राजस्थान हाईकोर्ट – Dastak Times | दस्तक टाइम्स https://dastaktimes.org By Dastak Times Hindi News Network Thu, 01 Oct 2026 08:50:35 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 https://dastaktimes.org/wp-content/uploads/2024/01/cropped-DT-ICon-copy.png राजस्थान हाईकोर्ट – Dastak Times | दस्तक टाइम्स https://dastaktimes.org 32 32 जस्टिस संदीप मेहता के आरोपों पर पूर्व जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा का पलटवार, बोले- पेशेवर ईर्ष्या भी हो सकती है वजह https://dastaktimes.org/former-justice-sanjeev-prakash-sharma-countered-on-the-allegations-of-justice-sandeep-mehta-and-said-that-professional-jealousy-can-also-be-the-reason/ Thu, 01 Oct 2026 08:50:33 +0000 https://dastaktimes.org/?p=909425 नई दिल्ली: राजस्थान हाईकोर्ट के पूर्व कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश और हाल ही में सेवानिवृत्त हुए जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस संदीप मेहता की ओर से लगाए गए आरोपों पर जवाब दिया है। शर्मा ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि इसके पीछे सामान्य पेशेवर ईर्ष्या की संभावना हो सकती …]]>

नई दिल्ली: राजस्थान हाईकोर्ट के पूर्व कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश और हाल ही में सेवानिवृत्त हुए जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस संदीप मेहता की ओर से लगाए गए आरोपों पर जवाब दिया है। शर्मा ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि इसके पीछे सामान्य पेशेवर ईर्ष्या की संभावना हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि जस्टिस मेहता को राजस्थान हाईकोर्ट के कामकाज में दखल देने का अधिकार नहीं था।

शर्मा ने प्रभावशाली मुकदमेदारों को लाभ पहुंचाने, रोस्टर में हेरफेर, जांच में हस्तक्षेप और किसी खास पक्ष को फायदा पहुंचाने के लिए न्यायिक अधिकारियों के तबादले के आरोपों से इनकार किया। उन्होंने कहा कि काम करने के तरीके अलग होने का मतलब यह नहीं है कि किसी एक पक्ष का तरीका गलत है। पिछले सप्ताह राजस्थान हाईकोर्ट के जज पद से सेवानिवृत्त हुए शर्मा ने कहा कि उन्हें जस्टिस मेहता से जिरह करने का अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि राजस्थान में वकीलों को उनके खिलाफ प्रदर्शन के लिए उकसाया गया।

जस्टिस मेहता ने अगस्त में सीजेआई को भेजे थे कई पत्र

अगस्त में जस्टिस संदीप मेहता ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को कई पत्र भेजे थे। इनकी प्रतियां सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के अन्य सदस्यों को भी दी गई थीं। पत्रों में उन्होंने जस्टिस शर्मा पर शक्तियों के दुरुपयोग का आरोप लगाया था।

जस्टिस मेहता का दावा था कि उन्हें जस्टिस शर्मा के खिलाफ कई शिकायतें मिली हैं, जिनसे उनकी ईमानदारी को लेकर सवाल उठते हैं। इन्हीं शिकायतों के आधार पर उन्होंने कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश को दूसरे हाईकोर्ट में स्थानांतरित करने और राजस्थान हाईकोर्ट में नए मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति की मांग की थी।

राजस्थान हाईकोर्ट के नए चीफ जस्टिस की सिफारिश

इसी महीने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जज संजय के. अग्रवाल को राजस्थान हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की। यह सिफारिश उस समय हुई, जब वकीलों के विरोध के बीच जस्टिस शर्मा छुट्टी पर चले गए थे।

जस्टिस शर्मा ने सवाल उठाया कि अगर उनके खिलाफ शिकायत थी तो वह सबसे पहले मुख्य न्यायाधीश के पास क्यों नहीं गई। उन्होंने बताया कि उन्होंने जस्टिस मेहता के चार पत्रों के जवाब दिए थे। साथ ही उन्होंने खुद सीजेआई को पत्र लिखकर पूछा था कि क्या सुप्रीम कोर्ट का कोई जज हाईकोर्ट के कामकाज में दखल दे सकता है।

साढ़े नौ साल में 88 हजार से ज्यादा मामलों का फैसला करने का दावा

जस्टिस शर्मा ने अपने कार्यकाल का बचाव करते हुए कहा कि करीब साढ़े नौ साल के दौरान उन्होंने 88 हजार से अधिक मामलों का फैसला किया। उनके मुताबिक, जिन फैसलों की सुप्रीम कोर्ट में जांच हुई, उनमें से कई फैसले बरकरार रखे गए।

उन्होंने कहा कि जजों को अपनी सीमाओं की जानकारी होनी चाहिए और यह भी पता होना चाहिए कि कहां बोलना है और कहां नहीं। उनके अनुसार, जज अपने फैसलों के जरिए बोलते हैं और इन फैसलों की न्यायिक समीक्षा होती है। उन्होंने यह भी कहा कि जजों को सोशल मीडिया के आधार पर नहीं परखा जाना चाहिए और आम लोगों का न्यायपालिका पर भरोसा प्रभावित नहीं होना चाहिए।

