‘नेता भी ऐश करता है और अफसर भी’

अफसर आमतौर पर चुप रहते हैं। बिरले ही किसी ने अन्याय का विरोध किया। ऐसे चुनिंदा अधिकारियों में सर्वोपरि हैं आईएफएस (इंडियन फारेस्ट सर्विस) के नामचीन अधिकारी रहे रामलखन सिंह। रायबरेली जिले की लालगंज तहसील के छोटे से गांव उत्तरागौरी में एक जनवरी 1945 को जन्मे रामलखन सिंह ने विश्व पटल पर भी देश का नाम रोशन किया। जब वे सेवानिवृत्ति के नजदीक थे, तभी मुलायम सिंह की सरकार ने बदले की भावना से उन्हें न सिर्फ निलंबित किया बल्कि उनकी गिरफ्तारी भी सुनिश्चित की। रामलखन सिंह ने एक दशक से अधिक के समय तक अपने ऊपर लगे आरोपों को धोने के लिए संघर्ष किया। अंतत: देश की सबसे बड़ी अदालत यानि सुप्रीम कोर्ट से उन्हें न्याय मिला। आरोपों से ससम्मान मुक्त होने के बाद आज करीब 70 साल की आयु में उनका सीना 56 इंच से कहीं अधिक चौड़ा हो गया है। अपने कार्यकाल के दौरान मायावती और राजनाथ सिंह सरीखे नेताओं के मुख्यमंत्री रहते उनके नियम विरुद्ध मौखिक आदेशों को दरकिनार करते हुए अपने कर्तव्य पर अडिग रहने वाले रामलखन सिंह ने नौकरशाही के रंग-ढंग को बहुत नजदीक से देखा है। उनसे बीते एक दशक में नौकरशाही में आये बदलाव पर बात छिड़ी तो वे अपनी बेबाक राय देने से नहीं चूके। उनका मानना है कि कोई भी अफसर विवेकशील और न्यायप्रिय नहीं बनना चाहता और सत्ता का सुख भोगने को आतुर रहता है। यदि कोई ऐसा बनना भी चाहता है तो उसे सत्ताधारी महत्वहीन और असम्मानजनक पद पर बैठा देते हैं। तमाम मुद्दों पर दस्तक टाइम्स के समाचार सम्पादक जितेन्द्र शुक्ला से हुई बातचीत के मुख्य अंश-

नए प्रशासक, अपने दौर के अफसरों से किस तरह से अलग हैं?
प्रशासक चाहे किसी सेवा का हो, आईएएस, आईपीएस, आईएफएस या और कोई भी हो सभी पब्लिक सर्वेंट हैं। प्रशासक की अपनी कोई हैसियत नहीं होती है। वहीं राजनेता जनता का नुमाइंदा होता है। ऐसे में प्रशासक वैसा ही कार्य करते हैं जैसा कि सत्ता पक्ष चाहता है। पहले प्रशासक शासक माने जाते थे, लेकिन जैसे-जैसे समय बीता उन्हें एहसास कराया गया कि वे पब्लिक सर्वेंट हैं। प्रशासक को विवेक इस्तेमाल करने की छूट नहीं है। जिसने विवेक का इस्तेमाल किया उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़े। इसका मैं एक उदाहरण हूं। महत्वहीन पद पर रिकार्ड मेनटेन करने जैसे काम में लगाकर मुझे दण्डित किया गया या फिर अफसर सत्ता पक्ष की बात को मान ले और जैसे वे कहें करता चले, तब उसका रुतबा, सम्मान सब कुछ बचा रहेगा। यह एक विकल्प है अन्यथा उन पर भ्रष्टाचार आदि के आरोप लगाकर निलंबित कर दिया जाता है। अधिसंख्य अफसर परिवार के दबाव में पहला विकल्प चुनते हैं। इससे यह होता है कि नेता भी ऐश करता है और अफसर भी।
नौकरशाही ने क्या सत्ताधारी राजनेताओं के आगे समर्पण कर दिया है, क्या उनके लिए जनता से अधिक किसी पार्टी या नेता के हित ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं?
