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	<title>रामेश्वरम &#8211; Dastak Times |  दस्तक टाइम्स</title>
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	<title>रामेश्वरम &#8211; Dastak Times |  दस्तक टाइम्स</title>
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		<title>रामेश्वरम</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Dastak Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 22 Nov 2017 08:05:28 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<img width="236" height="294" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/11/vimlesh-shukla.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" />राम से रामेश्वर, नारायण से नारायणत्व की ओर प्रयाण करने वाला, इच्छा-ज्ञान-क्रिया की त्रिवेणी के पावन प्रवाह में तप, त्याग और तपस्या की डुबकियों से स्नात, सत्य- प्रेम-करुणा के आनन्द सागर की अनन्त गहराइयों की यात्रा कराने वाला एक अद्भुत पावन ग्रन्थ है। आपके हाथों तक पहुंचा यह &#8216;रामेश्वरम&#8217;, आकार से पुस्तक, किन्तु विषय वस्तु से &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="236" height="294" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/11/vimlesh-shukla.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" /><figure id="attachment_193351" aria-describedby="caption-attachment-193351" style="width: 220px" class="wp-caption alignright"><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/11/vimlesh-shukla.jpg"><img decoding="async" class=" wp-image-193351" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/11/vimlesh-shukla.jpg" alt="" width="220" height="274" /></a><figcaption id="caption-attachment-193351" class="wp-caption-text"><strong>डॉ. विमलेश शुक्ला</strong></figcaption></figure>
<p><strong>राम से रामेश्वर, नारायण से नारायणत्व की ओर प्रयाण करने वाला, इच्छा-ज्ञान-क्रिया की त्रिवेणी के पावन प्रवाह में तप, त्याग और तपस्या की डुबकियों से स्नात, सत्य- प्रेम-करुणा के आनन्द सागर की अनन्त गहराइयों की यात्रा कराने वाला एक अद्भुत पावन ग्रन्थ है। </strong><strong>आपके हाथों तक पहुंचा यह &#8216;रामेश्वरम&#8217;, आकार से पुस्तक, किन्तु विषय वस्तु से ग्रन्थ की गरिमा का संस्पर्श करता है।</strong><br />
<strong>समीक्ष्य पुस्तक में &#8220;पार्थवेश्वर महादेव&#8221; एवं &#8220;सीता परित्याग&#8221;, इन दो कथाओं का अभूतपूर्व विश्लेषण मानवीय संवेदना को अलौकिक संचेतना के जिस शिव संकल्प-मय धरातल पर अवतरित किया गया है, वह लेखक आशुतोष राणा के समर्पण की तन्मयता, चिंतन की सार्वभौमिकता, सर्वजनीनता एवं मानव मनोभावों की सूक्ष्मता को मूर्तमान करता है </strong><strong>और शब्द अनायास निकल ही पड़ते हैं &#8211;</strong><br />
<span style="color: #800000"><strong>सोइ जानहि जेहि देहु जनाई। जानत तुमहिं तुमहिं होइ जाई॥</strong></span><br />
<strong>कैसे संभव हुआ, और हो पाता है इस स्तर का सृजन और वह भी इतने कम समय में, यह भी ध्यान देने योग्य है।</strong><br />
<span style="color: #800000"><strong>तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु ।</strong></span><br />
<strong>हमारा मन शिव संकल्पों वाला- अर्थात् ‘श्रद्धा विश्वास रूपिणौ पार्वती पर्मेश्वरौ&#8217; की तरह मंगलमय, कल्याण मय, शिवमय हो, जो आत्मगत , सुप्त और विस्मृत चैतन्य तत्व को जाग्रत करनेवाला, जनमानस को शव से शिवमय बनाने वाला हो।</strong><br />
