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	<title>साजिश की दाग से मुक्त हुई साध्वी &#8211; Dastak Times |  दस्तक टाइम्स</title>
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	<description>By Dastak Times Hindi News Network</description>
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		<dc:creator><![CDATA[Ranjeet Gupta]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 04 Jul 2016 05:00:43 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दस्तक-विशेष]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="298" height="300" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/sadhvi-298x300.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/sadhvi-298x300.jpg 298w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/sadhvi-150x150.jpg 150w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/sadhvi-200x200.jpg 200w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/sadhvi.jpg 353w" sizes="(max-width: 298px) 100vw, 298px" />सुधीर जोशी किसी आपराधिक मामले में मुख्य आरोपी को इस आधार पर लगभग आठ साल बाद रिहा करने का रास्ता साफ हो कि उसके खिलाफ मुकदमा चलाने जैसा कोई सबूत मिला ही नहीं, उसे बहुत टीस होती है, जिसे उक्त सजा मुकर्रर की गई होती है। साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के साथ भी कुछ ऐसा &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="298" height="300" src="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/sadhvi-298x300.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/sadhvi-298x300.jpg 298w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/sadhvi-150x150.jpg 150w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/sadhvi-200x200.jpg 200w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/sadhvi.jpg 353w" sizes="auto, (max-width: 298px) 100vw, 298px" /><p><span style="color: #ff0000;"><strong>सुधीर जोशी</strong></span><br />
<strong><br />
<a href="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/sadhvi.jpg"><img decoding="async" class="alignleft  wp-image-106260" src="http://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/sadhvi-298x300.jpg" alt="sadhvi" width="269" height="271" srcset="https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/sadhvi-298x300.jpg 298w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/sadhvi-150x150.jpg 150w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/sadhvi-200x200.jpg 200w, https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2016/07/sadhvi.jpg 353w" sizes="(max-width: 269px) 100vw, 269px" /></a>किसी आपराधिक मामले में मुख्य आरोपी को इस आधार पर लगभग आठ साल बाद रिहा करने का रास्ता साफ हो कि उसके खिलाफ मुकदमा चलाने जैसा कोई सबूत मिला ही नहीं, उसे बहुत टीस होती है, जिसे उक्त सजा मुकर्रर की गई होती है। साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। मालेगांव में 29 सितंबर, 2008 को मालेगांव के अंजुमन चौक तथा भिकू चौक में रात साढ़े आठ बजे मस्जिद में नमाज के बाद रात 9.30 बजे हुए बम विस्फोट में महाराष्ट्र एटीएस ने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत 14 लोगों को आरोपी बनाया था, लेकिन आठ साल बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने एटीएस के फैसले को पलट कर मुख्य आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिंह समेत पांच अन्य लोगों को क्लीन चिट दे दी। राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि चूंकि इस प्रकरण में कोई भी साक्ष्य ऐसा नहीं मिला है, जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि मालेगांव बम धमाके में साध्वी प्रज्ञा सिंह का हाथ था। ज्ञात हो कि जब यह मामला हेमंत करकरे को सौंपा गया था तो पहले उन्होंने इस पूरे प्रकरण का अध्ययन किया। अध्ययन के बाद करकरे ने पाया कि इस बम कांड में कुछ हिंदुत्ववादी संगठनों का हाथ हो सकता है और जब उन्होंने इस आधार पर जांच शुरू की तो उन्हें इस बात का प्रमाण मिला कि दयानंद पांडे ने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर तथा कर्नल प्रसाद पुरोहित की मदद से मालेगांव में बम विस्फोट किया गया। इसके आधार पर साध्वी, कर्नल पुरोहित तथा अन्य संदिग्ध आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। </strong><br />
<strong>राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) तथा एटीएस की जांच एक दूसरे के विपरीत होने के कारण इस बात को लेकर संदेह उठाया जा रहा है कि किसकी जांच खरी है और किसकी जांच में खोट है। मालेगांव बम धमाकों के बाद उसकी जांच का दायित्व महाराष्ट्र एटीएस को सौंपा गया था। हेमंत करकरे के मार्गदर्शन में मालेगांव बम धमाक कांड की जांच हुई थी। ज्ञात हो कि महाराष्ट्र एटीएस ने अपनी जांच में इस बात का खुलासा किया था कि मालेगांब बम धमाके में कुछ हिंदुत्ववादी संगठनों का हाथ है। हेमंत करकरे ने अपनी जांच में यह भी बताया था कि साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर भी इस बम कांड में शामिल थीं। करकरे ने इसी संदेह के आधार पर साध्वी प्रज्ञा सिंह के साथ-साथ लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, रमेश उपाध्याय शिवनारायण कालसंग्रा, श्याम भवरलाल साहू, प्रवीण टाककल्की, लोकेश शर्मा, समीर कुलकर्णी, राजा राहिरकर, राकेश धावडे, जगदीश म्हात्रे, सुधाकर दिवेदी, सुधाकर चतुर्वेदी, रामचंद्र कालसंग्रा उर्फ रामजी तथा संदीप डांगे को गिरफ्तार किया था। एटीएस ने 20 जनवरी, 2009 को 16 लोगों के खिलाफ मुंबई की अदालत में आरोप पत्र दाखिल किए, जबकि 29 अपैल, 2011 को 14 लोगों के खिलाफ मुंबई उच्च न्यायालय में आरोप-पत्र दाखिल किए गए थे, उस समय सभी आरोपियों पर मकोका के अंतर्गत मुकदमा दायर किया गया था। इसके बाद साध्वी प्रज्ञा सिंह तथा कर्नल पुरोहित ने आरोप-पत्र को मुंबई उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। आठ वर्ष पूर्व यानि सन् 2008 में अंजाम दिए गए मालेगांव बमकांड का षड्यंत्र रचने में सीधे-सीधे साध्वी तथा कर्नल पुरोहित भले ही शामिल न हों, पर उनकी भूमिका संदेश के दायरे में जरूर बतायी जा रही है। साध्वी के साथ-साथ शिवनारायण कालसंग्रा, श्याय भंवरलाल साहू, प्रवीण टलक्काल्की, लोकेश शर्मा तथा धनसिंह चौधरी पर लगे सभी आरोपों को एनएआई ने वापस ले लिया है। चूंकि यह मामला संगठित अपराध नियंत्रण कानून के तहत नहीं आता, इसलिए कर्नल पुरोहित तथा अन्य आरोपियों पर मकोका नहीं लगाया जा सकता, ऐसा एनआईए ने विशेष न्यायालय में बताया है।</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>हमदर्दी बरतने के लिए डाला गया जोर : सालियान</strong></span><br />
<strong>मालेगांव बम धमाकों के आरोपियों के साथ हमदर्दी बरतने का दबाव लगातार डाला जाता रहा है, इस आशय का खुलासा करते हुए विशेष सरकारी वकील रोहिणी सालियान ने बताया कि मालेगांव बम धमाकों के आरोपियों के साथ किसी तरह की सख्ती नहीं की जा रही है, लेकिन उस समय सालियान के आरोप को बेबुनियाद करार देते हुए एनआईए ने कहा था कि किसी भी आरोपी के साथ सहानुभूति नहीं बरती जा रही है, लेकिन जब इस मामले से साध्वी समेत पांच अन्य लोगों के नाम आरोप-पत्र से हटा दिए गए तब लगा कि सरकारी वकील ने जो आरोप लगाए थे, उसमें दम था।</strong><br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>एटीएस की जांच पर संदेह क्यों?</strong></span><br />
<strong> महाराष्ट्र एटीएस की जांच पर एनआईए ने संदेह क्यों व्यक्त किया यह भी कम महत्वपूर्ण सवाल नहीं है। विस्फोट के प्रत्यक्षदर्शी नहीं मिल रहे थे, इसलिए एटीएस ने आरोपियों को बहुत परेशान किया और उनसे जैसा चाहा वैसा जबाव बुलवा लिया। इतना ही नहीं, आरोपियों पर मकोका जैसी कठोर सजा मुकर्रर की। एनआईए ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा है कि जिस मोटरसाइकिल का इस्तेमाल बम विस्फोट के लिए किया गया, वह मोटरसाइकिल साध्वी प्रज्ञा सिंह की थी जरूर पर उसका इस्तेमाल फरार आरोपी रामचंद्र कालसंग्रा करता था, इस आधार पर साध्वी को बम विस्फोट का मुख्य सूत्रधार मानना गलत है। अभिनव भारत जैसी संस्था में काम करने वाला रामचंद्र कालसंग्रा बम कांड का रणनीतिकार बताया जाता है, वह अब तक लापता है। इसके अलावा संदीप डांगे का भी आठ साल बीत जाने के बावजूद कोई पता नहीं है। जिस आईपीएस अधिकारी ने मुंबई में आतंकवादी धमाकों के दौरान अपने जान की बाजी लगा दी, उस पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे की जांच पर सवाल उठाना उचित नहीं है। सेवानिवृत्त विशेष कैबिनेट सचिव तथा गुप्तवार्ता विशेषज्ञ वी.बालचंद्रन का कहना है कि करकरे एक बहुत ही कुशल पुलिस अधिकारी थे, उनकी जांच पर सवाल उठाने का सीधा अर्थ यही है कि महाराष्ट्र तथा केंद्र सरकार ने उनकी योग्यता पर ही सवालिया निशान लगा दिया है। बालचंद्रन ने एनआई के यू-टर्न को ही विवादों के घेरे में ला खड़ा कर दिया है। आठ वर्ष तक चले इस मामले में जमानत के आवेदनों को खारिज किया जाता रहा।</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>मालेगांव में प्रदर्शन</strong></span><br />
