशील पत्नियों के नोट्स’ और अंतिका से प्रकाशित ‘सोनम गुप्ता बेवफा नहीं है’ किताबोंका शोर कुछ ज्यादा ही था लेकिन इन्हें पढ़ने के बाद गहरी निराशा के अलावा हाथ कुछ नहीं आता ’ जबकि इसी पुस्तक मेले में राजकमल से प्रकाशित लगभग 10-12 काव्य संग्रह पूरे समकालीन कविता परिदृश्य को बदलने का माद्दा रखती हैं ’जब इन काव्य संग्रहों से गुजरता हूँ तो राजकमल प्रकाशन अब सिर्फ प्रकाशन नहीं हिंदी साहित्य के प्रकाशकों का सिंडिकेट के विज्ञापन नीति और समझ पर रोना आता है ’ प्रकाशक यह रोना रो सकते हैं कि लोग कविताएँ नहीं पढ़ते लेकिन व्यक्तिगत अनुभवों से कह सकता हूँ कि अब भी हिंदी के गंभीर पाठक बिना हो हल्ला के चुपचाप पढ़ रहें हैं ’ इसी सिलसिले में हिंदी के बेस्ट सेलर्स प्रकाशक(हिन्द युग्म इत्यादि)जो बाज़ार के नए तरीकों से पुस्तकों का प्रचार कर रहें हैं उन पुस्तकों में लुगदी साहित्य का छौंक ही दिखता है ’ आज भी असल में हिंदी का बेस्ट सेलर ‘गुनाहों का देवता’, ‘रागदरबारी’, ‘मुझे चाँद चाहिए’, ‘कुमारजीव’, ‘साये में धूप’, वह भी कोई देश है महाराज’ आदि किताबें ही हैं ’</strong><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/04/bina-muder.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="size-full wp-image-153437 alignright" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/04/bina-muder.jpg" alt="" width="160" height="264" /></a>राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 10-12 संग्रहों में आर. चेतनक्रांति, दिनेश कुशवाहा, प्रेम रंजन अनिमेष, राकेश रंजन इत्यादि कवियों के संग्रह हैं’ यह हिंदी के नवागत कवि नहीं हैं ’ इन कवियों की कविताओं का रंग अब पक गया है’ असल में समकालीन हिंदी कविता विविधतावादी रही है, इसका कोई मूल स्वर नहीं रहा है’ अपने वैविध्यपूर्ण स्वरों से इसने कविता के रक़बे को बढ़ाया है’ इन संग्रहों में कवियों का स्वर प्रौढ़ हुआ है’ इन संग्रहों में समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य और मुहावरों को बदलने का माद्दा है ’ ऐसे में प्रेम रंजन अनिमेष का यह पाँचवा संग्रह ‘बिना मुंडेर की छत’ उल्लेखनीय है ’ प्रेम रंजन अनिमेष के इस संग्रह को पढ़ते हुए हिंदी की पारम्परिकता और इसके धरातल पर अभिव्यक्त आधुनिकता को रेखांकित किया जा सकता है’ ये कविताएँ समकालीन हिंदी कविता के पाठकों को नयी काव्यात्मक ऊर्जा, नयेपन के आस्वाद के साथ-साथ आज की कविता को दिशा प्रदान तो करती है साथ में आने वाली पीढ़ी के लिए एक चुनौती भी देती है ’ भाषा की अनूठी भंगिमा, शिल्प में लोक की जड़ों में जीवित जीने की उद्दाम आकांक्षा, रोजमर्रा के उद्दात संघर्ष और लोकभाव को फिर-फिर सिरजते हैं’ इन कविताओं के बारे में पुस्तक में सच ही लिखा गया है कि प्रेम के लिए कविताएँ‘लोक-बिम्ब-काव्य प्रविधि मात्र नहीं हैं, वे वैकल्पिक जीवन-दृष्टि के संवाहक हैं’’</strong><br />
<strong>प्रेम रंजन अनिमेष की कविताओं में कुछ ऐसी बातें हैं, जो उन्हें अपनी पीढ़ी से एकदम पृथक व्यक्तित्व प्रदान करती है ’ इनकी कविताओं में विन्यस्त उम्मीद और जिजीविषा के स्वर प्रमुख हैं ’ ‘निब’ कविता में वे लिखते हैं-&#8220;शिराओं में जब तक रक्त आँखों में नमी/रोशनाई सूखेगी नहीं/कागज कभी ख़त्म नहीं होगा/जब तक पेड़ हैं धरती पर और उनमें पत्ते ’&#8221; प्रेम रंजन अनिमेष की कविताओं में गाँव बहुत गहरे पैठा हुआ है’ उसकी स्मृतियाँ नौस्टैल्जिया नहीं हैं’ आज शहर की ओर भागती युवा पीढ़ी के लिए एक बेबस बाप की हूक है जिसे वे ‘एक किसान की शहर में रहनेवाले बेटे के लिए वसीयत’ में लिखते हैं- &#8220;पुआल का बिस्तर/छोड़ रहा हूँ तुम्हारे लिए/देह भर उसकी गरमाहट और चुनचुनी/और तलवों में/ गुदगुदी ओस की&#8230;/एकअलाव की तरह जलने की/अंतिम इच्छा/छोड़ता तुम्हारे लिए/और सवेरे के चाँद की तरह/उसकी बुझी