कितने सिंगुर?

- in दस्तक-विशेष

सुभाष गाताडे
प्रकाशम जिले के किसानों के लिए सर्वोच्च न्यायालय का एक ताज़ा निर्णय उम्मीद की किरण के तौर पर सामने आया है जिसमें उसने एक जनहित याचिका के सिलसिले में केन्द्र और राज्य सरकारों से जवाब भेजने के लिए निर्देश दिया है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे एस केहर की पीठ के सामने आंध्र स्थित गैर सरकारी संस्था ‘एसईजेड फार्मर्स प्रोटेक्शन एण्ड वेलफेयर एसोसिएशन की तरफ से यह याचिका डाली गयी है जिसमें बताया गया है कि विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने के नाम पर किसानों से ली गयी जमीन में से नब्बे फीसदी जमीन बेकार पड़ी है। याचिका में टाटा की लखटकिया नैनो कार बनाने के लिए बंगाल के सिंगुर में जमीन के हस्तगतीकरण और बाद में अदालत के निर्णय के बाद उसे किसानों को लौटा देने की बात को आधार बनाया गया है, जहां किसानों को उपरोक्त जमीन का मुआवज़ा तक मिला था। ख़बरों के मुताबिक आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले के यह किसान- जिन्हें अपनी 22 हजार एकड़ से अधिक जमीन वर्ष 2008 में औद्योगिक कोरिडॉर के लिए देनी पड़ी थी- इन दिनों आशान्वित हैं कि उन्हें अपनी जमीन वापस मिल सकेगी। मालूम हो कि पेड्डागंजम, गुंडायापालेम, पाथपाडू, चिंतागारीपालेम और देवरामपाडू तथा अन्य कई गांवों में फैली जमीन पर दो समुद्री बंदरगाह बनाने तथा औद्योगिक कोरिडॉर बनाने की योजना को अंजाम देने के लिए किसानों से जमीन ली गयी थी, मगर योजनाएं कागज़ पर ही बनी रहीं और अपनी जमीन वापस पाने के लिए वह लम्बे समय से आन्दोलनरत थे।
उपरोक्त याचिका में कंट्रोलर एण्ड आडिटर जनरल की रिपोर्ट को उद्धृत किया गया है जो यह कहती है कि ‘‘राज्यों के लिए 50 स्पेशल इकोनोमिक जोन्स के लिए मंजूरी दी गयी थी जिसमें से महज 15 कार्यरत हैं, छह को डिनोटिफाई किया गया है और 29 को अभी व्यावसायिक गतिविधि शुरू करनी है। जहां इन विशेष आर्थिक क्षेत्रों से 12 लाख 47 हजार रोजगार अवसरों के सृजित करने की बात की गयी थी वहीं महज 42 हजार अवसर मिल सके हैं।’ याचिकाकर्ता के मुताबिक जिन उद्योगों को इन क्षेत्रों में सस्ते दर पर जमीन आवंटित की गयी थी उन्होंने बरसों तक इंतजार किया तथा जब जमीन के दाम बढ़े तो उसी जमीन को बैंकों के पास गिरवी रख कर मोटे कर्जे हासिल किए और इन कर्जों को इन क्षेत्रों में उद्योग स्थापित करने के लिए इस्तेमाल करने के बजाय अन्य कामों में लगा दिया।
इस मसले पर लिखे अपने संपादकीय में अग्रणी साप्ताहिक ‘इकोनोमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली’ विशेष आर्थिक क्षेत्र नीति की सामाजिक कीमत की भी बात उठाता है और कहता है कि ‘इस नीति की सामाजिक कीमत लगभग आर्थिक कीमत इतनी ही होगी। हालांकि दोनों ही पहलुओं पर तथ्यों के गहरे अभाव को रेखांकित करता है।’ दरअसल इस याचिका ने भी अदालत से यह गुजारिश की थी कि वह सरकार को आदेश दे कि वह सम्बधित किसानों के जीवन पर इस नीति के पड़ने वाले सामाजिक प्रभाव का अध्ययन करें ताकि यह जाना जा सके कि जीवनयापन के उनके साधन छीनने के बाद उन्हें कितने मुआवजे की जरूरत है। विडम्बना ही है कि वर्ष 1990 से 2003 के दरमियान 21 लाख हेक्टेयर जमीन गैरकृषिगत कामों के लिए हस्तांतरित की गयी मगर यह किसी को नहीं मालूम कि इसमें से कितनी जमीन दलितों, आदिवासियों या अन्य सीमांत किसानों की थी।
यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या ऐसे मामलों में उच्चस्तरीय जांच करने का आदेश सर्वोच्च न्यायालय दे देगा, जो इस कड़वी सच्चाई को रेखांकित करती है कि सरकार द्वारा लोगों से अधिग्रहीत की गयी जमीनें ‘सेज’ अधिनियम के उद्देश्यों को पूरा करती नहीं दिखती हैं और इस तरह हासिल की जा रही जमीन एक तरह से ग्रामीण जनता की सम्पत्ति को कार्पोरेट दुनिया को हस्तांतरित करने का जरिया बन गया है। जबकि यह पहली दफा नहीं है कि यह बात सामने आयी है। मालूम हो कि दो साल पहले ‘स्पेशल इकोनोमिक जोन/विशेष आर्थिक क्षेत्र अर्थात ‘सेज’ के अमल को लेकर रखी गयी ‘कन्ट्रोलर एण्ड आडिटर जनरल/कैंग’ की रिपोर्ट ने यही बात बतायी थी कि ‘सार्वजनिक हित’ के नाम पर विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने के लिए हासिल की जा रही हजारों हेक्टेयर जमीनों को अन्य कामों के लिए बेचा जा रहा है या इस्तेमाल किया जा रहा है। संसद के पटल पर प्रस्तुत इस आडिट रिपोर्ट में देश के कई अग्रणी कार्पोरेट समूहों के नाम रहे, जिन्होंने इस तरह सस्ते में हासिल की गयी जमीनों को डिनोटिफाई करके, अन्य समूहों को बेच कर करोड़ों/अरबों रुपए कमाए। रिपोर्ट के मुताबिक जहां छह राज्यों में 39,425 हेक्टेयर जमीन विशेष आर्थिक क्षेत्र अर्थात सेज के लिए आवंटित की गयी, जिनमें से 5,402 हेक्टेयर जमीन अर्थात लगभग 14 फीसदी जमीन इसी तरह डिनोटिफाई करके बेच दी गयी। इस रिपोर्ट में डेवलपर्स की इस वजह से आलोचना की गयी है कि वह टैक्स फ्री जोन बनाने के नाम पर जमीनों के विशाल टुकड़े हासिल अवश्य कर लेते हैं, मगर उसका बहुत मामूली हिस्सा इस्तेमाल करते हैं। इस सन्दर्भ में ऐसे विशेष क्षेत्रों के कई डेवलपर्स- जैसे रिलायंस, एस्सार, श्रीसिटी, डीएलएफ और यूनिटेक आदि को निशाना बनाया गया। आंध्र प्रदेश के श्रीसिटी सेज का मसला रेखांकित करने वाला है, जिसने दो हजार हेक्टेयर से अधिक जमीन को डिनोटिफाई करके अल्स्टॉम, पेप्सीको, कैडबरी, कोलगेट और केलॉग जैसी बहुद्देशीय कम्पनियों को बेच दिया। बड़े गाजे-बाजे के साथ शुरू की गयी प्रस्तुत योजना, जिसके पीछे एक तरह से चीनी चमत्कार को दोहराने का मकसद था और भारत को एक नए मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की योजना थी, को लेकर रिपोर्ट में साफ लिखा गया था कि ‘यही देखने में आ रहा है कि इसमें सबसे महत्वपूर्ण एवं आकर्षक घटक जमीन ही है। मुल्क में जहां ‘सेज’ के नाम पर 45 हजार हेक्टेयर से अधिक जमीन नोटिफाई की गयी, उसमें से 38 फीसदी जमीन पर अभी भी कोई काम नहीं शुरू किया गया है।’
अब जहां तक विशेष आर्थिक क्षेत्र का सवाल है तो उसके बारे में कुछ बातें बिल्कुल स्पष्ट रही हैं: कथित तौर पर विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए बने वह देश के अन्दर ही स्थित अलग किस्म के भौगोलिक इलाके होते हैं जो ऐसे आर्थिक नियमों से संचालित होते हैं जो उपरोक्त देश विशेष के आर्थिक कानूनों से अधिक लचीले होते हैं अर्थात अगर मुल्क विशेष में मजदूरों के अधिकारों की सुरक्षा करने वाले, कर, व्यापार, उत्पादन-शुल्क आदि को लेकर बने निश्चित कानून होते हैं तो उसी मुल्क की धरती पर बने इन विशेष आर्थिक क्षेत्रों को इन तमाम ‘बन्धनों’ से मुक्ति मिलती है। सिद्धान्तत: ऐसे क्षेत्रों का निर्माण अपने मुल्क के हिसाब से सोचें तो देश के पूंजीपतियों को ‘बाहरी’ पूंजीपतियों के बरअक्स अधिक वरीयता देने से जुड़ा मामला है। आम तौर पर यहां निर्मित तमाम उत्पादन निर्यात क्षेत्र के लिए ही उपलब्ध होता है, जिन्हें लगभग दस साल तक तमाम करों से मुक्त रखा जाता है। यह भी स्पष्ट है कि विशेष आर्थिक क्षेत्र के निर्माण से सबसे अधिक यहां के निजी या सार्वजनिक उद्यम लाभान्वित होते दिखते हैं। एक स्थूल आकलन के हिसाब से ‘सेज’ के निर्माण से पांच साल के अन्दर राज्य को 1.75 लाख करोड़ रुपये की वित्तीय हानि होगी। यह इतनी बड़ी रकम है कि इसके जरिये हर रोज भूखे सो जाने वाले 32 करोड़ नागरिकों को सालों तक खाना खिलाया जा सकता है या आने वाले पांच सालों तक हर ग्रामीण परिवार के दो सदस्यों को गारन्टीशुदा रोजगार दिया जा सकता है।
