‘अपने दरिया में मौज़ प्यासी है’

- in दस्तक-विशेष

ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि मैं पहाड़ के अपने घर में रहूं, सुबह तैयार होकर हवाई जहाज या हेलीकॉप्टर सेवा से लखनऊ जाऊं और दिन भर वहां काम करके रात को फिर गांव लौट आऊं । गोण्डा, बस्ती या चित्रकूट, बांदा की तरफ रहने वाले अपनी निजी कार या बेहतरीन सार्वजनिक बस या टैक्सी या मेट्रो रेल सेवा से विभिन्न शहरों, कस्बों में काम पर जाते और शाम को लौट आते। बिजली, पानी और बढ़िया सड़कें गांवों तक होतीं और चुस्त सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था हर जगह सुलभ होती। हम प्राकृतिक सौंदर्य और अप्रदूषित वातावरण में सुकून से रहते। बच्चों के लिए वहीं बेहतरीन स्कूल कॉलेज होते, बीमारों के लिए सभी सुविधाओं से युक्त अस्पताल होते।

Naven Joshi
नवीन जोशी

 कोई दस-बारह वर्ष पहले लखनऊ की मशहूर लाल बारादरी में स्थित ललित कला केंद्र में प्रख्यात चित्रकार जतिन दास व्याख्यान दे रहे थे। चित्रकला पर बोलते-बोलते वे जीवन में आ रहे अजूबे, विसंगत बदलावों और उनके कारण बढ़ रही कला विहीनता पर बात करने लगे थे। कहने लगे कि अब मकानों की बजाय दस गुणा दस के छोटे-छोटे दड़बेनुमा फ्लैट बन रहे हैं, जिनमें घरों के परम्परागत आंगन नहीं हैं, आंगन में अचार डालती दादी नहीं है। आंगन में लम्बे-लम्बे बाल सुखाती बहू-बेटी नहीं हैं। जीवन ऐसे ब्लॉकों में बदल गया है कि कला और सौंदर्यप्रियता खो गई है। इसलिए आज के जीवन में कला का लोप हो गया है। यह अलग बात है कि आर्कीटेक्चर से लेकर पहनावे तक में कला और सौंदर्यप्रियता का खूब दिखावा हो रहा है। उस दिन जतिन दास की इस बात ने मुझे बहुत गहरे उद्वेलित कर दिया था। उन्होंने और भी बातें कही थीं, लेकिन मेरा मन इसी में अटका रहा और हिंदुस्तान के अपने साप्ताहिक कॉलम में मैंने इसी उद्वेलन पर लिखा था- घरों से गायब होते आंगन का विलाप ।
Captureदिल्ली-मुम्बई जैसे महानगरों में मकानों के ब्लॉकों और दड़बों में बदलने का क्रम काफी पहले शुरू हो चुका था। उत्तर प्रदेश के नोएडा और गाजियाबाद में भी बहुत तेजी से अपार्टमेंट बनने लगे थे, लेकिन अपनी राजधानी लखनऊ समेत बाकी जिलों में तब भी अपने घर के सपने में एक अदद आंगन और सामने छोड़े गए दस फुटी लॉन का सपना मौजूद था। आवास विकास परिषद तथा शहरी विकास प्राधिकरणों से मकान का नक्शा पास कराने के लिए पीछे दस फुट आंगन और सामने थोड़ा लॉन दिखाना जरूरी होता था। दो मकानों के बीच छोटा-सा गलियारा भी अनिवार्य होता था, लेकिन उस दिन जतिन दास की बात से व्यथित मन ने जब लखनऊ को उस तरह देखना शुरू किया तो पाया कि ये आंगन,लॉन और गलियारा बहुत तेजी से गायब हो रहे हैं, मैं याद करने लगा था कि आंगन में छोटी-छोटी क्यारियां होती थीं, उनमें फूल खिलते थे। फूलों पर तितलियां मंडराती थीं और बच्चे उन चंचल, खूबसूरत तितलियों को पकड़ने के लिए भागते थे। आंगन में नीम के पेड़ पर कोयल कूकती थी और फाख्ते का जोड़ा तिनके-तिनके बीन कर घोंसले बनाया करता था। गौरैया कमरे के रोशनदान में बसेरा करती थी। आंगन में अचार पड़ता था और पापड़ सूखते थे। आंगन में मां निश्चिंत होकर बच्चों को छाती का दूध पिलाती थी और लोरी गुनगुनाती थी। अब दो कमरों की कोठरी में धूप नहीं आती । दादी का गठिया और बहू के गीले बाल कोठरी की सीलन में टीसते-रिसते रहते हैं।

