नागरिकता संशोधन कानून का बेजा विरोध

  • कैब का विरोध, संसद संविधान और सरकार का अपमान

 बृजनन्दन राजू

स्तम्भ : नागरिकता संशोधन कानून के मुद्दे पर देश के विभिन्न क्षेत्रों में विरोध के नाम पर हो रही हिंसा जायज नहीं है। इस कानून के विरोध के नाम पर असम सहित पूर्वोत्तर के राज्यों से शुरू हुआ विरोध और हिंसा का सिलसिला परिश्चम बंगाल होते हुए बिहार उत्तर प्रदेश और दिल्ली तक पहुंच गया है। इस कानून को हिन्दू मुस्लिम के चश्मे से नहीं देखना चाहिए। नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करना भारत के लोकतंत्र, संसद संविधान और सरकार का अपमान है। इस कानून का विरोध करने वाले देशद्रोही हैं। देश की संसद को कानून बनाने का आधिकार है। यह संसद का विवेकाधिकार है कि किसे नागरिकता दे किसे न दे। फिर यह कानून तो आजादी से पहले इसी देश के जो नागरिक रहे हैं उनको ही नागरिकता देने का विषय है। उनका विरोध क्यों? राज्यसभा में यह बिल 105 के मुकाबले 125 मतों से पास हुआ वहीं लोकसभा में विधेयक के पक्ष में 311 वोट पड़े जबकि विपक्ष में मात्र 80 वोट पड़े। इन सांसदों को जनता ने ही चुन कर भेजा है। इसलिए जिनको देश की संसद और कानून पर भरोसा नहीं है तो वह भारत के हितैषी नहीं हो सकते। सरकार को चाहिए कि इस कानून का विरोध करने वालों से सख्ती से निपटे अन्यथा यह विरोध का सिलसिला बढ़ता जायेगा।
अगर देश का बहुसंख्यक समाज इस प्रतिक्रिया के विरोध में खड़ा हुआ तो एनआरसी के विरोधियों को कहीं शरण नहीं मिलेगी। इनको अधिकार सबसे ज्यादा चाहिए,विशेष व्यवस्था और आरक्षण भी चाहिए लेकिन देश की एकता अखण्डता, सुरक्षा और संप्रभुता की बात आती है तो इमेशा देश के खिलाफ खड़े होते हैं। यही लोग कभी एनआरसी,अनुच्छेद 370, अयोध्या मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले और अब नागरिक संशोधन कानून का विरोध कर रहे हैं। आगे यही लोग जनसंख्या नियंत्रण कानून और समान नागरिक संहिता का भी विरोध करेंगे।
आखिर इस बिल से जामिया मिलिया विश्वविद्यालय दिल्ली और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से क्या संबंध है। इस विधेयक में इन विश्श्वविद्यालयों की शिक्षा और स्वायत्ता से कोई संबंध नहीं है तो विरोध किस बात का। मुसलमान यह मानकर विरोध कर रहें कि मुस्लिमों को इसमें क्यों शामिल नहीं किया गया है। धर्म के आधार पर उनके साथ अन्याय किया जा रहा है। जबकि इस कानून से यहां के मुसलमानों का कोई लेना देना ही नहीं है। मुस्लिमों की इसी चिरपरिचित मानसिकता के कारण मुस्लिमों को पूरे विश्व में आज शंका की दृष्टि से देखा जा रहा है।