आरोपों की वजह पर बोले- पेशेवर जलन की संभावना

आरोपों की वजह पूछे जाने पर शर्मा ने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है, लेकिन पेशेवर जलन इसकी एक वजह हो सकती है। उन्होंने बताया कि 2011 में दोनों को सीनियर एडवोकेट बनाया गया था।

शर्मा के मुताबिक, उन्होंने सीनियर एडवोकेट बनने के लिए आवेदन नहीं किया था और फुल कोर्ट ने उन्हें सीनियर एडवोकेट बनाया था। वहीं, जस्टिस मेहता ने इसके लिए आवेदन किया था। शर्मा ने कहा कि वह पहली पीढ़ी के वकील हैं, जबकि जस्टिस मेहता न्यायिक परिवार से आते हैं। उनका आरोप है कि पदोन्नति के समय जस्टिस मेहता ने यह सुनिश्चित किया कि वह मुख्य न्यायाधीश न बनें।

दोनों ने कभी साथ काम नहीं किया: शर्मा

जस्टिस शर्मा ने कहा कि दोनों ने कभी साथ काम नहीं किया। वकालत के दौरान जस्टिस मेहता जोधपुर में और वह जयपुर में थे। जज बनने के बाद भी दोनों अलग-अलग स्थानों पर रहे।

उनके मुताबिक, जस्टिस मेहता मुख्य रूप से आपराधिक मामलों से जुड़े रहे, जबकि वह संवैधानिक मामलों के वकील रहे हैं। शर्मा ने कहा कि जस्टिस मेहता पिछले चार साल से राजस्थान से बाहर हैं, इसलिए उन्हें राजस्थान की समस्याओं के बारे में कैसे पता होगा।

बूंदी के मुकदमेदार से मुलाकात पर भी दी सफाई

बूंदी के एक मुकदमेदार से मुलाकात के आरोप पर शर्मा ने कहा कि उनकी पत्नी भी अत्री समुदाय से हैं और रघुबीर सिंह अत्री उनके साले नहीं बल्कि भाई-बहन के रिश्ते में हैं। शर्मा के अनुसार, अत्री छुट्टियों में आए थे और वह उन्हें मंदिर ले गए थे। बाद में इस मुलाकात को मुकदमे को प्रभावित करने की कोशिश के तौर पर पेश किया गया।

शर्मा ने बताया कि अत्री का मुकदमा 1992 से चल रहा है। उनके भाई की ओर से दायर मुकदमे को खारिज कराने का आवेदन अत्री ने दिया था, जिसे खारिज कर दिया गया। शर्मा ने कहा कि अगर वह मामले को प्रभावित कर रहे होते तो आवेदन मंजूर करा सकते थे।

न्यायिक अधिकारियों के तबादले के आरोप को बताया गलत

जस्टिस शर्मा ने जस्टिस मेहता के उस दावे को भी खारिज किया, जिसमें अत्री के मामले में अनुकूल फैसला नहीं देने वाले न्यायिक अधिकारियों के तबादले का आरोप लगाया गया था। उन्होंने इसे गलत बताते हुए कहा कि करीब 800 तबादले किए गए थे।

उनके अनुसार, आम तौर पर तबादले रजिस्ट्रार जनरल करते हैं और इसमें संबंधित अधिकारी ने किसी स्थान पर कितना समय बिताया है, समेत कई पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है।

रोस्टर में हेरफेर के आरोप पर भी दिया जवाब

रोस्टर में हेरफेर के आरोप पर शर्मा ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश के पास मामलों को एक जगह से दूसरी जगह भेजने का अधिकार होता है। इसके लिए वकीलों की समस्याओं और सरकार की ओर से मामलों के लंबित रहने समेत कई तरह की जानकारियां प्राप्त होती हैं।

उदयपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी से जुड़े बहुकरोड़ रुपये के मामले पर शर्मा ने कहा कि तीन जजों के खुद को मामले से अलग करने के बाद उन्होंने इसकी सुनवाई की थी। उनके मुताबिक, एडवोकेट जनरल ने उनसे अपील की सुनवाई करने का अनुरोध किया था। वकीलों के आंदोलन को लेकर शर्मा ने कहा कि यदि मांगों का कोई आधार नहीं है तो जजों को उन्हें खुश करने की जरूरत नहीं है।

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राजस्थान HC के चीफ जस्टिस को हटाने की मांग, SC जज संदीप मेहता ने CJI सूर्यकांत को लिखे 3 पत्र; केस लिस्टिंग से लेकर तबादले तक गंभीर आरोप https://dastaktimes.org/demand-for-removal-of-chief-justice-of-rajasthan-hc-sc-judge-sandeep-mehta-wrote-3-letters-to-cji-surya-kant/ Wed, 26 Aug 2026 05:49:07 +0000 https://dastaktimes.org/?p=901862 जयपुर: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता ने राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा को पद से हटाने की मांग की है। जस्टिस मेहता ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को 2 अगस्त, 10 अगस्त और 17 अगस्त को पत्र लिखे हैं। इन पत्रों में जस्टिस शर्मा पर मामलों की सूची में कथित हेरफेर …]]>