जीवन से बेदखल प्यारी चीजें-

यह दस-बारह साल पुरानी बात थी और आज? पिछले एक दशक में लखनऊ ही नहीं प्रदेश के बहुत सारे छोटे-बड़े शहरों में हजारों की संख्या में ब्लॉकनुमा छोटी कोठरियों वाले अपार्टमेंट बन गए। आंगनों वाले मकान तोड़-तोड़कर पांच-छह मंजिला या इससे भी ऊंचे अपार्टमेंट बन गए। आंगन से जुड़े दैनंदिन जीवन के तमाम कार्य-व्यापार बंद हो गए, स्पंदन थम गए और देखिए कि पिछले कुछ वर्षों से हम ‘गौरैया बचाओ दिवस मनाने लगे’ हैं। इस विडम्बना पर 20 मार्च 2010 के अपने कॉलम में मैंने लिखा था, प्रकृति से, प्रकृति की सुंदर रचनाओं से मनुष्य का साझा अब नही रहा। हाते पट गए, पेड़ कट गए, पुराने घर-आंगन तोड़कर अपार्टमेंट बन गए। एसी वगैरह ने रोशनदानों की जरूरत खत्म कर दी और खिड़की-दरवाजे सदा बंद रखने की अनेक मजबूरियां निकल आईं। कीटनाशकों, उर्वरकों ने कीट,पतंगों और पक्षियों पर रासायनिक हमला बोल दिया। प्रकृति से दूर जाते हमारे जीवन से बहुत कुछ बाहर चला गया। गौरैया, तितली, वगैरह भी, कितनी जरूरी और प्यारी चीजें हमारे जीवन से बहुत तेजी से गायब होती जा रही हैं, ऐसी चीजें जो जीवन को खूबसूरत बनाती थीं, उसे अर्थ देती थीं, अपने पर्यावरण के साथ तालमेल बनाए रखते हुए जीना सिखाती थीं। इन सब प्यारी चीजों में हमारी भाषा-बोलियां, गीत-संगीत, स्वाद और हवा, पानी जिंदा रहते थे और इनसे हमारी जड़ें हरी रहती थीं। हम, ‘हम’ होते थे। सामूहिक जीवन था हमारा, पड़ोसी से प्यार और सुख-दुख का नाता। दड़बों की दीवारों में पड़ोसी खो गए। फिर रिश्ते कैसे रह जाते। अब हम क्या होते जा रहे हैं!

चरमराते शहर और उजड़ते गांव, सबसे बड़ा और भयानक बदलाव जो हुआ है वह है गांवों का उजड़ना और उससे तेजी से शहरों का विकराल होना। गांवों से शहरों की ओर आबादी का पलायन नयी बात नहीं है, लेकिन पिछले दस वर्षों में यह इतना भयावह हो गया है कि ‘गांवों का देश भारत’ वाली परिभाषा ही उलटती जा रही है। सन 2011 की जनगणना में हमारी 11 फीसदी आबादी महानगरी बतायी गई थी जिसके 2031 में 40 फीसदी हो जाने का अनुमान है। इसी रफ्तार से 2051 में देश की जनसंख्या का 50 प्रतिशत बड़े शहरों में रह रहा होगा। तब हम गांवों का देश नहीं रह जाएंगे।

हमारा होना भी अब कितनी चुनौतियों से घिरा है! पेरिस में जब ग्लोबल वार्मिंग पर डेढ़ सौ से ज्यादा देश माथापच्ची कर रहे थे तब दिल्ली की हवा में इतना जहर फैला था कि मास्क पहनने की सलाह दी गई। गर्भवती महिलाओं-बच्चों को घर भीतर दुबके रहने को कहा जा रहा है। चीन की राजधानी बीजिंग में खतरनाक ‘स्मॉग’ के कारण रेड अलर्ट घोषित करना पड़ा, जिसमें स्कूल-कॉलेज बंद किए गए। उससे पहले सिंगापुर में भी ऐसा ही हुआ। इसके रुकने के कोई आसार नहीं हैं। जीवन की गति और तथाकथित विकास की दिशा बना ही ऐसी दी गई है। लगता है हमारी गाड़ी सर्वथा विपरीत दिशा में हांकी जा रही है और हमारा उसकी गति और दिशा पर कोई नियंत्रण ही नहीं है।