राख में/कुछ सोंधे पके आलू/और कोई चिनगारी/प्रतीक्षा करती आँखों की कौंध सी&#8230;&#8221; हिंदी कविता में वसीयत शीर्षक से बहुत कम कविताएँ लिखी गयी हैं ’ समकालीन कविता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता है वसीयत जिसमें वे कहते हैं-&#8220;मेरी कविताएँ ही मेरी वसीयत हैं ’&#8221; लेकिन प्रेम इस कविता में आगे बढ़ जाते हैं ’ यह वसीयत एक बाप की है, जो अपने अगली पीढ़ी को अपनी परम्परा देना चाहता है ’ प्रेम अपनी कविता में अनछुए विषयों को भी उठाते हैंऔर पारंपरिक बिम्बों को भी, लेकिन उनमें उनका नयापन बोलता है ’ नए का यह आग्रह ‘भवें’ शीर्षक कविता में वे भवों पर कविता तो लिखते हैं पर उसमें समय की कैसी आलोचना करते हैं, उदाहरण द्रष्टव्यहै-&#8220;आधुनिकता की खूबी/वह अभावों को भी/संभ्रांत आदतें सौंपती&#8221;</strong><br />
<strong>‘रिक्शे पर हँसी’ शीर्षक कविता में उन्होंने स्त्री मन की संवेदना और आज की आधुनिक स्त्री का जो बिम्ब खीचा है, वो अलहदा और महत्वपूर्ण है- ‘यहहरी हँसी है हारी हुई नहीं/शायद वे एक दूसरे के प्रेम के बारे में पूछकर लगा रहीं ठहाके/प्रेम को निरीह बोलकर अदना बताकर छौना बुलाकर/किलकतीं कि आज तक प्यार को इतना प्यारा नाम किसी ने नहीं दिया&#8221;</strong><br />
<strong>अंत में इन कविताओं से गुजरते हुए यह कहा जा सकता है कि इनकी कविताओं में छंदों की वापसी हुई है ’ प्रेम की गद्य कविता भी छंदों की लय में चलती है ’प्रेम ने छंदों को बंधनों में जकड़ कर नहीं उसके उन्मुक्तता में एक नयी भंगिमा के साथ अवतरित किया है ’प्रेम रंजन अनिमेष की ये कविताएँ किसी भी उपलब्धि की तरह आपके साथ रहेंगी ’</strong><br />
<span style="color: #800000"><strong>(लेखक गुजरात केन्द्रीय विवि. </strong><strong>में शोध छात्र हैं।)</strong></span></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>जनता करती है सब हिसाब</title>
		<link>https://dastaktimes.org/%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%b8%e0%a4%ac-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%ac/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Dastak Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 03 Mar 2017 08:20:21 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दस्तक-विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[पुस्तक समीक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="258" height="300" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/jagnnath-258x300.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/jagnnath-258x300.jpg 258w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/jagnnath.jpg 481w" sizes="auto, (max-width: 258px) 100vw, 258px" />पुस्तक समीक्षा समकालीन युवा कवियों में राकेश रंजन का नाम उनके विशिष्ट काव्य-प्रयोगों के कारण भी अलग से पहचान में आ जाने वाला नाम है। उनका नया काव्य संग्रह &#8216;दिव्य कैदखाने में&#8217; उनके इसी विशिष्ट काव्य प्रयोग और स्पष्ट वर्गीय पक्षधरता को प्रमाणित करने वाला संग्रह है। इस नए काव्य संग्रह से पहले राकेश की &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="258" height="300" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/jagnnath-258x300.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/jagnnath-258x300.jpg 258w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/jagnnath.jpg 481w" sizes="auto, (max-width: 258px) 100vw, 258px" /><p><span style="color: #ff0000"><strong>पुस्तक समीक्षा</strong></span></p>
