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	<title>(राजनीतिक व्यंग ) &#8211; Dastak Times |  दस्तक टाइम्स</title>
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	<description>By Dastak Times Hindi News Network</description>
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		<title>हमारा लोकतंत्र और बेचारे गधे!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Dastak Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 08 Dec 2017 06:35:20 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दस्तक-विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[(राजनीतिक व्यंग )]]></category>
		<category><![CDATA[लोकतंत्र और गधे]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="300" height="216" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/12/ass-politics-300x216.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/12/ass-politics-300x216.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/12/ass-politics.jpg 530w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" />राजनीतिक व्यंग : -प्रभुनाथ शुक्ल  सुबह सो कर उठा तो मेरी नज़र अचानक टी टेबल पर पड़े अख़बार के ताजे अंक पर जा टिकी । जिस पर मोटे &#8211; मोटे अक्षरों में लिखा था &#8221; गधों की हड़ताल&#8221; अख़बार के सम्पादक जी कि कृपा से यह खबर फ्रंट पेज की लीड स्टोरी बनी थी। स्वर्णाक्षरों &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="216" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/12/ass-politics-300x216.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/12/ass-politics-300x216.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/12/ass-politics.jpg 530w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /><h3><span style="color: #800000">राजनीतिक व्यंग : <span style="color: #000000">-प्रभुनाथ शुक्ल </span></span></h3>
<p><strong>सुबह सो कर उठा तो मेरी नज़र अचानक टी टेबल पर पड़े अख़बार के ताजे अंक पर जा टिकी । जिस पर मोटे &#8211; मोटे अक्षरों में लिखा था &#8221; गधों की हड़ताल&#8221; अख़बार के सम्पादक जी कि कृपा से यह खबर फ्रंट पेज की लीड स्टोरी बनी थी। स्वर्णाक्षरों में कई उप शीर्षक और बॉक्स लगाए गए थे। अभी मैंने पूरी ख़बर पढ़ी नहीँ , लेकिन मेरा सिर चराकर समुन्दर बन गया। मैं शून्य में चला गया। मेरी आँखें घूर- घूर कर उसी ख़बर पर धँस गई। मैं सोच रहा था कि इन अखबार और टीवी वालों को, टीआरपी रोग से मुक्ति कब मिलेंगी। रामजी ! इनकी चाल-चलन कब दुरुस्त करेंगे। इन्हें गधे की दुलत्ति मारते शीर्षक हमेशा से प्रिय हैं। लिहाजा ऊल- जलूल शीर्षक टीपते रहते हैं। पाठकों को गधे समझते हैं । समझ नाम की कोई चीज़ नहीँ है। जी में जो आया खबर छाप दिया। अब भला बताइए गधे क्यों हड़ताल करेंगे, उन्हें क्या तकलीफ है। मीडिया वाले भी अजीब प्राणी हैं । इनका भी जिन टेस्ट कराना पड़ेगा, पता नहीँ किस लोक से पधारे हैं। बाल की खाल के शिवाय इन्हें कुछ मिलता ही नहीँ । नीरा खुरपेंची हैं यह परालोचक। </strong></p>