हमारे स्वाद का हाल देखिए

चंद हफ्तों के लिए मैगी क्या बंद हुई, बच्चों का मुंह लटक गया। मां का दूध सूख जाने पर भी ऐसी व्याकुलता नहीं होती। अब मैगी बाजार में वापस आ रही है तो छोटे बच्चों से लेकर युवा तक आनंदित हैं और मैगी पार्टी की तस्वीरें सोशल साइट्स पर सगर्व पोस्ट कर रहे हैं। हमारी पीढ़ी की जमीनी, अपनी माटी की चीजें बाजार के जादूगरों ने कैसे हर लीं और हमने उन्हें खुशी-खुशी हर ले जाने दिया। नवउदारीकरण से उपजे तथाकथित विकास की चकाचौंध में हमने देखा ही नहीं कि हम क्या अपना रहे हैं और क्या हमसे छीना जा रहा है। भारतीय खाने की विविधता और पौष्टिकता की सर्वत्र चर्चा होती है, लेकिन माताओं की शिकायत है कि पराठा-पूरी या दाल, भात, रोटी सामने रखो तो बच्चे कहने लगते हैं कि कुछ अच्छा ‘ खिलाओ’.
कुछ अच्छा माने मैगी, पास्ता,केएफसी, जाने क्या-क्या। आज यह हर घर की समस्या है। क्या त्रासदी है कि स्वदेशी का राग अलापने और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के खिलाफ झण्डा उठाने वाले बाबा रामदेव अपनी कम्पनी के नूडल्स लेकर बाजार में आ गए हैं। मैगी पर रोक लगने के बाद उन्हें मुनाफे का अच्छा मौका दिखा होगा। मैकरोनी, स्पाघेटी और वर्मिसेली वे पहले से बेच ही रहे हैं। हमला बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का हो या तथाकथित भारतीय आश्रमों का देसी स्वाद तो धीरे-धीरे मारे जा रहे हैं।
यह सामाजिक-सांस्कृतिक हमला बड़े शहरों से सीधे गांवों तक पहुंच गया है। गांवों के मेलों, हाटों, उत्सवों, ब्याह, काजों में सबसे ज्यादा मांग ‘चाऊमीन’ वगैरह की हो रही है। गांवों के साप्ताहिक हाटों में लाल-हरे और जाने कैसे-कैसे सॉस से सजे ठेले हाफ और फुल प्लेट चाऊमीन के रेट लटकाए सबके आकर्षण का केंद्र बने दिखते हैं। सांस्कृतिक संध्याओं में लोक गीतों की बजाय फिल्मी धुनों पर ‘लोकनृत्य’ होते हैं। लोक संगीत और भाषा-बोली का हाल वैसा ही हो गया है जैसा किसी ढाबे में प्याज,लहसुन का छौंका लगाकर पकाई गई मैगी का हो सकता है।

