आशुतोष राणा की कलम से…मौन मुस्कान की मार

भाईसाहब में ग़ज़ब की मोहिनी थी। आप उनकी पीठ के पीछे भले ही कितना कुछ कहते रहें लेकिन उनके सामने पड़ते ही आपको वही सब कहना पड़ता था जो भाईसाहब चाहते थे। और जैसे ही आपने वो कहा जो भाईसाहब चाहते हैं कि आप कहें, फिर उस बात को भाईसाहब आपके स्टेटमेंट, आपके इक्सेप्टेंस के नाम से मोहल्ले भर में प्रचारित कर देते थे, लोग आपकी लानत-मलानत पर उतर आते थे आपके लिए भ्रांतियों का निर्माण हो जाता था।
मैं बेहद उत्साह से भरा हुआ घर से निकला, आज हिन्दू नववर्ष का पहला दिन था और पहले दिन ही मुझे वह ऑफ़र मिला जिसके लिए मैं घनघोर प्रयास के साथ मन ही मन प्रतीक्षा भी कर रहा था।
घर से निकलते ही मुझे सबसे पहले भाईसाहब के दर्शन हो गए। ना-ना वे मेरे सगे भाई नहीं हैं और ना ही सौतेले हैं, ये वो भाईसाहब थे जिन्होंने अपने सद्आचारण से नहीं बल्कि सर्वत्र विचरण से हमारे पूरे मुहल्ले पर ज़बरदस्ती अपना भाईसाहबपन लादा हुआ था।
उद्देश्यहीनता से प्रेरित इस भटकती हुई आत्मा का किसी भी उद्देश्य प्रधान व्यक्ति को स्वयं में अटका लेना ही प्रमुख उद्देश्य होता था।
उनके साथ उनकी पत्नी भी थीं जो हमेशा ही उनसे क़रीब दस-पंद्रह फ़ीट पीछे चला करती थीं, जिन लोगों को भाईसाहब के वैवाहिक स्टेटस की जानकारी नहीं थी (जिसे वो देना भी नहीं चाहते थे) उनके लिए भाईसाहब सिंगल केन मिंगल थे, लोगों को लगता कि भाईसाहब में ग़जब का आकर्षण है जो ये महिला भाईसाहब की मोहिनी से बंधी हुई उनका पीछा करती रहती है, जबकि भाईसाहब को उसमें रत्ती भर इंट्रेस्ट नहीं है।
और जिनको जानकारी थी उनके लिए भाईसाहब का जवाब होता था कि स्त्री व्यक्ति नहीं सत्ता और सम्पत्ति के जैसी होती है, सफल लोग सत्ता और सम्पत्ति के पीछे नहीं भागते, बल्कि सत्ता और सम्पत्ति सदैव सफल आदमी का पीछा करती हैं, इसलिए ये कहा जाता है कि हर सफल आदमी के पीछे एक औरत होती है, तो तुम्हारी भाभी का मेरे पीछे चलना मेरी सफलता का प्रमाणपत्र है।
भाईसाहब को सजधज के रहने का नशा था, उनकी सजावट देखकर हमेशा ही यह लगता कि कोई महान अभिनेता अभी किसी मंच पर अपने अभिनय से दर्शकों को भाव से तरबतर करने जा रहा है या तरबतर करके आ रहा है।


भाईसाहब और भाभीसाहब के इस छोड़-पकड़ जोड़े को अपने सामने देख मेरी आत्मा भय से मेरे हलक में आ गयी।
अब आप पूछेंगे कि ये छोड़-पकड़ जोड़ा क्या है?
