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	<title>Rainfall Deficit India &#8211; Dastak Times |  दस्तक टाइम्स</title>
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		<title>अल-नीनो की आहट से बढ़ी चिंता! अभी दिखा है ट्रेलर, अगले 5 महीने बारिश, खेती और महंगाई पर पड़ सकता है बड़ा असर</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Dastak Desk]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 19 Jun 2026 04:38:17 +0000</pubDate>
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<p><strong>नई दिल्ली:</strong> देश में मॉनसून की सुस्त शुरुआत के बीच मौसम वैज्ञानिकों ने अल-नीनो को लेकर नई चेतावनी जारी की है। विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल इसका सीमित प्रभाव दिखाई दे रहा है, लेकिन जुलाई से नवंबर के बीच इसके असर में तेजी आ सकती है। ऐसे में बारिश, खेती, जल संसाधनों और अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।</p>



<p>दक्षिण-पश्चिम मॉनसून जून की शुरुआत में केरल पहुंचा, लेकिन शुरुआती चरण में कई राज्यों में अपेक्षा से कम बारिश दर्ज की गई। मौसम विभाग का अनुमान है कि इस वर्ष पूरे मॉनसून सीजन में सामान्य से कम वर्षा हो सकती है, जिससे कई क्षेत्रों में सूखे जैसी परिस्थितियां बनने का खतरा पैदा हो गया है।</p>



<p><strong>क्या है अल-नीनो और क्यों बढ़ती है चिंता?</strong></p>



<p>अल-नीनो एक वैश्विक जलवायु प्रक्रिया है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री जल सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इसके कारण वैश्विक मौसम चक्र प्रभावित होता है और भारत तक पहुंचने वाली नमी वाली हवाओं की ताकत कमजोर पड़ सकती है।</p>



<p>मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, यही वजह है कि अल-नीनो के वर्षों में भारत में मॉनसून अक्सर कमजोर रहता है। चूंकि देश की करीब 70 प्रतिशत वार्षिक वर्षा मॉनसून से होती है, इसलिए इसका सीधा असर कृषि, जल भंडारण, बिजली उत्पादन और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।</p>



<p><strong>जुलाई से सितंबर के बीच दिख सकता है बड़ा असर</strong></p>



<p>वैज्ञानिकों का मानना है कि जून में अल-नीनो का प्रभाव अपेक्षाकृत कमजोर रहेगा, लेकिन जुलाई और अगस्त में इसकी तीव्रता बढ़ सकती है। सितंबर तक इसके और मजबूत होने की संभावना जताई जा रही है।</p>



<p>विशेषज्ञों के मुताबिक मॉनसून का सबसे महत्वपूर्ण दौर जुलाई से सितंबर के बीच होता है। यदि इसी समय अल-नीनो मजबूत हुआ तो वर्षा में और कमी आ सकती है, जिससे जलाशयों में पानी का स्तर घटने, नदियों में प्रवाह कम होने और भूजल संकट गहराने की आशंका है।</p>



<p><strong>कमजोर शुरुआत ने बढ़ाई किसानों की चिंता</strong></p>



<p>जून के पहले दो सप्ताह में कई राज्यों में सामान्य से काफी कम बारिश रिकॉर्ड की गई। महाराष्ट्र समेत कई इलाकों में वर्षा की बड़ी कमी दर्ज हुई है। इससे खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित होने लगी है।</p>



<p>धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दालों जैसी फसलें समय पर और पर्याप्त बारिश पर निर्भर करती हैं। ऐसे में मॉनसून की कमजोर शुरुआत किसानों के लिए चिंता का विषय बन गई है।</p>



<p><strong>खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर</strong></p>



<p>विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पूरे सीजन में बारिश सामान्य से कम रहती है तो खाद्यान्न उत्पादन में गिरावट आ सकती है। इसका असर किसानों की आय, कृषि आधारित रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर देखने को मिल सकता है।</p>



<p>मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में वर्षा आधारित खेती का दायरा बड़ा है। ऐसे क्षेत्रों में छोटे और सीमांत किसान सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं।</p>



<p>पशुपालन क्षेत्र पर भी असर पड़ने की आशंका है, क्योंकि कम बारिश के कारण चारे की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।</p>