गीत-संगीत और भाषा-बोली का गुम व्याकरण-

सुबह घूमने निकलता हूं तो देखता हूं कि बूढ़ों से लेकर महिलाओं तक और खासकर युवाओं का पहनावा कितना बदल गया है। शॉट्र्स,टी, शर्ट, वगैरह जो बच्चों-किशोरों का पहनावा था अब सभी ने मजे से अपना लिया है। कुर्ता,पाजामा,धोती या साड़ी, सलवार जैसी ड्रेस अब पिछड़ेपन की निशानी माने जाने लगे हैं। बड़े-बड़े मॉल के शोरूम देखिए, कैसी-कैसी ड्रेस सजाए बैठे हैं। फैशन और डिजायन की तरक्की से कहीं ज्यादा पश्चिम की भौण्डी नकल ज्यादा छा गई। लखनऊ का मशहूर ‘हैण्डलूम हाउस’ हज़रतगंज का अपना शोरूम बंद करके पिछले साल गोरखपुर चला गया। उनके मैनेजर ने अफसोस के साथ बताया था कि हथकरघे की बनी बढ़िया काम वाली छह गजी साड़ियों की बिक्री लखनऊ में कम होती चली गई थी, इसलिए-यहां यह बात साफ कर देना जरूरी है कि खान-पान या पहनावे के परिवर्तन अत्यंत स्वाभाविक हैं। जीवन का ढर्रा बदला है। महिलाएं घर की चारदीवारी से निकल कर अब हर मुश्किल और कठिन काम बराबरी से कर रही हैं। खान-पान और पहनावे का सम्बंध दिनचर्या और सुविधा से है। इसलिए साड़ी या सलवार कुर्ते की जगह जींस-टॉप या दूसरी ड्रेस अपनाने में कतई हर्ज नहीं। बल्कि अपनाने ही चाहिए। इसी तरह खान-पान। मैगी हो पिज्जा या केएफसी या ढेरों दूसरे विदेशी व्यंजन उन्हें खाने में कोई हर्ज नहीं। बल्कि, दुनिया भर के स्वाद जरूर लेने चाहिए। आज पूरी दुनिया मुट्ठी में है तो जितनी हो सके भाषाएं सीखिए पहनावे धारण कीजिए और खान-पान बरतिए। कोई डण्डा नहीं चला रहा कि बाटी-चोखा, आलू, पूरी, हलवा, डोसा, पोहा, वगैरह ही गले से नीचे धकेलते रहिए या धोती, कुर्ता, लुंगी, साड़ी ही धारण कीजिए, लेकिन यह जरूर देखा जाना चाहिए कि अपने स्वाद, पहनावे और भाषा-बोलियों के साथ कैसा सलूक हम कर रहे हैं। जी हां, खान-पान और भाषा-बोलियों का परस्पर अंतरंग सम्बंध है और पिछले एक दशक में यह बहुत दरका है। जो बदलाव बिना सोचे-विचारे हम जीवन में अपनाते जा रहे हैं वे हमारी भाषाओं को भी मार रहे हैं।
स्वाद छिनता है तो अपनी बोली, भाषा, लोकगीत, संगीत सब जाते रहते हैं। क्या जरूरी है कि हम पहनावा बदलने के साथ भाषा भी बदल लें, बोली छोड़ दें और लोकोक्तियों-मुहावरों को मर जाने दें? आप पश्चिमी संगीत पसंद करने को स्वतंत्र हैं, खूब रंैप सुनिए और डांस करिए, लेकिन अपने लोक गीत-संगीत की हत्या करना क्यों जरूरी है? अपनी जड़ों का संगीत भी क्यों नहीं अंतर्राष्ट्रीय फलक पर गूंज सकता? दिक्कत दुनिया भर की चीजें बरतने में नहीं है। दिक्कत है हमारे सोच में कि अपनी चीजों को पिछड़ेपन की निशानी मान कर उनकी घोर उपेक्षा किए जा रहे हैं और बाहरी चीजों को प्रगति और आधुनिकता का प्रतीक मान कर आंखें बंद करके अपनाए जा रहे हैं। यह नहीं देख रहे कि इससे हो क्या रहा है।
हमारी विविध लोक सांस्कृतिक विरासत का क्या से क्या हो गया। लोक गीत-संगीत और नृत्य के नाम पर जो परोसा जा रहा है वह सिर्फ फैशन में उसे ‘फोक’ कहलाता है, लेकिन वह ऐसा भयानक सांस्कृतिक प्रदूषण है कि अब भी बच रहे माटी से जुड़े लोग माथा पीट रहे हैं। हिंदी अखबारों की भाषा देखिए। युवा पीढ़ी से जुड़ने के नाम पर जो छप रहा है वह क्या है? उसमें हिंदी बची न उसका व्याकरण और न अंग्रेजी ही ठीक से अपनाई जा रही है। व्याकरण के बिना भी क्या कोई भाषा हो सकती है? पिछले एक दशक में हमने बहुत तेजी से अपनी भाषा खोई है।