वैसे नागरिकता संशोधन कानून को हिन्दू मुसलमान के चश्मे से नहीं देखना चाहिए। विधेयक भी यह देखकर पास नहीं किया गया है। विधेयक इस आधार पर तैयार किया गया है कि आजादी के बाद बांग्लादेश और पाक में रह रहे हिन्दुओं के खिलाफ वहां के मुस्लिमों ने कहर बरपाया। हिन्दू अपनी जमीन जायदाद छोड़कर वहां से पलायन को मजबूर हुए। इसलिए वह विदेशी और शरणार्थी नहीं हुए। विभाजन से पहले वह इसी देश के नागरिक थे और इस कानून के द्वारा मिले अधिकार के तहत फिर से उन्हें उनका अधिकार मिलने वाला है। बीच के वर्षों में उनके साथ जो हुआ और वे प्रताड़ना के शिकार हुए इसके लिए देश विभाजन के दोषी कांग्रेसियों को इनसे माफी मांगनी चाहिए। क्योंकि इस दुरावस्था के लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार है। क्योंकि कांग्रेस ने उनके साथ धोखा किया है। महात्मा गांधी कहते रहे कि देश का विभाजन हमारी लाश पर होगा। देश की जनता ने उनकी बातों पर विश्वास किया। सत्ता के स्वार्थी कांग्रेसी नेताओं ने हड़बड़ी में भारत विभाजन की बात स्वीकार कर ली। विभाजन के परिणाम स्वरूप लाखों हिन्दू बेघर हुए हजारों माताओं बहनों की इज्जत लूटी गयी। वहीं कांग्रेसी नेता आजादी के जश्न मनाने में मशगूल थे। पाक में हिन्दुओं पर बढ़ते अत्याचारों के फलस्वरूप 1950 में नेहरू लियाकत समझौता हुआ। तय हुआ कि दोनों देश अपने यहां के अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करेंगे। इतना ही नहीं, यह भी कहा गया है कि जो भागकर आए हैं उन्हें लौटकर अपनी संपत्ति बेचने का अधिकार होगा, अपहृत औरतों को लौटाना होगा और जबरन कराया गया धर्म परिवर्तन अमान्य किया जाएगा, लेकिन कुछ ही महीने बाद पाकिस्तान से दस लाख हिंदू भागकर भारत आ गए। तब सरदार पटेल ने पाकिस्तान को चेतावनी देते हुए कहा था कि यह एकतरफा नहीं चल सकता। पाकिस्तान अगर नहीं सुधरा तो उसे नतीजा भुगतना होगा। दुर्भाग्य से 1950 में सरदार पटेल का निधन हो गया। इसके बाद भी पाक में हिन्दुओं को उत्पीड़न रूका नहीं।
कांग्रेस ने दोहरी गलती की है क्योंकि पहली गलती तो देश विभाजन स्वीकार करने की की वहीं दूसरी गलती विभाजन के बाद वहां से भागकर आये शरणार्थियों को अब तक न तो नागरिकता दी गयी और नहीं उनके पुनर्वास की व्यवस्था की। आज केन्द्र की भाजपा सरकार जब ऐतिहासिक भूलों का परिमार्जन करते हुए उन्हें नागरिकता देने के लिए काननू बना रही है तो उल्टे कांग्रेस इस विधेयक का विरोध कर ही नहीं रही बल्कि देश को आग में झोंकने का प्रयास कर रही है। देश का बहुसंख्यक समाज अब जाग चुका है। जनता अब कांग्रेस को माफ करने वाली नहीं है। लोकतंत्र का गला घोंटकर देश में आपातकाल थोपने वाली, सिखों का कत्ले आम कराने वाली और “सांप्रदायिक हिंसा निवारण जैसे बिल लाने वाली कांग्रेस आज नागरिकता संशोधन कानून का विरोध कर रही है। राजनीति में भी विरोध की एक सीमा होती है। लेकिन इस कानून का विरोध करना राष्ट्रद्रोह है।
लोकतंत्र में लोकतांत्रिक तरीके से सरकार का विरोध होना चाहिए आगजनी,हिंसा और बमबारी के माध्यम से नहीं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अंदर प्रदर्शनकारियों को रोकने गयी पुलिस पर देशी बम फेंके गये। दिल्ली में सीएए के विरुद्ध जामिया मिल्लिया इस्लामिया में तीन दिन से विरोध प्रदर्शन चल रहा था। 15 दिसम्बर को छात्रों के प्रदर्शन में स्थानीय लोगों के शामिल हो जाने के बाद स्थिति अनियंत्रित हो गई। उत्पातियों ने पूरे दिन दिल्ली-नोएडा रोड और मथुरा रोड को ठप रखा। दिल्ली में कई बसें और पुलिस चौकियां फूंकी गईं। इसमें छात्रों, पुलिसकर्मियों और दमकलकर्मियों समेत करीब 40 लोग घायल हो गए। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हुई हिंसा में डीआइजी समेत 50 लोग घायल हो गए। यह हिंसा सोची समझी की ओर संकेत करती है।
