काम कामनाओं का बीज है

हृदयनारायण दीक्षित

स्तम्भ : काम प्रकृति में सर्वव्यापी है। प्राकृतिक है। प्रकृति की सृजनशक्ति है। प्रत्येक शक्ति का नियमन भी होता है। नियमविहीन शक्ति अराजकता में प्रकट होती है। फिर काम को विराट शक्ति जाना गया है। यही शक्ति हम सबके अंतःकरण में अनन्त अभिलाषाएं प्रकट करती रहती है। अभिलाषाएं कभी तृप्त नहीं होतीं। वे रूप बदल कर बारंबार अतृप्त भाव ही पैदा करती हैं। अतृप्ति व्यथित करती है। वह वर्तमान से संतुष्ट नहीं होती। लोभ पैदा करती है और क्रोध भी। अथर्ववेद में काम देवता हैं। वे नमस्कारों के योग्य हैं। कामनाओं का स्रोत हैं। लेकिन कामनाओं की अतृप्ति सदा सुखदाई है। अथर्ववेद मंे काम धारणा के इस महत्वपूर्ण भाव पर भी विचार किया गया है। कवि ऋषि अथर्वा आधुनिक मनोवैज्ञानिकों की प्रतिभा वाली भाषा में कहते हैं, “यह कामना भाव हमारा स्मरण करें लेकिन हमें इसका ध्यान न आए। हे देवों! आप इस काम स्मरण को हमसे दूर रखें। यह हमें पीड़ित न कर पाने के लिए शोक करे – देवाः प्र हिणुत स्मरमसौ मामनु शोचतु।” (6.130.3) यहां 6 मंत्रों के अंत में यही पंक्ति प्रयुक्त हुई है।
सिगमण्ड फ्राइड विश्व प्रतिष्ठ मनोवैज्ञानिक थे। उन्होंने इसी कामभाव को लिविडो कहा है। लिविडो मनुष्य की कामेच्छा है। यह बार बार स्मृति में आती है और हमारे संपूर्ण व्यक्तित्व को प्रभावित करती है। फ्रायड इससे बचाव के उपाय से अपरिचित थे। भारतीय योग विज्ञानी पतंजलि ने चित्तवृत्ति पर गहन विचार किया था। उन्होंने ध्यान व धारणा द्वारा चित्तवृत्तियों द्वारा पैदा होने वाले दुख सुख का विवेचन किया था। उन्होंने सुख-दुख और उत्तेजना की समाप्ति का वैज्ञानिक मार्ग सुझाया था। अथर्वा का ध्यान कामप्रभाव पर है। फ्रायड का लिविडो और पतंजलि की चित्तवृत्ति निकटवर्ती है। अथर्वा फ्रायड के विचार के निकट हैं लेकिन समाधान के लिए पतंजलि के करीब हैं। पतंजलि अथर्वा के बाद हुए। अथर्वा का कथन प्राचीन है लेकिन दोनो का तल एक है। कहते हैं, “यह कामभाव मेरा स्मरण करे। हमारा प्रिय हमें स्मरण करे। दे देवों! आप इस काम-स्मर को हमसे दूर करें। यह हमें पीड़ित न कर पाने के लिए शोक करे।” (वही 2)
अथर्वा के मंत्र सीधी स्तुतियां हैं। देव स्तुतियों से भौतिक परिणामों की प्राप्ति हमेशा विवाद का विषय रही है। देवों की कृपा से ही परिणाम पाने का विश्वास अंधविश्वास कहा जाता है। उपनिषदों में भी यज्ञ की नाव को छिद्रों वाला बताया गया है। लेकिन इस प्रसंग की स्तुतियां भिन्न प्रकृति की हैं। यहां ‘काम भाव’ के प्रभाव को दूर करने की प्रार्थना है। भाव का प्रभाव भाव जगत पर ही होता है। प्रार्थना या स्तुति का प्रभाव भी भावजगत पर ही होता है। इसीलिए स्तुति का उपयोग है। स्तुति निरर्थक कर्मकाण्ड नहीं है। स्तुति भावजगत में रासायनिक परिवर्तन लाती हैं। इसीलिए किसी कार्य की शुरूवात में संकल्प लिये जाते हैं। प्रगाढ़ भाव से लिए गए संकल्प मनोबल बढ़ाते हैं। अथर्वा देवों से कहते हैं, “हे मरूत देवो! हमें उन्मत करो, चेतना को ऊध्र्वामुखी बनाओ। हे अंतरिक्ष आप उन्मत्त करो, हे अग्नि उन्मत करो। यह काम हमें प्रभावित न कर पाने के लिए शोक करे।” (वही 4) यह मंत्र काव्य की दृष्टि से भी सुंदर है।
काम या कामना न पूरी होने की व्यथा मानसिक होती है। चित्त कामना के प्रभाव में होता है। मानसिक तनाव बढ़ते हैं। मानसिक व्यथा के प्रभाव शरीर पर भी पड़ते हैं। इसका उल्टा भी होता है। शरीर के कष्ट व्यथा भी देते हैं। अथर्वा कहते हैं “जो व्यथा सिर पैर से आई है। मैं उसे दूर भगाता हूं। हे देवो! आप काम प्रभाव को हमसे दूर रखें।” (6.131.1) प्रार्थना के प्रभाव पड़ते हैं। कहते हैं “हे देव! हमारी प्रार्थना को सही मानें। हमारी विनय स्वीकार करें। काम विकार को हमसे दूर रखें। वह हमें प्रभावित न कर सकें।” (वही 3) प्रशांत चित्त सर्जक होता है। सुख और आनंद का क्षेत्र है प्रशांत मन। अशांत मन दुख शोक बढ़ाता है। शांत चित्त आनंददाता है। अशांत चित्त का मुख्य कारण कामनाभाव है। कामनाएं असंतुष्ट भाव बढ़ाती हैं। दिक्काल और भी तनाव देते हैं। अथर्ववेद में कामस्रोत और उसके प्रभाव पर सम्यक विचार हुआ है।