जहां चीन का अनुकरण करते हुए उन्हें बनाया गया था, मगर दोनों मुल्कों में ऐसे क्षेत्रों की लाभप्रदता में इस वजह से जमीन आसमान का फर्क दिखाई दिया कि जहां चीन ने कम संख्या में, विशाल विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाएं, जो बन्दरगाहों के पास स्थित थे ताकि उनके निर्यात में सुविधा हो, इसके बरअक्स भारत में भारी संख्या में ऐसे क्षेत्रों का निर्माण हुआ, जिन्हें बनाते वक्त इस बात का भी ध्यान नहीं रखा गया कि इन क्षेत्रों के बाहर अवरचना/इन्फ्रास्टक्चर की क्या स्थिति है। जानने योग्य है कि विशेष आर्थिक क्षेत्रों की इतनी अधिक संख्या को देखते हुए- जिनके चलते सरकार की अपनी आमदनी पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा, विश्व बैंक ने भी चिन्ता प्रगट की थी। कैग की उपरोक्त रिपोर्ट में सेज डेवलपर्स को दी जा रही इस छूट का मसला भी उठा था कि उन्हें आवंटित जमीनों पर काम शुरू न करने के बावजूद उन्हें लगातार समय विस्तार दिया गया। इस सन्दर्भ में रिपोर्ट ने देश के अग्रणी समूह की चर्चा की थी। मुकेश अम्बानी समूह द्वारा स्थापित किए गए नवी मुंबई एसईजेड ने बीती सरकार से महाराष्ट्र के द्रोणागिरी में 1,250 एकड़ दायरे में बहुउत्पाद पर केन्द्रित एक एसईजेड कायम करने की अनुमति मांगी थी। 2006 में समूह को जमीन हस्तांतरित होने के बावजूद /रिपोर्ट के मुताबिक/वहां पर एकभी इकाई ने उत्पादन नहीं शुरू किया है और जैसा कि स्पष्ट रहा है कि उसे इतने साल बाद भी समय विस्तार की इजाजत मिलती रहती है। आडिट में यह भी उजागर करती है कि कई बार एसईजेड विकसित करने के लिए हासिल की गयी जमीन को आवासीय योजनाओं के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
यह एक सकारात्मक बात है कि जनता की सम्पत्ति को थैलीशाहों के नाम करने की इस नीति के खिलाफ संघर्ष महज अदालतों तक सीमित नहीं हैं। ऐसे मौके भी आए हैं कि जनता के व्यापक प्रतिरोध के चलते विशेष आर्थिक क्षेत्रों को विकसित करने वाली परियोजनाओं को रद्द करना पड़ा और जमीनें किसानों को लौटानी पड़ीं। चार साल पहले महाराष्ट्र इण्डस्ट्रियल डेवलपमेण्ट कार्पोरेशन को ऐसा ही कदम उठाना पड़ा था और स्थानीय आबादी से ली गयी सैंकड़ों एकड़ जमीन /8,700 एकड़ जमीन/ के ‘डिनोटिफाय’ करने का ऐलान करना पड़ा था। इसमें शामिल रहा 2008 में प्रस्तावित इण्डिया बुल्स का रायगढ़ जिले में 1,935 एकड़ का प्रोजेक्ट, कार्ला में महिन्द्रा एण्ड महिन्द्रा का 3,000 एकड़ में फैला प्रोजेक्ट, औरंगाबाद एवं पुणे में विडियोकॉन की 3,763 एकड़ में फैली दो परियोजनाएं। गौरतलब है कि जनता के निरन्तर विरोध के चलते विशेष आर्थिक क्षेत्र की योजना सूबा महाराष्ट्र में कभी जड़ नहीं जमा सकी और मंजूरी मिले 104 प्रोजेक्ट में से सिर्फ 18 परियोजनाओं पर काम शुरू हो सका था। उपरोक्त विकास क्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए नेशनल एलायन्स फार पीपुल्स मूवमेण्ट्स की तरफ से कहा गया था कि ‘आंदोलन के मुद्दे बिल्कुल स्पष्ट एवं न्यायपूर्ण थे। निजी कार्पोरेट घरानों के लिए जमीन का छीनना न केवल अवैध है बल्कि असंवैधानिक कार्रवाई भी है।’ इस बात पर आश्चर्य प्रगट किया गया था कि आखिर जमीन पर आधारित समुदायों को उजाड़ कर पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए सरकारें इतना उतावला होती क्यों दिखती रही हैं । यह एक ऐसा सवाल है जिसे अब अधिक जोर से उठाने की जरूरत आ पड़ी है।