विपक्षी दलों का यह कहना है कि यह विधेयक देश के करीब 15 फीसदी मुसलमानों के साथ भेदभाव करता है। जबकि इस कानून से यहां के मुसलमानों का कोई मतलब ही नहीं है। वहीं पूर्वोत्तर के लोगों का कहना है कि अवैध प्रवासियों के स्थाई रूप से बसने के बाद स्थानीय लोगों की मुश्किलें बढ़ जायेंगी। असम में विरोध का कोई औचित्य ही नही हैं क्योंकि वहां के कुछ ही जिलों में यह कानून लागू होगा। यही स्थिति पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की भी है। इनर लाइन परमिट की वजह से पूर्वोत्तर के जनजाति क्षेत्र वैसे ही इससे बाहर हैं फिर भी वहां विरोध हो रहा है। विपक्षी जनता को इस कानून की हकीकत न बताकर जनता को उकसाने का काम कर रहे हैं। योगेन्द्र यादव सरीखे नेता छात्रों को भड़काने का काम कर रहे हैं। वैसे भाजपा सरकार इस कानून के मुद्दे पर पीछे हटने वाली नहीं है चाहे देश के अंदर विरोध हो या अमेरिकी संस्था द्वारा गृहमंत्री अमित शाह व अन्य प्रमुख नेताओं के विरुद्ध प्रतिबन्ध लगाने की बात हो।
नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ जिस प्रकार जामिया मिलिया विश्वविद्यालय, अलीगढ़ यूनिवर्सिटी और लखनऊ के नदवा कॉलेज में प्रदर्शन हुए और पुलिस पर पत्थरबाजी हुई इससे अंदाजा लगाया जा सकता है वहां किस प्रकार की शिक्षा दी जाती है।
भारत ही दुनिया में एकमात्र ऐसा देश है जिसे विस्थापित हिन्दू अपना घर मानता है और जहां वह विदेशी नहीं माना जा सकता। इस समस्या को संकीर्ण प्रान्तीय या राजनीति के चश्मे से न देखकर सम्पूर्ण राष्ट्र की एकता एवं सुरक्षा की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए।
विभाजन से लेकर आज तक की घटनाओें ने स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान में कोई गैर मुस्लिम नहीं रह सकता। वहां न तो असामाजिक तत्वों से रक्षा की व्यवस्था की गयी और न ही समानता का अधिकार दिया गया। भारत में आने वाले इन विस्थापितों के प्रति सहानुभूति का व्यवहार तथा उनके पुनर्वास की व्यवस्था भारत सरकार का कर्तव्य है तथा उनका अधिकार भी है क्योंकि विभाजन के बाद पाकिस्तान के हिन्दू भारतीय राष्ट्रीयता से न तो वंचित हुए हैं और न हो ही सकते हैं और इसलिए वे भारत सरकार से सब प्रकार की सहायता पाने के अधिकारी हैं। साम्प्रदायिक आधार पर देश के विभाजन के परिणामस्वरूप, अपना स्वयं का कोई अपराध न होते हुए भी, वर्तमान संकट की स्थिति में पहुंचे हुए हिन्दुओं के प्रति भारत सरकार का यह नैतिक उत्तरदायित्व है। इसी दायित्व की पूर्ति करते हुए मोदी सरकार नागरिकता संशोधन कानून लायी है। इस काननू से उन लाखों परिवारों का भला होगा जो आज तक विभाजन का दंश झेलते रहे।
(लेखक प्रेरणाा शोध संस्थान नोएडा से जुड़े हैं)