नहीं, ऐसा नहीं है। यह बाध्यता है क्Captureयोंकि सिस्टम ऐसा है। अफसर यदि विवेकशील और कानून पसन्द बनना चाहता है तो उसे सत्ताधारी दल तुरन्त ही हैसियत का एहसास करा देते हैं। अब तो कोई अधिकारी भी जोखिम नहीं उठाना चाहता। आप देख लीजिए जितना वेतन पाते हैं उससे कहीं अधिक की हैसियत की उनकी कोठियां हैं। आखिर यह सब कैसे मिल जाता है। दूसरी बात यह भी है कि यह अफसरों की विवशता है। संरक्षण देने वाली संस्थायें बहुत जटिल प्रक्रिया अपनाती हैं। मुझे स्वयं 12 साल लग गए सुप्रीम कोर्ट से यह साबित कराने में कि मेरे ऊपर लगाये गए आरोप झूठे थे।
ट्रांसफर-पोस्टिंग और दण्डात्मक कार्रवाई क्या नौकरशाहों को नियंत्रित करने के हथियार हैं?
हां, बहुत हद तक। सत्ता पक्ष हमेशा ही सत्ता में बने रहना चाहता है और इसके लिए वह सब कुछ करने को तत्पर रहता है। चाहे वह गलत हो या सही।
क्या बढ़ती आबादी और जनता की अपेक्षाओं के कारण प्रशासनिक ढांचा अक्षम साबित हुआ है?
नहीं, बिल्कुल नहीं। प्रशासनिक ढांचा अक्षम नहीं बल्कि सफल साबित हुआ है। भारत जैसे देश में जहां बहुत गरीबी, बहुत अशिक्षा और हर तरह के भेदभाव हों, वहां चीजों का चलते रहना, देश का एक रहना भी एक बड़ी उपलब्धि है। देश ने प्रगति की है तभी तो जहां कल तक औसत आयु 35 साल होती थी आज 65 साल हो गई है। गांव-गांव तक सड़कों का जाल है, बिजली है, पेयजल है।
भारत में नागरिकों को जो पांच अधिकार- सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, रोजगार का अधिकार, न्याय का अधिकार और भोजन का अधिकार मिले हैं, यह बड़ी उपलब्धि है। भारत में जिस तरह अधिकारगत विकास हुआ है वह दुनिया में बेमिसाल हैं।
‘नेता आते-जाते रहते हैं, सरकार तो नौकरशाह चलाते हैं’-क्या यह जुमला सच है?
यह सच नहीं है। नेता किसी पार्टी का हो, वह इसी मनोवृत्ति से कार्य करता है कि वह सदैव सत्ता में बना रहे। वह कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता। वह हमेशा अपने विरोधियों के दमन और अपनों के हित के लिए नौकरशाही का प्रयोग करता है। ऐसे में नौकरशाही के दुरुपयोग से बचा नहीं जा सकता है। सच्चाई तो यह है कि सत्ताधारी दल बदलने से कुछ भी नहीं बदलता। जो नया आता है वह भी पुराने की ही तर्ज पर हमेशा सत्ता में रहने के लिए वही काम करता है।
यूपी ऐसा राज्य है जहां के प्रशासनिक तंत्र को सर्वाधिक भ्रष्ट नौकरशाहों का चुनाव करने की जरूरत पड़ती है।…ऐसा क्यों?