चरमराते शहर और उजड़ते गांव-

सबसे बड़ा और भयानक बदलाव जो हुआ है वह है गांवों का उजड़ना और उससे तेजी से शहरों का विकराल होना, गांवों से शहरों की ओर आबादी का पलायन नयी बात नहीं है, लेकिन पिछले दस वर्षों में यह इतना भयावह हो गया है कि ‘गांवों का देश भारत’ वाली परिभाषा ही उलटती जा रही है।
सन 2011 की जनगणना में हमारी 11 फीसदी आबादी महानगरी बताई गई थी जिसके 2031 में 40 फीसदी हो जाने का अनुमान है। इसी रफ्तार से 2051 में देश की जनसंख्या का 50 प्रतिशत बड़े शहरों में रह रहा होगा। तब हम गांवों का देश नहीं रह जाएंगे। गांवों का देश नहीं कहलाने पर स्यापा करने की जरूरत नहीं है, लेकिन यह सोचिए कि इतनी विशाल आबादी शहरों में रहेगी कहां और कैसे, हमारे सारे शहर अभी ही चोक हो चुके हैं।
वहां सारी नागरिक सुविधाओं का गला घुट चुका है। चेन्नै में हाल का जल-प्रलय, हर बड़े शहर में धूप को निगलता जहरीला ‘स्मॉग’ और कश्मीर की बाढ़ बताती है कि शहरों में आबादी और उसके बढ़ते कचरे का बोझ उठाने की क्षमता खत्म हो चुकी है। हर शहर जाम, अतिक्रमण, जल भराव, झुग्गियों, पानी-बिजली संकट से त्रस्त है और लोग हैं कि गांव छोड़-छोड़कर शहरों में आते जाने को मजबूर हैं। दमघोटू हो चुके शहरों को रहने लायक बनाए रखने के लिए उन्हें ‘स्मार्ट सिटी’ बनाने की हास्यास्पद कवायद की जा रही है। कितना ही स्मार्ट सिटी बना लीजिए,गांवों का उजड़ना नहीं थमेगा तो शहर में लोगों के लिए कही ठौर नहीं बचेगा। स्थिति भयावह होती जाएगी।

बदलाव की भयानक रफ्तार

पिछले एक दशक पर नजर डालिए तो कितनी सारी चीजें बदल गई हैं। पूरा जीवन-व्यवहार बदल रहा है और बदलाव की गति बहुत तेज है। जॉर्ज ऑर्वेल ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘उन्नीस सौ चौरासी’ में ऐसा ही कुछ कहा भी था कि जो परिवर्तन मेरे बाबा के जीवन में साठ-सत्तर साल में हुआ उससे ज्यादा परिवर्तन मेरे पिता के जीवन में दस साल में आ गया और उससे बहुत ज़्यादा बदलाव मेरे जीवन में सिर्फ दो-तीन साल में आ गया। मेरे बेटे के जीवन में पता नहीं यह कैसी उलट-फेर करेगा और कितनी भयानक रफ्तार से। यह उलट-फेर काफी पहले शुरू हो चुकी है।

