क्या कर्मफल की इच्छा दोषपूर्ण अभिलाषा है, अनासक्त कर्म ही क्यों श्रेष्ठ है?

हम सब कर्मशील प्राणी हैं। कर्म की प्रेरणा है कर्मफल प्राप्ति की इच्छा। कर्मफल प्राप्ति की अभिलाषा के कारण ही सभी प्राणी सक्रिय हैं। मानव जीवन अनंत अभिलाषा है। लेकिन उपनिषद् और गीता में इच्छारहित कर्म पर जोर है। फल की इच्छा न करना-मा फलेषु कदाचन गीता का केन्द्रीय विचार है। प्रश्न उठता है कि क्या कर्मफल की इच्छा दोषपूर्ण अभिलाषा है? अनासक्त कर्म ही क्यों श्रेष्ठ है?

असल में उपनिषद् दर्शन के काल में कर्म को बंधनकारी बताया गया था। कर्मबंधन आसक्ति देते है। अशुभ कर्म तो बंधन में फंसाते ही हैं शुभ कर्म और भी ज्यादा सांसारिक आकर्षण में बांधते हैं। इसलिए उत्तर वैदिक काल के दार्शनिकों की एक धारा सभी कर्मों को बंधनकारी मानती थी। यह धारा सभी कर्मों के त्याग की समर्थक थी। लेकिन सामान्य जीवनयापन के कर्माें को लेकर संशय भी था। भोजन वस्त्र जुटाना भी कर्म है। प्रश्न था कि क्या ऐसे कर्मों को भी त्याग कर जीवन यात्रा संभव है? ऐसे प्रश्नों से जूझने वाले पूर्वजों ने सामान्य जीवन यापन व यज्ञ को आवश्यक कर्मों की सूची में डाला और शेष कर्मों के त्याग पर सहमति व्यक्त की। फिर इसी उहापोह में एक नई धारा का विकास भी हुआ कि कर्मत्याग नहीं कर्मफल की इच्छा के त्याग ही श्रेष्ठ मार्ग है। विचार था कि अनासक्त कर्म बंधन में नहीं डालते।
गीता में कर्मफल का त्याग ही प्रमुख विचार है गीता के अनुसार अन्याय के विरूद्ध युद्ध जारी है। इसलिए अर्जुन को फल प्राप्ति का विचार त्यागकर युद्ध करना चाहिए। श्री कृष्ण का प्रबोधन है कि इस संसार में न कोई किसी को मारता है, न कोई मरता है। स्वयं को मारने वाला समझना गलत है। यहां न कोई मारता है और न कोई मरता है। श्री कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध प्रेरित करने के लिए तमाम तार्किक, दार्शनिक युक्तियाँ अपनाई। वे पठनीय और मननीय हैं। कठोपनिषद् में यम ने नचिकेता को आत्मतत्व की अमरता का सिद्धांत दिया था ठीक वैसे ही शब्द श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहे। दोनों के प्रबोधन एक जैसे हैं, लेकिन उद्देश्यों में अंतर है। यम नचिकेता को तत्वावधान में देना चाहते हैं। यही नचिकेता की इच्छा भी है। अर्जुन तत्वावधान का अभिलाषी नहीं है लेकिन श्री कृष्ण की योजना उसे युद्ध प्रवृत्त करने की है। युद्ध उसका कर्तव्य है। कर्तव्य को सुंदरता में निर्वहन करने के लिए आसक्ति रहित चित्त जरूरी है। यहां मूलभूत प्रश्न है कि क्या श्री कृष्ण युद्ध परिणाम की इच्छा से मुक्त हैं? गीता में श्री कृष्ण द्वारा इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है। यह प्रश्न अर्जुन ने नहीं पूछा। उन्होंने निष्काम कर्म करते रहने के निर्देश में यह बात जोड़ी है। सतत् कर्म कर्मफल से मुक्त होकर भी किये जा सकते हैं।
श्री कृृष्ण कहते हैं ‘मेरे लिए ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो करने योग्य हो। ऐसी कोई वस्तु पाने योग्य नहीं है तो भी मैं कर्म में लगा रहता हूँ। यदि मैं आलस्यविहीन होकर कर्मरत न रहूँ तो सब मेरे ही मार्ग का अनुसरण करने लगेंगे।’ (गीता 3.22-23) यहाँ प्रत्यक्ष रूप में निष्कामता है। श्री कृष्ण कुछ भी पाने के लिए कर्म नहीं करते। लेकिन उक्त कथन में शेष समाज को कर्मरत बनाए रखने की उनकी इच्छा स्पष्ट है। यहां श्री कृष्ण ने स्वयं को इच्छा मुक्त बताया है लेकिन इच्छा मुक्त रहकर कर्म करते रहने की इच्छा भी प्रकट की है। अनासक्त होना स्वाभाविक नहीं जान पड़ता। हम सब के भीतर जन्म से ही तमाम अभिलाषाएं हैं। यह हमारा स्वभाव है। निस्संदेह अनेेक अभिलाषाओं का जन्म देखा देखी भी होता है। हम सुंदर भवन देखते है, वैसा ही भवन पाने की इच्छा पैदा हो सकती है। बचपन में हम खिलौंनों की इच्छा से जुड़ते हैं। इसीलिए हाथ पैर चलाते हैं। हाथ पैर चलाना और अपनी इच्छापूर्ति के लिए रोना कर्मफल प्राप्ति की ही अभिलाषा है। ऐसी तमाम अभिलाषाओं से भरी पूरी प्रकृति में अनासक्त भाव पैदा करना असंभव जैसा कठिन कार्य व मार्ग है। गीता दर्शन इसी मार्ग की परतें खोलता है।