देखिए, ईमानदार होकर हम किसी के ऊपर अहसान नहीं करते। महाभ्रष्ट चुनने के पीछे स्वयं को महा ईमानदार साबित करना ही होता है। यह गलत परम्परा है। इससे कुछ भी बदलेगा नहीं। ईमानदार होना कोई उपलब्धि नहीं है। साल 1980 में मैं दुधवा नेशनल पार्क में निदेशक था और दुधवा के जंगल तथा सीमावर्ती गन्ने के खेतों में 22 लोगों को खा चुकी एक मानवभक्षी बाघिन को मुझे गोली मारनी पड़ी थी। जिस तारा नामक बाघिन को मैंने मारा था वह इंग्लैण्ड से तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी को भेंट में मिली थी। यह मामला संसद में उठा और मुझ पर यह दबाव डाला गया कि मैं मारी गयी बाघिन को तारा नहीं बल्कि जंगली बाघिन कहूं, लेकिन मैं अपने बात पर कायम रहा। बाद में इंदिरा गांधी ने ही मुझे पूरे देश के प्रोजेक्ट टाइगर का निदेशक बनाया।
भाजपा नेता राजनाथ सिंह ने चाहा था कि उनके गुरु के आश्रम की जमीन राजाजी नेशनल पार्क की वनभूमि बताकर अलग कराने के बजाए लीज पर आश्रम में ही बनाए रखा जाए, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। बाद में जब वे मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने मुझे पर्यावरण संरक्षण के लिए सम्मानित किया। इसी तरह बसपा के एक विधायक को दो हिरणों के अवैध शिकार में पकड़ा। दबाव के बावजूद दो लाख का जुर्माना भरवाकर ही दम लिया और विधायक का नाम अवैध शिकारियों की सूची में शामिल किया।
बाद में जब मायावती मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने मुझे मुख्य वन संरक्षक के पद पर बैठाया। मेरे प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा है ‘‘कुछ ईमानदार अफसर ही भ्रष्ट तंत्र का सामना करने के लिए खड़े होते हैं। उन्हें ट्रांसफर या अन्य तरीकों से परेशान किया जाता है। समाज को इससे खतरा है। ईमानदार अफसर को संरक्षण प्रदान करना सिर्फ उसके हित में नहीं है, बल्कि समाज का हित भी इसी में है कि वह दक्ष अफसर को पूरी मेहनत और ईमानदारी के साथ काम करने की छूट दे। ’’

प्रशासन में किस तरह के सुधार सर्वाधिक जरूरी हैं?
पहला, अफसरों को न्याय व्यवस्था में विश्वास बढ़ाना चाहिए। सभी प्रकार के अन्यायों के खिलाफ सशक्त संस्थाएं हैं। मैने अपने ही प्रकरण में पांच संस्थाओं को आजमाया। राष्ट्रपति, न्याय पालिका, प्रेस परिषद, बार काउंसिल और मीडिया। लोगों को न तो आतंकवादी बनना चाहिए और न ही आत्महत्या करनी चाहिए बल्कि इन संस्थाओं को आजमाना चाहिए। लोगों को संवैधानिक संस्थाओं में विश्वास करना चाहिए और अन्याय सहने की तो बिल्कुल भी जरूरत नहीं है। दूसरा, ब्यूरोक्रेसी को गरीबों के प्रति और अधिक संवेदनशील होना चाहिए। अफसरों को यह गरीब देश बहुत कुछ दे रहा है। गाड़ी, बंगला, अच्छा वेतन, टीए-डीए, दौरे पर जाने पर रुकने को डाक बंगले …और क्या चाहिए। जरूरत इस बात की है कि वे अपनी सोयी हुई अन्तरआत्मा को जगायें। तीसरा, स्वयंसेवी संस्थाओं यानि एनजीओ और मीडिया बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। इन्हें और सक्रिय करने की जरूरत है। यह आम लोगों के लिए बहुत बड़ा सहारा हैं। मैं आशावान हूं कि यह सब होगा। अब तो जनता ही शासक है, सबको आईना दिखा देती है। जनता का सशक्तिकरण हुआ है और यह काम मीडिया ने किया है। यह उम्मीद जगाता है। अच्छे लोग हर जगह हैं, उनकी कमी किसी भी फील्ड में नहीं है। वहीं बुरे लोग भी हैं। मेरे अपने प्रकरण में हर स्तर पर लोगों का सहयोग मिला। एक बात और, देश तथा समाज में परिवार कमजोर हो रहा है। परिवार जैसी संस्था को और मजबूत करने की जरूरत है।

