कैसे प्रकट करे अपने अंदर बैठी दुर्गा को।

रामकुमार सिंह

मॉ भगवती हम सभी के अंदर प्राण शक्ति के रूप में विद्यमान हैं, आईये अपने अंदर ही छुपी इस अदृश्य शक्ति को प्रकट करना सीखे ।

नवरात्रि विशेष: नवरात्रि पर्व का दो मौसमों के संधिकाल पर आयोजन महज आध्यात्मिक-सामाजिक संयोग ही नही वरन् मानव शरीर व उसकी स्वस्थता के लिहाज से भी अत्यधिक रोचक हैं।पूर्व से ही हमारे धार्मिक-आध्यात्मिक मार्गदर्शको को यह आभाष था की हमारे देश या समाज के अधिकतर लोग धर्म-अध्यात्म के गूढ सैद्धांतिक नियमो को समझ कर प्रयोगिक तौर पर इससे लाभांवित हो पाने में असमर्थ ही रहेगे।इसलिए आध्यात्मिक शोद्धार्थियो ने हमारी रहन-सहन,खान-पान की शैली,परंपराओ-रिवाजो और प्रत्येक स्थान के लिहाज से अलग-अलग लोकाचार को ध्यान मे रखते हुए,परंपराओ और लोकाचार में दिखने वाले अज्ञान में विज्ञान की प्रक्रिया निहित कर,साथ ही उसके इस्तेमाल के तरीके को बेहद आसान बना दिया।

जिसके फलस्वरूप परिणाम चमत्कारिक उपस्थित हुये,साथ ही रोचकता से भरपूर हो कर पर्व और उत्सव के रूप में परणित हो गये।एक सामान्य आदमी भी जो बौद्धिक स्तर पर उच्च चेतना न रखता हो,फिर भी परंपरागत धार्मिक प्रक्रिया को अपना कर अपने को शारीरिक,अध्यात्मिक रूप से लाभांवित कर सकता हैं।यह हमारे मार्गदर्शको ने हजारो वर्ष पूर्व ही सुनिश्चित कर दिया था।किंतु इन बेहद उपयोगी और वैज्ञानिक प्रक्रियाओ में भी समय के साथ विसंगतियॉ आती गयी। जिनको समय-समय पर वर्तमान अनुभवगम्य शोद्धार्थियो द्वारा संशोधित किया जाता रहता हैं। फिर भी इनमे भ्रम की संभावना सदैव बनी रहती हैं।वर्तमान समय में प्राय: देखा जाता हैं की उपवास के समय चाय,कॉफी,कुट्टू, सिंघाड़ा, देशी घी, मखाना दूध,दही जैसी सामग्रियो का उपयोग लोग उपवास में दौरान करने लगे हैं।अब इसे तो उपवास नही माना जा सकता।इसीलिए प्राय: उपवास तोड़ने के बाद अक्सर लोगो को बीमार होते हुए देखा गया है।

भारतीय ग्रामीण परिवेश में पूर्व के सामान्य दिनो में भी दिन में कच्चा रात में पक्का यानी एक टाइम ही अन्नमय भोजन लेने का चलन था। एक टाइम केवल फल और सब्जियो के सेवन का रिवाज था।किंतु धीरे-धीरे लोगो ने इन स्वाभाविक और प्राकृतिक नियमो में अपनी इच्छानुसार परिवर्तन कर लिया और परिणाम के रूप में सामान्य जीवन में भी अनेक प्रकार के रोगो को आमंत्रित कर लिया ,जोकि पूर्णरूप से मात्र हमारी वर्तमान दोषपूर्ण भोजन शैली का परिणाम है।#नवरात्रि व्रत-उपवास का आध्यात्मिक दृष्टिकोण के साथ-साथ शारीरिक स्वस्थता से विशेष संबंध हैं।

