दूर खिसकता कश्मीर

- in संपादकीय

19_12_2016-18susheel_panditअपने पिता शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की मजार से अपनी पार्टी नेशनल कांफ्रेंस (एनसी) के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने अलगाववादी हुर्रियत कांफ्रेंस के धड़ों से अपील की कि ‘एक हो जाओ’। फारूक ने आगे कहा कि अपने संघर्ष में हमें अपना दुश्मन मत समझो, हम तुम्हारे साथ हैं। कुछ दिन पहले भारत सरकार को ताना मारते हुए कहा था कि हिम्मत है तो पाक अधिकृत कश्मीर ले कर दिखाओ। जो लोग अब्दुल्ला परिवार और उसकी तीन पीढ़ियों के इतिहास से परिचित नहीं हैं वे यह सब सुनकर हतप्रभ हैं। इतिहास यह है कि बनाई तो शेख ने मुस्लिम कांफ्रेंस थी, लेकिन उन्होंने नेहरू और कश्मीरी हिंदुओं के आग्रह पर नाम बदलकर नेशनल कांफ्रेंस रख लिया। फिर 1947 में शेख अब्दुल्ला ने मुस्लिम बहुल जम्मू-कश्मीर के विलय को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच भारत को चुना। इसके दो कारण थे। पहला, वह पंजाबी-मुसलमानों की धौंस और कश्मीरी मुसलमानों की लाहौर तथा रावलपिंडी में होती दुर्गति तथा अपमान से परिचित थे। उन्हें चिंता थी कि ये कुछ लाख कश्मीरी पाकिस्तान में करोड़ों पंजाबियों की भेंट चढ़ जाएंगे। दूसरा, जब जिन्ना कश्मीर आए तो शेख ने अपनी इसी चिंता के चलते विलय की कुछ शर्तें सुझाईं। जिन्ना खुद को मुसलमानों का एकमात्र नेता मानते थे। इस अहंकार में उन्होंने शेख की एक नहीं मानी और कहा कि जो होगा विलय के बाद देखा जाएगा। महत्वाकांक्षी शेख को लगा कि पहले पाकिस्तान से पिंड छुड़ाया जाए। नेहरू के कश्मीरी मूल के कारण शेख की उनसे आत्मीयता भी थी। नेहरू के उदारवादी रवैये ने भी कुछ भरोसा जगाया होगा।
शेख ने पाकिस्तानी आक्रमण के चलते भारत में विलय को मान तो लिया, लेकिन मन में कुछ और भी था। अनुच्छेद-370 पर शेख के आग्रह से अलगाव के बीज फूटे। नेहरू मान गए। फिर कश्मीर की ‘स्वायत्तता’ को लेकर आग्रह बढ़ा और शेख ने अपना अलग संविधान और अपना अलग ध्वज मांगा। नेहरू ने वह भी दिया। शेख अब्दुल्ला कश्मीर के मुख्यमंत्री नहीं प्रधानमंत्री कहलाएंगे, नेहरू ने इसकी भी स्वीकृति दी। किसी भी भारतीय नागरिक को कश्मीर आने के लिए परमिट लेना होगा, नेहरू ने यह भी स्वीकार कर लिया। इतने सबके बावजूद जब नेहरू को जानकारी मिली कि शेख अमेरिका और ब्रिटेन के राजनयिकों के साथ गुप्त मंत्रणाएं कर रहे हैं और जल्दी ही एक बड़ी घोषणा करने वाले हैं तो नेहरू को उन्हें बर्खास्त करना पड़ा। नेशनल कांफ्रेंस टूटी। बख्शी गुलाम मोहम्मद मुख्यमंत्री बने और शेख नजरबंद किए गए। शेख के हिमायती धड़े ने भारत समर्थक धड़े के विरुद्ध सामाजिक बहिष्कार का आह्वान किया। शेख का भारत विरोध तब तक चलता रहा जब तक भारत ने 1971 के युद्ध में पाकिस्तान की कमर तोड़कर दो टुकड़े नहीं कर दिए। तब जाकर शेख अब्दुल्ला बाज आए और 1974 में इंदिरा गांधी के साथ समझौता किया, कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग माना और मुख्यमंत्री बनाए गए। लेकिन आज भी जब तब परिवार में किसी को अवसर दिखाई पड़ता है तो उनकी भारत-विरोधी रग फड़कने लगती है और राग होता है स्वायत्तता।