<strong>और यह संकल्प सद्गुरु के सुदुर्लभं सानिध्य तथा अनुकम्पा से ही प्राप्त होता है। आराध्य और आराधक , साध्य और साधक की समुपस्थिति में ही मन शिवमय अथवा शिवसंकल्प वाला होता है।</strong><br />
<strong>रामसेतु और रामहेतु रामेश्वरम् की पवित्र रज कण कण में विद्ममान है। रामसेतु ही राम का हेतु है और रामहेतु रामसेतु का निमित्त ही है।</strong><br />
<strong>पार्थवेश्वर शिवलिंग निर्माण के लिए मृन्मय मन को चिन्मय बनाने की आवश्यकता है क्यों कि- मन एव मनुष्याणां कारण बन्ध मोक्षयो:।</strong><br />
<strong>इस अद्भुत रचना का विमोचन पूज्य गुरुदेव श्री देवप्रभाकर जी शास्त्री ‘दद्दाजी’ की प्रेरणा, संकल्प व निर्देशन में रामेश्वरम धाम-तमिलनाडु में हो रहे सवा करोड़ पार्थिव शिवलिंग निर्माण महारुद्र यज्ञ व महारुद्राभिषेक की पावन बेला में हो रहा है यह भी एक सुखद संयोग है। आयुर्वेद के अनुसार भूमि के दो फिट नीचे की जो मिट्टी होती है वह शरीर के बडे़ ,से बड़े घावों को भर देती है। अतएव यह पार्थिव शिवलिंग निर्माण मानव मन के, समाज के, राष्ट्र के, समस्त विश्व के, इतना ही नहीं पृथ्वी के जीव मात्र के जख्मों को भरने वाले हैं। इस पुस्तक के प्रणम्य चिंतन ने मेरे तुच्छ मन मस्तिष्क में एक साथ कई विचारों को कौंधा दिया है। दोनों ही कथाएं चार भागों में रची गई हैं, जो धर्म अर्थ काम मोक्ष इन चार पुरुषार्थों की ओर संकेत करते हैं। इन चार भागों से शिवमय संकल्प की पूर्व-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण, चारों दिशाओं अनुव्याप्ति की भी व्यंजना हो जाती हैं। राम शिव को अपना आराध्य और शिव स्वयं को राम का आराधक मानते हैं। यह इस बात की पुष्टि है कि जब आराध्य और आराधक द्वैत से अद्वैत हो जाते हैं तभी मन शिवसंकल्पों वाला होता है। यह शिव संकल्पों वाला मन ही रामसेतु-रामहेतु के एकत्व को समर्पित हो जाता है, तथा जनमचिन्न्यायालय के कारण भी पृथ्वी का कण-कण शिवमय कल्याणमय और चिन्मय हो जाता है। हरि और हर की एकत्व की स्थिति बन जाती है। पार्थिव शिवलिंग निर्माण आज आयुर्वेद औषधि विज्ञान के परिप्रेक्ष्य मे भी शिवमय कल्याणकारी है।</strong><br />
<strong>&#8221; सीता परित्याग की कथा &#8220;</strong><br />
<strong>अत्यंत मार्मिक कारुणिक एवं, राम की अन्तव्र्यथा की पीड़ान्तक अभिव्यंजना है। राम सत्य, शील, मर्यादा एवं प्रजा वत्सल स्वरूप के प्रतीक हैं। वे एक आज्ञा पालक पुत्र, प्राणवल्लभ प्रियतम, प्रजा वत्सल, मर्यादा पुरुषोत्तम शासक हैं।</strong><br />
<strong>सीता का परित्याग, परित्याग नहीं है क्योंकि सीता सिद्धि है जिसे साधक अपनी साधना से अर्जित करता है,वह उससे कैसे विलग हो सकती हैं?</strong><br />
<strong>फिर भी सीता विछोह जन्य राम हृदय के कारुणिक आलोड़न विलोड़न जिस मानवीय कारुणिक रुदन की अभिव्यंजना हुई है वह अद्भुत है। भाई आशुतोष राणा की लेखिनी गुरु प्रसाद प्रदत्त अलौकिक क्षमता का दर्शन है। राम की अन्तव्र्यथा (महाकवि भवभूति कृत) उत्तर रामचरितम् में प्रस्फुटित हो उठी है-</strong><br />
<strong>पुटपाक प्रतीकाशो रामस्य करुणो रस:।</strong><br />
<strong>सीता परित्याग कथा इतनी करुणाप्लावित है कि जनमानस के अश्रचपातों से भावभूमि सिक्य हो जाती हैं किंतु जब उनकी अन्तर भावभूमि का संस्पर्श करते हैं तो राम सीता नहीं सीताराम दिखाई देते हैं ।</strong><br />
<strong>सीता को राम की निर्मिति &#8230;सृष्टि माना है और वह साधक से अलग नहीं हो सकती।</strong><br />
<strong>महाकवि लालदास ने अपने अवध विलास महाकाव्य मे लिखा है&#8230;।।</strong><br />
<strong>मम मत राम गए न हि कतहूँ। </strong><strong>और कविन की कही कहत हूँ।।</strong><br />