जयपुर: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता ने राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा को पद से हटाने की मांग की है। जस्टिस मेहता ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को 2 अगस्त, 10 अगस्त और 17 अगस्त को पत्र लिखे हैं। इन पत्रों में जस्टिस शर्मा पर मामलों की सूची में कथित हेरफेर और प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। जस्टिस मेहता के मुताबिक, जस्टिस शर्मा अगले महीने सेवानिवृत्त होने वाले हैं।

जस्टिस मेहता ने आरोप लगाया है कि कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने प्रभावशाली और अमीर पक्षकारों से जुड़े मामलों की सूची को प्रभावित किया और अपनी प्रशासनिक शक्तियों का इस्तेमाल किया। उन्होंने कॉलेजियम से जस्टिस शर्मा का तत्काल राजस्थान से तबादला करने का अनुरोध भी किया है।

जजों को कार्रवाई और तबादले की धमकी देने का आरोप

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, 2 अगस्त के पत्र में जस्टिस मेहता ने राजस्थान दौरे के दौरान हाईकोर्ट के कई जजों से हुई मुलाकात का जिक्र किया। उनके अनुसार, इन जजों ने जस्टिस एसपी शर्मा के व्यवहार को लेकर नाराजगी जताई थी। पत्र में आरोप लगाया गया है कि जस्टिस शर्मा साथी जजों को कार्रवाई और तबादले की धमकी देते हैं और इसके लिए मुख्य न्यायाधीश से अपनी निकटता का हवाला देते हैं।

जस्टिस मेहता ने अपने पत्रों में CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की एक हालिया टिप्पणी का भी उल्लेख किया है। एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान दोनों जजों की पीठ ने सेवानिवृत्ति के करीब पहुंचने पर बाहरी कारणों से आदेश पारित करने और रिटायरमेंट से पहले ‘छक्के मारने’ की प्रवृत्ति पर चिंता जताई थी।

उदयपुर की बेशकीमती जमीन के मामलों की सूची पर सवाल

जस्टिस मेहता ने राजस्थान हाईकोर्ट की दो खंडपीठों के आदेशों का भी अपने पत्रों में हवाला दिया है। पत्र के अनुसार, उदयपुर की बेहद मूल्यवान जमीन से जुड़े अपीलों के एक समूह को जयपुर में जस्टिस शर्मा की अपनी पीठ के सामने सूचीबद्ध किया गया। जस्टिस मेहता ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि जस्टिस शर्मा खुद पहले एक फैसले में स्पष्ट कर चुके थे कि जोधपुर स्थित प्रधान पीठ से जुड़े ऐसे मामलों को जयपुर नहीं भेजा जा सकता।

जोधपुर में नए कोर्ट भवन के उद्घाटन को लेकर भी शिकायत

17 अगस्त के पत्र में राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस उमा शंकर व्यास से जुड़ी शिकायत का भी उल्लेख किया गया है। पत्र के अनुसार, जस्टिस व्यास ने साथी जजों के सामने आरोप लगाया था कि जस्टिस शर्मा उनकी पत्नी के प्रति कथित तौर पर प्रतिशोधात्मक रवैया अपना रहे हैं। उनकी पत्नी जिला न्यायपालिका में वरिष्ठ अधिकारी हैं।

जस्टिस व्यास की कथित शिकायत के अनुसार, जस्टिस शर्मा ने अपनी ‘मनमर्जी और सनक’ के चलते जोधपुर में नए कोर्ट भवन के उद्घाटन को रोक दिया। जस्टिस मेहता ने पत्र में इसे संस्थान के लिए ‘माफ न किए जाने योग्य’ नुकसान बताया है।

लोक अदालत में नियुक्तियों को लेकर भी आरोप

एक अलग शिकायत अधिवक्ता पूजा त्रिपाठी ने सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ को भेजी थी। इसकी प्रतियां जस्टिस मेहता समेत 16 अन्य लोगों को भी भेजी गई थीं। शिकायत में आरोप लगाया गया कि जस्टिस शर्मा ने अपने पद का इस्तेमाल जयपुर और अजमेर की स्थायी लोक अदालतों में अपने करीबी लोगों की नियुक्तियां कराने के लिए किया। इनमें उनके बचपन के एक दोस्त और दो जिला जजों के पति-पत्नी के नाम शामिल बताए गए हैं।

शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने हाईकोर्ट में जज के पद पर पदोन्नति के लिए चार महिला वकीलों के नाम आगे बढ़ाए। शिकायतकर्ता के अनुसार, ये चारों महिला वकील सक्रिय प्रैक्टिस में नहीं हैं और प्रत्येक का संबंध किसी वरिष्ठ वकील या सेवानिवृत्त जज से बताया गया है, जिन्हें जस्टिस शर्मा का करीबी माना जाता है।