प्रश्न यह उठता है कि नेहरू ने कश्मीर में शेख को ऐसी घातक रियायतें क्यों दीं? विलय तो हो चुका था। पाकिस्तान को 1947-48 के युद्ध में भी परास्त कर दिया गया था। अनुच्छेद-370 को तो स्वयं डॉ. भीमराव अंबेडकर ने ‘राष्ट्र के साथ द्रोह’ कहते हुए संविधान में लेने से मना कर दिया था। फिर भी जिस तरह अनुच्छेद-370 पर सरदार पटेल को मजबूर किया गया औैर अनुच्छेद-35 को 1954 में शेख अब्दुल्ला की नजरबंदी के दौरान संसद की नजर बचाते हुए गोपनीय तरीके से संविधान में घुसाया गया, वह किसी धोखाधड़ी से कम नहीं है।
इसका एक ही आकलन समझ में आता है। देश भर में एक पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था के निर्माण का बीड़ा उठाने के बावजूद भी नेहरू मुस्लिम बहुल जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय को लेकर मानो किसी हीनग्रंथी या अपराधबोध से ग्रसित थे। जिस तरह वह शेख को भारत की सीमा के भीतर ही एक पाकिस्तान बनाने दे रहे थे उससे लगता है कि वह प्रायश्चित करना चाहते थे। उन्होंने कश्मीर को एक ऐसा संविधान बनाने दिया जिसमें अल्पसंख्यक शब्द तक नहीं है, अल्पसंख्यकों के लिए विशेषाधिकार तो भूल ही जाएं। कश्मीर की विडंबना यह है कि वहां घाटी की 95 प्रतिशत आबादी वाले मुसलमान ‘अल्पसंख्यक’ माने गए और मारकर भगाए गए पांच प्रतिशत हिंदू ‘बहुसंख्यक’। इस पांच प्रतिशत ‘बहुसंख्यक हिंदू समुदाय को सामाजिक उत्पीड़न के साथ-साथ शिक्षा, नौकरी और व्यवसाय में सरकारी पक्षपात का सामना करना पड़ता था। विलय के लिए शेख के राजी होने पर अहसानमंद भारत अब्दुल्ला परिवार की हर राजनीतिक घुड़की पर इस तरह फिरौती अदा करता रहा कि भारतीय राजनीतिक व्यवस्था की यह आदत-सी बन गई।
1990 के हिंदू पलायन की सीधी जिम्मेदारी भी तत्कालीन मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला की ही है। 1989 के जून और सितंबर महीनों के बीच 70 से अधिक कैदी-आतंकियों को रिहाकर उन्होंने घाटी में मार-काट के लिए छोड़ दिया था। जब पानी सिर के ऊपर चला आया तब फारुक त्यागपत्र देकर लंदन चले गए। 1971 में लंदन में जब जेकेएलएफ का गठन हुआ था तो उसकी संस्थापक टोली के साथ फारूक का चित्र आज भी उपलब्ध है। कश्मीर को एक परिवार के इस एकाधिकार से मुक्त कराने के लिए ही वाजपेयी सरकार के ‘प्रोत्साहन’ पर मुफ्ती मुहम्मद सईद ने पीडीपी का गठन किया। यह वही मुफ्ती थे, जिनकी अगुआई में 1986 में भारत का पहला सांप्रदायिक दंगा कश्मीर ने देखा था। मुफ्ती की राजनीति जमात-ए-इस्लामी के कार्यकर्ताओं के बल पर चलती थी। लाजमी था कि वह हुर्रियत के एजेंडे को ही आगे करते। 2002 के चुनावों में पहली बार अब्दुल्ला परिवार को हार का मुंह देखना पड़ा। हुर्रियत के एजेंडे और जमात के कैडर को लेकर मुफ्ती जीते। केंद्र को लगता है कि मुख्यधारा के दल ही हुर्रियत का एजेंडा ले उड़े तो हुर्रियत की क्या हैसियत बचेगी? अब्दुल्ला और मुफ्ती मोहम्मद के निधन के बाद पीडीपी की कमान संभाल रहीं महबूबा, दोनों के राजनीतिक आह्वानों को देखें तो हुर्रियत फीकी पड़ती दिखाई देती है। लेकिन हुर्रियत को कोई फर्क नहीं पड़ता। एजेंडा तो उन्हीं का चल रहा है। वह भी भारतीय साधनों के बल पर, भारत के संविधान की शपथ लेकर और भारत के ही देशभक्त दलों के अप्रत्यक्ष सहयोग के साथ। और कश्मीर भारत से प्रतिक्षण दूर खिसकता जा रहा है।