अपनी भीतरी यात्रा के हम स्वयं साक्षी

प्रवासी साहित्य-संसार में अनिलप्रभा कुमार का नाम अचीन्हा-अजाना नहीं है। अपनी दक्ष लेखनी से आप सामाजिक विद्रूप को, कटु सत्य को परत दर परत मार्मिक कविताओं-कहानियों में उकेरती अभिव्यक्त करती हैं। अनिल जी विलियम पैट्रसन यूनिवर्सिटी, न्यूजर्सी में हिन्दी भाषा और साहित्य की प्राध्यापिका हैं। आपने सात वर्षों तक अन्तर्राष्ट्रीय समाचार संस्था “विज़न्यूस” में तकनीकी-संपादक के रूप में काम किया तथा वॉयस आफ़ अमेरिका के न्यूयॉर्क संवाददाता के रूप में कार्य करते हुए मदर टेरेसा, सत्यजित रे और पंडित रविशंकर जैसी विभूतियों का अविस्मरणीय साक्षात्कार भी लिया था। व्यवहार से बहुत ही निश्छल-मधुर अनिल जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के विविध पहलुओं पर बातचीत कर रही हैं ‘दस्तक टाइम्स’ की साहित्य -संपादिका डॉ.सुमन सिंह

-डॉ. सुमन सिंह

पूछने की गुस्ताख़ी कर रही हूँ कि ‘अनिल प्रभा कुमार’ क्या बचपन में मिला मूल नाम है या कि आपने बाद में इसमें कुछ जोड़ा ?

-अरे, सुमन जी, यह “अनिल” नाम मेरी मां को अच्छा लगा तो उसने अपनी पहली संतान का रख दिया। उनके मन में शायद कभी यह प्रश्न उठा ही नहीं कि यह पुरुष वाची नाम है। कॉलेज में डॉ. मधुर मालती सिंह ने इस पर अपने स्नेह से स्वीकृति दे दी कि “अनिल की प्रभा” बिल्कुल स्त्रियोचित नाम है हालांकि मुझे “प्रभा” बहुत औपचारिक और बेगाना सा लगता है। रही सही क़सर न्यूयॉर्क में प्रवेश करते समय वीज़ा अधिकारियों ने मेरे पति के नाम का तग़मा “कुमार” भी मेरे नाम के साथ टंकित कर दिया। बस अब यह नाम ही मेरी पहचान है। इसी नाम से पुकारे जाने पर मैं पलट कर देखती हूँ।

आपकी रचनाओं में एक सशक्त -निर्भीक स्त्री-मन का साक्षात्कार होता है। यह वैचारिक दृढ़ता-निर्भीकता परिस्थितिजन्य है या कि बचपन में मिले परिवेश का प्रतिफल है ?

– हम आज जो भी हैं एक दिन में तो बने नहीं। हमारे अतीत का, संस्कारों का, परिवेश, अनुभव और परिस्थितियों का बहुत सूक्ष्म सा, तिल-तिल योगदान रहता है जिसे हम कभी स्पष्ट रूप से रेखांकित भी नहीं कर पाते। मैं भी पितृसत्तात्मक परिवेश में पली हूँ पर सिर झुकाकर बंधी-बंधाई परम्पराओं और गलत लगने वाली मान्यताओं को स्वीकार कभी नहीं कर पाई। मेरी माँ मानसिक रूप से एक सशक्त औरत थीं। उनके व्यवहार और बातों से मुझ तक एक अबोला संदेश पहुंचा है कि मुझे सिर्फ इसलिए गलत बातों के साथ समझौता नहीं करना है क्योंकि मैं एक औरत हूँ। मुझे प्रश्न करने का अधिकार है। मुझे एक स्वतंत्र विचारों वाली स्त्री के रूप में जीने का अधिकार है जो स्वयं सही और गलत का चुनाव करे। मर्यादा और नियम उसके चुने हुए हों। मूल्य वह निर्धारित करे। यदि मैं अपनी सोच में निर्भीक हूँ तो इसे मेरी शिक्षा और परिवेश ने धार दी है। शायद पश्चिमी देश में आने से भी दृष्टि का विस्तार हुआ हो। स्थितियों को एक नये कोण से देखने का अवसर उपलब्ध हुआ हो। जब मैं आपने आस-पास गलत घटित होते हुए देखती हूँ तो विद्रोह का लावा मेरे अन्दर उफनता है। शायद वही सब कुछ जो मैं हूँ, मेरे लेखन में भी झलक जाता है। मै सायास ऐसा नहीं करती।

अपने भीतर की सृजनात्मकता से आपका पहला परिचय कब हुआ मतलब वह पहली रचना कौन सी थी जिसने आपको लेखिका होने का अहसास कराया ?