परकटे परिंदों की उड़ान

ग्रामीण किशोरों-युवाओं की बेशुमार भीड़ शहरों की तरफ दौड़ी चली आ रही है। काली कमाई से चौतरफा खुले निजी कॉलेजों में किसी भी कीमत पर दाखिला लेते इन बच्चों में आधुनिक जीवन की सारी चकाचौंध जल्द से जल्द अपने जीवन में उतार लेने के सपने हैं। वे यह नहीं देख रहे कि उनमें सम्भावनाएं क्या हैं, क्या वे बेहतर कर सकते हैं और क्या उनकी विशेषताएं हैं। वे सिर्फ एक दौड़ लगा रहे हैं, इंजीनियर बनने की भेड़चाल। बेशुमार खुलते जा रहे इंजीनियरिंग कॉलेजों में बीटेक में बहुत आसानी से दाखिला हो जाता है। पढ़ने वालों से ज्यादा सीटें हैं। बस, फीस भरने को पैसा चाहिए। सो, कर्जा लेकर, खेत बेचकर या गिरवी रख कर गांवों से बच्चे चले आ रहे हैं इंजीनियर बनने को। इनमें लड़कियों की संख्या भी बहुत है। अच्छी बात है कि मध्य और निम्न मध्य वर्ग के परिवारों में लड़कियों को पढ़ाने की चेतना फैली है, लेकिन सवाल यह कि क्या पढ़ाई और कैसी पढ़ाई? ज़्यादातर बच्चे बीटेक की जो डिग्री हासिल कर रहे हैं वह किसी काम की नहीं। बड़े-बड़े पैकेज वाले कम्प्यूटर इंजीनियर की नौकरी का गुब्बारा फूटे जमाना हो गया, जो बचा है वह आईआईटी या चंद नामी संस्थानों से निकलने वालों के हिस्से आता है। सामान्य कॉलेजों की बीटेक की डिग्री पांच हजार रुपये महीने की नौकरी नहीं दिला पा रही। अच्छी शिक्षा भी वह हर्गिज नहीं है। नतीजा यह कि पढ़े-लिखे कहलाने वाले बेरोजगार बढ़ रहे हैं। उसी अनुपात में कुंठा और हताशा भी। इन्हें देख कर उस परिंदे की याद आती है जिसने ऊंचे उड़ने की गफलत में अपने पंख खुद ही नोच डाले।
जो बच्चे एक अंधी दौड़ में उच्च शिक्षा के लिए शहरों की तरफ आ रहे हैं उनमें से कई एकाएक मिली आजादी में संतुलन न बना पाने के कारण मनोवैज्ञानिक दवाबों और यौनाचारों का शिकार बन रहे है। ग्रामीण पृष्ठभूमि और तथाकथित संस्कारी परिवारों से आने वाली लड़कियां शहरों में हॉस्टल या पीजी लाइफ में आसानी से शारीरिक और अन्य शोषणों में फंस रही हैं। जब तक वे बॉयफे्रंड या प्रेम का अर्थ समझ पाती हैं तब तक उसमें गहरे धंस चुकी होती है। सिगरेट और नशे की लत के शिकार कम उम्र लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। शहरों में बढ़ते भांति-भांति के अपराधों में युवाओं की संलिप्तता इसका प्रमाण है। हमें कोई आश्चर्य नहीं हुआ था जब चार वर्ष पहले की एक रिपोर्ट में गल्र्स हॉस्टल के बाहर की गुमटी में सबसे महंगी लेडीज सिगरेट और हर तरह के नशे बिकते पाए गए थे। खेती और अन्य परम्परागत धंधों के साथ ही अपने इलाके में नए-नए व्यवसायों को विकसित करने में युवाओं की तनिक भी दिलचस्पी न होना हमारे समय की एक और त्रासदी है। दोष युवाओं को देना ठीक नहीं होगा। शिक्षा की दिशा ही ऐसी नहीं रही। उच्च शिक्षा प्राप्त चंद युवाओं ने गांव, खेती और परम्परागत व्यवसायों को नए जमाने के अनुरूप अपना कर साबित किया है कि इस क्षेत्र में अपार सम्भावनाएं मौजूद हैं, लेकिन यह धारा के विरुद्ध बहना अपवाद स्वरूप ही दिखाई दे रहा है।

काश, ऐसा होता

क्या ऐसा नहीं हो सकता कि गांवों का चौतरफा विकास हो, वहां सारी सुविधाएं दीजिए, बिजली, पानी, सड़क आदि ही नहीं अच्छे स्कूल, अस्पताल, बेहतरीन नेट-कनेक्टिविटी के साथ रोजगार के बेहतर अवसर भी। ऐसा कीजिए कि महानगर से आजिज लोग अपने गांवों-कस्बों की ओर लौटना चाहें। शहरों की बदहाली से आजिज लोग आज सुकून की तलाश में गांवों की तरफ लौटना चाहते हैं। लौट इसलिए नहीं पाते कि वहां जीवन के लिए ज़रूरी सुविधाएं नहीं हैं। कोई पंद्रह-सोलह वर्ष पहले उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़ शहर में तब नई-नई बनी हवाई पट्टी पर खड़ा मैं सोच रहा था कि ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि मैं पहाड़ के अपने घर में रहूं, सुबह तैयार होकर हवाई जहाज या हेलीकॉप्टर सेवा से लखनऊ जाऊं और दिन भर वहां काम करके रात को फिर गांव लौट आऊं । विकास की दिशा और दृष्टि ऐसी होती कि ग्रामीण मूल के हम सभी लोग ऐसा कर पाते। गोण्डा, बस्ती या चित्रकूट, बांदा की तरफ रहने वाले अपनी निजी कार या बेहतरीन सार्वजनिक बस या टैक्सी या मेट्रो रेल सेवा से विभिन्न शहरों, कस्बों में अपने-अपने काम पर जाते और शाम को लौट आते। बिजली, पानी और बढ़िया सड़कें गांवों तक होतीं और चुस्त सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था हर जगह सुलभ होती।

