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	<title>Private Space Launch India &#8211; Dastak Times |  दस्तक टाइम्स</title>
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	<description>By Dastak Times Hindi News Network</description>
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		<title>भारत के स्पेस सेक्टर में आज रचेगा इतिहास! पहली बार निजी कंपनी लॉन्च करेगी ऑर्बिटल रॉकेट, मिशन आगमन पर दुनिया की नजर</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Dastak Desk]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Jul 2026 09:58:49 +0000</pubDate>
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<p><strong>नई दिल्ली:</strong> भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए आज का दिन ऐतिहासिक साबित हो सकता है। पहली बार कोई भारतीय निजी कंपनी अपने स्वदेशी ऑर्बिटल रॉकेट के जरिए उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने का प्रयास करने जा रही है। हैदराबाद स्थित स्काईरूट एयरोस्पेस अपने पहले ऑर्बिटल क्लास लॉन्च व्हीकल विक्रम-1 का परीक्षण मिशन ‘मिशन आगमन’ लॉन्च करेगी। इस मिशन की सफलता भारत के निजी स्पेस उद्योग के लिए नए अवसरों के द्वार खोल सकती है।</p>



<p>अब तक देश में उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने का दायित्व मुख्य रूप से इसरो के रॉकेट निभाते रहे हैं। ऐसे में विक्रम-1 की पहली उड़ान को भारत के निजी अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है।</p>



<p><strong>क्या है मिशन आगमन?</strong></p>



<p>मिशन आगमन, विक्रम-1 रॉकेट की पहली परीक्षण उड़ान है। इसका प्रक्षेपण सुबह 11:30 बजे श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से किया जाना है। इस मिशन के माध्यम से कंपनी अपने स्वदेशी ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल की तकनीक, क्षमता और प्रदर्शन का परीक्षण करेगी।</p>



<p><strong>क्या हैं विक्रम-1 रॉकेट की प्रमुख खूबियां?</strong></p>



<p>विक्रम-1 का नाम भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया है। यह लगभग 24 मीटर लंबा ऑर्बिटल क्लास रॉकेट है, जिसे छोटे उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित करने के लिए विकसित किया गया है।</p>



<p>रॉकेट का ढांचा हल्के कार्बन-कॉम्पोजिट स्ट्रक्चर से तैयार किया गया है। इसमें तीन सॉलिड प्रोपल्शन स्टेज हैं, जबकि ऊपरी हिस्से में ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल लगाया गया है, जिससे एक ही मिशन में कई उपग्रहों को अलग-अलग कक्षाओं में स्थापित किया जा सकेगा।</p>



<p>इसे 450 किलोमीटर ऊंचाई वाली लो-अर्थ ऑर्बिट में लगभग 350 किलोग्राम तक का पेलोड पहुंचाने के लिए डिजाइन किया गया है।</p>



<p><strong>अत्याधुनिक तकनीकों से लैस है विक्रम-1</strong></p>



<p>विक्रम-1 में पूरी तरह धातु से बने 3डी-प्रिंटेड लिक्विड इंजन का इस्तेमाल किया गया है। इस तकनीक से इंजन निर्माण की प्रक्रिया अधिक तेज और किफायती हो जाती है।</p>



<p>इसके अलावा कंपनी ने अपना स्वदेशी न्यूमेटिक स्टेज सेपरेशन सिस्टम भी विकसित किया है। कंपनी का दावा है कि इन तकनीकों से रॉकेट हल्का, भरोसेमंद और कम लागत वाला बनाया गया है।</p>



<p><strong>मिशन के साथ अंतरिक्ष में क्या-क्या जाएगा?</strong></p>



<p>मिशन आगमन के साथ कई विशेष पेलोड भी अंतरिक्ष में भेजे जाएंगे। इनमें बेंगलुरु की कंपनी द्वारा तैयार लैब-निर्मित डायमंड लोटस शामिल है।</p>



<p>इसके अलावा माइक्रोआर्ट के रूप में 18 कैरेट सोने से बना एक सूक्ष्म रॉकेट भी भेजा जाएगा, जिसके भीतर सर सीवी रमन, डॉ. विक्रम साराभाई और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की अत्यंत छोटी मूर्तियां बनाई गई हैं।</p>



<p>मिशन के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हस्तलिखित पोस्टकार्ड, जिस पर &#8216;वंदे मातरम&#8217; लिखा है, भी अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। इसके अलावा कंपनी की टीम, निवेशकों, नीति-निर्माताओं और समर्थकों के संदेश भी इस मिशन का हिस्सा होंगे।</p>



<p><strong>भारत के निजी स्पेस सेक्टर के लिए क्यों है अहम?</strong></p>



<p>यदि विक्रम-1 का परीक्षण सफल रहता है, तो भारतीय निजी कंपनियों के लिए स्वतंत्र रूप से व्यावसायिक लॉन्च सेवाएं उपलब्ध कराने का रास्ता और मजबूत होगा।</p>



<p>विशेषज्ञों का मानना है कि इससे छोटे उपग्रहों के वैश्विक लॉन्च बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ सकती है। वर्ष 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र में सुधार लागू होने के बाद निजी कंपनियों की भागीदारी लगातार बढ़ी है।</p>



<p><strong>विक्रम-एस से विक्रम-1 तक का सफर</strong></p>



<p>स्काईरूट एयरोस्पेस ने 18 नवंबर 2022 को अपना पहला निजी सब-ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-एस सफलतापूर्वक लॉन्च किया था। &#8216;प्रारंभ&#8217; मिशन के तहत यह रॉकेट लगभग 88.8 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा और निर्धारित परीक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया।</p>



<p>उसी मिशन में विकसित कई तकनीकों को अब विक्रम-1 में और उन्नत रूप में शामिल किया गया है।</p>



<p><strong>सरकारी सुधारों से मिला निजी कंपनियों को बढ़ावा</strong></p>



<p>हाल के वर्षों में सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। अंतरिक्ष नीति लागू करने, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नियम आसान बनाने, स्टार्टअप्स के लिए सीड फंड और वेंचर कैपिटल फंड उपलब्ध कराने तथा नई तकनीकों के लिए विशेष वित्तीय सहायता जैसी पहलों ने इस क्षेत्र को नई गति दी है।</p>



<p>सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014 में जहां देश में केवल एक पंजीकृत स्पेस स्टार्टअप था, वहीं फरवरी 2026 तक इनकी संख्या 400 से अधिक हो चुकी है। भारतीय स्पेस स्टार्टअप्स में अब तक 50 करोड़ डॉलर से अधिक का निवेश भी हो चुका है।</p>



<p>यदि मिशन आगमन अपने सभी निर्धारित उद्देश्यों को सफलतापूर्वक पूरा करता है, तो यह केवल स्काईरूट एयरोस्पेस की उपलब्धि नहीं होगी, बल्कि भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए एक नए युग की शुरुआत के रूप में भी देखा जाएगा।</p>



<p></p>
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