प्राकृतिक व्यवस्था है धर्म

हृदयनारायण दीक्षित : धर्म प्राकृतिक व्यवस्था है। भारत की धर्म देह विराट है। यह संपूर्ण अस्तित्व को आच्छादित करती है। इसलिए धर्म का बौद्धिक विवेचन निर्वचन जटिल है। मोटे तौर पर इसके तीन अंग संभव हैं। पहला अंग दर्शन है। इस दर्शन का जन्म विश्वास या श्रद्धा से नहीं हुआ। भारतीय दर्शन के जन्म का का कारण जिज्ञासा और प्रश्नाकुलता है। ऋग्वेद में सर्वत्र जिज्ञासा है और प्रश्नाकुलता है। भारतीय दर्शन में विचार विविधिता है। इसके प्रभाव में भारत का प्रत्येक नागरिक जिज्ञासु और प्रश्न बेचैन है। दर्शन के बाद धर्म का दूसरा भाग रीति परम्परा व कर्मकाण्ड है। वैदिक परंपरा में मुख्य कर्मकाण्ड यज्ञ है। यज्ञ प्राचीन वैदिक उत्सव थे। इनमें शास्त्रार्थ व विद्वत गोष्ठियां थीं। बाद में कुछ पुरोहितों ने अनेक अन्य कर्मकाण्ड जोड़े। पुरोहितों का बड़ा भाग यज्ञ आदि उत्सवों के दार्शनिक भाव से जुड़ा था। पुरोहित पुरः हितः थे। पुर-नगर हितैषी थे लेकिन कुछ पुरोहितों ने निजी स्वार्थ के लिए कर्मकाण्ड से स्वर्ग या भौतिक उपलब्धियां प्राप्त कराने का दावा किया। दोनों तरह के पुरोहितों में टकराव था। कर्मकाण्ड से लाभ दिलाने वाले पुरोहित मुख्य धारा से बाहर रहे।
धर्म का तीसरा भाग ‘मिथ’ या रम्य कल्पना है। ऋग्वेद में यह तीसरा भाग कम है। दर्शन भाग ज्यादा है, यही प्रेय श्रेय है। दूसरा भाग यज्ञ तक सीमित है और तीसरा मिथ भाग अप्रत्यक्ष देवों का है। अग्नि, जल, मरूत्-वायु, पृथ्वी, आकाश, रात्रि, नदी आदि प्रत्यक्ष देव हैं। वे मिथ नहीं है। इन्द्र वरूण आदि अप्रत्यक्ष देवों को कल्पित कहा जा सकता है पर उन्हें भी प्रकृति की अदृश्य शक्तियों के रूप में नमस्कार किया गया है। वैदिक मिथोलोजी का अपना आनंद है। धार्मिक आश्चर्यजनक मिथ लोकमन पर प्रभाव डालते हैं। मिथ जैसे देव प्रत्यक्ष जगत में हस्तक्षेप करते गाए गए हैं। इन्द्र जल प्रवाहों की बाधाएं दूर करते हैं। वे बांध तोड़ डालते हैं। वे ऋग्वेद में वृत्र हंता है। यथार्थ में वृत्र और कुछ नहीं नदी प्रवाह के बाधक बांध या पत्थर है। इन्द्र जल को मुक्त करते हैं। लेकिन मिथ में वे वृत्रासुर को मार गिराते हैं। मिथ कथाएं मन को सहलाती हैं और जटिल विषय को सरल बनानी हैं। जैसे ऊषा और रात्रि सगी बहने हैं। रात्रि बड़ी बहन है और ऊषा छोटी। यहां सुंदर नेह का चित्रण है। पिता माता का आदर भी इसी तरह गाया गया है। उत्तर वैदिक काल के बाद मिथ कल्पना में भारी वृद्धि हुई। इसका अपना लाभ था लेकिन आधुनिक मन प्रायः मिथक से दूर है।