<p><strong><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/12/ass-politics.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-197015 aligncenter" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/12/ass-politics-300x216.jpg" alt="" width="664" height="478" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/12/ass-politics-300x216.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/12/ass-politics.jpg 530w" sizes="auto, (max-width: 664px) 100vw, 664px" /></a>तभी मेरे दिमाग में आया कि आज़ पहली अप्रैल तो नहीँ है । यह मुझ जैसे निरामीष पाठक को मूर्ख तो नहीँ बनाया गया है। उसी दौरान तभी पत्नी जी कमरे में बेड टी के साथ पेश हुई। दरवाजे को नाक करते हुए बोली उठो जी ! चाय लाई हूँ । कमरे में मेरी मूर्ति रूपी मुद्रा देख भौंक पड़ी। क्या गधे जैसी मुद्रा बना रखी है। &#8211; &#8211; &#8211; लो चाय लो , लेकिन मैं तो दूसरी दुनिया में ही खोया था। गृहलक्ष्मी जी की बात का मुझ पर कोई असर नहीँ दिखा तो वह आपे से बाहर चाय की प्याली मेरे हाथ में थमा कमरे से निकल गई । चाय की प्याली मुझसे नहीँ सम्भली और वह कई खंड में स्वर्गवासी हो गई। फर्श पर टूट कर गिरे कप की मधुर ध्वनि मेरे कानों में जैसे ही पहुँची तभी मेरी मूर्छा धूल धूसरित हो उठी। अब मैं पूरी तरह होश में आ गया था। मुझे लगने लगा था कि यह किसी सम्पादक का भोंडा मजाक नहीँ हो सकता। क्योंकि यहाँ अप्रैल फूल का मौसम नहीँ , बल्कि गुनगुनी ठंड में गुजरात के चुनावी उत्सव की ऋतु है। जहाँ शहजादे से लेकर औरंगजेब तक उतर आए हैं । गधे से लेकर सीडी और देवलोक तक उतर आया है ।</strong></p>
<p><strong>सोचा पहले पूरी ख़बर का पोस्टमार्टम कर लिया जाय, इसके बाद अगला क़दम बढ़ाया जाय। जब इत्मीनान से ख़बर का चक्छू भेदन किया तो, अभी तक पापड़ बेलता दिमाग ज़मीन पर धम्म हो गया। ख़बर पुरी तरह सच थी, आलइंडिया गधा असोसिएशन की तरफ़ से उठाए गए सवाल भी जायज और लाज़मी थे। गधों की तरफ से चुनाव आयोग से जो मांग की गई थी वह बिल्कुल सच थी। मैं भी सहमत हूँ कि गधों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए । संवैधानिक अधिकारों में मिली आजादी की धाराओं में उन्हें भी राजनैतिक दल गठित करने और वोट की आजादी मिलनी ही चाहिए। आयोग को इस पर विचार करना चाहिए। क्योंकि देश में सबका विकास हो रहा है और सबका साथ भी मिल रहा है, फ़िर गधों को अछूता क्यों रखा जाय। क्योंकि संविधान में किसी के साथ भेदभाव करने का अधिकार नहीँ है । हमने सभी को अंगीकार किया है । मोर को हमने राष्ट्रीय पक्षी बनाया जबकि कमल को राष्ट्रीय फूल । इसके अलावा शेर को हमने राष्ट्रीय पशु भी घोषित कर रखा है। फ़िर गधों को चुनाव आयोग दल बनाने की स्वाधीनता क्यों नहीँ दे रहा। </strong><br />
<strong>गुजरात के साथ पूरे देश के गधों ने आयोग को खुली चुनौती दे डाली है । उनका कहना है कि यूपी तो छोड़ दिया लेकिन गुजरात किसी भी कीमत पर नहीँ छोडेंगे। अब की सरकरा हमारी बनेगी। आयोग हमें अगर राष्ट्रीय राजनैतिक दल की मान्यता नहीँ देता है तो यह संविधान में वर्णित अधिकारों की अवहेलना होगी। गधों के संगठन ने कहा है कि ज़रूरत पड़ी तो हम देश भर के गधे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए जंतर &#8211; मंतर पर प्रदर्शन करेंगे क्योंकि जब इंसान और उसके जातीय समूह अपने अधिकारों को लेकर दल, संगठन और आरक्षण की माँग कर सकते हैं फ़िर हम गधे दल क्यों नहीँ गठित कर सकते हैं ? सवाल तो जायज है । </strong></p>
