आखिर रूप, रस, गंध, स्पर्श और स्वाद के आनंद का केन्द्र क्या है?

स्वयं के भीतर बैठकर अन्तःकरण की गति और विधि देखना ही अध्यात्म है


हृदयनारायण दीक्षित : संसार प्रत्यक्ष है। दिखाई पड़ता है। लेकिन प्रत्यक्ष संसार के साथ ही एक संसार हम सबके भीतर भी है। इसकी वाह्य सीमा शरीर है। विज्ञान से सुपरिचित हिस्सा सरल है। स्वास नली, भोजन मार्ग, आमाशय, छोटी आंत, पैंक्रियाज, एपीनडेक्स और बड़ी आंत। हृदय और स्नायु तंत्र भी महत्वपूर्ण हैं। भीतर के शरीर से चिकित्सा विज्ञान सुपरिचित है। मनोवैज्ञानिकों ने भी काफी अध्ययन किये हैं लेकिन इस सामान्य यंत्र का तंत्र जटिल है। इस जटिलता के कारण अनेक प्रश्न अभी उलझे हैं। जैसे अवसाद का केन्द्र क्या है? तनाव का उद्भव कैसे होता है? शरीर के किस केन्द्र से होता है? प्रीति का मूल क्या है? क्या पैंक्रियाज या पिट्यूटरी की तरह दुख रस प्रवाह की भी कोई ग्रंथि है? शरीर में निद्रा का केन्द्र क्या है? अनिद्रा का उद्भव कैसे होता है? बाद में सही सिद्ध होने वाले स्वप्नों की फिल्म कौन बनाता है? सामान्य स्वप्नों का भी निर्माता कौन है? गीत-संगीत क्यों अच्छे लगते हैं? रूप, रस, गंध, स्पर्श और स्वाद के आनंद का केन्द्र क्या है? क्या ऐसे सारे प्रश्नों वाले केन्द्र या कारण भीतर ही नहीं है? बाहर और भीतर का सम्यक जानकार ही इन प्रश्नों के उत्तर दे सकता है।
सुख और आनंद के उपकरण बाहर भी हो सकते हैं और भीतर भी। लेकिन भारतीय चिंतन इन्हे भीतर ही मानता रहा है। उपनिषदों में भीतर की जिज्ञासा से जुड़े तमाम प्रश्न है जैसे मन को कौन प्रेरित करता है? इन्द्रियाँ किसकी प्रेरणा से काम करती हैं? प्राण क्या है? कैसे गति करता है? ऋग्वेद में भी तमाम मौलिक प्रश्न हैं- हम किससे प्रेरित होकर गलत काम करते हैं आदि। वाह्य संसार का अध्ययन पदार्थ विज्ञान का हिस्सा है लेकिन भीतर का संसार और भी अध्ययन योग्य है। बाहर की तुलना में भीतर के संसार का बोध कहीं ज्यादा जरूरी जान पड़ता है। मैं अनुभव करता हूँ कि भीतर उदासी है और इस उदासी का बाहर कोई प्रत्यक्ष कारण नहीं है। भीतर क्रोध है लेकिन कभी-कभी क्रोध का भी बाहर कोई कारण नहीं मिलता। बाहर सब कुछ सामान्य है, शरीर निरोगी है या थोड़ा कुछ गड़बड़। बाहर उल्लास के पर्याप्त कारण नहीं हैं। अवसाद के लिए भी जरूरी परिस्थितियां नहीं हैं लेकिन अकारण आ धमकता है उल्लास। बिना बादल ही वर्षा आश्चर्यजनक है। कोई काव्य उगता है भीतर। बिना प्रयास। अनायास। इसका उल्टा भी होता है। अकारण भीतर से ही आ जाता है अवसाद। विषाद। हम इसका भी कारण नहीं जान पाते।
भारतीय चिंतन में ज्ञान के साथ भाव की महत्ता है। ज्ञान यात्रा में तर्क और प्रतितर्क होते हैं। भाव-जगत में तर्क से काम नहीं चलता। वाह्य संसार की वस्तुओं, रूपों, जीवों के प्रति ज्ञान के साथ हमारा विशेष भाव भी होता है। भाव का अध्ययन जटिल है। इस अध्ययन में कार्य कारण का सिद्धांत प्रायः काम नहीं आता। भाव की समझ के लिए ‘स्वभाव’ की समझ ही सहायक बनती है। स्वभाव हमारा है। इसकी समझ के लिए पदार्थ विज्ञान की उपयोगिता नहीं होती। हम ‘स्व’ हैं। स्व का ही दूसरा नाम है मैं। स्वभाव हमारा केन्द्र है। भारतीय चिंतन का आध्यात्म स्वभाव का ही साक्षात्कार है। अध्यात्म बिना जांची-परखी आस्था नहीं है। यह अन्तःकरण में प्रतिपल चल रहे कार्यव्यापार का तटस्थ अध्ययन है। भाव का प्रवाह देखना तटस्थता में ही संभव है। हम दुखभाव में दुखी होते है। और सुखभाव में सुखी। तटस्थ हो तो दुखी या सुखी होना दिखाई पड़ता है। क्रोध तीव्र आवेग है। इस आवेग में हम क्रोध का भाग बनते हैं। तटस्थता ढेर हो जाती है। तटस्थ हो सके तो क्रोध का दर्शन किया जाना बहुत कठिन नहीं। तब क्रोध संवेग का प्रवाह देखना एक मजेदार अनुभव होगा।
तटस्थता मन की प्रकृति नहीं है। मन के अध्ययन पर भारतीय पूर्वजों व वैज्ञानिकों ने काफी परिश्रम किया है। ऋंग्वेद से लेकर पतंजलि तक भारत में मनोविश्लेषण का लम्बा इतिहास है। पतंजलि बेजोड़ है। उनका समूचा योग विज्ञान चित्तवृत्तियों की ही अड़ियल और चंचल प्रवृत्ति को उखाड़ फेकने का शास्त्र है। हम स्वभाव के कारण लाचार है। स्वयं के निश्चय और निर्णय भी प्रायः क्रियान्वित नहीं कर पाते। मन मनमानी करता है, बुद्धि की बुद्धिमानी काम नहीं आती। बुद्धि हमारा अर्जन है। देखा, पढ़ा, सुना और भोगा यथार्थ ही बुद्धि बनता है। देश समाज द्वारा घोषित शुभ-अशुभ बुद्धि का मार्गदर्शन करते हैं। ‘स्वभाव’ तो भी अपनी चलाता है। भाव का संस्कार आसान नहीं। बुद्धिगत संस्कार भाव को प्रभाव में लेने का प्रयास करते हैं। लेकिन स्वभाव बुद्धि के प्रभाव में नहीं आता है। गीता में श्री कृष्ण ने उचित ही स्वभाव को अध्यात्म कहा है। स्वभाव का दर्शन अध्यात्म है। इस दर्शन के लिए ‘अन्तर्यात्रा’ के अलावा और कोई विकल्प नहीं। स्वयं के भीतर बैठकर अन्तःकरण की गति और विधि देखना ही अध्यात्म है।