<strong>भाई आशुतोष राणा की लेखन शैली सरल ,सहज सर्वसंवेद्य और प्रवाहमय है।</strong><br />
<strong>भरत मुनि के नाट्य शास्त्र की अभिनय कला को अभिनव रूप में &#8216;पार्थवेश्वर महादेव&#8217; और &#8216;सीता परित्याग&#8217; जैसी कथाओं को मनोवैज्ञानिक धरातल पर उतारना निषाणात अभिनय कला का महामंचन है!</strong><br />
<strong>पार्थवेश्वर महादेव एवं सीता परित्याग के माध्यम, से सुविज्ञ चिंतक अद्भुत लेखन शक्ति सम्पन्न मानव मन की सूक्ष्यमातिसूक्ष्म अन्तर्वृत्तियों की विश्लेषण क्षमता सम्पन्न भाई आशुतोष जी ने गुरु कृपा के अनन्य पात्र के रूप में अपना अनकहा परिचय दिया जो श्लाघनीय ही नही प्रणम्य है।</strong></p>
<p><span style="color: #800000"><strong>डॉ. विमलेश शुक्ला, पुणे, महाराष्ट्र, शोध कार्य &#8211; महाकवि लालदास कृत महिकाव्य &#8216;अवधविलास&#8217; का शोधपरक अनुशीलन, जुलाई 1957, बांदा (उ.प्र) मे जन्म। आयुर्वेद विज्ञान व संस्कृत भाषा के विद्वान पिता से मिली प्रेरणा संस्कृत भाषा और साहित्य अध्ययन की। ग्वालियर (जीवाजी) तथा झांसी (बुन्देलखण्ड) विश्वविद्यालयों में अध्यापन।</strong></span></p>
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		<title>रामेश्वरम</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Dastak Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 22 Nov 2017 07:59:42 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[दस्तक-विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[रामेश्वरम]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="228" height="300" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/11/dinesh_1-228x300.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/11/dinesh_1-228x300.jpg 228w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/11/dinesh_1.jpg 236w" sizes="auto, (max-width: 228px) 100vw, 228px" />दुश्मन, संघर्ष &#8230;जैसी कई हिन्दी व अन्य भाषाओं में अपने अभिनय की अमिट छाप छोड़ने वाले अभिनेता, अपने गुरु श्री दद्दा जी के प्रति पूर्ण समर्पित शिष्य, अपने शुभचिंतकों के सदा परिष्कार की लालसा रखने वाले मित्र व एक उच्च शिक्षित, जागृत, सजग, दबंग व तर्कशास्त्री, ज्ञानवान आशुतोष राणा को तो मैं जानता था परंतु &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="228" height="300" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/11/dinesh_1-228x300.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/11/dinesh_1-228x300.jpg 228w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/11/dinesh_1.jpg 236w" sizes="auto, (max-width: 228px) 100vw, 228px" /><figure id="attachment_193347" aria-describedby="caption-attachment-193347" style="width: 168px" class="wp-caption alignright"><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/11/dinesh_1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-193347" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/11/dinesh_1-228x300.jpg" alt="" width="168" height="221" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/11/dinesh_1-228x300.jpg 228w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/11/dinesh_1.jpg 236w" sizes="auto, (max-width: 168px) 100vw, 168px" /></a><figcaption id="caption-attachment-193347" class="wp-caption-text"><strong>दिनेश भवानीदत्त व्यास</strong></figcaption></figure>