– मैने अपनी पहली ही कहानी “खाली दायरे” ज्ञानोदय के नई कलम अंक प्रतियोगिता में भेजी थी और उसे प्रथम पुरस्कार भी मिल गया परन्तु उससे लेखिका होने के अहसास जैसी कोई बात नहीं हुई। हाँ,अच्छा लगा था। लगा कि शायद मुझे लिखते रहना चाहिए। विवाह के उपरान्त मेरे अलेखन में कई दशक बीत गए। जब मैने अपनी दूसरी पारी शुरू की तो साहित्य की दुनिया से कटे होने और काफी कुछ आत्मविश्वास की कमी के कारण उस समय मै अपनी रचनाएं प्रकाशन के लिए नहीं भेजती थी पर जब “वर्तमान साहित्य” के महाप्रवासी विशेषांक में न सिर्फ मेरी रचनाएं ही छपीं बल्कि उन पर बहुत प्रशंसात्मक समीक्षा भी लिखी तो मुझे लगा कि हां शायद मैं लिख सकती हूँ।

विदेश जाना कैसे हुआ ?

– मै विदेश में अपनी इच्छा से नहीं आई। अपने सारे सपनों, महत्वकांक्षाओं और आत्मीय सम्बन्धों की गठरी पीछे छोड़कर, केवल अपने पति की महत्वाकांक्षाओं में योग देने के लिए मैं नींव का पत्थर बन इस ठंडे देश में आ गई। मेरी औसत कहानी है। यहां आई लगभग सभी औरतों जैसी।

परदेस ने आपको व्यक्तिगत और रचनात्मक स्तर पर कितना प्रभावित किया ?

– प्रवासवास ने तो मेरे भीतरी रचनाकार को काले पानी की सज़ा ही दे डाली। इतना बेगानापन कि मैं ही इस नए परिवेश में गुम होती गई। ज़मीन पराई, लोग अनजाने, कोई अपनी भाषा में बात करने वाला नहीं और न ही यहां की सभ्यता न संस्कृति की समझ। बस, थी तो नई धरती पर जड़ें जमाने की जुझारु प्रतिबद्धता। मेरी एक मित्र कहती हैं, हमारे भाग्य में यशोधरा बनना लिखा है बुद्ध नहीं। बस यशोधरा बनी राहुलों को पालती रही, जबकि पति अपनी महत्वाकांक्षाओं की सीढ़ियां चढ़ते रहे।
वॉयस ऑफ़ अमेरिका के लिए रिपोर्ट लिखना या लेखकों और कलाकारों के साक्षात्कार लेना शायद उस समय कलम की स्याही को सूखने से बचाने का छिटपुट प्रयत्न रहा होगा। समय बीतने के साथ मुझे इस नई ज़मीन पर, नए देश को, स्थितियों को नए नज़रिए से देखने का अवसर मिला। जो कुछ मुझे थाती में मिला था उसे और गर्व के साथ सहेजा। जो लगा कि दमघोंटू है उसे छोड़कर सांसों में ताज़गी भरने का भी अवसर मैने लपक लिया। मुझे अपनी पहचान को मान्यता देने के लिए स्वतंत्र माहौल मिला। सोच को यहां आकर धार ही नहीं मिली बल्कि पंखों को लम्बी उड़ान भरने की क्षमता भी। मेरे लेखन में आए इस साहस का श्रेय शायद इसी प्रभाव से आया हो।

आपने ‘वायस ऑफ़ अमेरिका के लिए ढेर सारे साक्षात्कार लिए हैं ,कोई अविस्मरणीय घटना या व्यक्तित्व जिसने आपको प्रेरित-प्रभावित किया ?