<p><strong>जल संकट और गर्मी दोनों बढ़ा सकते हैं मुश्किलें</strong></p>



<p>कम बारिश का सीधा असर पेयजल और सिंचाई व्यवस्था पर पड़ सकता है। कई शहर और ग्रामीण क्षेत्र पहले से ही जल संकट का सामना कर रहे हैं। यदि मॉनसून कमजोर रहा तो पानी की उपलब्धता और प्रभावित हो सकती है।</p>



<p>इसके साथ ही अल-नीनो के कारण तापमान बढ़ने की संभावना भी जताई जा रही है। लंबे समय तक चलने वाली गर्म हवाएं और तीव्र गर्मी बुजुर्गों, बच्चों और बाहर काम करने वाले लोगों के लिए अतिरिक्त चुनौती बन सकती हैं।</p>



<p><strong>महंगाई और विकास दर पर भी पड़ सकता है प्रभाव</strong></p>



<p>कृषि उत्पादन प्रभावित होने की स्थिति में खाद्यान्न, दालों और सब्जियों की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है। इससे खाद्य महंगाई बढ़ने की आशंका है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कृषि क्षेत्र पर व्यापक असर पड़ा तो आर्थिक विकास की रफ्तार भी प्रभावित हो सकती है।</p>



<p>सरकार ने संभावित परिस्थितियों को देखते हुए विभिन्न स्तरों पर तैयारी शुरू कर दी है। सूखा राहत योजनाओं, फसल बीमा और वैकल्पिक कृषि रणनीतियों पर भी जोर दिया जा रहा है।</p>



<p><strong>इतिहास से मिले हैं कई संकेत</strong></p>



<p>पिछले दशकों के आंकड़े बताते हैं कि कई अल-नीनो वर्षों में भारत को सामान्य से कम वर्षा मिली है। हालांकि कुछ वर्षों में अन्य मौसमीय कारकों ने इसके प्रभाव को आंशिक रूप से संतुलित भी किया।</p>



<p>विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार भी हिंद महासागर से जुड़ी मौसमीय परिस्थितियां आगे चलकर कुछ राहत दे सकती हैं, लेकिन फिलहाल मॉनसून और अल-नीनो की स्थिति पर लगातार नजर बनाए रखना जरूरी है।</p>



<p><strong>जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चुनौती</strong></p>



<p>वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम में अत्यधिक उतार-चढ़ाव की घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसे में जल संरक्षण, सूखा सहनशील फसलों का उपयोग और सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों को बढ़ावा देना भविष्य की जरूरत बनता जा रहा है।</p>



<p></p>
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		<title>मॉनसून की चाल पड़ी सुस्त, देशभर में 41% बारिश की कमी; महाराष्ट्र में थमा आगे बढ़ने का सिलसिला</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Dastak Desk]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 19 Jun 2026 04:25:49 +0000</pubDate>
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<p><strong>नई दिल्ली:</strong> दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की रफ्तार इस बार उम्मीद के विपरीत धीमी पड़ गई है। 4 जून को केरल पहुंचने के बाद मॉनसून ने शुरुआती बढ़त तो दिखाई, लेकिन जून के मध्य तक आते-आते इसकी गति थम गई। स्थिति यह है कि महाराष्ट्र के दक्षिणी हिस्सों में मॉनसून आगे नहीं बढ़ पा रहा है और देशभर में सामान्य से 41 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है।</p>



<p>भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़ों के अनुसार 4 जून से 18 जून के बीच देश में केवल 42.6 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि इस अवधि में सामान्य वर्षा 72.2 मिलीमीटर होनी चाहिए थी। बारिश की कमी ने मौसम वैज्ञानिकों के साथ-साथ किसानों की चिंता भी बढ़ा दी है।</p>



<p><strong>मध्य भारत में सबसे ज्यादा बारिश की कमी</strong></p>



<p>मौसम विभाग की क्षेत्रीय रिपोर्ट के मुताबिक मध्य भारत में वर्षा की स्थिति सबसे खराब बनी हुई है, जहां सामान्य से 67 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। वहीं पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में 42 प्रतिशत, दक्षिणी प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में 22 प्रतिशत और उत्तर-पश्चिम भारत में 6 प्रतिशत वर्षा की कमी रिकॉर्ड की गई है।</p>



<p>मौसम विभाग का कहना है कि कोंकण और मध्य महाराष्ट्र सहित कई क्षेत्रों में मॉनसून पिछले कई दिनों से लगभग ठहरा हुआ है और आगे बढ़ने के लिए अनुकूल परिस्थितियां नहीं बन पा रही हैं।</p>