भक्ति कथा, प्रवचन आदि को अध्यात्म कहा जाता है। ये सामान्य अर्थ में अध्यात्म कहे जा सकते हैं। वस्तुतः वे अध्यात्म की यात्रा के पथ संकेत हैं। मूलतत्व है अन्तर्यात्रा। कथा हमको हमारी भीतर की यात्रा के लिए प्रेरित करती है तो अध्यात्म। वैसे कथा भी एक साामन्य कर्मकाण्ड है। बाहर का संसार कत्र्तापन-भोक्तापन का क्षेत्र है। हम कत्र्ता हैं, हम कर्म करते हैं, इसलिए हम कर्मफल के भोक्ता भी हैं। अन्तर्यात्रा के पहले चरण में ही कत्र्तापन प्रश्नवाचक हो जाता है। क्रोध हम कहां करते हैं? क्रोध कहीं किसी भिन्न केन्द्र से आता है। झुलसते हम हैं। क्या हम सोते हैं? मित्र कहते हैं कि 11 बजे रात सोता हूँ। गलत कहते हैं। हम किसी समय विशेष पर लेट सकते हैं। निद्रा कही किसी समय अज्ञात क्षेत्र से आती है। अनिद्रा वाले करवट बदला करते हैं। निद्रा नहीं आती। मन में प्रश्न उठते हैं यह निद्रा कहाँ से आती है और हम सबको ऊर्जा सम्पन्न बनाती है? क्या उसे पुकारा जा सकता है? क्या उसे रात्रि के आयोजन का मुख्य अतिथि बनाया जा सकता है? वह पूरी रात रूके, थपकी दे, वह जागे और मैं सोऊं। लेकिन ऐसे प्रश्नों के उत्तर पदार्थ विज्ञान के पास नहीं हैं। विज्ञान अनिद्रा रोगी को बेहोश कर सकता है और बेहोशी असली निद्रा नहीं होती।
सत्य भीतर है। हिरण्यमय पात्र से ढका हुआ। गंध का स्रोत पृथ्वी के अन्तस् में है। गंध ऊपर-ऊपर है भीतर गंध कोष है। मधु भी बाहर नहीं। हम मिठाई खाते हैं। गुड़-शक्कर या ऐसा ही कोई पदार्थ। लेकिन मधुमयता पदार्थ नहीं है। गुड़ या शक्कर में छुपा हुआ मधुतत्व भी भीतर है। कामनाएं भीतर है। कामनापूर्ति के कर्म बाहर हैं। काम अतृप्त रहता है। पदार्थों से भरे संसार में हरेक वस्तु का मोलभाव है। भीतर बैठी तमाम प्राकृतिक सम्पदा का कोई बााजर भाव नहीं। भीतर की सारी वस्तुएं अपनी हैं। उनके दरश मात्र से आत्मबोध जागता है और बाहर का पीड़ादायी संसार माया हो जाता है। माया अर्थात आभास। वह जैसा दिखाई पड़ता है, वैसा ही न होना माया है। सारी धनसंपदा भीतर ही है। बाहर उसकी छाया माया है। यह पंक्तियां भीतर से आई हैं। मेरी अन्तर्यात्रा की पैठ बहुत गहरी नहीं है। इसलिए भीतर के भी भीतर प्रवेश का उद्योग अभी शेष है। सो अनुभूति का सृजन वैसा नहीं है, जैसा होना चाहिए था। इन पंक्तियों में ‘भीतर गाव’ की ताकझाक ही प्रकट हुई है। ‘भीतरगांव’ यहां हमारे अन्तःकरण में विकसित गांव है। इस गांव कापूरा हाल कभी जाने मिला तो जस का तस आगे लिखूंगा। आप सब भी भीतर की यात्रा पर निकलो। वहां कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है और न ही टांग खिचाई ही।

(रविवार पर विशेष)
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार, वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधान सभा अध्यक्ष हैं)

भारत शक्ति उपासना में आनंदमगन है