अक्सर लोगों को यह कहते हुए सुना जाता है कि मौसम बदलने के कारण खांसी, बुखार या अन्य बीमारी हो गयी,दो मौसमो के संधिकाल पर मौसम परिवर्तन के कारण रोगो का प्रकोप तो होता ही हैं। जिसको उपवास के द्वारा प्राकृतिक तरीके से रोका जा सकता हैं।जिस तरह से गाड़ियों कि सर्विसिंग का प्रावधान है।गाड़ी चलाने के बाद पहले से निर्धारित किलोमीटर के बाद उसकी सर्विसिंग कराई जानी आवश्यक होती है। उसी प्रकार शरीर को भी एक निश्चित अवधी के उपरांत भोजन की प्रक्रिया से कुछ समय के लिए मुक्त रखना अत्यंत आवश्यक है।ताकि शरीर की आतंरिक सफाई हो सके,इसी उद्देश्य से उपवास का विधान प्रचलित हैं।लगातार तनाव भरा जीवन और खान-पान की अनियमितता के कारण मनुष्य के शरीर मे रोगो का उत्पन्न होना स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसको समय-समय पर विश्राम और बिना भोजन के शुद्धीकरण(क्लीनिंग) प्रक्रिया मे लाना बहुत आवश्यक हैं।

शरीर में बचा रह गया पुराना मल व कई तरह के टाक्सिंस व वात-पित्त-कफ आदि के असुंतलन को संतुलित करना व शरीर में कई प्रकार के छारीय तत्वो को उपवास की प्रक्रिया से शोधित करना अत्यंत आवश्यक होता हैं।इसके लिए सबसे आवश्यक क्रिया यह हैं कि गरिष्ठ व अन्नमय भोजन को रोक कर उपवास के द्वारा शरीर के शुद्धीकरण का प्राविधान अत्यंत प्रचीन है।दो मौसमो के संधिकाल पर #नवरात्रि के व्रत-उपवास के द्वारा शरीर की आंतरिक सफाई कर के हर व्यक्ति अगले लगभग छह माह के लिए शारीरिक स्वस्थता की गारंटी पा सकता हैं।किंतु इसके लिए उपवास की पूरी प्रक्रिया को सही से समझना अति आवश्यक है और साथ ही किसी अनुभवी उपवासकर्ता का मार्ग दर्शन भी बहुत जरूरी हैं।”मसलन #उपवास काल में आलू अरबी, केला, चीनी, अन्न, दूध” या इससे बनी हुई कोई खाद्य सामग्री का इस्तेमाल अगर किया गया तो परिणाम विपरीत ही आयेंगे।#उपवास का ठीक-ठीक औचित्य तो यह है कि पिछले दिनो खान-पान में जिस पदार्थ की अधिकता हुई है उसे रोक कर शरीर की ठीक तरह से वाह्य के साथ आंतरिक सफाई कर ली जाये,अगर शरीर में शुगर की अधिकता है तो उसका सेवन कुछ समय के लिए रोक देने से वह स्वत: ही नियंत्रित हो जाएगी।

अगर डायबिटीज के लक्षण उत्पन्न होने वाले भी होगें तो नष्ट हो जायेंगे।इसी प्रकार अनेक शारीरिक रोग के कारण जैसे उच्च या निम्न रक्तचाप,विटामिनस् की कमी,हाई प्रोटीन या फैट कंटेट के अधिक उपयोग के कारण बनने वाले सभी असुंतलन समाप्त हो जायेंगे।साथ ही उपवास कर्ता को ताजगी और स्फूर्ति का एहसास होने लगेगा। प्राकृतिक व्यवस्था को समझ कर उपवास के अंतराल में ताजे फल व फलों का रस और हरी सब्जियाँ और सब्जियों के सूप का सेवन अगर किया जाये तो यह सर्वोत्तम उपवास बनकर,उपवास करने वाले के लिए वरदान साबित हो जायेगा । वास्तव में जो व्यक्ति उपवास की प्रक्रिया को सही तरह समझता है, वही भगवान की शक्ति मॉ भगवती को भी जान सकता है। उपवास का सही तरीका अपनाने से बीमारी से मुक्ति तो मिलती ही हैं आध्यत्मिक विकास भी सुनिश्चित हो जाता है। #नवरात्र के इस पावन पर्व पर अपने जीवन में क्यों न एक नया अनुभव लाये,जो पूजा-पाठ का संस्कार भी पूरा करे और साथ ही शारीरिक रूप से स्वास्थ प्रदान करने के साथ-साथ आध्यात्मिक रूप से विकसित कर पाने में भी समर्थ बना कर जीवन को सुखमय और आनंदित कर दें।