तो ऐसा पति-पत्नी का जोड़ा जिसने एक दूसरे को पकड़ा भी ना हो और छोड़ा भी ना हो। ख़ैर, मैंने अपने अंदर के भय को क़ाबू में लाते हुए यूँ ही पूछ लिया- कैसे हैं भाईसाहब? और बहुत गर्मजोशी से उनको शुभकामनाएँ दीं- हिन्दू नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ भाईसाहब, माँ भगवती आपको परम स्वस्थ रखते हुए आपके सभी संकल्पों को पूरा करें।
मैंने शुभकामनाएँ बहुत तेज़ी से उनसे नज़रें चुराते हुए प्रदान की थीं, क्योंकि मैं भाईसाहब की उस विलक्षण सिद्धि से वाकिफ था और हाल ही में दो तीन बार उसका शिकार भी हो चुका था। भाईसाहब निश्चित मानसिकता वाले व्यक्ति को अनिश्चित मानसिकता वाले व्यक्ति में रूपांतरित करने में महारथी थे। इस उद्देश्यहीन दिव्यात्मा का एकमात्र उद्देश्य था कि लोगों के उद्देश्य में शामिल होकर उन्हें निरुद्देश्य कर देना और स्वयं को उनके काउन्सलर उनके पथप्रदर्शक के रूप में प्रचारित करना।
मुझे जल्दी में और आगे बढ़ता देख भाईसाहब थपोड़ी मारते हुए बोले- सुनो..
उनका ह्यसुनोह्ण जैसे ही मेरे कान में पड़ा मैं सन्न रह गया और किसी अज्ञात आशंका से मेरा हृदय धड़धड़धड़ाने लगा।
भाईसाहब जो कहना चाहते थे उसे एक तरफ़ रखते हुए शंका में पड़ गए कि मैं उनके माथे पर क्यों देख रहा हूँ, क्या देख रहा हूँ? उन्होंने अपनी आँखों को ऊपर की तरफ़ ले जाते हुए स्वयं के माथे पर ये देखने का प्रयास किया कि मैं उनके माथे पर क्या देख रहा हूँ? किंतु यह असम्भव प्रयास था दुनिया का कोई भी आदमी खुद की आँखों से खुद के माथे को नहीं देख सकता, फिर भले ही वो भाईसाहब रूपी तुर्रमखाँ ही क्यों ना हों। अपने माथे को देखने के लिए या तो मनुष्य को आईने की ज़रूरत पड़ती है या किसी दूसरे व्यक्ति की। भाईसाहब को पहली बार अपनी भौंहों पर ग़ुस्सा आ रहा था, जो आज उनके माथे और आँखों के बीच बाधा बनकर बिछी हुई थीं, अचानक उनकी दृष्टि मेरे होठों पर गई जो किंचित मुस्कान लिए हुए थे।
एक सत्य का उल्लेख करना यहाँ बहुत ज़रूरी है कि भाईसाहब में ग़ज़ब की मोहिनी थी। आप उनकी पीठ के पीछे भले ही कितना कुछ कहते रहें लेकिन उनके सामने पड़ते ही आपको वही सब कहना पड़ता था जो भाईसाहब चाहते थे। और जैसे ही आपने वो कहा जो भाईसाहब चाहते हैं कि आप कहें, फिर उस बात को भाईसाहब आपके स्टेटमेंट, आपके इक्सेप्टेंस के नाम से मोहल्ले भर में प्रचारित कर देते थे, लोग आपकी लानत-मलानत पर उतर आते थे आपके लिए भ्रांतियों का निर्माण हो जाता था, आपके भ्रमित, उद्देश्यहीन, या कु-उद्देश्य वाले व्यक्ति की धारणा समाज में स्थापित हो जाती थी। और भाईसाहब आपको उस दलदल में से निकालने वाले व्यक्ति की ख्याति को प्राप्त होते थे उनके ऊपर पड़ी हुई कीचड़ का कारण संसार आपको ही मानता था।
मैं बिना किसी अपराध के बुरी तरह घबरा गया था, मेरे भय का आलम ये था कि मैं व्यर्थ ही स्वयं को सच्ची में कुछ-कुछ अपराधी टाइप का महसूस करने लगा, मैं भाईसाहब की ओर पलटा, भाईसाहब ने मेरी एक तरफ़ की आँख में अपनी दोनों आँखे गड़ा दीं।
उनके इस तरह देखने को योग की भाषा में शायद त्राटक दृष्टि कहा जाता है।