<p><span style="color: #800000"><em><strong>दुश्मन, संघर्ष &#8230;जैसी कई हिन्दी व अन्य भाषाओं में अपने अभिनय की अमिट छाप छोड़ने वाले अभिनेता, अपने गुरु श्री दद्दा जी के प्रति पूर्ण समर्पित शिष्य, अपने शुभचिंतकों के सदा परिष्कार की लालसा रखने वाले मित्र व एक उच्च शिक्षित, जागृत, सजग, दबंग व तर्कशास्त्री, ज्ञानवान आशुतोष राणा को तो मैं जानता था परंतु &#8216;रामेश्वरम&#8217; पढ़ने के बाद कहना पड़ रहा है कि इन्हें सीमाओं में परिभाषित नहीं किया जा सकता। कथाकार या साहित्यकार कहना पर्याप्त नही लगता।</strong></em></span></p>
<p><strong>वाल्मीकि कृत रामायण, तुलसीदास रचित रामचरितमानस, अन्य कई मनीषियों द्वारा विभिन्न भाषाएं व भाष्य तथा तीन दशकों पूर्व टेलीवीजन पर व्यूवरशिप के रिकॉर्ड तोड़ने वाला रामानन्द सागर द्वारा प्रस्तुत धारावाहिक &#8216;रामायण&#8217; ने सनातन भारत के जन-मन में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को आस्था का केन्द्र बनाये रखा है। राम कथा के अनेकों प्रसंगों, पात्रों, घटनाओं का विवरण, विश्लेषण, विवचना हर काल में हुए विद्वानों, लेखकों, भक्तों, तर्कशास्त्रियों व वैज्ञानिकों ने अपनी अनुभूति, ज्ञान व दृष्टिकोण से की हैं। मैने अपने जैसे सामान्य लोगों से वार्तालाप के दौरान पाया कि भले ही श्रीराम के प्रति आपार श्रद्धा हो, उनका सीता को वनवास में भेजना एक अजीब सा संशय और अनभिज्ञता पैदा करता है; भले ही रावण को खलनायक मानकर उसके वध को दशहरा पर्व में हर्षोल्लास के साथ मनाने में प्रसन्नता रहती हो, पर उसका एक प्रकांड विद्वान और शिव का असाधारण भक्त होना उसके कई निर्णयों पर संशय को जन्म देता है। कई और ऐसे प्रसंग हैं जो पूरी कथा के बीच अचानक उसके प्रवाह में अवरोधक व दिशाशूल के रूप में या अतार्किक प्रतीत होते हैं। मेरा यह भी मानना है कि जो लोग इनका <a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/11/dinesh_2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="size-medium wp-image-193348 alignleft" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/11/dinesh_2-300x169.jpg" alt="" width="300" height="169" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/11/dinesh_2-300x169.jpg 300w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/11/dinesh_2.jpg 467w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /></a>सही संदर्भ मे अर्थ समझ पाये वो औरों को समझा नही पाये। जब मैं इन दो कथाओं को पढ़ रहा था तो ऐसा लगा मानो इस युग के वाल्मीकि या तुलसी साक्षात सामने हैं और मुस्कराते हुए मेरे संशयों को देख कुछ प्रसंगों को लिखते जा रहे हैं और विस्मित हुआ मैं पढ़ता जा रहा हूं। अद्भुत अनुभूति है यह।</strong><br />
<strong>श्री आशुतोष राणा ने राम कथा के दो प्रसंगों को जैसे प्रस्तुत किया है &#8216;रामेश्वरम्&#8217; में वह अतुलनीय है। दुश्मन, संघर्ष &#8230;जैसी कई हिन्दी व अन्य भाषाओं में अपने अभिनय की अमिट छाप छोड़ने वाले अभिनेता, अपने गुरु श्री दद्दा जी के प्रति पूर्ण समर्पित शिष्य, अपने शुभचिंतकों के सदा परिष्कार की लालसा रखने वाले मित्र व एक उच्च शिक्षित, जागृत, सजग, दबंग व तर्कशास्त्री, ज्ञानवान आशुतोष राणा को तो मैं जानता था परंतु &#8216;रामेश्वरम&#8217; पढ़ने के बाद कहना पड़ रहा है कि इन्हे सीमाओं में परिभाषित नहीं किया जा सकता। कथाकार या साहित्यकार कहना पर्याप्त नहीं लगता। आशुतोष राणा कृत सीता परित्याग व पार्थेश्वर महादेव कथा रामायण के समसामयिक व कालजयी होने का प्रमाण है जो आज व भविष्य मे भी जनमानस के परिष्कार में सहायक होंगी। </strong><strong>और क्या कहूं, बहुत आनंदित हूं।</strong></p>