हारा वही जो लड़ा नहीं
पूर्व प्रमुख वन संरक्षक डॉ. राम लखन सिंह जब नौकरी के अंतिम पड़ाव पर थे तब उन्हें, मुलायम सरकार के कोप का भाजन बनना पड़ा था। 11 दिन जेल में रहने और सरकारी प्रताड़ना के बावजूद डॉ. सिंह ने हार नहीं मानी और हाईकोर्ट से 30 अगस्त 2011 को बेदाग बरी हो गये। वे तब भी शांत नहीं बैठे और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट जा पहुंचे। तब सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को खरी-खोटी सुनाने के साथ ही दस लाख रुपए का हर्जाना भी ठोका।
दरअसल हुआ यह था कि 22 सितम्बर 2003 को डॉ. सिंह को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ का सदस्य बनाया गया, यहीं से मुसीबत शुरू हो गयी। बोर्ड की अनुमति के बिना किसी भी सेंचुरी की सीमा में परिवर्तन नहीं किया जा सकता था। बोर्ड की बैठक एक अक्टूबर 2003 को प्रस्तावित थी। तत्कालीन मुलायम सरकार यह चाहती थी कि कुंडा, प्रतापगढ़ के बेंती पक्षी विहार की जमीन को गैर सरकारी जमीन घोषित करते हुए उसे सेंक्चुरी एक्ट से बाहर करने का प्रस्ताव बोर्ड की बैठक में रखा जाये। जबकि मायावती सरकार में जिलाधिकारी ने उसे सरकारी जमीन घोषित किया था।
ऐसा कोई भी प्रस्ताव जब बोर्ड के समक्ष रखने से डॉ. सिंह ने मना किया तब मुसीबतों का पहाड़ टूटना शुरू हो गया। 19 नवम्बर 2003 को उन्हें प्रमुख वन संरक्षक के पद से हटा दिया गया। अगले दिन 20 नवम्बर को उनके खिलाफ विजिलेंस जांच के आदेश हो गए। जिस पर उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कहा कि विजिलेंस जांच का आदेश मुख्यमंत्री नहीं दे सकते। यह अधिकार मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली कमेटी को होता है। कोर्ट ने जब इस पर मुहर लगा दी तो सरकार की नाराजगी और बढ़ गयी।
इसके बाद 25 जून 2004 को एक वकील ने हाईकोर्ट में पीआईएल दाखिल की कि विजिलेंस जांच में रामलखन सिंह को दोषी पाया गया है। जिसके बाद उसी दिन एफआईआर दर्ज हुई और रामलखन की गिरफ्तारी के लिए पुलिस पहुंच गयी। जब वे नहीं मिले तो 30 जून 2004 को उनके पीछे एसटीएफ लगा दी गयी। इधर, गिरफ्तारी पर रोक के लिए हाईकोर्ट में डॉ. सिंह ने याचिका दाखिल की जिसकी कि सुनवाई छह जुलाई 2004 को होनी थी, लेकिन एक दिन पहले ही पांच जुलाई को दिल्ली से लखनऊ आते समय दिल्ली रेलवे स्टेशन से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जिसके बाद उन्हें 11 दिन जेल में रहना पड़ा तब कहीं जाकर उन्हें जमानत मिली। फिर अपनी लड़ाई को वह सुप्रीम कोर्ट ले गए। बाद में 30 अगस्त 2011 को हाईकोर्ट ने अन्तिम आदेश जारी करते हुए सभी तरह की कार्रवाई को शून्य घोषित करते हुए उन्हें निर्दोष करार दिया। यह तो तय हो गया था कि रामलखन सिंह निर्दोष हैं, लेकिन फिर आखिर दोषी कौन है यह जानने के लिए वे सुप्रीम कोर्ट गए। वहां उन्होंने खुद पैरवी की और अन्त में सरकार पर सुप्रीम कोर्ट ने दस लाख रुपए का हर्जाना ठोंका। डॉ. राम लखन सिंह का कहना है कि कोई संकट मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं, हारा वही जो लड़ा नहीं। उन्हें स्वामी विवेकानन्द का वह कथन भी बहुत प्रिय है जिसमें उन्होंने कहा था ‘‘आश्चर्य की बात यह नहीं है कि अनेक लोग असफल हो रहे हैं, आश्चर्य की बात यह है कि अनेक बाधाओं के बाद भी कुछ लोग सफल हो रहे हैं।’’

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *