इस आइलैंड पर चारों ओर फैला हुआ है जहरीला रेगिस्तान, जाने से घबराते हैं लोग

- in अजब-गजब

मध्य एशिया में कजाखस्तान-उज्बेकिस्तान की सीमा पर एक छोटा सा द्वीप है। ये चारों तरफ से जहरीले रेगिस्तान से घिरा हुआ है। अब इसे द्वीप कहना ठीक नहीं होगा, क्योंकि इसके आस-पास की झील यानी अराल सागर अब कमोबेश सूख चुकी है। इस द्वीप का नाम वोजरोझडेनीया है। किसी दौर में ये मछली मारने का बहुत बड़ा ठिकाना था। ये उस वक्त की बात है जब अराल सागर दुनिया की चौथी बड़ी झील हुआ करती थी। लेकिन सोवियत संघ ने इस झील का इतना दुरुपयोग किया कि आज ये झील सूख चुकी है। इस वजह से वोजरोझडेनीया से भी जजीरा होने का खिताब छिन गया है। इस झील तक पानी लाने वाली नदियों का रुख खेतों की सिंचाई के लिए मोड़ दिया गया था। इसी वजह से अराल सागर सूख गया।

आज ये जगह कीटनाशकों का ढेर है। यहां पर पारा अक्सर 60 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। जिंदगी के निशान के तौर पर यहां सिर्फ सूखे हुए दरख्त दिखते हैं। कभी-कभार यहां पर सुस्ताते हुए ऊंट भी दिख जाते हैं, जो किसी जमाने में यहां चलने वाले बड़े जहाजों की छांव में बैठते हैं। वोजरोझडेनीया द्वीप ने अराल सागर का पानी इतना सोख लिया है कि इसका आकार दस गुना तक बढ़ गया है।

आज की तारीख में वोजरोझडेनीया को दुनिया के सबसे खतरनाक इलाकों में गिना जाता है। एक दौर में यहां पर सोवियत संघ का जैवीय युद्ध की तैयारी का ठिकाना हुआ करता था। सत्तर के दशक से यहां कई भयानक घटनाएं घट चुकी हैं। जैसे कि 1971 में एक वैज्ञानिक बीमार पड़ गई। उसे चेचक की बीमारी हुई थी। उसे चेचक का टीका लगा हुआ था, तब भी वो बीमार पड़ गई। बाद में वो ठीक हो गई, लेकिन चेचक की वजह से उसके भाई समेत तीन और लोगों की मौत हो गई। इस घटना के ठीक एक साल बाद दो लापता लोग एक नाव में मरे हुए पाए गए। कहा जाता है कि उन्हें प्लेग की बीमारी ने मार डाला। इसके बाद पूरे इलाके में बड़ी तादाद में मरी हुई मछलियां पकड़ी जाने लगीं। मई 1988 में 50 हजार के आसपास बारहसिंघे रहस्यमय तरीके से मर गए। इन सब की मौत एक घंटे के अंदर हो गई थी।

सोवियत संघ के विघटन के बाद यानी 90 के दशक से वोजरोझडेनीया वीरान पड़ा है। इस द्वीप के बारे में ब्रिटिश पत्रकार निक मिडलटन ने 2005 में एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी। निक बताते हैं कि वो एक ब्रिटिश सैन्य जासूस की मदद से इस इलाके में पहुंचे थे। यहां के बारे में कहा जाता था कि सोवियत दौर में यहां जैविक युद्ध के बहुत से तजुर्बे किए गए थे। बहुत से जानलेवा बीमारियों की जड़ समझे जाने वाले बैक्टीरिया यहां पर जमा किए गए थे। निक ने बताया कि वो मास्क, रबर बूट और ऑक्सिजन टैंक जैसे बहुत से एहतियात लेकर वोजरोझडेनीया द्वीप पहुंचे थे।

पश्चिमी देशों को यहां चल रहे रिसर्च के बारे में मालूम था। 1962 के दशक में सीआईए ने हवाई जहाज से इस इलाके की तस्वीरें ली थीं। इन तस्वीरों में इस वीरान इलाके में बने फायरिंग रेंज से लेकर बहुमंजिला इमारतें तक, साफ दिखती थीं। वोजरोझडेनीया को सोवियत संघ ने सैन्य अड्डा बना लिया था। यहां जैविक हथियारों का परीक्षण किया जाता था। हालांकि सोवियत संघ का ये प्रोजेक्ट बेहद खुफिया था। सोवियत संघ के किसी भी नक्शे में इसका जिक्र नहीं मिलता। जिन लोगों को इसके बारे में पता था, वो इसे इसके कोड नेम अर्लास्क-7 के नाम से जानते थे।

एक बार यहां पर एंथ्रैक्स बीमारी के कीटाणुओं की बड़ी खेप लाई गई थी। इसके अलावा चेचक और प्लेग के बैक्टीरिया भी यहां जमा किए गए थे। इसके अलावा कई बहुत सी भयंकर मगर बहुत कम होने वाली बीमारियों के विषाणु भी वोजरोझडेनीया में जमा किए गए थे। इन में से कई बीमारियों के तो लोगों ने नाम भी नहीं सुने होंगे, जैसे टुलारेमिया, ब्रूसेलोसिस और टाइफस। इतनी बड़ी तादाद में ये विषाणु जमा होने की वजह से पूरा का पूरा वोजरोझडेनीया द्वीप जहरीला हो गया है।

एक दौर में ये द्वीप इतना छुपा हुआ था कि इसकी तलाश ही उन्नीसवीं सदी में हुई थी। इसी वजह से इसे सोवियत संघ ने खुफिया रिसर्च का अड्डा बनाया। आसपास आसानी से उपलब्ध पानी की वजह से वोजरोझडेनीया द्वीप खतरनाक रिसर्च के लिए बेहद मुफीद था। आबादी कम होने से इंसानों को नुकसान होने का डर भी कम था। इसी वजह से एक बार सोवियत संघ ने एंथ्रैक्स के बैक्टीरिया की सबसे बड़ी खेप को यहां जमीन में दबाने का फैसला किया। ये खेप रूस के शहर येकाटेरिनबर्ग में तैयार की गई थी। बाद में इसे वोजरोझडेनीया लाया गया।

वोजरोझडेनीया पर एक वक्त में 50 हजार से ज्यादा लोग काम किया करते थे। इन का काम खतरनाक जैविक हथियार तैयार करना था। 1998 में एंथ्रैक्स लीक होने से 105 लोग मारे गए थे। इसके बाद सोवियत सरकार ने एंथ्रैक्स के सारे बैक्टीरिया के खात्मे का फैसला किया। इन्हें वोजरोझडेनीया के पास जमीन में बहुत नीचे दफ्न कर दिया गया। ये तादाद 100 से 200 टन के आस-पास थी। इन्हें गड्ढों में दबाकर लोग भूल गए। मगर दिक्कत ये है कि एंथ्रैक्स के बैक्टीरिया स्पोर के तौर पर जिंदा रहते हैं और मौका पाते ही वार करते हैं। तो इनसे इंसानियत को खतरा मंडरा रहा था। जमीन में दबे होने के बावजूद ये सैकड़ों साल तक जिंदा रह सकते हैं। कहीं गलती से भी इन्हें खोल दिया जाए, तो ये भयंकर तबाही मचा सकते हैं।