– यूं तो बहुत से अविस्मरणीय अनुभव हैं। लिखने बैठूंगी तो कितने ही पृष्ठ रंग जाएंगे। लेकिन एक अनुभव अभी भी भीतर तक भिगो देता है वह है संयुक्त राष्ट्र के भवन में, एक ही बेंच पर, बमुश्किल एक फ़ीट की दूरी पर बैठकर मदर टेरेसा से बातें करना। मै बस उन्हें मंत्रमुग्ध निहारे जा रही थी उनके चेहरे और उनके हाथों, उनके भावों को। जैसे वह कोई अलौकिक व्यक्ति हों, मै उनके प्रभामंडल से अभिभूत थी। वहां कड़ी सुरक्षा के कारण मै उनके साथ कोई तस्वीर नहीं ले सकी पर मुझे वह कभी बिसरी ही नहीं।

आप गद्य-पद्य दोनों विधाओं में लिखती हैं, प्रिय विधा कौन सी है ?

– कविता मै लिखती नहीं वह तो क्षणिक उद्वेग में अपने आप लिखी जाती है। मुझे लगता है कि मैं जो कहना चाहती हूँ उसे अभिव्यक्त करने के लिए शायद मुझे कहानी के माध्यम का सहारा चाहिए।

आपकी रचनाओं की स्त्री बहुत ही गंभीर, यथार्थवादी, अपने स्व के प्रति सचेत और मुखर है। यह मुखरता आपकी किस दौर की रचनाओं में अधिक दिखाई देती है ?

– मेरे लेखन का कारण ही मेरे भीतरी लड़ाई को आवाज़ देने की कोशिश था। शायद समय के साथ-साथ ज्यों-ज्यों मैं, अपने स्व के प्रति सचेत होती गई, उसका प्रतिबिम्ब भी मेरी रचनाओं में आता गया हो। स्वयं अपने लेखन का विश्लेषण कर पाना कठिन है जबकि अपनी भीतरी यात्रा के साक्षी हम सदैव रहते हैं। समय और परिवेश के प्रति यदि आप सचेत हैं तो आपका संवेदनशील रचनाकार समाज की विषमताओं, असंगतियों और अन्याय के प्रति मुखर हुए बिना रह ही नहीं सकता।

स्त्री -विमर्श और दलित विमर्श ने साहित्य की मुख्यधारा को समय-समय पर बहुत आन्दोलित किया है,आपकी दृष्टि में इन दोनों विमर्शों ने अपने -अपने वर्ग को कैसे और कितना प्रभावित किया है ?

– स्त्री विमर्श और दलित विमर्श साहित्य में नए नहीं हैं। इनके प्रति जीवन में जो दमन चक्र, क्रूरताएं और न्याय होता आ रहा है उसके विरोध में जागरूक, प्रगतिशील और संवेदनशील विचारकों , स्त्री- पुरुषों दोनों ने हमेशा आवाज़ उठायी है। प्रथाएं तोड़ने के लिए, समाज से टक्कर लेने में, समाज की सोच बदलने में ये आन्दोलन एक बहुत सशक्त अस्त्र हैं। आजकल स्त्री सम्बन्धी सरोकारों के प्रति सचेत होने से साहित्य में इस विषय पर बहुलता से लिखा जा रहा है। कई बार नारे लगाने के जोश में हम मुख्य विषय से भटक भी जाते हैं। जहां स्त्री-विमर्श पर ज़्यादा शोर मचाया जा रहा है वहां बात केवल नारी देह मुक्ति तक ही अटक कर रह जाती है। स्त्री-विमर्श देह-विमर्श का पर्याय नहीं है। देह से परे भी स्त्री है। उसको समानता, सम्मान देने की भी बात असल ज़िन्दगी में क्यों नहीं उठती? क्योंकि स्त्री है, भले ही पढ़ी-लिखी है, बराबरी का आर्थिक योगदान करती है, कोई फर्कनहीं पड़ता। उसका दर्जा दोयम ही रहता है। विमर्श तक ही क्यों रह जाती हैं ये सब बातें, व्यवहार में क्यों नहीं आ पातीं? ख़ासकर जो इसका झंडा उठाए खड़े हैं, वही क्यों अपनी स्त्रियों को सबसे ज़्यादा प्रताड़ित करते हैं? दूसरी ओर जो स्त्रियां इसके पक्ष में खड़ी हैं, वे ही दूसरी ओर खड़ी स्त्री की पीड़ा समझने में क्यों असमर्थ हैं? स्त्री-विमर्श महानगरीय बुद्धिजीवियों की मानसिक विलासिता तक ही आकर रह गया है। जिन्हें इसकी ज़रूरत है उन तक तो पहुंचता ही नहीं। वे अभी भी मानवता के मूलभूत अधिकारों से जूझ रही हैं।

प्रवासी साहित्यकार कहलाना कैसा लगता है?

