कोई काम मुश्किल नहीं होता: रचना

8 मार्च अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष
पुरुष प्रधान समाज में आधी आबादी के उत्थान और उन्हें प्रोत्साहन देने आदि को लेकर न जाने क्या-क्या दावे और वादे अब तक किए जाते रहे। यहां तक आरक्षण देकर उन्हें पुरुष की बराबरी पर खड़ा करने की बातें हुईं। घर की दहलीज लांघना जिनके लिए किसी अपराध से कम नहीं माना जाता था उन्होंने ने ऐसा कुछ कर दिखाया कि वह अपने आप में किसी कीर्तिमान से कम नहीं था। ऐसी बहुत सी महिलायें हैं जिन्होंने अपने बलबूते पर वह मुकाम हासिल किया जिसको पाना हर किसी के बस की बात नहीं थी। ऐसी ही एक महिला हैं रचना गोविल। वह दूसरों के लिए कब प्रेरणास्रोत बन गयीं, यह वह खुद भी नहीं जान पायीं। आज तो फिर भी महिला और पुरुष के बीच की खाईं बहुत कुछ पट चुकी है लेकिन जरा तीन दशक पहले का युग याद कीजिए। तब कोई महिला यदि खेल में रुचि दिखाये तो लोगों की आंखें फटी की फटी रह जाती थीं। लेकिन रचना गोविल ने अपना लक्ष्य स्वयं ही तय कर रखा था। यही वजह है कि जब वह रंनिग ट्रैक पर दौड़ीं तो उनके हौसलों की सभी ने दाद दी। मूल रूप से उप्र की राजधानी लखनऊ की निवासी रचना सिर्फ दौड़ में ही नहीं, नृत्य के मंच पर भी लोगों की वाहवाही लूटी और फिर वह कब उनके हाथों में शूटिंग की पिस्टल आ गयी, पता ही नहीं चला। 8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विलक्षण प्रतिभा की धनी और महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत, स्पोट्र्स अथॉरिटी ऑफ इण्डिया की कार्यकारी निदेशक रचना गोविल से संपादक राम कुमार सिंह से हुई चर्चा के प्रमुख अंश-

अपनी पृष्ठभूमि से अवगत करायें?
मैं मूलत: लखनऊ की ही रहने वाली हूं। यहां लालबाग गल्र्स इण्टर कालेज से पढ़ाई की। उसके बाद अवध डिग्री कालेज से इंग्लिश और इकोनामिक्स में ग्रेजुएशन किया। पिता डा. एसपी गुप्ता एक मशहूर डेंटल सर्जन थे और वे आल इण्डिया डेंटल एसोसिएशन के संस्थापक सदस्यों में भी थे। मां पुष्पा स्वतंत्रता सेनानी थी। वह 70 का दशक था। मैंने कभी सोचा नहीं था कि कभी खेलों के तरफ मेरा रुझान हो जायेगा। लेकिन स्कूल के समय मैं हर प्रतियोगिता में भाग लेती थी, चाहे जीतूं या हारूं। मेरी रुचि देखकर ही मेरे बड़े भाई ने एक कोच का इंतजाम किया। कोच ने मेरी प्रतिभा को संवारने में बड़ी भूमिका निभाई। दिलचस्प बात यह है कि थोड़ी रुचि नृत्य में थी। जिसके कारण भातखण्डे से मणिपुरी नृत्य में स्कॉलरशिप भी मिली। लेकिन फिर रनिंग ट्रैक ने आकर्षित किया और जब 1979 में नेशनल वुमेन चैम्पियनशिप में 1500 मीटर दौड़ में सिल्वर मेडल मिला तो राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनीं।

सफलता की यह यात्रा आगे कहां तक पहुंची?
बाद में 1981 में फाइव नेशन मीट में देश का प्रतिनिधित्व किया। वहीं 1985 में आयोजित इंदिरा मैराथन में पहला पुरस्कार हासिल हुआ। लेकिन फिर समय बदला और घर-परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ गयीं। इसी दौरान सरकारी सेवा में भी आना हो गया।

यह रनिंग ट्रैक से इतर शूटिंग रेंज की ओर रुझान कैसे हुआ?
सरकारी सेवा में आने के बाद नौकरी करते दस साल हो गए थे। एक बार मैं अपने बेटे प्रखर को शूटिंग सिखाने ले गयी, मगर मुझे खुद ही नहीं पता था कि राइफल या पिस्टल कैसे चलाई जाती है। फिर इसे जानने-समझने की इच्छा जागी। लेकिन पता नहीं कैसे शूटिंग रेंज की ओर कदम बढ़ गये। फिर मैंने पिस्टल का विधिवत प्रशिक्षण लिया। उसके बाद शूटिंग में तीन बार देश का प्रतिनिधित्व किया। यह भी गौरव मिला कि 47 साल की उम्र में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व किया। यह सौभाग्य है मेरा कि मैं भारत की एकमात्र महिला खिलाड़ी हूं, जो दो अलग-अलग खेलों में राष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीता है। अब तक एथेलेटिक्स में 12 और शूटिंग में आठ मेडल जीत चुकी हूं।

कॉमनवेल्थ खेलों में भी आपको क्या भूमिका दी गयी थी?
साल 2010 में नई दिल्ली में हुए कॉमनवेल्थ खेलों में सभी पांचों स्टेडियम की मैं इंचार्ज थी। बड़ी जिम्मेदारी मिली थी जो कि ईश्वर की कृपा से सबकुछ अच्छे से हो गया।
इन खेलों की सफलता वास्तव में हम सबके लिए बड़ी चुनौती थी, क्योंकि इससे देश की छवि जुड़ी थी। इस चुनौती को हर किसी को स्वीकार करना ही था।

आपने जो कुछ हासिल किया उसके पीछे आपकी क्या सोच थी?
दरअसल, मैंने किसी काम को मुश्किल नहीं समझा। वास्तव में मुश्किल या आसान तो सिर्फ सोच पर निर्भर करता है। ऐसी सोच एक खिलाड़ी की ही हो सकती है। जब एक महिला खिलाड़ी को खेलों के कॉमनवेल्थ गेम जैसे इतने बड़े आयोजन का सहभागी बनाया तो कोई कारण नहीं कि सफलता हाथ न लगे।

खेलों के प्रति लड़कियों का रुझान बढ़े, इसके लिए आपकी नजर में क्या होना चाहिए?
देखिए, ऐसा है कि हमारे देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। जरूरत है कि लड़कियों के हुनर को पहचानने की और साथ ही उन लड़कियों को भी यह अहसास कराने की कि उनके अन्दर क्या क्षमता, क्या प्रतिभा है। इसीलिए मैंने पहल करके आदिवासी लड़कियों को खेलों में भाग लेने का मौका दिया।

तमाम मेडल, सम्मान, अर्जुन अवार्ड आपके नाम हैं। लेकिन खेलों के अलावा आप समाज सेवा में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं?
हां, थोड़ी बहुत रुचि समाज सेवा में भी है और थोड़े दिन पहले ही मुझे ‘यश भारती एवं रानी लक्ष्मीबाई ब्रेवरी अवार्ड 2016’ मिला। वहीं साल 2003 में मुझे रायन फाउण्डेशन ने ‘वोमेन ऑफ सब्टेंस अवार्ड वर्ष 2002’ पुरस्कार मिला था।