<p><span style="color: #800000"><strong>(दिनेश भवानीदत्त व्यास, निदेशक &#8211; एच. एण्ड आर. जॉन्सन टी.बी.के. लिमिटेड, मुंबई, महाराष्ट्र)</strong></span></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>रामेश्वरम</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Dastak Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 22 Nov 2017 07:46:07 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अद्धयात्म]]></category>
		<category><![CDATA[दस्तक-विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[रामेश्वरम]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="236" height="287" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/11/suresh-acharya.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" />सीता के रूप में खड़ी सती को देखते ही राम ने पिता सहित अपना नाम बताते हुए उन्हें प्रणाम किया और दोनों हाथ जोड़कर पूछा कि मां, बैल पर बैठने वाले कहां हैं? और आप यहां वन में अकेली कैसे फिर रही हैं। सती डर गईं, राम ने उन्हें आश्वस्त करने के लिए वन में &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="236" height="287" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/11/suresh-acharya.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" /><p><span style="color: #800000"><em><strong>सीता के रूप में खड़ी सती को देखते ही राम ने पिता सहित अपना नाम बताते हुए उन्हें प्रणाम किया और दोनों हाथ जोड़कर पूछा कि मां, बैल पर बैठने वाले कहां हैं? और आप यहां वन में अकेली कैसे फिर रही हैं। सती डर गईं, राम ने उन्हें आश्वस्त करने के लिए वन में ही अनेक रूपों में दर्शन दिए। चारों ओर श्रीराम, सीता और लक्ष्मण उन्हें प्रसन्न मुद्रा में दिखाई दिए। घबराई सती वटवृक्ष के नीचे बैठे शिव के पास लौट आईं। सीता का परित्याग राम की शिव भक्ति के परंपरागत आचरण का ही रूप है।</strong></em></span></p>
<figure id="attachment_193343" aria-describedby="caption-attachment-193343" style="width: 206px" class="wp-caption alignright"><a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/11/suresh-acharya.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-193343" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2017/11/suresh-acharya.jpg" alt="" width="206" height="251" /></a><figcaption id="caption-attachment-193343" class="wp-caption-text"><span style="color: #800000"><strong>(प्रो. सुरेश आचार्य)</strong></span></figcaption></figure>
<p><strong>श्री आशुतोष राणा भारतीय आध्यात्मिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक इतिहास के निरंतर जिज्ञासु और सतत् अनुरागी जानकार हैं। शिव उनके परम आराध्य हैं रामाख्यमीशं हरि अर्थात राम उपनाम वाले महाविष्णु श्री हरि ने तो विधिवत घोषित ही कर दिया है कि जो शिव का द्रोह करके मेरी भक्ति करता है वह मनुष्य मुझे स्वप्न में भी पसंद नहीं। श्री राणा के द्वारा रचित ‘पार्थिवेश्वर महादेव’ तथा ‘सीता परित्याग’ का विषद अध्ययन मुझे आनंद और उल्लास से भर गया। श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, वे लोक में मर्यादा की स्थापना के लिए न केवल राज सत्ता का त्याग करते हैं अपितु लोक निंदा के कलंक के असत्य आरोप का जहर पीते हुए सीता का परित्याग करके राज्य के लोक मंगलकारी आदर्श की स्थापना भी करते हैं। प्रभु परम शिव तो अमृत मंथन के पश्चात निकले हलाहल के दाहक ज्वाल से सृष्टि की रक्षा करने के लिए उस महा गरल को कंठ में धारण करके ही नीलकंठ कहलाये।</strong><br />