– भारत से बाहर रहने की अवधि, भारत में रहे जाने की अवधि को पार कर चुकी है। अब जब परदेश में रहते हैं तो मन चाहे माने या न माने, व्यावहारिक रूप से प्रवासी तो हम हो ही गए हैं। जहां तक “साहित्यकार” माना जाता है, मेरे लिए यही पर्याप्त है। प्रवासी-अप्रवासी तो सुविधा के लिए बनाए गए खांचे हैं।

आप विलियम पैट्रसन यूनिवर्सिटी ,न्यू जर्सी में हिन्दी-भाषा और साहित्य की प्राध्यापिका हैं इसलिये जानना चाहती हूँ कि वहाँ हिन्दी भाषा और साहित्य की स्थिति क्या है ?आपके अध्यापकीय अनुभव से भी रूबरू होना चाहती हूँ?

– अमेरिका के अधिकांश विश्वविद्यालयों में हिन्दी भाषा मध्य-पूर्वी या दक्षिण-एशियाई विभागों के अन्तर्गत ही पढ़ाई जाती है। हिन्दी यहां विदेशी भाषा की श्रेणी में आती है। जिसका तात्पर्य यह है कि चार महीने के सत्र के भीतर छात्रों को देवनागरी लिपि में लिखना, पढ़ना और बोलने का प्राथमिक ज्ञान हो जाना चाहिए। यहाँ क्योंकि भारतीय मूल के युवा ही नहीं बल्कि आमेरिकी और दूसरी संस्कृतियों के छात्र भी होते हैं तो उन सब में तालमेल करना और अंग्रेज़ी माध्यम से हिन्दी भाषा पढ़ाना भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। चाहे हम कुछ भी कहें, हिन्दी फ़िल्मों का हिन्दी भाषा सीखने में भारी योगदान रहा है। कई नई पीढ़ी के युवाओं ने स्पष्ट, पूरी ईमानदारी से बताया कि उनके हिन्दी भाषा सीखने के पीछे सबसे बड़ा कारण यही है कि वे हिन्दी फ़िल्मों के संवाद समझना चाहते हैं। छात्रों को हिन्दी में बोलने में ज़्यादा रुचि होने का एक मूल कारण यह है कि जहां भारतीय मूल के छात्रों में अपने सम्बन्धियों से अपनी भाषा में बात करने की ललक होती है वहीं अमरीकी विद्यार्थी भारत जाकर वहां के आम आदमी से सम्प्रेषण करना चाहते हैं। दुख तब होता है जब ये लोग इतने उत्साह और उमंग से भरकर, ढेर सारा आर्थिक व्यय करके भारत जाते हैं और महानगरों से लौटकर निराश और आहत चेहरा लिए कहते हैं, “प्रोफ़ेसर वहां तो कोई हिन्दी बोलता ही नहीं। वहां सभी कहते हैं कि हम तो केवल घर के सेवकों के साथ ही हिन्दी बोलते हैं।” सोचती हूं क्या करूं अपनी राष्ट्र भाषा पर लगे इस धब्बे का? उन्हें समझाती हूँ कि यदि तुम भारत के गौरव, इतिहास, साहित्य, संगीत, दर्शन और धर्म के प्रति जिज्ञासा रखते हो तो आम जन की यह भाषा ही तुम्हें उस लक्ष्य तक पहुंचा पाएगी।

आजकल आपकी क्या व्यस्तता है ?

– बहुत सी कहानियां हैं जो पिछले तीन- चार वर्षों से प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं, बस उन्हें समेट-संवार कर दूसरा कहानी संग्रह तैयार कर रही हूँ। एक उपन्यास का कथानक भी पिछले कई वर्षों से मन-मस्तिष्क पर हावी है, उसका भी लिख कर कर्ज़ चुकाने का इरादा है।

-अनिलप्रभा कुमार
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Aksh414@hotmail.com