राजस्थान से तत्काल तबादले की मांग

जस्टिस मेहता के पत्रों में जस्टिस एसपी शर्मा को राजस्थान हाईकोर्ट का स्थायी मुख्य न्यायाधीश बनाए जाने के कथित प्रयासों का भी उल्लेख है। उन्होंने इन प्रयासों को गंभीर आरोपों के बावजूद जारी बताया है। जस्टिस मेहता ने कॉलेजियम से जस्टिस शर्मा को तत्काल राजस्थान से बाहर स्थानांतरित करने का अनुरोध किया है।

उन्होंने CJI सूर्यकांत से किसी अन्य राज्य के मुख्य न्यायाधीश को राजस्थान हाईकोर्ट भेजने की मांग भी दोहराई है। जस्टिस मेहता के अनुसार, उनके अनुरोध को लगातार नजरअंदाज करना संस्थान के हित में नहीं होगा।

नवंबर 2016 में राजस्थान हाईकोर्ट के जज बने थे शर्मा

जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा को नवंबर 2016 में राजस्थान हाईकोर्ट का जज नियुक्त किया गया था। वर्ष 2022 में उनका तबादला पटना हाईकोर्ट कर दिया गया। स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए उन्होंने वापस राजस्थान भेजे जाने का अनुरोध किया था, लेकिन तत्कालीन CJI डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम ने मार्च 2023 में इस अनुरोध को ठुकरा दिया और उन्हें पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट भेजने की सिफारिश की।

मई 2025 में कॉलेजियम के एक नए प्रस्ताव में उन्हें राजस्थान वापस भेजने की सिफारिश की गई। इसके बाद वह राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बने। जस्टिस मेहता के पत्र के मुताबिक, वह इस पद पर 10 महीने से अधिक समय से हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट पहुंचे जस्टिस संदीप मेहता

जस्टिस संदीप मेहता भी राजस्थान हाईकोर्ट से ही सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं। उन्हें 30 मई 2011 को राजस्थान हाईकोर्ट का जज नियुक्त किया गया था। फरवरी 2023 में वह गुवाहाटी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने। इसके बाद 9 नवंबर 2023 को उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त किया गया।

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राजस्थान हाईकोर्ट से आसाराम को 20 दिन की पैरोल, फरार होने की आशंका को अदालत ने माना निराधार https://dastaktimes.org/the-court-considered-the-fear-of-asaram-absconding-from-rajasthan-high-courts-20-day-parole-as-baseless/ Tue, 04 Aug 2026 10:45:50 +0000 https://dastaktimes.org/?p=896921 जोधपुर: नाबालिग से यौन उत्पीड़न मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे आसाराम उर्फ आशुमल को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। जोधपुर सेंट्रल जेल में बंद 87 वर्षीय आसाराम को अदालत ने 20 दिन की पैरोल मंजूर कर दी है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस की उस आशंका को स्वीकार नहीं …]]>

जोधपुर: नाबालिग से यौन उत्पीड़न मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे आसाराम उर्फ आशुमल को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। जोधपुर सेंट्रल जेल में बंद 87 वर्षीय आसाराम को अदालत ने 20 दिन की पैरोल मंजूर कर दी है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस की उस आशंका को स्वीकार नहीं किया, जिसमें कहा गया था कि पैरोल मिलने पर वह फरार हो सकता है। अदालत ने कहा कि इस आशंका के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया।

सिर्फ आशंकाओं के आधार पर पैरोल से इनकार नहीं किया जा सकता

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायाधीश संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने पैरोल याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि केवल संभावित आशंकाओं के आधार पर किसी कैदी को पैरोल से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि आसाराम पैरोल का दुरुपयोग करेगा या न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करेगा।

राज्य सरकार ने किया था पैरोल का विरोध

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि जिला कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट जोधपुर की अध्यक्षता में हुई बैठक में आसाराम के 20 दिन की पैरोल के आवेदन को पहले ही खारिज किया जा चुका था। सरकार का तर्क था कि पुलिस ने पैरोल के दौरान उसके फरार होने की आशंका जताई थी।

सरकार ने राजस्थान प्रिजनर्स रिलीज ऑन पैरोल रूल्स-1958 के नियम 14 (ए) का हवाला देते हुए कहा कि राजस्थान के अलावा गुजरात में भी आसाराम के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज है और गांधीनगर की अदालत उसे दोषी ठहरा चुकी है। ऐसे में पैरोल दिए जाने से कानून-व्यवस्था और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां उत्पन्न हो सकती हैं।

मेडिकल स्थिति और सुरक्षा का भी दिया गया हवाला

राज्य सरकार ने यह भी दलील दी कि आसाराम का इलाज चल रहा है और मेडिकल अधिकारी ने उसे पैरोल के लिए पूरी तरह फिट घोषित नहीं किया है। साथ ही शिकायतकर्ता के परिवार की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई गई।

हालांकि, अदालत ने कहा कि इन सभी तर्कों के समर्थन में कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया। इसलिए केवल संभावनाओं के आधार पर पैरोल से इनकार करना उचित नहीं माना जा सकता।