प्रश्न अनेक हैं। एक सुंदर प्रश्न यही है कि हम गीता क्यों पढ़ें? इसका सामान्य उत्तर हो सकता है कि गीता भारत और विश्व का लोकप्रिय दर्शन है। हम भी इस दर्शन को जान लें। लेकिन आधुनिक मन पढ़ने के पहले ही पढ़ने के लाभ का विचार करता है। जीवन में आखिरकार गीता पढ़कर मिलेगा क्या? गीता में साख्य/ज्ञान है। योग दर्शन है। प्रकृति के गुणों का विवेचन है। वेदांत है। भरा पूरा विश्वदर्शन है। प्रश्न फिर से उठते हैं। सांख्य और योग जानकर हम को क्या प्राप्त होगा? जहां कर्म है वहां कर्म फल भी साथ-साथ है। प्रत्येक कर्म का परिणाम होता है। कर्म में ऊर्जा लगती है। कर्म हमारी ऊर्जा का रूपांतरण है। इसलिए कर्म निष्फल नहीं हो सकता। मेरे अपने अनुभव में कर्म और कर्मफल दो नहीं हैं। मैंने एक क्रम सोचा है। पहले इच्छा होती है। इच्छा अपनी पूर्ति के लिए प्रेरणा बनती है। प्रेरणा ऊर्जा को सक्रिय करती है। यह कर्म बनती है। कर्म ही रूपांतरित होकर कर्मफल बनता है। मीमांसा दर्शन के अनुसार कर्म रूपांतरित होकर एक नए तत्व ‘अपूर्व’ का निर्माण करता है। अपूर्व ही एक समय बाद कर्मफल बनता है या कर्मफल देता है। मीमांसा ने कर्मफल देने के लिए ईश्वर को उत्तरदायी नहीं माना। यहां अपूर्व ही कर्मफलदाता है। माना जा सकता है कि कर्म कभी नष्ट नहीं होता। कर्म अपनी समाप्ति के बाद रूप बदल लेता है। यही अपूर्व बनता है। अपूर्व फल देने के बाद समाप्त हो जाता है।
गीता दर्शन कर्मफल सिद्धांत पर मौन है। कर्मफल में कार्य कारण भी स्पष्ट नहीं होता। तमाम लोग बिना कर्म के ही बड़ी उपलब्धियां पाते हैं। कर्मफल त्याग का सिद्धांत देने के बावजूद भी गीता में कर्म परिणाम या कार्य सिद्धि के 5 कारण बताए गए हैं। पहला अधिष्ठान है और दूसरा कार्य-कत्र्ता। तीसरा कर्म और चैथा चेष्टा या प्रयास। पांचवा और अंतिम कारण ‘दैव’ है। दैव ईश्वर नहीं है। यह ब्रह्माण्डीय हस्तक्षेप की अनुकूलता या प्रतिकूलता है। हम कर्म करते समय कर्ता होते हैं। प्रयास या चेष्टा करते हैं। कर्म और अधिष्ठान की प्रकृति भी महत्व रखती है। पांचों के योग से कर्म परिणाम देते हैं। मीमांसा दर्शन और गीता के विवेचन बहुत भिन्न नहीं हैं। कर्मफल की व्याख्या दोनों में है। गीता में कर्मफल की इच्छा छोड़ देने का निर्देश है। मीमांसा में कर्मफल इच्छा का त्याग नहीं है। संसार कर्म प्रधान है। ऋग्वेद में कर्म को श्रेष्ठ बताया गया है।
जीवन की गति कर्म में है। धर्म भी प्रत्यक्ष रूप में कर्म है। अध्ययन भी कर्म है। सारे कर्मों के उद्देश्य हैं। कर्मफल की इच्छा का त्याग आसान नहीं है। तब इस त्याग का सहज उपाय क्या है? कर्मफलदाता की उपस्थिति अदृृश्य जान पड़ती है। तो भी उनके कर्म प्रत्यक्ष नहीं होते। तब हम उन्हें भाग्य के खाते में डाल देते हैं। परीक्षार्थी का कर्मफल दाता परीक्षक प्रत्यक्ष है। राजनैतिक क्षेत्र में मतदाता कर्मफलदाता है। लेकिन इस सिद्धांत में झोल है। मतदाता प्रत्याशी के कर्म अनुसार ही मत नहीं देते। वे जाति मजहब या अन्य कारण भी देख सकते हैं। परीक्षार्थी के साथ भी ऐसा ही बहुत कुछ संभव है। हम बिना कर्म किए ही बहुत सारे लोगों को सफल और यशस्वी बनता देखते हैं और उन्हें भाग्यशाली समझते हैं। भाग्य सिद्धांत के बावजूद संसार के सभी व्यक्ति कर्म करते हैं। कर्मफल की आशा उन्हें और सक्रिय बनाती है। श्रीकृृष्ण का प्रबोधन भी कर्म है। वे अर्जुन को युद्ध प्रवृत्त करने की इच्छा से प्रबोधन देते हैं। संभव है कि वे निष्काम भाव से ही ऐसा प्रबोधन दे रहे हों। लेकिन गीता के लेखक के चित्त में निश्चित ही गीता दर्शन प्रसार की इच्छा थी। वह अपने निजी लाभ से निस्संदेह मुक्त थे लेकिन गीता दर्शन का प्रसार उनके लेखन कर्म की फल इच्छा से जुड़ा रहा होगा। मैं स्वयं भारतीय दर्शन पर सकाम भाव से ही लिखता हूँ। निष्काम हो जाऊँ इसलिए गीता को तमाम दृष्टिकोणों से पढ़ता हूँ सकाम होकर निष्काम होने की इच्छा पालना निष्कामता कहां है?

– हृदयनारायण दीक्षित (रविवार पर विशेष)

 

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