<strong>मालेगांव बम विस्फोट के मामले में मुख्य आरोपी कही जाने वाली साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर तथा लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित के साथ-साथ 12 आरोपियों पर मकोका हटाकर उन्हें क्लीन चिट दिए जाने के फैसले के विरोध में मालेगांव में कांग्रेस विधायक आसिफ शेख के नेतृत्व में प्रदर्शन किया गया। मालेगांव शहर के शहीद हेमंत करकरे चौक पर विधायक शेख के नेतृत्व में हुए प्रदर्शन में केंद्र तथा राज्य सरकार के विरोध में नारेबाजी की गई। इस दौरान शेख ने कहा कि केंद्र तथा राज्य सरकारों ने अपनी सत्ता का प्रभाव दिखाकर साध्वी प्रज्ञा की रिहाई का रास्ता साफ किया है। कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया है कि साध्वी की रिहाई राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दबाव में आकर की गई है। इस मामले में पीएमओ की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। धमाके के 8 वर्ष बाद साध्वी प्रज्ञा को राहत मिल गई है। मुंबई की एनआईए की स्पेशल कोर्ट एक पूरक चार्जशीट दाखिल करके साध्वी पर लगा मकोका हटा लिया गया लेकिन आठ साल तक साध्वी ने जो कष्ट, विषाद सहन किये, जो दु:ख अपने सीने में संजोकर रखा है, आठ साल में बिताए हुए दिन क्या कोई उन्हें लौटा सकता है? रिहाई का रास्ता साफ होने के बाद अब जबकि सभी को उनके जेल से बाहर आने की प्रतीक्षा है, पर उनके जीवन के जो आठ साल बर्बाद हुए, उस नुकसान की भरपाई कौन करेगा?</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>बेगुनाही की कीमत कैसे चुकाएगी सरकार?</strong></span><br />
<strong> साध्वी को रिहाई के लिए जो भी रास्ता चुना गया है, वह उचित या अनुचित यह तो शोध का विषय है, पर अगर साध्वी वास्तव में बेगुनाह हैं, तो उनकी बेगुनाही की कीमत सरकार किस तरह चुकाएगी, यह भी कम महत्वपूर्ण बात नहीं होगी। जहां एक ओर समाजवादी पार्टी के महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष तथा विधायक अबू आसिम आजमी ने साध्वी को क्लीन चिट देने को एक साजिश करार दे दिया है, वहीं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता नबाव मलिक ने कहा है कि साध्वी तथा कर्नल की रिहाई के लिए भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी तथा केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने एनआईए पर दबाव बनाया था।</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>सपा- राकांपा विरोध में तथा भाजपा-शिवसेना समर्थन में</strong></span><br />
<strong>समाजवादी पार्टी तथा राकांपा केविपरीत भाजपा तथा शिवसेना ने साध्वी को क्लीन चिट मिलने का स्वागत किया है। महाराष्ट्र भाजपा के प्रमुख प्रवक्ता माधव भंडारी ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि कांग्रेस-राकांपा कीन आघाड़ी सरकार ने सन् 2009 में चुनाव जीतने के लिए हिंदु आतंकवाद का भ्रम पैदा किया था, इसी योजना के तहत प्रज्ञा सिंह ठाकुर को गिरफ्तार कर उन्हें मालेगांव बम धमाके में फंसाया गया। ज्ञानबूझकर लोगों के बीच भगवा आतंकवाद की दहशत फैलायी गई, जिसके फलस्वरूप साध्वी को आठ वर्ष तक जेल में असहनीय यातनाएं सहन करनी पड़ीं। मालेगांव बम विस्फोट से सबंद्ध दो फरार आरोपियों रामचंद्र कालसंग्रे तथा संदीप डांगे को बब्बर खालसा जैसे प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन से मिले होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>दो टीमों ने की जांच</strong></span><br />
<strong>मालेगांव बम कांड की जांच राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी की दो टीमों ने की थी। पहली टीम का नेतृत्व इस्पेंक्टर जनरल संजीव सिंह ने किया, जबकि दूसरी टीम के मुखिया थे इंस्पेक्टर जनरल जी.पी. सिंह। संजीव सिंह की टीम अपनी चार्जशीट तभी दायर करने वाली थी, जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार पदभार ग्रहण कर रही थी। इस टीम ने गवाहों के 164 बयान रेकार्ड किए और इस निष्कर्ष पर पहुंच रही थी कि बम ब्लास्ट का षड्यंत्र रचने में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर तथा कर्नल पुरोहित का हाथ है, लेकिन दूसरे जांच दल जिसके मुखिया जी पी सिंह थे, ने सभी गवाहों का फिर से बयान लिया और करीब 164 बयान रिकार्ड किए। सभी गवाहों ने कहा कि वे अपना बयान नए सिरे से देना चाहते हैं, और कहा कि उन्हें ब्लास्ट के षड्यंत्र का पता नहीं था। एनआईए जीपी सिंह के बयानों के आधार पर साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, कर्नल पुरोहित समेत 12 आरोपियों से मकोका हटाने का फैसला किया। </strong></p>
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