पुनर्जन्म के विश्वासी भी करते हैं लोक परलोक की बातें

हृदयनारायण दीक्षित

स्तम्भ : लोक की व्याप्ति बड़ी है। सामान्यतया प्रत्यक्ष विश्व को लोक कहते हैं। लेकिन भारतीय परंपरा में कई लोकों की चर्चा है। ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में ‘अमृत’ लोक का उल्लेख है। बताते हैं, ”प्रत्यक्ष विश्व उस पुरुष की महिमा है। पुरुष इससे बड़ा है। विश्व उसका एक पाद चरण है। तीन भाग अमृत लोक में हैं।” लोक का विचार वैदिककाल से प्राचीन है। इसी परंपरा में स्वर्गलोक व मृत्युलोक की भी चर्चा होती है। यजुर्वेद के अंतिम अध्याय में कहा गया है ”आत्मविरोधी लोग अंधकार आच्छादित लोकों में बार-बार जाते हैं।”

ऐतरेय उपनिषद् में ‘आत्मा’ को सृष्टि सृजन का कर्ता बताया गया है। इस उपनिषद् में कहते हैं कि आदि में आत्मा अकेला था, दूसरा कोई नहीं था – आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत। नान्यत्किंचनमिषत्। उसने लोकसृजन की इच्छा की। उसने द्युलोक और ऊपर के लोक और जल के नीचे के लोक बनाए। तुलसीदास, ने भी रामचरितमानस के गरुण कागभुशुंडि सम्वाद में अनेक लोक बताए हैं। पुनर्जन्म के विश्वासी भी लोक परलोक की बाते करते हैं। यह पृथ्वी प्रत्यक्ष लोक है। हम सब इसी का भाग हैं। अन्य लोक हमारे इन्द्रियबोध द्वारा यथार्थ नहीं है। दार्शनिक स्तर पर तमाम विचारधाराएँ हैं। प्रत्यक्ष को ही सृष्टि के गोचर का कर्ता-धर्ता मानना भौतिकवाद कहा जाता है। भौतिकवाद में सृष्टि रचना व विकास के लिए जड़ द्रव्य को ही आधारभूत माना गया है। आत्मा या चेतन की जरूरत नहीं है। भौतिकवादी आत्मा और ईश्वर जैसी सत्ता के प्रति विश्वास नहीं रखते है। चार्वाक दर्शन इसी श्रेणी में है। इस विचार को नास्तिक कहा जाता है। सामान्यतया दार्शनिक ज्ञान यात्रा में प्रमाण, अनुमान व सिद्ध कथन तीन उपकरण हैं। प्रमाण प्रत्यक्ष होता है। अनुमान प्रत्यक्ष के आधार पर की गई कल्पना है। अनुमान प्रत्यक्ष की संगति में यथार्थ सिद्ध होता है तो ठीक वरना व्यर्थ। आप्त वचन या सिद्ध कथन पूर्वजों के अनुभूत विचार हैं। लेकिन भौतिकवाद में प्रत्यक्ष को ही ज्ञान साधन माना जाता हैं।


भौतिकवादी दर्शन प्राचीन है। ऋग्वेद में जल से सृष्टि विकास बताया गया है। अन्य विचार भी है। लेकिन तब दर्शन अपनी विकास शील दशा में था। भौतिकवादी दर्शन को भारतीय चिन्तन में चार्वाक दर्शन कहा गया है माना जाता है कि इसके प्रवर्तक ऋषि वृहस्पति हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार वृहस्पति देव कथाओं के पात्र हो सकते हैं। वास्तविक मनुष्य नहीं। लेकिन ऋग्वेद के एक मंत्र (10.72.2) के रचनाकार लौक्य वृहस्पति है। इस मंत्र में कहा गया है कि ‘‘देवों से पूर्व युग में असत् से सत् उत्पन्न हुआ।’’ असत् सृष्टि के पहले के स्थिति है। यह अव्यक्त दशा है। तब देवता भी नहीं है। देवता व्यक्त सृष्टि में प्रकट हो सकते हैं। मूल बात है असत् से सत् का उद्भव। इस उद्भव का कर्ता कोई आत्मा या देवता नहीं है। बृहस्पतिवार की तरह उशना भी ऋग्वेद मे हैं। उशना शुक्राचार्य हैं। चार्वाक दर्शन में जल, अग्नि, वायु और पृथ्वी चार तत्व ही माने जाते हैं। आकाश को वह लोग तत्व या पदार्थ नहीं मानते थे। प्रत्यक्ष को ही सब कुछ मानने के कारण किसी समय यह बहुत लोकप्रिय रहा होगा। लोकप्रियता के कारण ही सम्भवतः इसे लोकायत दर्शन भी कहते हैं। लोकायत शब्द लोक और आयत से बना है। लोक का अर्थ प्रत्यक्ष है और आयत का अर्थ विस्तृत है।


कौटिल्य के द्वारा लिखे गये अर्थशास्त्र में भी लोकायत की चर्चा है। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र के प्रारंभ में ही बृहस्पतिवार व शुक्र को नमस्कार किया है। चार विद्याएँ बताई हैं। इनमें पहली आन्वीक्षकी है, दूसरी त्रयी है। तीसरी वार्ता और चैथी दण्डनीति है। कौटिल्य ने स्पष्ट किया है कि सांख्य, योग और लोकायत आन्वीक्षकी विद्या के अन्तर्गत है। त्रयी में तीन वेद हैं। वार्ता, विद्या, कृषि और पशुपालन व व्यापार से सम्बन्धित हैं। आन्वेक्षकी के बारे में कहते हैं कि यह लोक का उपकार करती है। इसी प्रकार दण्डनीति शासन को प्रतिपादित करने वाली है। दार्शनिक स्तर पर कौटिल्य सांख्य, योग और लोकायत की चर्चा करते हैं।