<p><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/12/ass_1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-197016" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/12/ass_1-300x190.jpg" alt="" width="594" height="376" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/12/ass_1-300x190.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/12/ass_1.jpg 640w" sizes="auto, (max-width: 594px) 100vw, 594px" /></a></p>
<p><strong>उधर चुनाव आयोग गधों से गुजरात चुनाव तक इस आंदोलन को टालने की मांग कर रहा है , लेकिन गधे अड़े हैं । आयोग का कहना है कि आपकी मांग जायज हो सकती है । लेकिन हमने देखा है कि यूपी से लेकर गुजरात चुनावों में भी आपको प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किया गया और फायदे भी लिए गए या इसकी कोशिश जारी है। इस स्थित में अगर आपका संगठन यह मांग उठता है तो राजनीतिक दल आपका और अधिक उपयोग कर चुनावी समीकरण की गणित बना बिगाड़ सकते हैं । यह आयोग की तरफ़ से जारी चुनावी आचार संहिता का खुला उल्लंघन होगा। आयोग आपकी बातों को संज्ञान में लिया है । अभी आप पर कोई चुनाव प्रतीक नहीँ बने और न ही दलों को मान्यता दी गई । आयोग के संज्ञान में यूपी चुनाव के बाद पहली बार यह मामला आया है। हम विचार को तैयार हैं , लेकिन गुजरात चुनावों के बाद। </strong></p>
<p><strong>उधर गधों की चुनौती से आयोग जहाँ उलझ गया है वही सरकार के सामने प्रदर्शन को लेकर कानून व्यवस्था का सवाल खड़ा हो गया है । जबकि गधों की इस मांग को देश में भारी समर्थन मिल रहा है। गधों ने ढेन्चू &#8211; ढेन्चू कर आवाज़ बुलंद कर दी है । लोग उनकी मांगो के समर्थन में सड़क पर उतर रहे हैं । गधों की बात जायज है कि जब हम अपने अधिकारों और उत्पीड़न को लेकर चिल्लाते हैं तो हमारा मालिक हमें और पिटता है और हमारी बात सुनने के बजाय बोझ का भार और बढ़ा देता है । लेकिन जब हमारे प्रतीकों में इतनी तागत है कि हम किसी कि सरकार गिरा और बना सकते हैं फ़िर हम चुप क्यों बैठें । कच्छ के गधों ने इसके लिए यूपी का उदाहरण दिया। बोले इस बार हम गुजरात में राजनेताओं की दाल नहीँ पकने देंगे। अब गधों की सरकार बनेगी। गधों ने कहा है कि अभी तक हमें अपनी तागत का अंदाजा ही नहीँ था। यूपी के चुनाव ने हमारी नींद खोल दी है। गधों ने कहा कि जब हमारे नाम का उपयोग कर सवा सौ अरब देशवासी किसी को वजीरे आजम और वजीरे सल्तनत बना सकते हैं तो फ़िर हम क्यों नही बन सकते ? अब हम जाग गए हैं । अपना हक अब इंसानों को नहीँ दे सकते। हमें इंसानों और दूसरे पशु &#8211; पक्षियों की तरह राष्ट्र की मुख्यधारा में लाना ही होगा। तभी भीड़ से नारा गूंज उठा। नाम हमारा ताज तुम्हारा, नहीँ चलेगा , नहीँ चलेगा।- &#8211; &#8211; गधे अब करें पुकार, नहीँ चलेगी इंसानों की सरकार। नाम हमारा , तंत्र तुम्हारा , नहीँ चलेगा , नहीँ चलेगा। भीड़ से तभी एक और नारा गूंजा गधहा राज़ जिन्दाबाद &#8211; &#8211; &#8211; जिन्दाबाद । तभी दरवाजे के बाहर शोर सुनाई दिया, तो देखा भारी संख्या में लोकतंत्र के पहरुये गधे हाथों में अपने पार्टी का झंडा और डंडा लिए आवाज़ बुलंद कर रहे थे और टेम्पो हाई का जयघोष कर रहे थे। जबकि मैं सोच रहा था देखिए वाकई में लोकतंत्र कितना मजबूत हो चला है । </strong><br />
<span style="color: #800000"><strong>(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)</strong></span></p>
<p><span style="color: #800000"><strong>(डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। दस्तक टाइम्स उसके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।)</strong></span></p>
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