गांवों में पेड़ों के नीचे और पहाड़ की चोटियों पर 4जी नेटवर्क मिलता और हम अपने देहातों में बैठे पूरी दुनिया से जुड़े होते। फिर कॉल सेंटर नोएडा, गुड़गांव में ही नहीं हरचंदपुर और सरायमीर में भी खोले जा सकते।

हम प्राकृतिक सौंदर्य और अप्रदूषित वातावरण में अपने गांवों में सुकून से रहते। बच्चों के लिए वहीं बेहतरीन स्कूल कॉलेज होते, बीमारों के लिए सभी सुविधाओं से युक्त अस्पताल होते मनोरंजन के विविध साधन और जरूरी बाजार भी। गांवों में पेड़ों के नीचे और पहाड़ की चोटियों पर 4जी नेटवर्क मिलता और हम अपने देहातों में बैठे पूरी दुनिया से जुड़े होते। फिर कॉल सेंटर नोएडा, गुड़गांव में ही नहीं हरचंदपुर और सरायमीरा में भी खोले जा सकते। हर आवश्यक जरूरत आस-पास पूरी हो जाती तो क्यों लोग गांव छोड़ते। बड़े शहर भी विकसित होते, लेकिन वे इस कदर अराजक और बरबाद नहीं होते और हर आदमी की रोजी-रोटी की दौड़ वहीं जाकर खत्म न होती। तब क्यों हमसे हमारी चिड़िया, हमारा आंगन, हमारा स्वाद और गीत-संगीत छिनते। तब आज हमारा यह जीवन,जहां सांस लेने के लिए शुद्ध हवा भी अब दुर्लभ है, इस कदर भयावह हरगिज नहीं होता। यह सब आज सपने की तरह और असंभव-सा जान पड़ेगा, लेकिन सोचिए कि विकास की नजर शुरू से ही व्यक्ति और ग्राम पर केंद्रित होती तो क्या यह मुश्किल था। शुरुआत ही नहीं की गई,सोचा ही इस तरह नहीं गया। अगर यह देश गांवों का था तो विकास की अवधारणा और योजनाएं गांव केंद्रित क्यों नहीं बनाई गईं? सब कुछ शहर केंद्रित, बड़ी पूंजी आधारित और एक खास वर्ग की नजर से होता चला आया। गांवों-ग्रामीणों की घनघोर उपेक्षा की गई और 68 साल में देखिए हम कहां पहुंच गए। पिथौरागढ़ की हवाई पट्टी का किस्सा भी बता दूं। वह पर्यटकों को उत्तराखण्ड की तरफ आकर्षित करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने बनाई थी (तब उत्तराखण्ड का जन्म नहीं हुआ था) आज तक वहां कोई विमान नहीं पहुंचा। उस पट्टी पर जानवर विचरण करते रहे और अब नवम्बर 2015 में उत्तराखण्ड सरकार ने प्रयोग के तौर पर एक छोटा विमान वहां उतारने का सफल प्रयोग करके अपनी पीठ ठोकी है। इस बीच पहाड़ की असहाय,उपेक्षित आबादी मैदानों को पलायन करती रही और हजारों गांव उजाड़ होते चले गए। दस वर्ष मानव इतिहास में कोई मायने नहीं रखते, लेकिन यात्रा उलटी या गलत दिशा में हो तो कहीं से कहीं पहुंचा देती हैं। हमने निश्चय ही तरक्की की है, लेकिन उसके लिए अपना बहुत कुछ कीमती गंवा दिया है। अपनी जड़ों की ओर झांकते हुए लगता है कि हम एक बियाबान में खड़े हैं। ‘रजिया सुल्तान’ फिल्म में लता मंगेशकर के गाए एक गीत की पक्तियां बरबस याद आ जाती हैं।

हम भटकते हैं क्यों भटकते हैं
दश्त-ओ-सहरा में, ऐसा लगता है,
मौज प्यासी है अपने दरिया में। 

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