13 साल के जेल रिकॉर्ड को माना अहम

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि आसाराम करीब 13 वर्ष, 1 माह और 24 दिन से जेल में बंद है। इस दौरान उसे पहले भी अंतरिम जमानत मिली थी, लेकिन उसने कभी उसका दुरुपयोग नहीं किया। अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई उदाहरण नहीं है, जिससे यह साबित हो कि उसने किसी गवाह, पीड़ित पक्ष या समाज के लिए खतरा उत्पन्न किया हो।

इन्हीं तथ्यों के आधार पर अदालत ने पुलिस की फरार होने की आशंका को निराधार मानते हुए पैरोल देने का फैसला सुनाया।

इन शर्तों के साथ मिली पैरोल

राजस्थान हाईकोर्ट ने आसाराम को 50 हजार रुपये के व्यक्तिगत मुचलके और 25-25 हजार रुपये के दो सक्षम जमानतदारों की शर्त पर 20 दिन की पैरोल मंजूर की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि राजस्थान में सुनाई गई सजा के संबंध में राज्य के पैरोल नियम लागू होंगे, जबकि गुजरात सहित अन्य राज्यों में दर्ज मामलों की कार्रवाई वहां के संबंधित कानूनों के तहत जारी रहेगी।

मई में उम्रकैद की सजा बरकरार रखी थी

गौरतलब है कि 27 मई को राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग से यौन उत्पीड़न मामले में आसाराम को सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा था। अदालत ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए उसकी अपील खारिज कर दी थी। अब पैरोल याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने सीमित अवधि के लिए राहत प्रदान की है।

पैरोल अवधि पूरी होने के बाद आसाराम को निर्धारित समय के भीतर जोधपुर सेंट्रल जेल में आत्मसमर्पण करना होगा। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पैरोल का लाभ तय नियमों और शर्तों के अधीन ही रहेगा।

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राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला! पाकिस्तान सीमा से जुड़े मस्जिद-मदरसा नोटिस पर रोक नहीं, सरकार को समिति बनाने के निर्देश https://dastaktimes.org/big-decision-of-rajasthan-high-court-no-ban-on-mosque-madrasa-notice-related-to-pakistan-border/ Tue, 14 Jul 2026 05:10:31 +0000 https://dastaktimes.org/?p=894332 नई दिल्ली: भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे क्षेत्रों में मस्जिदों, मदरसों और दरगाहों को जारी नोटिस के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि, हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि प्रत्येक मामले की अलग-अलग जांच के लिए एक समिति …]]>

नई दिल्ली: भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे क्षेत्रों में मस्जिदों, मदरसों और दरगाहों को जारी नोटिस के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि, हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि प्रत्येक मामले की अलग-अलग जांच के लिए एक समिति गठित की जाए, जिसकी सिफारिश के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

राजस्थान सरकार ने अंतरराष्ट्रीय सीमा से 50 किलोमीटर के दायरे में स्थित कुछ मस्जिदों, मदरसों और दरगाहों को स्थान खाली करने के नोटिस जारी किए थे। इन नोटिसों को चुनौती देते हुए संबंधित पक्षों ने राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

हाईकोर्ट ने अंतरिम राहत देने से किया इनकार

मामले की सुनवाई के दौरान राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकार की कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग स्वीकार नहीं की। अदालत ने कहा कि आगे किसी भी ध्वस्तीकरण या बेदखली जैसी कार्रवाई से पहले गठित समिति प्रत्येक मामले की अलग-अलग समीक्षा करेगी और उसी के आधार पर सिफारिशें देगी।

‘मामला धार्मिक नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा’

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति समीर जैन ने कहा कि यह मामला धार्मिक भेदभाव का नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। अदालत ने यह भी कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का महत्व अपनी जगह है, लेकिन संवेदनशील सुरक्षा संबंधी जानकारी सार्वजनिक करने से राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। इसी आधार पर अदालत ने पीर मोहम्मद शाह जिलानी दरगाह समिति और अन्य याचिकाकर्ताओं की याचिकाएं खारिज कर दीं।

याचिकाकर्ताओं ने नोटिस को दी थी चुनौती

याचिका में जैसलमेर, बाड़मेर और बीकानेर जिलों में भारत-पाकिस्तान सीमा से 50 किलोमीटर के दायरे में स्थित मस्जिदों, मदरसों और दरगाहों को जारी नोटिस को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि केंद्र सरकार द्वारा जून में सीमा क्षेत्र में स्थित ऐसे धार्मिक स्थलों को हटाने की घोषणा के बाद ये नोटिस जारी किए गए।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत में यह भी दलील दी कि कई मस्जिदों और मदरसों पर पहले ही कार्रवाई हो चुकी है और उन्हें भी इसी तरह की कार्रवाई का डर है।

सरकार ने बताया कानूनी प्रक्रिया का पालन

राजस्थान सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि सभी नोटिस पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए जारी किए गए हैं। सरकार ने यह भी बताया कि संबंधित पक्षों को अपील करने और निर्माण से जुड़े मामलों में निर्धारित प्रक्रिया का लाभ लेने का अवसर उपलब्ध है।

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आसाराम को हाईकोर्ट से बड़ा झटका, उम्रकैद की सजा बरकरार; जोधपुर जेल में किया सरेंडर https://dastaktimes.org/big-blow-to-asaram-from-high-court-life-sentence-upheld/ Fri, 29 May 2026 06:11:28 +0000 https://dastaktimes.org/?p=888491 जोधपुर: नाबालिग से दुष्कर्म मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने उसकी अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। अंतरिम जमानत रद्द होने के बाद आसाराम ने गुरुवार शाम जोधपुर सेंट्रल जेल पहुंचकर …]]>

जोधपुर: नाबालिग से दुष्कर्म मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने उसकी अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। अंतरिम जमानत रद्द होने के बाद आसाराम ने गुरुवार शाम जोधपुर सेंट्रल जेल पहुंचकर सरेंडर कर दिया।

राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही माना। न्यायमूर्ति अरुण मोंगा और न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि पीड़िता जिस व्यक्ति को भगवान की तरह मानती थी, उसी ने उसके विश्वास और आस्था को तोड़ा। अदालत ने टिप्पणी की कि इस अपराध ने पीड़िता की गरिमा, स्वतंत्रता और मासूमियत को गहरी चोट पहुंचाई है।

हाईकोर्ट के फैसले के बाद आसाराम के जोधपुर पहुंचने की सूचना मिलते ही एयरपोर्ट के बाहर समर्थकों की भारी भीड़ जुट गई। वह कार में बैठकर समर्थकों का अभिवादन करते हुए पाल स्थित अपने आश्रम पहुंचा। वहां कुछ समय रुकने के बाद वह मेडिकल जांच के लिए एम्स गया और जरूरी प्रक्रिया पूरी करने के बाद शाम को जोधपुर सेंट्रल जेल पहुंचकर आत्मसमर्पण कर दिया।

गौरतलब है कि वर्ष 2018 में जोधपुर की विशेष अदालत ने आसाराम को नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। मामला वर्ष 2013 का है, जब पीड़िता जोधपुर स्थित आश्रम पहुंची थी और वहां उसके साथ दुष्कर्म की घटना हुई थी।

हालांकि हालिया फैसले में हाईकोर्ट ने आसाराम को सामूहिक दुष्कर्म के आरोपों से राहत दे दी है, लेकिन दुष्कर्म के मुख्य मामले में उसकी उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा गया है। अब आसाराम के वकील इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं।

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राजस्थान हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी: ‘वैध शादी में पत्नी से संबंध रेप नहीं’, पति पर दर्ज FIR रद्द https://dastaktimes.org/rajasthan-high-courts-big-comment-relations-with-wife-in-valid-marriage-are-not-rape-fir-lodged-against-husband-canceled/ Mon, 18 May 2026 14:18:35 +0000 https://dastaktimes.org/?p=887186 जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए पति के खिलाफ दर्ज रेप की FIR को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि यदि शादी वैध है और महिला बालिग है, तो पति पर बलात्कार का मामला नहीं बनता। कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून का …]]>

जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए पति के खिलाफ दर्ज रेप की FIR को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि यदि शादी वैध है और महिला बालिग है, तो पति पर बलात्कार का मामला नहीं बनता। कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून का दुरुपयोग कर बदले की भावना से मुकदमे दर्ज करना न्याय व्यवस्था पर बोझ बढ़ा रहा है।

यह फैसला जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकल पीठ ने सुनाया। अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि एक ही मामले में पति पर दहेज प्रताड़ना और रेप जैसे आरोप लगाना गंभीर सवाल खड़े करता है। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या कोई महिला एक ही समय में किसी पुरुष की पत्नी भी हो सकती है और उसी के खिलाफ रेप पीड़िता भी?

कोर्ट बोला- वैध विवाह में रेप का मामला नहीं बनता

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि यदि विवाह कानूनी रूप से वैध है और शादी के समय पत्नी की उम्र 18 वर्ष से अधिक थी, तो पति के खिलाफ बलात्कार का मुकदमा किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने पति के खिलाफ दर्ज रेप का मामला रद्द करते हुए उसे राहत दे दी।

कोर्ट ने कहा कि इस तरह की “फिजूल मुकदमेबाजी” अब एक तरह का फैशन बन चुकी है, जिसकी वजह से अदालतों में मामलों का बोझ लगातार बढ़ रहा है और वास्तविक पीड़ितों को समय पर न्याय नहीं मिल पा रहा।

पति-पत्नी विवाद के बाद दर्ज हुआ था केस

मामले के अनुसार, महिला ने पति के साथ विवाद के बाद उसके खिलाफ दहेज उत्पीड़न और रेप समेत कई गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया था। मामला हाईकोर्ट पहुंचने पर अदालत ने केस की परिस्थितियों और तथ्यों की जांच की।

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि मामला व्यक्तिगत रंजिश और प्रतिशोध की भावना से प्रेरित प्रतीत होता है। कोर्ट ने कहा कि जब विवाह वैध है, तब रेप का आरोप टिक नहीं सकता।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित ‘नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ’ फैसले का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि न्यायपालिका की गरिमा और कानून की पवित्रता बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है।

कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया कि वैवाहिक विवादों को कानूनी प्रक्रिया और आपसी सहमति के जरिए सुलझाया जाना चाहिए, न कि कानून को बदले के हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाए।

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लड़के और लड़की की शादी की न्यूनतम उम्र एक समान हो, केंद्र को नोटिस https://dastaktimes.org/supreme-court-marriage-age-male-female/ Tue, 02 Feb 2021 10:35:27 +0000 https://dastaktimes.org/?p=497169 नई दिल्ली : लड़के और लड़की के लिए शादी की न्यूनतम उम्र एकसमान करने की मांग को लेकर दिल्ली और राजस्थान हाईकोर्ट में में लंबित याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर किये जाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिकाओं में कहा गया है कि शादी की उम्र …]]>
लड़के और लड़की की शादी की न्यूनतम उम्र एक समान हो, केंद्र को नोटिस

नई दिल्ली : लड़के और लड़की के लिए शादी की न्यूनतम उम्र एकसमान करने की मांग को लेकर दिल्ली और राजस्थान हाईकोर्ट में में लंबित याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर किये जाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिकाओं में कहा गया है कि शादी की उम्र में ये अंतर पितृसत्तात्मक सोच का परिचायक है।

दिल्ली हाईकोर्ट में यह याचिका भाजपा नेता और वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय ने दायर की है। याचिका में कहा गया है कि युवतियों की शादी की उम्र 18 वर्ष करना भेदभाव के बराबर है।

याचिका में कहा गया

युवक और युवतियों की शादी की न्यूनतम आयु में फर्क करना हमारे पितृसत्तात्मक समाज की मानसिकता को दर्शाता है। इसके पीछे कोई वैज्ञानिक वजह नहीं है। यह प्रावधान युवतियों के साथ भेदभावपूर्ण है। याचिका में कहा गया है कि पुरुषों की शादी करने की उम्र 21 वर्ष है जबकि महिलाओं की शादी करने की उम्र 18 वर्ष है। यह प्रावधान लैंगिक समानता और लैंगिक न्याय के साथ साथ महिलाओं की गरिमा के खिलाफ है।

महिला महिला को अपने पति से कम आंका जाता

याचिका में कहा गया है यह एक सामाजिक सच्चाई है कि शादी के बाद महिला महिला को अपने पति से कम आंका जाता है और उसमें उम्र का अंतर और भेदभाव बढ़ाता है। कम उनकी पत्नी उम्मीद की जाती है कि वह अपने से बड़े उम्र के पति का सम्मान करें। याचिका में युवक और युवती दोनों की शादी करने की न्यूनतम उम्र एक समान 21 वर्ष करने की मांग की गई है।

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असिस्टेंट प्रोफेसर पद: अकादमिक रिकॉर्ड की शर्त को चुनौती की याचिका सुनवाई https://dastaktimes.org/high-court-order/ Sat, 07 Nov 2020 08:55:30 +0000 https://dastaktimes.org/?p=481496 राजस्थान हाईकोर्ट ने असिस्टेंट प्रोफेसर पद की भर्ती में अच्छा अकादमिक रिकॉर्ड होने की शर्त को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के बाद याचिकाकर्ता को प्रोविजनली आवेदन करने की अनुमति देने के निर्देश दिए हैं। साथ ही भर्ती का नतीजा जारी नहीं करने और उसे बंद लिफाफे में रखने को कहा है। न्यायाधीश संदीप …]]>

राजस्थान हाईकोर्ट ने असिस्टेंट प्रोफेसर पद की भर्ती में अच्छा अकादमिक रिकॉर्ड होने की शर्त को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के बाद याचिकाकर्ता को प्रोविजनली आवेदन करने की अनुमति देने के निर्देश दिए हैं। साथ ही भर्ती का नतीजा जारी नहीं करने और उसे बंद लिफाफे में रखने को कहा है।

न्यायाधीश संदीप मेहता तथा न्यायाधीश देवेन्द्र कछवाहा की खंडपीठ में याचिकाकर्ता डा.सुनीता साध की ओर से अधिवक्ता निखिल डूंगावत व अधिवक्ता निहार जैन ने केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए कानून एवं राज्य सरकार द्वारा बनाए गए कानून मे विविधता व विसंगति को चुनौती देते हुए कहा कि राजस्थान लोक सेवा आयोग ने 2 नवंबर को असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर भर्ती की अधिसूचना जारी की है, जिसमें पात्रता के लिए एक शर्त अच्छा अकादमिक रिकॉर्ड भी है।

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उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी और कॉलेज में शिक्षक और अकादमिक स्टाफ की भर्ती यूजीसी रेग्यूलेशंस 2018 से निर्धारित होती है, जिसमें ऐसी कोई शर्त नहीं दी गई है जबकि आयोग की यह शर्त अवैधानिक है।

खंडपीठ ने कहा कि याची को प्रोविजनली आवेदन की अनुमति दी जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस अंतरिम आदेश से याची का कोई अधिकार सृजित नहीं होगा। उसके चयन का अधिकार याचिका के अंतिम निस्तारण के अधीन रहेगा।

