तर्क, जिज्ञासा और दर्शन की शुरुआत ऋग्वैदिक काल से भी प्राचीन

हिन्दुओं का कोई सर्वमान्य आस्था ग्रंथ नहीं और न ही सर्वमान्य देवता। हरेक हिन्दू की अपनी इच्छा। कोई अग्नि उपासक तो कोई जल का। यहां ब्रह्मा, विष्णु और महेश की त्रयी है तो श्रीराम, श्रीकृष्ण और शिव के भी विकल्प हैं। देवी उपासना अतिप्राचीन है ही। हनुमान मन्दिर भी लाखों की संख्या में हैं। व्यक्तिगत विवेक का ऐसा मौलिक अधिकार दुनिया की किसी आस्था प्रणाली में नहीं है।

हृदयनारायण दीक्षित : ‘विज्ञान और दर्शन’ सार्वभौम होते हैं। उनकी मान्यताएँ भौगोलिक क्षेत्र के बन्धन में नहीं होतीं। भारत में तर्क, जिज्ञासा और दर्शन की शुरुआत ऋग्वैदिक काल से भी प्राचीन है। यहां धर्म आस्था के विकास के बहुत पहले से तर्क और जिज्ञासा से परिपूर्ण दार्शनिक वातावरण रहा है। इसलिए अन्य पंथिक आस्था विश्वासों की तुलना में यहाँ स्वतन्त्र विचार और विवेक का प्रभाव बहुत पहले से है। हिन्दू भूसांस्कृतिक संज्ञा है। इस भूक्षेत्र के निवासियों की एक तार्किक और दार्शनिक जीवन शैली है। भारत भूमि में आस्था पर भी प्रश्न करने की परम्परा है। हिन्दू तार्किक रहे हैं। यहाँ वैदिककाल से ही जिज्ञासा और प्रश्नों की महत्ता है। इसीलिए हिन्दुओं का कोई सर्वमान्य आस्था ग्रंथ नहीं और न ही सर्वमान्य देवता। हरेक हिन्दू की अपनी इच्छा। कोई अग्नि उपासक तो कोई जल का। यहां ब्रह्मा, विष्णु और महेश की त्रयी है तो श्रीराम, श्रीकृष्ण और शिव के भी विकल्प हैं। देवी उपासना अतिप्राचीन है ही। हनुमान मन्दिर भी लाखों की संख्या में हैं। व्यक्तिगत विवेक का ऐसा मौलिक अधिकार दुनिया की किसी आस्था प्रणाली में नहीं है। यहां चार पुरूषार्थ बताए गए हैं-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। कुछ हिन्दू केवल अर्थ-धन को ही वास्तविक पुरूषार्थ मानते हैं। ‘सर्वेगुणाः कांचनमा श्रयंते’ की उक्ति इसी का साक्ष्य है। काम या कामना पूर्ति पुरूषार्थ तो है लेकिन गीता निष्काम हो जाने का दर्शन है। धर्म स्थिर आचार संहिता नहीं है। यह दिक्-काल के अनुसार परिवर्तनीय है। तीनों पुरूषार्थ भौतिक हैं। संसारी हैं। मोक्ष प्रत्यक्ष नहीं।


हिन्दू को सुविधा है कि मोक्ष माने या न माने। कौटिल्य ने ‘अर्थशास्त्र’ लिखा। उन्होंने शुरूवात में ही धर्म, अर्थ और काम को नमस्कार किया। मोक्ष का उल्लेख तक नहीं किया। हिन्दू जीवन में अपने छन्द में जीने की परिपूर्ण स्वतन्त्रता है। तार्किक और प्रश्नाकुल जीवन शैली के अपने सुख-दुख हैं। पाकिस्तान में हिन्दुओं की संख्या लगातार घटी है। बांग्लादेश की भी यही त्रासदी है। कट्टरपंथी तत्वों की दृष्टि में हिन्दू इंकार करने वाले काफिर हैं और काफिर को जीने का अधिकार नहीं। लेकिन हिन्दू होने का आनन्द अकथनीय है। हिन्दू होने के स्वतन्त्र विवेक का आनन्द असीम है।
इस्लामी विषयों के जानकार और भौतिक विज्ञान के एक अध्यापक से मेरी मित्रता थी। हम लोग धर्म मजहब के रूढ़िगत हिस्सों पर बहस करते थे। एक दिन वे हरेक घटना का श्रेय अल्लाह को देने लगे। मैंने तर्क दिए। ईश्वर काल्पनिक धारणा भी हो सकता है। पूरी जानकारी के बाद ही हमें ईश्वर के अस्तित्व पर हाँ या न करना चाहिए। उनका तर्क था कि अल्लाह के अलावा सभी विषयों पर बहस की जा सकती है। मैंने कहा मैं ईश्वर को प्रश्नवाचक करता हूँ आप भी करें। बहस का आधार दर्शन विज्ञान ही रहने चाहिए। वे बोले, ‘आप हिन्दू हैं आपके यहाँ सुविधा है, ईश्वर को न मानो तो भी फर्क नहीं पड़ता लेकिन हम ऐसा नहीं कर सकते।’ हम सौभाग्यशाली हैं कि हिन्दू हैं। हम हिन्दू होकर ही ईश्वर को अध्ययन का विषय बना सकते हैं। हिन्दू के लिए ईश्वर की जिज्ञासा धर्मविरोधी नहीं है। हिन्दू को इस्लाम के आदर की सुविधा है। कुरान और बाईबिल को पवित्र कहने की भी।