<strong>श्री राम और पंडित-राज दशानन दोनों शिव से जुड़े हुए हैं। लोक में व्याप्त अनेक अज्ञानजनित अवधारणाओं को निरस्त करते हुए श्री आशुतोष राणा ने पार्थिवेश्वर महादेव के आवाहन-पूजन और सम्यक आराधन के लिए महापंडित रावण के पौरोहित्य को रेखांकित किया है। भूले बिसरे गीत की तरह यह मन को छू लेने वाला प्रसंग है। लक्ष्मण के साथ न आकर और हनुमान की विनय को स्वीकारते हुए रावण का शिव के पार्थिव स्वरूप के पूजन के लिए राम का पौरोहित्य को स्वीकार करना धर्मगरु के स्वाभिमान और सत्य का प्रतीक है। राम को ‘विजयी भव’ का आशीर्वाद देकर रावण भारतीय धर्मानुष्ठान की श्रेष्ठ परंपरा की रक्षा के साथ ही अपना मरण भी निश्चित कर लेता है। यह शैव परंपरा के भक्तों की सहजता और सांसारिक वैभव की निस्सारता की ओर इंगित भी है।</strong><br />
<strong>श्री आशुतोष राणा की ये रचनाएं दरअसल रामकथा ही हैं मगर इसमें सामाजिक संलग्नता अपने पूर्ण वैभव के साथ उपस्थित होकर इन्हें अद्यतन करती है। सीता परित्याग अपने सम्पूर्ण पाठ में हृदय को छूने वाली रचना है। स्मरणीय है कि रामवनगमन के समय सीता हरण के पश्चात राम को सीता के विरह में खग, मृग, और भौरों की पंक्तियों से मृगनयनी सीता का पता पूछने वाले राम को शिव का ‘जय सच्चिदानंद जगपावन’ कहकर प्रणाम करना सती को संदेह से भर देता है। अंतत: शिव से आज्ञा लेकर सती राम की परीक्षा लेने उनके मार्ग में सीता का रूप धारण करके खड़ी हो जाती हैं। सीता के रूप में खड़ी सती को देखते ही राम ने पिता सहित अपना नाम बताते हुए उन्हें प्रणाम किया और दोनों हाथ जोड़कर पूछा कि मां, बैल पर बैठने वाले कहां हैं? और आप यहां वन में अकेली कैसे फिर रही हैं। सती डर गईं, राम ने उन्हें आश्वस्त करने के लिए वन में ही अनेक रूपों में दर्शन दिए। चारों ओर श्रीराम, सीता और लक्ष्मण उन्हें प्रसन्न मुद्रा में दिखाई दिए। घबराई सती वटवृक्ष के नीचे बैठे शिव के पास लौट आईं। शिव से उन्होंने सारा परीक्षा-प्रसंग छिपा लिया, किन्तु अंतर्रायामी शिव ने सब जान लिया, उनके हृदय में यह जानकर बड़ा विषाद हुआ कि सती ने सीता का वेष धारण कर लिया था। कैलाश की ओर लौटते हुए उन्होंने संकल्प कर लिया- एहि तन सतिहि भेंट मोहि नाहीं। यह सती का परित्याग ही था जिसके परिणाम स्वरूप अंतत: सती ने शरीर छोड़ दिया।</strong><br />
<strong>सीता का परित्याग राम की शिव भक्ति के परंपरागत आचरण का ही रूप है। श्री आशुतोष राणा से मेरा आग्रह है कि चार पुरुषार्थों में से धर्म के लुप्त और विकृत होते अर्थ की रक्षा के लिए वे इस सम्पूर्ण प्रसंग को एक औपन्यासिक रूप में दें तथा इसे वर्तमान सामाजिक संदर्भों सहित एक नई व्याख्या के साथ प्रस्तुत करें। यह शुभ कार्य करके वे अपना शिव-संकल्प पूर्ण करें। मेरा दृढ़ विश्वास है कि एतदर्थ उन्हें अपने गुरु पंडित देव प्रभाकर जी शास्त्री का शुभाशीष भी प्राप्त होगा। पुष्पदंत गंधर्व की शिव महिमा को याद करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं कि यदि हिमालय पर्वत के बराबर स्याही को समुद्र बराबर दावात में घोला जाए तथा कल्पवृक्ष की शाखा से बनाई गई कलम से स्वयं सरस्वती अपनी पूर्ण आयु धरती को कागज बनाकर लिखती रहें तब भी भगवान शिव के गुणों का वर्णन नहीं हो सकता। वहीं प्रभु परम शिव हम सबका कल्याण करें। हम अर्थात जलचर, थलचर, नभचर, जड़ और चेतन सभी का।</strong></p>
<p><span style="color: #800000"><strong>(प्रो. सुरेश आचार्य, पीएच.डी. डी. लिट्. (से.नि.), डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर, (केन्द्रीय विश्वविद्यालय), पूर्व प्रधान संपादक &#8211; मध्य भारती (शोध पत्रिका))</strong></span></p>
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