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	<title>Gaur &#8211; Dastak Times |  दस्तक टाइम्स</title>
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	<description>By Dastak Times Hindi News Network</description>
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		<title>बांधवगढ़ में बढ़ रहा गौर का कुनबा, कान्हा में फिर बसेंगे वन भैंसे; जानें दोनों में क्या है अंतर</title>
		<link>https://dastaktimes.org/the-clan-of-gaur-is-increasing-in-bandhavgarh-forest-buffaloes-will-settle-in-kanha-again-know-what-is-the-difference-between-the-two/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Dastak Desk]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 23 Sep 2026 05:28:10 +0000</pubDate>
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<p><strong>उमरिया:</strong> मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ और कान्हा टाइगर रिजर्व में बड़े शाकाहारी वन्यजीवों के संरक्षण और पुनर्स्थापना की दिशा में काम जारी है। बांधवगढ़ में गौर यानी इंडियन बायसन की संख्या बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है, जबकि कान्हा में वन भैंसा यानी वाइल्ड बफेलो को दोबारा बसाने की प्रक्रिया चल रही है। दोनों प्रजातियां देखने में कुछ हद तक समान नजर आती हैं, लेकिन उनके आवास, खान-पान और जैविक विशेषताओं में काफी अंतर है।</p>



<p>बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक अनुपम सहाय के अनुसार, गौर एशिया का सबसे बड़ा जंगली गौवंश है। बांधवगढ़ में गौर वर्ष 1998 में विलुप्त हो गया था। इसके बाद 2011-12 में कान्हा से 50 गौर लाकर उन्हें बांधवगढ़ में दोबारा स्थापित किया गया। इसके बाद इनकी संख्या बढ़कर करीब 170 तक पहुंच गई।</p>



<p><strong>आनुवंशिक विविधता के लिए सतपुड़ा से भी लाए गए गौर</strong></p>



<p>गौर की आनुवंशिक विविधता बनाए रखने के उद्देश्य से सतपुड़ा से भी इन्हें बांधवगढ़ लाने की योजना बनाई गई। इसी क्रम में फरवरी 2025 में 23 गौर लाए गए, जिनमें 18 मादा और 5 नर थे। इसके बाद जनवरी 2026 में दूसरे चरण में 27 और गौर बांधवगढ़ पहुंचे। इनमें 22 मादा और 5 नर शामिल थे।</p>



<p>इस तरह 50 नए गौर लाने का लक्ष्य पूरा किया गया। इनकी निगरानी के लिए वीएचएफ कॉलर, हॉर्न स्लीव और ईयर टैग लगाए गए हैं। वर्तमान में बांधवगढ़ लैंडस्केप में गौर की संख्या करीब 220 से 240 के बीच बताई गई है।</p>



<p><strong>कान्हा में तीन साल में 50 वन भैंसे लाने की योजना</strong></p>



<p>कान्हा टाइगर रिजर्व में वन भैंसा यानी वाइल्ड बफेलो को फिर से बसाने की प्रक्रिया भी जारी है। कान्हा टाइगर रिजर्व के उप संचालक पीके वर्मा के अनुसार, तीन साल में 50 वन भैंसे लाने की योजना है।</p>



<p>पहले चरण में 28 अप्रैल 2026 को वन भैंसों की पहली खेप कान्हा लाई गई थी। अब तक दो खेप में 4-4 वन भैंसे लाए जा चुके हैं। यानी कुल 8 वन भैंसे कान्हा पहुंच चुके हैं।</p>



<p>शुरुआती दौर में वन भैंसों को बाड़े में रखा जाएगा। संख्या बढ़ने के बाद जरूरत के अनुसार इन्हें धीरे-धीरे प्राकृतिक रहवास क्षेत्रों में छोड़ा जाएगा। कुछ वन भैंसों को खुले क्षेत्र में और कुछ को निर्धारित क्षेत्र में रखने की योजना है, ताकि उनकी आबादी को व्यवस्थित तरीके से बढ़ाया जा सके।</p>



<p><strong>गौर और वन भैंसे में क्या अंतर है?</strong></p>



<p>गौर गौवंश से संबंधित है, जबकि वन भैंसा भैंस वंश से जुड़ा है। गौर की पहचान उसके विशाल शरीर, कंधे पर उभरे कूबड़, पीले-सफेद निचले पैरों और घुमावदार सींगों से की जा सकती है। वहीं वन भैंसे के कंधे पर गौर की तरह स्पष्ट कूबड़ नहीं होता। यह आमतौर पर गीले घास के मैदानों, दलदली क्षेत्रों और जल स्रोतों के आसपास पाया जाता है।</p>



<p>खान-पान में भी दोनों में अंतर है। गौर घास के साथ जंगल में उपलब्ध अन्य वनस्पतियां भी खाता है, जबकि वन भैंसा कठोर और ऊंची घास को भी खा सकता है। जल और नमी वाले क्षेत्रों में उगने वाली ऊंची घास को नियंत्रित करने में वन भैंसे की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।</p>



<p><strong>जंगल के ‘प्राकृतिक इंजीनियर’ क्यों हैं बड़े शाकाहारी?</strong></p>



<p>गौर और वन भैंसे जैसे बड़े शाकाहारी वन्यजीव जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र में अहम भूमिका निभाते हैं। इनके घास और अन्य वनस्पतियां खाने से अत्यधिक ऊंची घास नियंत्रित होती है और नई कोमल घास व पत्तियों को बढ़ने का अवसर मिलता है।</p>



<p>इससे चीतल और सांभर जैसे दूसरे शाकाहारी वन्यजीवों के लिए भी भोजन उपलब्ध होता है। इस तरह बड़े शाकाहारी जंगल की वनस्पति संरचना को संतुलित रखने में योगदान देते हैं। इसी वजह से गौर और वन भैंसे जैसे वन्यजीवों को जंगल के ‘प्राकृतिक इंजीनियर’ भी कहा जाता है।</p>



<p>बांधवगढ़ में गौर के संरक्षण और कान्हा में वन भैंसे की पुनर्स्थापना से मध्य प्रदेश के वन क्षेत्रों में जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने की दिशा में मदद मिलने की उम्मीद है।</p>



<p></p>
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