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सुप्रीम कोर्ट में राजस्थान के बागी विधायकों पर 11 बजे सुनवाई https://dastaktimes.org/hearing-on-rajasthan-rebel-mlas-in-supreme-court-at-11-am/ Mon, 27 Jul 2020 04:53:38 +0000 http://dastaktimes.org/?p=460318 नई दिल्ली (एजेंसी): राजस्थान के सियासी मामले पर स्पीकर सीपी जोशी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच आज यानि 27 जुलाई को सुबह 11 बजे सुनवाई करेगी। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने 23 जुलाई को राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। उसके बाद …]]>

नई दिल्ली (एजेंसी): राजस्थान के सियासी मामले पर स्पीकर सीपी जोशी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच आज यानि 27 जुलाई को सुबह 11 बजे सुनवाई करेगी। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने 23 जुलाई को राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। उसके बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने 24 जुलाई को स्पीकर के नोटिस पर यथास्थिति रखने का आदेश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि हाईकोर्ट के आदेश पर अमल हमारे फैसले पर निर्भर करेगा। कोर्ट ने कहा था कि इस मसले पर विस्तार से सुनवाई करने की जरूरत है।

इस मामले में राजस्थान कांग्रेस के बागी गुट के नेता सचिन पायलट ने भी कैविएट याचिका दायर की है। स्पीकर की याचिका में कहा गया है कि होटो होलोहॉन मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार अयोग्यता के मामले में स्पीकर जबतक फैसला नहीं ले लेता, कोर्ट कोई दखल नहीं दे सकता है। याचिका में कहा गया है कि स्पीकर को कारण बताओ नोटिस भेजने का अधिकार है। स्पीकर की भूमिका की व्याख्या सुप्रीम कोर्ट और संविधान ने की है।

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हाईकोर्ट के जज ने बताया मोर को ब्रह्मचारी, सोशल मीडिया पर खूब उड़ा मजाक https://dastaktimes.org/%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%88%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a4%9c-%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%8b/ Fri, 02 Jun 2017 05:37:39 +0000 http://dastaktimes.org/?p=161936 जयपुर :  अपने रिटायरमेंट के दिन गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने का सुझाव देने और मोर को ब्रह्मचारी बताने वाले राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस महेश चंद्र शर्मा विवादों में घिर गए हैं। कोर्ट में की गई उनकी टिप्पणियों को लेकर सोशल मीडिया पर विवाद छिड़ गया। टि्‌वटर, फेसबुक और वाट्‌सएप पर तरह-तरह के मैसेज …]]>
जयपुर :  अपने रिटायरमेंट के दिन गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने का सुझाव देने और मोर को ब्रह्मचारी बताने वाले राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस महेश चंद्र शर्मा विवादों में घिर गए हैं। कोर्ट में की गई उनकी टिप्पणियों को लेकर सोशल मीडिया पर विवाद छिड़ गया। टि्‌वटर, फेसबुक और वाट्‌सएप पर तरह-तरह के मैसेज और फोटोज वायरल होने लगे। इनमें उनकी टिप्पणियों का खूब मजाक बनाया गया।

जानिये क्या कहता है आज का राशिफल, दिनांक – 02 जून, 2017, दिन – शुक्रवार

 
हालांकि, कुछ लोग उनके समर्थन में भी नजर आए। जस्टिस शर्मा ने यह भी कहा था कि वे शिवभक्त हैं और यह फैसला आत्मा की आवाज है। उन्होंने 139 पेज के फैसले में कहा था कि गायों की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है। यह सुझाव देने के चंद घंटे बाद वे रिटायर हो गए।
मोर ब्रह्मचारी है
जस्टिस शर्मा ने एक चैनल से कहा, ‘मोर राष्ट्रीय पक्षी क्यों है? वह ब्रह्मचारी रहता है। इसके आंसुओं से ही मोरनी गर्भवती होती है। मोर पंख भगवान कृष्ण ने इसलिए ही लगाया, क्योंकि वह ब्रह्मचारी है। गाय भी इतनी गुणी है कि वह राष्ट्रीय पशु बन सकती है।’ हालांकि, वैज्ञानिक कसौटी पर यह दावा सच नहीं है। 

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– मोर के बच्चे ने मोर से पूछा कि पापा मैं कैसे पैदा हुआ था। मोर ने कहा-मत पूछ बेटा बड़ी दुःख भरी कहानी है, सुनकर तू रो देगा और मैं दादा बन जाऊंगा।-निशा सिद्धू
– मैं शर्त लगा सकता हूं कि कल राजस्थान हाईकोर्ट से रिटायर हुए जस्टिस शर्मा जल्दी ही आरएसएस परिवार ज्वॉइन कर लेंगे।-राकेश अग्रवाल
 
– गाय को माता, बकरी को बहन, मुर्गी को बेटी और इंसान को राष्ट्रीय मूर्ख घोषित कर दो।-डॉ. टीएन शर्मा
 
– मोर का मूड नहीं होता तो वह मोरनी से कहता है-पुष्पा मुझे आंसू पसंद नहीं हैं।-टी एस सुधीर
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