वरूण शक्तिशाली देवता हैं। वे प्रकृति के संविधान के रक्षक व पालक हैं। प्रकृति के संविधान का नाम ऋत है, ऋत का अनुसरण धर्म है। वैदिक धर्म वरूण का नियम कहा जाता है। इन नियमों का का पालन कराना वरूण का धर्म है। ऋग्वेद में वरूण का सर्वशक्तिमान है। अथर्ववेद (4.16) में भी वरूण को सर्वज्ञ कहा गया है। कहते हैं कि “वरूण सब जानते हैं। वे स्थिर, गतिशील, गुप्त या प्रत्यक्ष के ज्ञाता हैं। वे दो मनुष्यों की गोपनीय वार्ता भी जानते हैं।” (वही 1.2) अथर्ववेद के एक सूक्त (6.132) में काम प्रभाव को वरूण धर्म से तपा देने की स्तुति है। इस सूक्त के सभी मंत्रों के अंत में एक वाक्य समान है कि “मैं उस काम प्रभाव को वरूण धर्म से तपाता हूं – तं ते तपामि वरूणस्य धर्मणा।” यहां धर्म आत्म शुद्धीकरण का तप है। काम अस्वाभाविक नहीं है। यह प्रकृति में सर्वव्यापी है। इसे प्रकृति की शक्ति ने ही प्रवर्तित किया है। लेकिन इसका अस्वाभाविक प्रभाव दुख देता है। अथर्वा कहते हैं “विश्वदेवो ने काम को जल में अभिषिक्त किया है। हम वरूण धर्म से इसे तपाते हैं – तं ते तपामि वरूणस्य धर्मणा।” (6.132.2)
स्वप्नों का केन्द्र काम है। स्वप्नों की संरचना आश्चर्यचकित करती है। आधुनिक वैज्ञानिकों के लिए भी स्वप्न एक विचित्र पहेली हैं। अथर्ववेद के ऋषि के लिए भी वे आश्चर्यजनक हैं। कहते हैं “स्वप्न का वार्तालाप पितृगण नहीं जानते हैं और देवता भी यह तत्व नहीं जानते।” (19.56.4) यहां बड़ी बात कही गई है कि देवता भी स्वप्न का वार्तालाप नहीं जानते। सिगमण्ड फ्राइड स्वप्न का केन्द्र ‘लिविडो’ मानते थे। वे इसे मनुष्य की काम अभिलाषा का सृजन मानते थे। वे अनेक स्वप्नों के बाद में सही हो जाने का कारण नहीं बता सके। कुछ स्वप्न अच्छा या बुरा फल भी पैदा करते हैं। अथर्ववेद में दुःस्वप्नों पर कई सूक्त हैं। ऋषि स्वप्नों को महत्वाकांक्षा से भी प्रेरित बताते हैं, “तीव्र गतिशील और महत्वाकांक्षा से प्रेरित स्वप्न असुरों से देवों तक पहुंचा है।” (वही 3) परिणाम देने वाले स्वप्नों के अलावा सभी स्वप्नों का केन्द्र काम है। ऋषि कहते हैं, “हे स्वप्न हम आपके मित्रों व परिजनो को जानते हैं। हम आपके अधिपति से भी परिचित हैं। तुम यमलोक से पृथ्वी पर आते हो। प्राणधारी जीवों के चित्त में उनके मनोरथ पर बैठकर आते हो।” (वही 6 व 1) यहां ‘मनोरथ’ शब्द ध्यान देने योग्य है। मनोरथ में मन ही गतिशील रथ है।
मन कामनाओं का वाहक है। यह स्वप्न सर्जक भी है। काम का सृजनात्मक संस्कार अथर्ववेद की अपेक्षा है। स्वप्न का अर्थ व्यापक है। स्वप्न निद्रा में ही नहीं आते। जागते समय भी आते हैं। बेशक निद्रा के समय आने वाले स्वप्नों पर मनुष्य का नियंत्रण नहीं हैं लेकिन निद्रा और जागरण अलग अलग स्वतंत्र सत्ता नहीं है। जागरण के समय आने वाले स्वप्न या विचार भी हमारे नियंत्रण में नहीं होते। हम जाग्रत अवस्था में तमाम इच्छाएं अनुभव करते हैं। वे अच्छी या बुरी हो सकती है। राष्ट्र निर्माण या अन्य सृजनात्मक कार्यो की इच्छाएं भी स्वप्न है। जागृत अवस्था में देखे गए ऐसे स्वप्न निद्रा में भी प्रवेश कर सकते हैं। जागृत दशा में तमाम अशुभ संकल्प भी लिए जाते हैं। वे भी निद्राजगत में प्रवेश कर सकते हैं। अथर्ववेद का ऋषि संभवतः जागृत अवस्था के दुःस्वप्नों से भी बचना चाहता है। स्तुति है, “हे स्वप्न! हमारी यशस्विता द्वारा दुःस्वप्नो से हमारी रक्षा करो – यशस्विनो नो यशसेह।” (वही 6) यहां मनुष्य के समग्र चिंतन को सृजनशील बनाने के सूत्र हैं। यहां कोरा मनोविज्ञान हीं नहीं है। तथ्यगत मनोविश्लेषण के साथ ही अंतर्जगत के सभी क्षेत्रों को सुखकर बनाने की प्रतिभूति भी है।
(रविवार पर विशेष)
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष हैं।)