<figure id="attachment_147487" aria-describedby="caption-attachment-147487" style="width: 168px" class="wp-caption alignright"><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/jagnnath.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-147487" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/jagnnath-258x300.jpg" alt="" width="168" height="195" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/jagnnath-258x300.jpg 258w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/jagnnath.jpg 481w" sizes="auto, (max-width: 168px) 100vw, 168px" /></a><figcaption id="caption-attachment-147487" class="wp-caption-text"><span style="color: #800000"><strong>जगन्नाथ दुबे</strong></span></figcaption></figure>
<p><strong>समकालीन युवा कवियों में राकेश रंजन का नाम उनके विशिष्ट काव्य-प्रयोगों के कारण भी अलग से पहचान में आ जाने वाला नाम है। उनका नया काव्य संग्रह &#8216;दिव्य कैदखाने में&#8217; उनके इसी विशिष्ट काव्य प्रयोग और स्पष्ट वर्गीय पक्षधरता को प्रमाणित करने वाला संग्रह है। इस नए काव्य संग्रह से पहले राकेश की कविताएँ हिंदी की प्राय: सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। इनके दो काव्य संग्रह &#8216;अभी अभी जनमा है कवि&#8217; और &#8216;चाँद में अटकी पतंग&#8217; भी प्रकाशित और चर्चित रहे हैं।</strong><br />
<strong>समकालीन हिंदी कविता के सम्पूर्ण जनवादी सरोकार और वर्गीय पक्षधरता के बीच मेरी नजर में जो एक नकारात्मक पक्ष है वह यह कि ये कविताएं पाठक के मन में ज्यादा देर तक टिक नही पातीं। कुछ को छोड़ दिया जाय तो अधिकांश कवियों की कविताएं पढ़ने के साथ ही भूल जाती हैं। इसका ये मतलब नहीं कि कविताओं के टिके रहने का पैमाना उनका हमारी जुबान पर चढ़ जाना है। मुक्तिबोध की कविताएँ भी हमारी जुबान पर चढ़ने वाली कविताएँ नही हैं पर वे बहुत लंबे समय तक हमारे साथ रहती हैं। यानी मुक्तिबोध की कविताओं को पढ़कर आप बहुत देर तक उनके प्रभाव से बाहर नही निकल पाते। </strong><br />
<strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/pustak.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft size-medium wp-image-147488" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/pustak-290x300.jpg" alt="" width="290" height="300" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/pustak-290x300.jpg 290w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/03/pustak.jpg 762w" sizes="auto, (max-width: 290px) 100vw, 290px" /></a>ये जो प्रभाव में ले लेने की शक्ति है यह लगातार कम होती गयी है। आज स्थिति यह है कि मुक्तिबोध, नागार्जुन या त्रिलोचन की तरह अपने प्रभाव में ले सकने वाली कविताएं समकालीन कवियों के पास बहुत कम हैं। अगर उस तरह के प्रभाव को किसी भी रूप में एक मानक मानकर समकालीन हिंदी कविता की बात की जाय तो एक चौकाने जैसी स्थिति बनती दिखाई पड़ेगी। ऐसा कहने के पीछे मेरी धारणा यह है कि राकेश रंजन अपनी पीढ़ी के उन कुछेक कवियों में हैं जिनकी कविताएँ हमे अपने प्रभाव में लेती हैं। राकेश की कविताओं का यह प्रभावकारी रूप कैसे संभव हो पाया है इस पर किसी निष्कर्षात्मक रूप में कुछ कह सकने की स्थिति में मैं नही हूँ पर उन्हें पढ़ते हुए यह महसूस जरूर हुआ। उन्हें पढ़ते हुए उनके साथ जो संवादी रिश्ता कायम हुआ वह काफी लंबे समय तक चलने वाला रिश्ता बना। उनकी कई कविताएँ रह-रहकर कचोटती रहती हैं। राकेश अपने समय की नब्ज़ को बहुत बारीकी से पकड़ने वाले कवि हैं यही कारण है कि अपने समय और समाज के बारे में सोचते हुए अचानक से हमारी निगाह जिन कुछेक बिम्बों पर जाकर टिक जाती है उनमें से कई बिम्ब राकेश की कविताओं में सहज ही दिख जाने वाले बिम्ब होते हैं। भारतीय समाज में किसान का बिम्ब सबसे ज्यादा मोहक बिम्ब रहा है पर वह किसान किस तरह लगातार अपने सब कुछ से बेदखल होता गया