भारतीय दर्शन की एक धारा वैशेविक दर्शन कहलाती है। यह भी भौतिकवादी है। कुछ विद्वान कणाद के वैशेषिक दर्शन को न्याय दर्शन का विस्तार मानते हैं। कणाद रचित वैशेषिक सूत्र 370 हैं। वैशेषिक का अर्थ पदार्थों के भेद का ज्ञान कहा गया है। इस दर्शन में ज्ञान के छः मूल तत्व बताए गए हैं। द्रव्य, अग्नि, कर्म, समवाय, सामान्य और विशेष। द्रव्य के बारे में कहते हैं कि वह नौ हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा और मन। काल और आत्मा को भी द्रव्य मानना बड़ी बात है।

चरक संहिता में भी आत्मा को द्रव्य बताया गया है। कणाद के अनुसार यह सृष्टि नौ द्रव्यों से बनी है और सभी द्रव्यों में परमाणु है। इस दर्शन के अनुसार पृथ्वी, जल, आग्नि और वायु के परमाणुओं से तीन तरह की वस्तुएँ बनी हैं। शरीर इन्द्रिय और विषय ये तीन प्रकार के पदार्थ हैं। आकाश के सम्बन्ध में कहते हैं कि आकाश की पहचान या गुण शब्द है। आकाश सर्वत्र व्याप्त है। आकाश का आयतन नहीं है। काल को नित्य बताया गया है। आश्चर्यजनक बात है कि परमाणुहीन काल को कणाद ने द्रव्य माना है। काल द्रव्य में परमाणु नहीं होते। दिशा भी एक द्रव्य है। इसके भी परमाणु नहीं होते। आत्मा को द्रव्य बताकर कहते हैं कि यह आकाश की तरह विभु और व्यापक है। आत्मा के भी कारण रुप परमाणु नहीं हैं। कणाद ने मन को अणु बताया है। मन आकाश आत्मा या दिक््काल की तरह व्यापक नहीं है। इस अभाव के कारण मन अणु है। अर्थात जो सर्वव्यापी है वह अणु नहीं है। प्रकृति के रहस्यों की गति, समयोग और गुण धर्म को जानने से मुक्ति मिलती है। वैशेषिक को भी अनीश्वरवादी दर्शन में गिना जाता है।

लोक में अनेक तरह के विचार होते हैं। कुछ लोग ईश्वर को मानते हैं। उसे संसार चक्र का नियंता भी मानते हैं। कुछ लोग आत्मा मानते हैं। शरीर को नश्वर और आत्मा को अविनाशी बताते हैं। पुनर्जन्म पर भी विश्वास करते हैं। कुछ लोग प्रकृति के प्रपंचों को ही सही मानते हैं। लोक में अनेक विचारधाराएँ होती हैं। इन्हीं विचारधाराओं में से कुछ विद्वान साधक नई विचारधारा का विकास करते हैं। कुछ विचारधाराएँ शास्त्र बनती हैं। इनका प्रसार कम लोगों में होता है। लेकिन शास्त्र रचयिता भी अपनी सामग्री लोक से ही प्राप्त करते हैं। लोक भी अपनी जिज्ञासा के लिए शास्त्र से सामग्री लेता है। लोक और शास्त्र में टकराव देखने वाले लोग गलती पर हैं। शास्त्र की बातें अथवा निष्कर्ष लोक से ही प्राप्त होते हैं। शास्त्र में अनुशासन होता है। यह अनुशासन लोक को प्रभावित कर सकता है। नहीं भी कर सकता है। लोक सभी विचारधाराओं की प्रयोगशाला है।

लोकायत को प्रत्यक्ष भौतिकवादी माना जाता है। शुक्र और वृहस्पति इस परंपरा के प्रवर्तक माने जाते हैं। प्रत्यक्ष संसार को देखकर प्रत्येक व्यक्ति अथवा विद्वान के मन में अपने-अपने ढंग से जिज्ञासा का विकास होता है। पंथिक आस्थाएँ जिज्ञासा को महत्व नहीं देती हैं। पंथिक आस्थाओं में संसार को जन्म देने व संचालन करने वाली कोई-न-कोई अदृश्य, शक्ति मान ली जाती है। इनमें संशय तर्क और जिज्ञासा की भी गुंजाइश नहीं होती। भारत में ऋग्वेद के रचनाकाल के पहले से ही प्रश्न जिज्ञासा व तर्क की महत्ता है। सबके अपने विचार हैं। ऋग्वेद में एक भी कथन में ‘‘हमारी ही बात मानने का आग्रह’’ नहीं किया गया है।

ऋग्वेद का काव्य और दर्शन लोक में ही उगा है। लोकमंगल इसका उद्देश्य है। लोकहित सभी ऋषियों का ध्येय है। इसमें दर्शन भी है। यह सच्चे अर्थों में लोकायत है। चार्वाक दर्शन की कुछ बातें चर्चा का विषय रहती हैं। एक श्लोक में कहा गया है, ‘‘कि यह संसार सुख के लिए है। उधार लेकर भी घी खाना अच्छा है।‘‘ शरीर नष्ट हो जाने के बाद कुछ भी नहीं बचता।’’ शरीर के बाद कुछ न बचना एक विचार है। शरीर नष्ट हो जाने के बाद भी प्राण या आत्मा बचना भी एक विचार है। लोकायतवादी अन्य विचारधाराओं पर आक्रामक थे। इसी तरह रामायण में भी लोकआयतों की आलोचना है। लोक में सभी विचार हैं।

(रविवार पर विशेष)
लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता हैं और वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष हैं