ECINet प्लेटफॉर्म – Dastak Times | दस्तक टाइम्स https://dastaktimes.org By Dastak Times Hindi News Network Tue, 27 Oct 2026 06:48:37 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2024/01/cropped-DT-ICon-copy.png ECINet प्लेटफॉर्म – Dastak Times | दस्तक टाइम्स https://dastaktimes.org 32 32 SIR पर सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग का बचाव, कहा- प्रमुख फैसले सामूहिक रूप से लिए गए https://dastaktimes.org/defense-of-election-commission-in-supreme-court-on-sir-said-major-decisions-were-taken-collectively/ Tue, 27 Oct 2026 06:48:33 +0000 https://dastaktimes.org/?p=921190 नई दिल्ली: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर उठ रहे सवालों के बीच चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपने कामकाज और निर्णय लेने की प्रक्रिया का बचाव किया है। आयोग ने अपने हलफनामे में कहा है कि SIR से जुड़े प्रमुख फैसले सामूहिक रूप से लिए गए थे और तीनों चुनाव …]]>

नई दिल्ली: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर उठ रहे सवालों के बीच चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपने कामकाज और निर्णय लेने की प्रक्रिया का बचाव किया है। आयोग ने अपने हलफनामे में कहा है कि SIR से जुड़े प्रमुख फैसले सामूहिक रूप से लिए गए थे और तीनों चुनाव आयुक्तों ने हलफनामा दाखिल करने की मंजूरी भी सर्वसम्मति से दी थी। हालांकि, आयोग के इस जवाब के बाद भी उसके भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया और दूसरे सदस्यों की भूमिका को लेकर उठे कुछ सवालों पर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुई है।

फैसलों की जानकारी को लेकर चुनाव आयुक्तों ने उठाए थे सवाल

रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में 14 बार अपनी टिप्पणियां दर्ज की थीं। कुछ मामलों में दोनों ने कहा था कि उन्हें फैसले लिए जाने के बाद इसकी जानकारी मिली। इसी वजह से विवाद केवल फैसलों को मंजूरी मिलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी सवाल है कि क्या आयोग के सभी सदस्यों को निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त जानकारी और अपनी राय रखने का अवसर मिला।

आयोग के प्रमुख ज्ञानेश कुमार पर फैसले खुद लेने के आरोप लगाए गए हैं। दूसरी ओर, आयोग ने अपने हलफनामे में निर्णयों को सामूहिक प्रक्रिया का हिस्सा बताया है। ऐसे में अलग-अलग चुनाव आयुक्तों की टिप्पणियों और आयोग के आधिकारिक जवाब के बीच के अंतर को लेकर चर्चा जारी है।

फॉर्म 6 में बदलाव को लेकर क्या है विवाद?

मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 को लेकर भी आयोग को सफाई देनी पड़ी है। रिपोर्ट के अनुसार, मई में चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने कहा था कि फॉर्म 6 में बदलाव करने के लिए निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 में संशोधन आवश्यक होगा। सुखबीर सिंह संधू ने भी इस राय का समर्थन किया था।

इसके बावजूद जुलाई में फॉर्म 6 के ऑनलाइन संस्करण में एक घोषणा जोड़ी गई। संधू को इस बदलाव की जानकारी कथित तौर पर अखबार की रिपोर्ट से मिली थी। अगस्त में उन्होंने ऑनलाइन फॉर्म में शामिल की गई घोषणा को अनधिकृत और अवैध बताया था।

अब आयोग ने अपने हलफनामे में स्पष्ट किया है कि SIR के दौरान जोड़ी गई घोषणा फॉर्म 6 में संशोधन नहीं थी, बल्कि एक अलग दस्तावेज था। हालांकि, आयोग ने यह स्वीकार किया कि ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में घोषणा को जिस तरीके से प्रदर्शित किया गया, उससे ऐसा प्रतीत हो सकता था कि फॉर्म 6 में ही बदलाव कर दिया गया है।

आयोग के मुताबिक, अधिकारियों की ओर से उठाए गए कुछ कदमों में सुधार की जरूरत थी। इसके बाद निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण प्रभाग ने 21 अक्टूबर को ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में वैधानिक फॉर्म 6 और SIR से संबंधित घोषणा को अलग-अलग करने का निर्णय लिया।

इसके बावजूद हलफनामे में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि जुलाई में ऑनलाइन फॉर्म में घोषणा जोड़ने की मंजूरी किसने दी थी। दो चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियों के बावजूद यह बदलाव कैसे लागू हुआ, इस सवाल का भी स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया।

ECINet प्लेटफॉर्म की कार्यप्रणाली पर भी सवाल

चुनाव आयोग के डिजिटल प्लेटफॉर्म ECINet को लेकर भी सवाल उठाए गए थे। इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल मतदाता सूची से जुड़े विभिन्न कार्यों में किया जाता है। आयोग ने अपने जवाब में कहा कि मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन करने की कानूनी जिम्मेदारी निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) की होती है।