भारतीय ‘धर्म का दर्शन’ महत्वपूर्ण है। दर्शन के कारण ही भारत का मन गहन रूप में लोकतंत्री है और दुनिया के सभी मतों पंथों के प्रति आदरभाव से युक्त है। रीति रिवाज कर्मकाण्ड सबको जोड़ते रहे हैं। जाति व्यवस्था के विकास के बाद कहीं कहीं जाति आधारित कर्मकाण्ड का विकास हुआ। लेकिन भारतीय धर्म के अनेक रीति रिवाज विश्व में भी लोकप्रिय हैं। उत्तर प्रदेश में प्रयाग का कुम्भ दुनिया का सबसे बड़ा मेला है। दक्षिण भारत के मंदिरों में दर्शन से लाखों को आनंद मिलता है। उत्तर प्रदेश व उत्तराखण्ड में बद्रीनाथ, केदारनाथ, काशी, मथुरा, अयोध्या के तीर्थ यात्री करोड़ों में हैं। सभी तीर्थ मनोरम हैं। इनमें जाने वाले श्रद्धालु दर्शन व आस्तिकता के साथ पर्यटन का भी आनंद पाते हैं। भारत के धर्म के रीति भाग में अनेक उत्सव हैं।
प्रकृति विराट है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। प्रकृति में लगातार परिवर्तन होते हैं। प्रकृति में परिवर्तन के भी नियम हैं। नियमानुसार परिवर्तन प्रकृति का नियम है। इसलिए धर्म प्रकृति का नियम है। वैदिक विषयों के विद्वान ग्रिफ्थ ने धर्म को ला या लाज कहा है। प्रकृति की सम्पूर्ण गतिविधि नियम बंधन में हैं। सूर्य प्रकृति की प्रत्यक्ष महाशक्ति है। सूर्योदय और सूर्यास्त भी नियम बंधन में है। वर्षा प्रत्यक्ष प्राकृतिक कार्रवाई है। आकाश में मेघ आते हैं, वर्षा करते हैं। यह नियम है, कभी कभी बिना वर्षा के ही लौट जाते हैं। दोनो स्थितियों के कारण और नियम हैं। बीज की काया छोटी होती है। इसके भीतर पेड़ हो जाना का संभावना है। धरती और जल से मिलकर यह टूटता है। बीज से पौध, पौध से वृक्ष, वृक्ष में कली, कली से फूल और फूल से फिर बीज बनना नियम है। प्रकृति के प्रत्येक अणु परमाणु नियम बंधन में है। प्रकृति में एक सुनिश्चित संविधान जैसी व्यवस्था है।
ऋग्वेद में प्रकृति के इस संविधान का नाम ऋत् है। ऋत् की खोज ऋग्वेद के ऋषियों का अनूठा आविष्कार है। ऋषि इन नियमों के निर्माता नहीं हैं। प्रकृति के नियम पहले से हैं। ये नियम ऋत हैं। ऋषि इन्हीं नियमों या ऋत के जानकार हैं। वे ऋत के ज्ञाता ‘ऋतज्ञा’ हैं। सभी देवता ऋत-संविधान का अनुसरण करते हैं। मरूद्गण देव हैं। वे वायु हैं लेकिन वे भी मनमानी नहीं कर सकते। वे ऋत के अनुशासन में गतिशील ‘ऋतजाता’ कहे गए हैं। (ऋ0 3.45.13) वे इन नियमों के ज्ञाता ऋतज्ञा भी हैं। (5.58.8)
ऋग्वेद के ऋषियों की दृष्टि वैज्ञानिक है। वे प्रकृति के गोचर प्रपंचों में रस लेते हैं। अग्नि प्रकृति के कण-कण में व्याप्त हैं। इसी तरह अग्नि के भीतर ऋत या नियम भी व्याप्त हैं। यही स्थिति प्रकृति की सभी शक्त्यिों की है। ऋत प्रकृति का आधारभूत सत्य है। ऋग्वेद में अग्नि देवता है। वे ‘ऋतस्य क्षता’ या नियमों पर चलाने वाले कहे गए हैं। वे ऋत नियम के प्रकाशक ‘ऋतस्य दीदिवं’ भी हैं। नदियाँ भी ऋत संविधान के अनुसार बहती हैं। ऋग्वेद में उन्हें ‘ऋतावरी’ कहा गया है। मित्र और वरूण देव ‘ऋतावृधौ’ है। ऋत में संवर्द्धित होते हैं।