है इसकी शिनाख्त करनी हो तो राकेश की कविता &#8216;मेरा देश महान&#8217; को देखना चाहिए। यह कविता भारतीय किसान जीवन की त्रासद गाथा व्यक्त करती है। प्रेमचन्द के यहां स्थिति यह थी कि एक किसान (होरी) का पुत्र (गोबर) मिल मजदूर होने को अभिशप्त हुआ था पर राकेश के यहाँ एकऐसा किसान जो सतगांवा के नभ का भान था उसके पुत्र को मिल मजदूरी भी नहीं नसीब हो रही है वह ठेला-खोमचा लगाकर अपनी जिंदगी बसर करने को विवश है। राकेश के इस संग्रह को पढ़ते हुए अपने समकालीन सामाजिक-राजनैतिक परिदृश्य को भी पढ़ा जा सकता है। यह संग्रह अपने समय और समाज के सामाजिक-राजनैतिक यथार्थ को व्याख्यायित कर सकने में समर्थ संग्रह है। शायद यह कहने की आवश्यकता नहीं कि राकेश अपनी सम्पूर्ण चेतना में जन पक्षधर कवि हैं। उनकी कविताएँ सत्ता की धूर्त चालों से मानवीय-मूल्यों को बचाये रखने को प्रतिबद्ध कविताएँ हैं। वे समझौता परस्त नही पक्षधर रचनाकार हैं। वे जिनके संघर्षों के साथ हैं उसकी शक्ति पर भरोषा भी करते हैं इसीलिए लिखते भी हैं</strong></p>
<p><strong>सब हिसाब जनता करती है,</strong><br />
<strong>नही किसी को देती माफ़ी</strong><br />
<strong>कांग्रेस हो या बीजेपी,</strong><br />
<strong>हिटलर हो चाहे गद्दाफी।</strong><br />
<strong>जनता की ताकत पर इतना भरोसा करने वाला कवि जनता के सवाल न पूछने पर परेशान होता है। कवि जनता से उम्मीद करता है कि वह सवाल पूछे ऐसा न करने पर राकेश खुद कहते हैं।</strong><br />
<strong>आते हो, जाते हो, रोते हो</strong><br />
<strong>गाते हो, कभी तुम सवाल </strong><br />
<strong>क्यों नही उठाते हो?</strong><br />
<strong>आधुनिक मानवीय बोध की सबसे पहली और अनिवार्य शर्त है सवाल उठाने की। सवाल करना आधुनिक बोध की पहली शर्त है। इसलिए कवि जब देखता है कि जिस जनता के ऊपर लोकतंत्र को कायम रखने की जिम्मेदारी है वही सवाल करने से भाग रही है तो कवि चेताता है कि सवाल तो उठाना ही होगा। सवाल न करना सर्वथा गैर-आधुनिक होना है इसलिए जब राकेश कहते हैं कि &#8216;सवाल क्यों नही उठाते हो?&#8217; तो जहाँ वे एक तरफ जनता को आगाह करते हैं वहीं दूसरी तरफ अपनी आधुनिक चेतना का परिचय भी देते हैं।</strong><br />
<strong>राकेश रंजन का यह संग्रह पढ़ते हुए दो कवियों त्रिलोचन और अरुण कमल की कई कविताओं की याद लगातार आती रहती है। इन दोनों कवियों की कविताओं की अनुगूंजें राकेश की कविताओं में अक्सरहां ही सुनाई पड़ती हैं। राकेश अपनी रचनात्मक ऊर्जा अपनी परम्परा से ग्रहण करते हुए अपना समकाल व्यक्त करने वाले कवि हैं। दिनकर ने कहीं कविता में लिखा है जिसका आशय है कि वे परम्परा में बहुत पीछे तक इसलिए जाते हैं कि भविष्य में बहुत दूर तक जा सकें। राकेश की कविताओं में भी अपनी परम्परा से संवाद कुछ इसी अर्थ में मालूम पड़ता है। वे अपने निकटवर्ती कवियों में अगर त्रिलोचन और अरुण कमल से संवादी रिश्ता कायम करते हैं तो अपनी परम्परा में सबसे पीछे जाते हुए कबीर से अपना रिश्ता जोड़ते हैं। इस तरह का रिश्ता उनके शिल्प में भी लक्षित किया जा सकता है। इस संग्रह में जहाँ एक तरफ सर्वथा नवीन मुक्तछन्द की कविताएँ शामिल हैं वहीं दूसरी तरफ पारम्परिक कवित्त छंद का बहुत बेबाकी से प्रयोग किया गया है। प्रयोग का यह वैविध्य भी राकेश रंजन को उन्हें उनके समकालीनों में सबसे अलग से पहचान दिलाता है। गुरुवर श्रीप्रकाश शुक्ल के शब्दों में हिंदी के सारस्वत कवि केदारनाथ सिंह जी ने संग्रह के ब्लर्ब पर लिखा भी है कि-&#8220;इस युवा कवि ने शायद पहली बार कवित्त जैसे लगभग छोड़ दिए गए छंद को एक नई भंगिमा के साथ अपनी कविता में अवतरित किया है।&#8221; </strong><br />
<span style="color: #800000"><strong>(लेखक बीएचयू के हिन्दी विभाग के शोध छात्र हैं )</strong></span></p>
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