आयोग के अनुसार, ERO के आदेश के बिना किसी मतदाता का नाम जोड़ा, हटाया या संशोधित नहीं किया जाता। सॉफ्टवेयर का उद्देश्य अधिकारियों को उनके वैधानिक अधिकारों के इस्तेमाल में सहायता देना है।

आयोग ने डिजिटल प्लेटफॉर्म के कानूनी अनुपालन की समीक्षा और नए आईटी मॉड्यूल की जांच के लिए विशेषज्ञ समिति की व्यवस्था का भी उल्लेख किया। इसमें आईआईटी मुंबई और भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु के विशेषज्ञों को शामिल करने का प्रावधान बताया गया है।

डेटाबेस में अधिकारों के केंद्रीकरण पर पहले भी जताई गई थी चिंता

रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने 29 मई को ही बाहरी विशेषज्ञों की मदद से आईटी सिस्टम की जांच कराने का सुझाव दिया था। उन्होंने मतदाता सूची के डेटाबेस में बदलाव करने के अधिकारों के धीरे-धीरे केंद्रीकरण को लेकर चिंता जताई थी। उनका सुझाव था कि किसी बाहरी आईआईटी विशेषज्ञ से यह प्रमाणित कराया जाए कि डेटाबेस में बदलाव करने का अधिकार केवल संबंधित वैधानिक अधिकारियों के पास हो।

सुखबीर सिंह संधू ने भी जुलाई में इस सुझाव का समर्थन किया था। हालांकि, 14 अगस्त को दर्ज अपनी टिप्पणी में उन्होंने कहा था कि उनके पहले के सुझावों पर क्या कार्रवाई हुई, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है।

आयोग के हलफनामे में विशेषज्ञ समिति गठित करने की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है, लेकिन मई में जोशी की ओर से दिए गए सुझाव का स्पष्ट जिक्र नहीं होने की बात रिपोर्ट में कही गई है।

गोवा में 97 मतदाताओं के नाम का मामला

गोवा में मतदाता सूची से जुड़े विवाद का भी हलफनामे में उल्लेख है। आयोग के अनुसार, अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो पाए 97 मतदाताओं में से 88 ने बाद में फॉर्म 6 के माध्यम से आवेदन किया था।

हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक, फरवरी में सामने आई समस्या पर आयोग का जवाब स्पष्ट नहीं है। उस समय गोवा के निर्वाचन अधिकारियों ने सात दिनों के भीतर आठ बार सॉफ्टवेयर में जरूरी बदलाव करने का अनुरोध किया था। इसका उद्देश्य हटाए गए मतदाताओं के नाम बहाल करने संबंधी उनके फैसलों को लागू करना था।

आयोग के एक उप निर्वाचन आयुक्त ने भी टिप्पणी की थी कि आईटी सिस्टम अधिकारियों की आवश्यक कार्रवाई में बाधा नहीं बन सकता। इसके बावजूद हलफनामे में 88 मतदाताओं के बाद में आवेदन करने की जानकारी तो दी गई, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि फरवरी में अधिकारियों को अपने निर्णय लागू करने में परेशानी क्यों हुई थी।

पश्चिम बंगाल में अपील दाखिल करने पर भी उठे सवाल

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम बहाल करने के आदेशों के खिलाफ दाखिल अपीलों का मुद्दा भी हलफनामे में शामिल है। आयोग ने कहा कि ये अपीलें राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के अधिकारियों ने दाखिल की थीं और इस मामले को आयोग के सामने नहीं रखा गया था।

आयोग के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत संबंधित अधिकारियों को अपील दाखिल करने का अधिकार था। हालांकि, इस मामले में भी आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया और अधिकारियों की भूमिका को लेकर उठे सभी सवालों का स्पष्ट समाधान सामने नहीं आया है।

SIR पर आयोग के जवाब के बाद भी चर्चा जारी

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपने हलफनामे के जरिए SIR से जुड़े फैसलों को सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बताया है। साथ ही, फॉर्म 6, ECINet प्लेटफॉर्म और मतदाता सूची में नाम जोड़ने या बहाल करने की प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर अपना पक्ष रखा है।

हालांकि, विभिन्न चुनाव आयुक्तों की पूर्व टिप्पणियों, ऑनलाइन फॉर्म में किए गए बदलाव और कुछ राज्यों में सामने आई तकनीकी समस्याओं को लेकर कई सवाल अब भी चर्चा में हैं। इन मुद्दों पर आयोग के हलफनामे में दी गई सफाई और उपलब्ध रिकॉर्ड के बीच की स्थिति आगे की न्यायिक प्रक्रिया में अहम हो सकती है।

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