क्या गैर हिन्दू समुदाय ऐसा कर सकते हैं? हिन्दू होने के कारण मुझे दुनिया के सारे आस्था पंथ स्वीकार्य हैं। इसकी कोई सीमा नहीं। हम हिन्दू होकर ही अपने स्वतन्त्र विवेक का स्वतन्त्र प्रयोग करते आए हैं। कभी-कभी कुछ समय के लिए ईश्वर का अस्तित्व समझ में आता है, तब ईश्वर के प्रति सजग हो जाता हूँ लेकिन तर्क, संशय और वैज्ञानिक उपकरणों के सामने वह पूरा नहीं टिकता तो संशय करता हूँ। हमेशा के लिए नहीं। अगले अध्ययन सोपान तक। ऐसी द्वन्द्वात्मक चित्तदशा की समृ़द्धि हिन्दू होने के कारण ही मिलती है। हिन्दू अपने समाज की कालबाह्य मान्यताएँ छोड़ने में सफल हुए हैं। दयानन्द, गांधी, डाॅ. अम्बेडकर जैसे महानुभाव भारतीय समाज की रूढ़ियों पर हमलावर रहे। हिन्दुओं में समाज सुधार की क्षमता है। बेशक सुधार की गति धीमी रही है तो भी आस्था और विश्वास सामाजिक सुधार के रास्ते बाधक नहीं बन सके। हिन्दू होने का विवेक हिन्दू न हो जाने तक फैला हुआ है। डाॅ. अम्बेडकर हिन्दू घर में जन्मे। स्वतन्त्र विवेक के रास्ते चले। उन्होंने हिन्दू न रह जाने के अधिकार का प्रयोग किया। अन्य आस्था विश्वासों में डाॅ. अम्बेडकर जैसा व्यक्तित्व नहीं मिलता। हिन्दू अपने इस ‘भारत रत्न’ को श्रद्धा करते हैं। हिन्दू धर्म के अतिक्रमण तक सोचते हैं। गीता के श्रीकृष्ण ने अर्जुन से ‘सर्व धर्म परित्यजन’ की बात कहीं थी। मैं स्वयं इस अधिकार का सदुपयोग करता हूँ।


हिन्दू होने के तमाम आनन्द हैं। मैं हिन्दू हूँ। इसीलिए भौतिकवादी हूँ। आध्यात्मिक भौतिकवादी भी हूँ। चाहूँ तो आस्थालु हो सकता हूँ लेकिन आस्तिकता में सन्तुष्ट हूँ। अंधविश्वास से मुक्त हूँ। पुनर्जन्म प्राचीन हिन्दू विश्वास है। बुद्ध ने भी पुनर्जन्म की धारा को स्वीकार किया है। लेकिन हिन्दू मन में इस धारणा के प्रति अंधविश्वास नहीं। कठोपनिषद् में पुनर्जन्म पर नचिकेता और यम के सुन्दर प्रश्नोत्तर हैं। नचिकेता का प्रश्न है ‘कुछ लोग कहते हैं कि मृत्यु के बाद भी जीवन प्रवाह चलता है लेकिन कुछ लोग कहतें कि मृत्यु के बाद कुछ नहीं बचता। सही क्या है? आप बताएँं। यम का उत्तर और भी रोचक है नचिकेता इस प्रश्न पर देवताओं में भी मतभेद हैं, तुम यह प्रश्न न पूछो। देवताओं में भी मतभेद जैसी आह्लादकारी बात और क्या हो सकती है? देवता होते हैं या नहीं होते यह बहस भी हिन्दू ही चला सकते हैं। यह बात पक्की है कि कठोपनिषद् के रचनाकाल में पुनर्जन्म पर बहस थी। हिन्दू अपनी मान्यताओं पर भी बहस चलाते रहते हैं। समाज में खुले शास्त्रार्थ द्वारा बहसे थी ही। अब समाचार माध्यमों में बहसे हैं।
हिन्दूमन गोष्ठियों और विचार विमर्श में रस लेता है। गाँव का अशिक्षित भी ईश्वर और देवों के अस्तित्व को चुनौती देता है। यही मन्दिरों और तीर्थ स्थलों में भारी अव्यवस्था के बावजूद मेला रेला बनता है। हिन्दू अपने मन के भीतर भी बहस करते हैं। स्वयं ही शंका और संशय करते हैं। स्वयं ही बाद और स्वयं ही प्रतिवाद बनते हैं। हिन्दुओं या आर्यों का सारा प्राचीन साहित्य प्रश्न बेचैनी है। हिन्दू ही अपनी मान्यताओं के विरोध में बोलते हैं। यहाँ हरेक हिन्दू के अपने विश्वास हैं और सबका निज धर्म है। दर्शन और तर्क के तल पर परिपूर्ण लोकतन्त्री हिन्दू जन्मना जाति के विरोधी हैं लेकिन जातिवाद का रोग नष्ट नहीं कर पाए। हिन्दू की सबसे बड़ी विफलता जाति है और सबसे बड़ी सफलता है अंधविश्वास रहित लोकतन्त्री मन।

(रविवार पर विशेष)
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष हैं।)

‘प्रकृति की संगति में स्वयं का पुनर्सृजन ही वास्तविक अभिव्यक्ति’