क्यों जरूरी है राम मंदिर

रामकुमार सिंह

स्तम्भ: राम हम सभी के आधारभूत अविनाशी तत्व जो जड और चेतन सबमे विद्मान। कही व्यक्त रूप से तो कही अव्यक्त रूप से। मनुष्य की संरचना और उसकी उपस्थिति से परमात्मा ईश्वर भगवान का विचार करे तो ज्ञात होता है कि हमारे शरीर के तीन अति महत्वपूर्ण हिस्से जिनमे से एक हिस्सा प्रत्यक्ष रूप से हमे व्यक्त हो पाता हैं किंतु इसके दो और महत्वपूर्ण भाग मनुष्य शरीर में विद्मान उसका सूक्ष्म शरीर यानि आत्मा और आत्मा का प्रत्येक शरीर में पृथक पृथक सूक्ष्म शरीरो के उपस्थित होने का कारण यानि हमारा कारण शरीर। तो हमारे शरीर के तीन भाग स्थूल,सूक्ष्म और कारण | अब इस विषय पर अगर गौर किया जाये | तो कारण सबसे महत्वपूर्ण उसके बाद सूक्ष्म और उसके बाद सबसे कम महत्वपूर्ण व्यक्ति का स्थूल शरीर यानि कारण और सूक्ष्म उपस्थित न हो तो स्थूल,तो स्थूल यानि मिट्टी ही है जिसका कोई महत्व नही। किंतु इस पर एक दृष्टिकोण से और विचार करे कि कारण और सूक्ष्म दोनो अति महत्वपूर्ण होते हुए भी यदि मिट्टी यानि स्थूल शरीर न हो तो क्या यह महान कारण और अतिसूक्ष्म अविनाशी आत्मा प्रकट रूप से हमे दिखाई या महसूस हो सकती हैं ? अगर नही हो सकती तो स्थूल जो कारण और आत्मा कि दृष्टि से सबसे कम महत्वपूर्ण हैं वह अत्यधिक महत्वपूर्ण साबित होता हैं।

इसी प्रकार मनुष्य के प्राण ईश्वर को समझने का प्रयास करे तो यह समझ आता हैं कि ईश्वर अविनाशी है और संसार के प्रत्येक जीव जंतु पाषाण वनस्पति मनुष्य सब में विद्मान लेकिन हम प्रत्यक्ष रूप से ईश्वर को कैसे जाने समझे महसूस करे इसके लिए हमारे अग्रजो नें मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर और चर्च का निर्माण किया | कि जब तक मनुष्य अपने भीतर ही विद्मान ईश्वर से साक्षात्कार कर के यह न समझ ले,”कि सागर में अगर एक घडा डुबो दिया जाये तो घडे में पानी हैं या पानी में घडा है।” हम सब भी ईश्वर में वैसे ही विद्मान हैं जैसे घडा सागर में और सागर घडे में,बस जब तक यह बात हमे समझ नही आती, हम मिट्टी के घडे को ही अपना मूल अस्तित्व समझते हैं और तभी तक हमें मंदिर,मस्जिद और गिरजाघरो कि आवश्यकता पडेगी ! तो मनुष्य अपनी मनुष्यता को प्राप्त कर सके,इसके लिए हमे यह व्यवस्था दी गई कि हम अपने ईश्वर के मंदिर बनाये उनकी पूजा आराधना कर उनके गुणो को अपने जीवन में आत्मसात करे और फिर उन्हे तत्व रूप से जान समझ कर महसूस करते हुये उनके गुणो को अपने स्थूल शरीर में प्रकट करते हुये स्थूल के विलीन होने के पहले ही स्व में स्थित हो जाये तथा घडे के फूटने पर घडे के जल और सागर के जल को जाग्रत अवस्था में सम्मिलित करते हुये ईश्वर के अंश से स्वंय ईश्वर बन जाये। किंतु यहॉ यह बात सबसे महत्वपूर्ण है कि स्थूल सूक्ष्म और कारण इन तीनो कि महत्ता को समझने और जानने कि शुरूआत स्थूल से ही होती हैं। तो मनुष्य का स्थूल उसका ‘शरीर’और ईश्वर का स्थूल रूप उनके ‘मंदिर’ इस मानवता को दानवीयता से ऊपर उठाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण और प्रथम सीढी हैं।

जिनके सहारे यह मानवता ईश्वरत्व को प्राप्त करती हैं। इसलिए सृष्टि के सृजन से लेकर सृष्टि के विनाश तक कि यात्रा में हमारे मंदिर और धार्मिक ग्रंथ ही हमारी नाव और उसके चप्पू हैं जिनके सहारे यह मनुष्यता अपनी निरंतर यात्रा में गतिमान हैं। संसार में मर्यादा पुरूषोत्म श्री राम ही हमारे ऐसे ईष्ट व मार्गदर्शक है| जो मानव जीवन को मर्यादित आचरण के द्वारा दैहिक दैविक भौतिक त्रितापो से मुक्ति का सशक्त और वैज्ञानिक सूत्र परिपादित ही नही कर गये वरन् उन सिद्धांतो का स्वयं पर प्रयोग कर उसके परिणामों का स्वर्णिम इतिहास भी रच गये। जो मानव जाति के सबसे उच्चतम इतिहास के शिखर पर सदैव संपूर्ण मानव जाति को ज्ञान का प्रकाश पथ प्रदर्शित करता रहेगा।

अयोध्या विवाद हमारे जीवन के द्वंद का भी प्रतीक हैं जिस पर आज लगभग पॉच सौ सालो से चले आ रहे विवाद को उच्चतम न्यायालय ने अपनी विशिष्टता को स्थापित करते हुये मानवता के प्रतीक श्री राम के मंदिर के निर्माण कि सभी बाधाओ को समाप्त कर ऐतिहासिक निर्णय दिया हैं।

जिस निर्णय का पूरा देश स्वागत कर रहा हैं। आईये हम सभी इस ऐतिहासिक पल का हिस्सा बनते हुए अपनी अपनी अयोध्या अपने ह्रदय स्थानो के द्वंद को भी समाप्त करने कि ओर अग्रसर हो और भौतिक अयोध्या में प्रभु श्रीराम के भव्य मॉदिर निर्माण के साथ मानवता के उत्थान कि कामना के साथ सबके अंदर उपस्थित सियाराम को भी प्रणाम करे।

सियाराम मै सब जग जानी।
करहु प्रणाम जोर जुग पानी।।.