कालजयी कबीर ईश्वर सा लगता है मुझे

कबीर को ईश्वर मानने वाली और काशी से अतिशय प्रेम करने वाली कवयित्री रेखा मैत्र अपने कृतित्व में जितनी गंभीर और दार्शनिक हैं, व्यक्तित्व से उतनी ही अलमस्त और जीवंत हैं। आपने कई वर्षों तक राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार के मुम्बई स्थित हिन्दी शिक्षण योजना के अंतर्गत विभिन्न केंद्रीय कार्यालयों, उपक्रमों, कम्पनियों के अधिकारियों और कर्मचारियों को हिंदी भाषा का प्रशिक्षण दिया। अमेरिका स्थित गवर्नेंस स्टेट यूनिवर्सिटी में अध्यापन कार्य किया और अब स्वतंत्र लेखन के साथ ही साथ साहित्यिक संस्था उन्मेष से जुड़कर अपना सक्रिय रचनात्मक योगदान दे रही हैं।प्रवासी हिंदी – साहित्य को समृद्ध बनाने में उल्लेखनीय योगदान देने वाली सुपरिचित -प्रतिष्ठित कवयित्री रेखा मैत्र जी से दस्तक टाइम्स की साहित्य-संपादिका सुमन सिंह की बातचीत-

डॉ. सुमन सिंह

कबीर की काशी में जन्मी हैं आप, एक विराट-चेतना सम्पन्न मन के अक्खड़-फक्कड़ फकीर ने आपके बालमन को कैसे और कितना प्रभावित किया?
रेखा मैत्र- कबीर तो मेरे रोम-रोम में बसे हैं। ये काशी में जन्म लेने से हुआ है या मेरे पिता श्री से बचपन में कबीर के दोहे, भजन आदि सुनकर हुआ, कहना मुश्किल है। कबीर मेरे सबसे प्रिय कवि हैं। उनका जीवन दर्शन मुझे और भी मोहता है। कालजयी कबीर ईश्वर सा लगता है मुझे।

स्मृति पटल पर काशी कितनी अंकित है?
रेखा मैत्र – यूँ तो काशी कभी भूला ही नहीं पर जाते-जाते एक बार फिर देख लूं-इस खयाल से दो वर्ष पूर्व वहां की माटी सर से लगा आई हूं।

आपके भीतर कविता किन क्षणों में स्पन्दित हुयी, वे दु:ख के क्षण थे या सुख के?
रेखा मैत्र- दु:ख-सुख तो छांव और धूप से आते रहे हैं पर खालीपन से बचने के लिए लिखना शुरू किया।

अमेरिका जाने का संयोग कैसे बना?
रेखा मैत्र – मैं अमेरिका में बसना कभी नहीं चाहती थी, पर वही नियति थी। मेरे पति ने बताया था कि हम कुछ वर्षों में लौट जाएंगे, पर वो हुआ नहीं।

क्या प्रवासवास ने आपकी सृजनशीलता को समृद्ध किया?
रेखा मैत्र- प्रवास ने मुझे लिखने की प्रेरणा दी या कह सकती हैं कि लिखने के लिए मजबूर किया।

आप मूलत: कवयित्री हैं, कविता आपके लेखे क्या है ?
रेखा मैत्र – जानती हो सुमन, मेरे हिसाब से कविता दिल से दिल की बात है, वो अगर लयात्मक हो तो सोने में सुहागा है ।

लेखन के अतिरिक्त आपकी अन्य रुचियां?
रेखा मैत्र- मुझे संगीत और भ्रमण पसंद है ।

इस बातचीत के दौरान आपकी कविता की एक पंक्ति याद आ रही है…’जब मन गलियारों में सफ़र करता है, तब आदमी बड़ा अकेला होता है।’ ये गलियारे और एकाकी मन की पीड़ा प्रवासी हो जाने के कारण है?
रेखा मैत्र- एकाकी होने का एक कारण कहां होता है? भीड़ बढ़ती जाती है आस-पास और आदमी अकेला होता जाता है।

आपके लेखन को सर्वाधिक प्रभावित किसने किया?
रेखा मैत्र – इंसान और रिश्ते मुझे प्रभावित करते हैं।

वर्तमान समय में रचे जा रहे साहित्य का आंकलन आप कैसे करती हैं?
रेखा मैत्र – सृजन एकाकीपन चाहता है। आज गिने चुने साहित्यकार हैं जो उतना समय निकाल पाते हैं। जाहिर है कि ये स्वर्ण काल तो नहीं ही है ।

आज की स्त्री और स्त्री-चेतना पर आपकी प्रतिक्रिया?
रेखा मैत्र – आज की स्त्री अपने अधिकारों के प्रति सजग है और ये शुभ चिन्ह है, जो उसे बहुत आगे ले जा सकता है। ये आशा जरूर बनती है कि यदि अधिकार और कर्तव्य के प्रति समान रूप से सजग रही तो सुनहरे भविष्य की सुखद सम्भावनाएं हैं।

“अच्छे बुरे दिनों को पोशाक की तरह बदलने वाली कवयित्री अपने जीवन की इस सृजनात्मक यात्रा से कितनी संतुष्ट है?
रेखा मैत्र – ये बहुत सुंदर सवाल है जिसका जवाब मैं ख़ुद ही खोज रही हूँ।

* आजकल क्या व्यस्तता है ?
रेखा मैत्र – पुस्तकों के प्रकाशन के बाद जब नून, तेल, लकड़ी की व्यवस्था खुद को करनी पड़ी तो अगली पुस्तक “एक और पड़ाव ” मेरा मुंह ताक रही है अर्थात् सृजन विलंबित गति से चल रहा है। सृजन इस गति से मैं कैसे प्रसन्न हो सकती हूँ! इस प्रश्न का उत्तर मेरी एक कविता ही देगी –
कभी कविता आँख मिचौनी खेलती है मुझसे।
आज उसके सृजन के सारे जतन कर डाले
सब काम-काज ठप्प करके
काग़ज़-क़लम लिए आ बैठी
आस – पास बड़ी देर तक निहारती भी रही।
कमरे के पर्दे खोल दिए
बाहर की ठंडी हवा भी आने लगी।
दूर के पेड़ आसमान की साड़ी में
हरे बॉर्डर भी सजा गए
कविता फिर भी मुझे
ठेंगा दिखाकर भाग गई।
——
सो , ये है मेरी स्थिति !
जीवन आपाधापी में मेरी सखी मुझसे रूठ जाती है फिर मैं उसे मना लेती हूँ ! बस यही है क्रम इन दिनों!

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