ऋग्वेद के बड़े देवता है – वरूण। वे स्वयं नियम पालन कराते हैं और कराते भी हैं। एक मंत्र में पृथ्वी और आकाश वरूण धर्म से धारण किए गए है – वरूणस्य धर्मणा। (6.70.1) वरूण का कोई अलग धर्म नहीं है। वरूण ऋत नियम मानते हैं और मनवाते हैं। ऋत नियम हैं। इनका पालन एक कर्म है। यही धर्म है। विष्णु देव ने तीन पग चलकर ब्रह्माण्ड नापा। ऋग्वेद में कहते हैं कि विष्णु ने धर्मान – धर्म पर चलते हुए तीन पग में विश्व नापा। यहां धर्म भी ऋत है। ऋत सत्य है, इसी का धारण किया जाना धर्म है। ऋग्वेद में ऋत की प्रतिष्ठा चर्चा ज्यादा है और धर्म की कम। प्रकृति की सारी शक्तियां नियम अनुसार सक्रिय हैं। प्रत्येक शक्ति का अपना गुण-धर्म भी है। जल का गुण धर्म रस है। प्रवाह है। अग्नि का गुण धर्म ताप है। वायु का स्पर्श है।
प्रकृति के सभी प्रपंच ऋत का अनुसरण करते हैं। सूर्य सविता भी पृथ्वी अंतरिक्ष को ‘स्वधर्मणे’ प्रकाश से भरते हैं। (4.53.3) प्रकाश से भरना सविता का स्वधर्म है। सूर्य तेजस्वी है, धर्मणा है। (1.60.1) ऋत प्राकृतिक सत्य है। इसका पालन धर्म है। यह सत्य है। जगत सृष्टा प्रजापति ‘सत्यधर्मा’ हैं। (10.12.9) मनुष्य को भी इन नियमों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। ऋत नियमों का उल्लंघन ‘अनृत’ है। ऋत सत्य है तो अनृत मिथ्या है। ऋग्वेद के ऋषि कहीं भी अपना विचार नहीं थोपते। वे अपने मंतव्य को स्तुति में प्रकट करते हैं। बोलना सामाजिक सम्बंधों का आधार है। प्रकृति के तमाम रहस्य ज्ञात थे, तमाम अज्ञात थे। ज्ञात प्रत्यक्ष सत्य होता है। सत्य बोलना धर्म है। ऋग्वेद की इसी परम्परा में उपनिषद्काल तक ऋत सत्य और धर्म    एक हो गए हैं।
तैत्तिरीय उपनिषद् में कहते हैं, “ऋतं वदिष्यामि, सत्य वदिष्यामि, सत्य बोलना आदर्श है लेकिन इसका आचरण और भी जरूरी है। इसलिए कहते हैं – सत्यं वद् धर्मं चर। सत्य बोलना और धर्म का आचरण ही लोकमंगलकारी है। वैदिक धर्म विचार नहीं व्यवहार है। प्रकृति की शक्त्यिों के नियम व्यवहार के अनुसरण में ऋग्वेद के ऋषियों ने धर्म का व्यवहार किया है। दुनिया में तमाम पंथ, विश्वास, रिलीजन हैं। इनमें मजहब भी है। रिलीजन और मजहब देवदूतों द्वारा दिए गए पवित्र संदेश के रूप में हैं। लेकिन वैदिक धर्म का सतत् विकास हुआ है। इस धर्म का प्रस्थान बिन्दु ऋग्वैदिक दर्शन है।
(रविवार पर विशेष)
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष हैं।)