आधुनिक मानव समाज की एक सच्ची विवेचना: ‘जि़स्मगोई’

जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

डॉ. पुष्पा सिंह विसेन जी द्वारा लिखित “जि़स्मगोई” नारी जागरूकता पर एक ऐसा शोधपरक संग्रह है जिसे बड़ी ही साफ़गोई से बिना किसी लाग लपेट के, बिना किसी पक्षधरता के लेखिका द्वारा आज के समाज मे नर-नारी के रिश्तों का सत्यपरक आईना बनाया गया है। जिसमें आज के समाज की कटु किन्तु सच्ची तस्वीर उभरकर सामने आती दिखती है। समाज में व्याप्त विभिन्न अवधारणाओं का सूक्ष्म निरीक्षण करते हुये बड़ी ही बेबाकी से आधुनिक समाज मे व्याप्त भोग-विलास की नकारात्मक प्रवृत्ति के चलते तथाकथित नैतिकता और आधुनिकता की बेलौस विवेचना अन्यत्र दुर्लभ ही है। नारी का स्वरूप कहाँ से शुरू होकर पतन के किस स्तर पर जा पहुंचा है, बिन्दुवार सत्य उदाहरणों द्वारा निरपेक्ष भाव से उकेरना किसी लेखिका के लिए तो अत्यंत दुरूह जान पड़ता है, परंतु इस कसौटी पर डॉ. पुष्पा सिंह विसेन जी की लेखनी कहीं भी डगमगाती नहीं दिखती है। लेखिका द्वारा समाज में पुरुष वर्ग के स्वयंभू श्रेष्ठता को भी चुनौती देने में जरा भी हिचक नहीं दिखाई देती है। वहीं कुत्सित नारी मानसिकता पर भी लेखिका जोरदार प्रहार करने में जरा भी नहीं हिचकती। पुरुष-स्त्री के रिश्तों के साथ-साथ समाज में बड़ी तेजी से पैर पसार रहे अप्राकृतिक रिश्ते जैसे लेस्बियन, गे और नर किन्नरों के रिश्तों पर कटाक्ष करते हुए उनसे अपनी असहमति भी जताई है। कहने का लब्बोलुआब यह कि देश के वर्तमान परिवेश के यथार्थ का चित्र ही तो खींचा है। दस अध्यायों में विभक्त इस संग्रह में लेखिका ने कई संवेदनशील मुद्दों पर ध्यान खींचा है। प्राय: सभी अध्याय कटु सत्य से भरे पड़े हैं। भूतकाल से लेकर वर्तमान समय की विषमताओं पर बेबाकी से अपनी राय व्यक्त कर रचना को सभी के लिए शिक्षाप्रद और पठनीय बना दिया है, साथ ही हिन्दी साहित्य जगत को एक अमूल्य निधि सौंपी है।
जि़स्मगोई जैसा शोधपरक संग्रह प्रस्तुत करने के लिए संतोष और धैर्य के स्तंभों में स्वयं को बांधकर जीवन जीना होता है। चारित्रिक सुदृढ़ता का एक ऐसा मानक गढ़ना होता है जिसे भेदने का सहसा कोई साहस न कर सके क्योंकि साहित्य की दुनिया भी किसी मामलों में अछूती नहीं है। लेखिका की यह स्वीकारोक्ति आज के तथाकथित बुद्धिजीवी समाज के ऊपर एक प्रश्नचिन्ह खड़ा कर जाती है। ‘जिस्मगोई आखिर क्या है- एक नश्वर मांस पिंड।’ ऐसा कहते हुए लेखिका नियम संयम से समाज के चरित्र निर्माण और भविष्य निर्माण का संदेश भी देती है। आज की आधुनिक नारी जो फैशन की अंधी दौड़ में पूरी तरह से सारे मानदंडों को तिलांजलि देकर सिर्फ अपने सौंदर्य और कुछ पाने की चाहत में सब कुछ न्योछावर करने को हर वक्त तैयार रहती है। नारी के इस स्वरूप पर लेखिका प्रश्न खड़ा करती है जो अपने फिगर के चक्कर में अपने शिशु को स्तनपान के सुख से वंचित कर अपने बच्चे के लिए कठोर बन जाती है। ऐसा करके वह अपना और अपने बच्चे का भविष्य कमजोर करती है।
आज के समाज के लड़कियों की सोच को व्यक्त करने के लिए लेखिका एक सच्ची घटना का सहारा लेकर एक लड़की से कहलवा देती है ‘ब्वायफ्रेंड का फैशन आउट डेटेड हो गया है। प्रतिदिन नए ब्वायफ्रेंड बनाओ, मजे लो और उससे तरह-तरह के गिफ्ट लो। यही सब रह गया है।’ आज के महानगरों में कुकुरमुत्तों की तरह पनप रहे अय्याशी के महाजाल में गाँव का सीधा-साधा पढ़ा-लिखा युवा का भी नगरबर बन जाना अपसंस्कृति को दर्शाता है। गाँवों से शहर की ओर पलायन का एक रूप रधिया और माधो के रूप में सामने आते हैं। कहीं न कहीं अमीरी गरीबी की खाईं, धन लोलुपता और ‘बदलाव’ के अतिरेक का जीता जागता प्रमाण ‘रधिया’ बनती दिखाई देती है। जो वस्तुत: आज के समाज की सच्चाई भी है।
समाज में बढ़ रहे यौन अपराधों का एक मजबूत कारण लेखिका लड़कियों के परिधान को मानती हैं। अपनी इस मान्यता के पक्ष मे एक उदाहरण भी देती है जो ‘करे कोई भरे कोई’ वाली कहावत को चरितार्थ करता है। आज के युग की नारियों के बारे मे लेखिका कहती है ‘आज के युग की नारी तीर-तलवार तो चलाने के योग्य तो रही नहीं परंतु पुरुषों के पुरुषत्व का हनन कर उन्हे भी पंगु बना रही है।’
उससे भी दो कदम आगे बढ़कर लेखिका का यह कथन सहसा आश्चर्यचकित कर जाता है कि ‘हमारा देश पुरुष प्रधान देश रहा है और रहना भी चाहिए।’ यह कथन कहीं न कहीं नारी समाज कि तथाकथित आधुनिकता जिसमे सिर्फ और सिर्फ दैहिक सुख की कामना है, उसके मुँह पर करारा तमाचा है। लेखिका सभ्य समाज के लिए नारी को जागरूक और जीवन के प्रति सतर्क रहने का आह्वान करती है। लेखिका नारी को नींव का ईंट मानती है जिस पर सभ्यता-संस्कृति कि दीवार खड़ी कि जा सकती है।
साथ ही वह प्रश्न खड़ा करती है कि ‘यह नारी को तय करना है कि वह गीता व कुरान बन कर रहे या फिर पतन के दलदल का नारकीय जीवन जीये, फैसला नारी के हाथों में है।’
यह किताब अपने में आज के समाज के बारे में बहुत समेटे हुए सभी के लिए पठनीय पुस्तक के रूप में पाठकों के समक्ष है। इस प्रकार कि रचनाधर्मिता सदा ही सराहनीय होती है। हमें पूर्ण विश्वास है कि यह पुस्तक ‘जि़स्मगोई’ समाज में एक अलग मुकाम हासिल करेगी। इसी के साथ मैं लेखिका डॉ. पुष्पा सिंह विसेन को साधुवाद देता हूँ। (प्रकाशक – साहित्य केंद्र प्रकाशन)