मेरी एक आँख उनकी दोनों आँखों का लोड नहीं ले पा रही थी, तो मैंने भी हिम्मत करके, आत्मरक्षा के लिए अपनी दोनों आँखें से उनकी एक आँख पर हमला कर दिया।
अब हम दोनों के बीच नि:शब्द दृष्टि युद्ध शुरू हो चुका था, भाईसाहब के त्राटक का जवाब मैं एकटक से दूँगा इसकी उन्हें बिलकुल भी आशा नहीं थी, मैंने देखा कि मेरे इस हमले से वे बौखला से रहे हैं, उन्होंने पैंतरा बदला और अचानक मेरी दायीं आँख को छोड़ बायीं आँख पर हमला कर दिया, इस अप्रत्याशित हमले से मैं कुछ कमज़ोर पड़ा, लेकिन तुरंत ही मैंने भी अपना दाँव बदलते हुए अपनी दोनों आँखों से उनके होंठों पर हमला कर दिया, मेरे टकटकी- अस्त्र से वे विचलित हो गए उन्हें लगा कि जैसे मैं उनके होठों से निकट भविष्य में निकलने वाले शब्दों का सटीक अंदाज़ा लगा चुका हूँ।
भाईसाहब को ये क़तई बर्दाश्त नहीं था कि कोई उनके मन में चल रहे विचारों को पढ़ लें, ये उनकी पहली हार थी।
अब भाईसाहब ने अपनी दोनों आँखें मेरी दोनों आँखों में गड़ा दीं और चार क़दम सशरीर मेरे क़रीब पहुँचे। ये उनका ब्रह्मास्त्र था लेकिन अब तक मैं भी सतर्क हो गया था और उत्साहित भी था, क्योंकि मैंने भाईसाहब को अपनी जगह से हिलने पर मजबूर कर दिया था।
भाईसाहब क़रीब आकर मेरी आँखों में झाँकते हुए जैसे ही कुछ बोलने के लिए हुए, वैसे ही मैंने प्रतिआक्रमण करते हुए अपनी दोनों आँखों को किंचित सिकोड़ते हुए उनके माथे पर अटपटी-टकटकी से चोट की और अपनी दोनों भौंहों को थोड़ा सा पास-पास कर दिया।
भाईसाहब जो कहना चाहते थे उसे एक तरफ़ रखते हुए शंका में पड़ गए कि मैं उनके माथे पर क्यों देख रहा हूँ, क्या देख रहा हूँ? उन्होंने अपनी आँखों को ऊपर की तरफ़ ले जाते हुए स्वयं के माथे पर ये देखने का प्रयास किया कि मैं उनके माथे पर क्या देख रहा हूँ?
किंतु यह असम्भव प्रयास था दुनिया का कोई भी आदमी खुद की आँखों से खुद के माथे को नहीं देख सकता, फिर भले ही वो भाईसाहब रूपी तुर्रमखाँ ही क्यों ना हों।
अपने माथे को देखने के लिए या तो मनुष्य को आईने की ज़रूरत पड़ती है या किसी दूसरे व्यक्ति की।
भाईसाहब को पहली बार अपनी भौंहों पर ग़ुस्सा आ रहा था, जो आज उनके माथे और आँखों के बीच बाधा बनकर बिछी हुई थीं, अचानक उनकी दृष्टि मेरे होठों पर गई जो किंचित मुस्कान लिए हुए थे, उन्होंने चमककर मेरे होंठों की मुस्कान को मेरे आँखों के भाव से मिलाकर देखने का प्रयास किया तो उसमें उनको कुछ रहस्यमय, उपहासमय सा दिखाई दिया। उन्हें लगा कि कहीं कुछ गड़बड़ है?
वे मुझसे पूछ नहीं सकते थे क्योंकि मुझे परास्त और भ्रमित करना उनका लक्ष्य था और जो भाईसाहब अभी तक दूसरों के दोषों को, कमियों को बताते आए हों, वे अपने दोष को उस व्यक्ति से चिन्हित करवाएँ जिसे वे चित्त करना चाहते हैं? ये सीधे-सीधे उनके अहंकार पर दूसरी चोट होती।
फिर भी भाईसाहब ने अपनी विचलित मनोदशा को छिपाते हुए मेरी तरफ़ देखा और अपने सिर को थोड़ा सा ऊपर उठकर वापस नीचे को झटका दिया, इस इशारे का अर्थ था- क्या है?? ऐसे क्यों देख रहे हो ?