<p><strong>अरब सागर से मजबूत हवाओं का अभाव बना बड़ी वजह</strong></p>



<p>विशेषज्ञों के अनुसार इस बार अरब सागर से आने वाली नमी वाली तेज हवाओं का प्रवाह कमजोर है। सामान्य तौर पर यही हवाएं मॉनसून को ऊर्जा देती हैं और व्यापक वर्षा का कारण बनती हैं। लेकिन इस बार प्रशांत महासागर में विकसित हो रहे अल-नीनो प्रभाव के चलते यह प्रक्रिया प्रभावित हुई है, जिससे मॉनसून की ताकत कम पड़ रही है।</p>



<p><strong>कमजोर दक्षिण-पश्चिमी हवाओं ने घटाई नमी</strong></p>



<p>अरब सागर के ऊपर निचले स्तर की दक्षिण-पश्चिमी हवाएं कमजोर हो गई हैं। इसके कारण महाराष्ट्र के तटीय और अंदरूनी इलाकों तक पर्याप्त नमी नहीं पहुंच पा रही है। दूसरी ओर उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत से आने वाली शुष्क पश्चिमी हवाएं मॉनसूनी क्षेत्र में प्रवेश कर रही हैं, जिससे बादलों का निर्माण प्रभावित हो रहा है।</p>



<p>मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि लगातार सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ भी मॉनसून की मुख्य धारा को कमजोर कर रहे हैं। इससे उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में बारिश हो रही है, लेकिन प्रमुख मॉनसूनी क्षेत्र अपेक्षाकृत सूखे बने हुए हैं।</p>



<p><strong>कम दबाव वाले तंत्र नहीं बनने से भी बढ़ी परेशानी</strong></p>



<p>मौसम विभाग ने बताया कि अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में इस समय कम दबाव वाले क्षेत्र या चक्रवाती परिसंचरण विकसित नहीं हो रहे हैं। इसके अलावा पश्चिमी तट पर बनने वाली निम्न दबाव की पट्टी भी मजबूत नहीं है। ये दोनों प्रणालियां सामान्यतः मॉनसून को आगे बढ़ाने और व्यापक वर्षा कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।</p>



<p><strong>भूमध्य रेखा पार करने वाली हवाएं भी कमजोर</strong></p>



<p>मॉनसून के लिए नमी उपलब्ध कराने वाली भूमध्य रेखा पार करने वाली हवाओं का प्रवाह भी कमजोर पड़ा है। पश्चिमी हिंद महासागर और अरब सागर क्षेत्र में इन हवाओं की ताकत कम होने से मॉनसूनी गतिविधियों पर सीधा असर पड़ा है और वर्षा की मात्रा घट गई है।</p>



<p><strong>एमजेओ की कमजोर स्थिति से भी प्रभावित हुई बारिश</strong></p>



<p>मौसम विभाग ने मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (एमजेओ) की कमजोर स्थिति को भी मॉनसून की सुस्ती का एक बड़ा कारण बताया है। यह मौसम प्रणाली सामान्यतः हिंद महासागर के ऊपर सक्रिय होकर बादल बनने और वर्षा बढ़ाने में मदद करती है। लेकिन इस बार इसकी सक्रियता कम है और इसका प्रभाव क्षेत्र हिंद महासागर से दूर बना हुआ है, जिससे दक्षिण भारत में बादल बनने की प्रक्रिया कमजोर पड़ी है।</p>



<p><strong>खरीफ फसलों पर बढ़ा संकट</strong></p>



<p>मौसम विभाग का अनुमान है कि अगले चार से पांच दिनों तक महाराष्ट्र के अधिकांश हिस्सों में केवल छिटपुट बारिश होने की संभावना है। मॉनसून की धीमी प्रगति और अल-नीनो जैसी परिस्थितियों ने कृषि क्षेत्र की चिंता बढ़ा दी है।</p>



<p>विशेषज्ञों का कहना है कि धान, मक्का, सोयाबीन जैसी खरीफ फसलें समय पर और पर्याप्त बारिश पर निर्भर करती हैं। यदि वर्षा की कमी लंबे समय तक बनी रहती है तो बुवाई और उत्पादन दोनों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।</p>



<p></p>
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