मैंने भी बिना बोले हल्का सा आँखों से मुस्कुरा दिया। और अपनी आँखों को उनके क़रीब पहुँच चुकीं भाभी साहब की तरफ़ मोड़ दिया और बहुत विनम्रतापूर्वक अपने दोनों हाथ जोड़कर उनको प्रणाम।
मुझसे मिले आदर ने भाभी साहब को अभिभूत कर दिया उन्होंने प्रसन्नता से मुस्कुराते हुए मेरे सिर को सहलाते हुए आशीर्वाद दिया।
मेरी मुस्कान और भाभी साहब के मेरे प्रति आत्मीय व्यवहार ने भाईसाहब को परेशान कर दिया था, वे सोच में पड़ गए कि उनके माथे पर ऐसा क्या है जो उन्हें दिखाई नहीं दे रहा किंतु दुनिया उसे साफ़ देख पा रही है? निरुद्देशय भाईसाहब को अब एक उद्देश्य मिल गया था और वे कौतुहल, जिज्ञासा, उत्कंठा, चिंता व खिन्नता से भरे हुए अपने घर की ओर बढ़ गए, किंतु इस बार उनकी सफलता, सत्ता और सम्पत्ति का प्रमाण वह औरत जो सदा ही उनके पीछे चला करती थी मेरे पास खड़ी हुई आनंद से मुस्कुरा रही थी क्योंकि सत्ता और सम्पत्ति को भी वे ही लोग अच्छे लगते हैं जो उनका आदर करें। मैं परम आनंद से भरा हुआ था, सभी को अपने शब्दों से पराजित भ्रमित करने वाले भाईसाहब आज मेरी नि:शब्दता से पराजित हुए थे। मुझे आज समझ में आया, कि क्यों लीलापुरुषोत्तम श्रीकृष्ण भीषण परिस्थितियों में भी अपने अधरों पर सदैव मुस्कान को धारण किए रहते थे, मुस्कान वह अद्भुत अस्त्र है जो मुखर, वाचाल और वाचिक प्रदूषण पैदा करने वाले व्यक्ति को नष्ट ही नहीं ध्वस्त भी करता है।

मेरी मुस्कान और भाभी साहब के मेरे प्रति आत्मीय व्यवहार ने भाईसाहब को परेशान कर दिया था, वे सोच में पड़ गए कि उनके माथे पर ऐसा क्या है जो उन्हें दिखाई नहीं दे रहा किंतु दुनिया उसे साफ़ देख पा रही है?
निरुद्देशय भाईसाहब को अब एक उद्देश्य मिल गया था और वे कौतुहल, जिज्ञासा, उत्कंठा, चिंता व खिन्नता से भरे हुए अपने घर की ओर बढ़ गए, किंतु इस बार उनकी सफलता, सत्ता और सम्पत्ति का प्रमाण वह औरत जो सदा ही उनके पीछे चला करती थी मेरे पास खड़ी हुई आनंद से मुस्कुरा रही थी क्योंकि सत्ता और सम्पत्ति को भी वे ही लोग अच्छे लगते हैं जो उनका आदर करें।
मैं परम आनंद से भरा हुआ था, सभी को अपने शब्दों से पराजित भ्रमित करने वाले भाईसाहब आज मेरी नि:शब्दता से पराजित हुए थे। मुझे आज समझ में आया, कि क्यों लीलापुरुषोत्तम श्रीकृष्ण भीषण परिस्थितियों में भी अपने अधरों पर सदैव मुस्कान को धारण किए रहते थे, मुस्कान वह अद्भुत अस्त्र है जो मुखर, वाचाल और वाचिक प्रदूषण पैदा करने वाले व्यक्ति को नष्ट ही नहीं ध्वस्त भी करता है।