भारत की नैविगेशन प्रणाली के बढ़ते चरण

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शुकदेव प्रसाद

20 जनवरी, 2016, सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्री हरिकोटा (आंध्र प्रदेश)। प्रात: ठीक 9:31 बजे हमारे ध्रुवीय राकेट (मिशन पीएसएलवी-सी-31) ने केंद्र के दूसरे लांच पैड से उड़ान भरी और 19 मिनट बाद इसने भारत के पांचवे नैविगेशन उपग्रह (आई आर एन एस एस-1ई) को उसकी कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया। 1425 किग्रा. वजनी इस उपग्रह की कार्यकारी अवधि 12 वर्ष आकलित की गई है। अब, आइए थोड़ा अतीत में लौटते हैं और डालते हैं एक नज़र भारतीय नैविगेशन प्रणाली पर जो अमेरिकी जी पी सी (ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम) के समतुल्य है। आज से 10 वर्ष पूर्व ‘इसरो’ के इंजीनियरों ने अमेरिकी ‘जीपीएस’ (ग्लोबल पोजीशिनिंग सिस्टम) से भिन्न अपनी नैविगेशन प्रणाली विकसित करने पर विमर्श आरंभ कर दिया था। जीपीएस, उपग्रह आधृत एक ऐसी प्रणाली है जिससे उपग्रह द्वारा जल, थल, नभ के चप्पे-चप्पे पर नज़र रखी जा सकती है। इसका सीधा सा अर्थ है उपग्रह आधृत वैश्विक दिशा ज्ञान और स्थान निर्धारण। हर्ष का प्रकरण यह है कि भारत भी अब इस क्लब में प्रविष्ट हो चुका है। हाल-फिलहाल अब तक की सर्वोत्तम और बहुप्रयुक्त ऐसी नैविगेशन प्रणाली की स्थापना आज से प्राय: दो दशक पूर्व अमेरिका ने की थी जिसे उसने ‘वैश्विक अवस्थिति प्रणाली’ (जीपीएस) नाम दिया था। कालांतर में कई अन्य राष्ट्रों ने भी ऐसी प्रणालियों की स्थापना की जो अभी विकासाधीन हैं।
navigationअमेरिका की नैविगेशन प्रणाली को 24 उपग्रहों की दरकार है। रूस ने भी वैश्विक कवरेज के लिए ऐसी प्रणाली विकसित की है जिसे उसने ‘ग्लोनास’ नाम दिया है, इस प्रणाली में 24 उपग्रह होंगे। यूरोप भी ऐसी प्रणाली की स्थापना कर रहा है। उसकी नैविगेशन प्रणाली में 27 उपग्रह होंगे। उसका यह सारा संजाल वर्ष 2019 तक संपूरित हो सकेगा। यूरोप की इस प्रणाली का नाम ‘गैलिलियो’ है। फिलहाल उसने अभी तक इस प्रणाली में चार उपग्रहों की स्थापना की है। चीन की नैविगेशन प्रणाली (बीएसएनएस) में 35 उपग्रह होंगे। अक्टूबर 2012 तक उसने 16 उपग्रहों की स्थापना कर ली है। उसकी यह प्रणाली वर्ष 2020 तक अंजाम तक पहुंचेगी। लेकिन उसका दायरा एशिया और प्रशांत क्षेत्र तक ही होगा। जापान की इस प्रणाली (क्यूजेडएसएस) में तीन उपग्रह होंगे। उसने इस उपक्रम में अपने पहले उपग्रह का प्रक्षेपण दिसंबर, 2010 में किया था। भारत भी अमेरिकी जीपीएस से जुड़ सकता था, लेकिन इसमें खतरा था। युद्ध या कि किसी संवेदनशील अवसर पर यदि उसने अपनी सेवाएं हमें देना बंद कर दिया तो कुछ का कुछ भी हो सकता है। ऐसे में हमारी नैविगेशन प्रणाली ध्वस्त हो सकती है और उपग्रहों से सिग्नल न मिलने पर हमारी रक्षा प्रणाली तार-तार हो सकती है, अत: भारत ने अपनी स्वतंत्र नैविगेशन प्रणाली के विकास का निर्णय लिया जो समीचीन है। अंतर सिर्फ यह है कि हमारी प्रणाली एक क्षेत्रीय सेवा है जो भारत भूमि और उसके इर्द-गिर्द 1500 किमी. के दायरे को अपने कवरेज में ले सकेगी और इतने से ही हमारा काम चल जाएगा, ऐसा ‘इसरो’ के विशेषज्ञों का कहना है।
अमेरिकी जीपीएस के संजाल में 24 उपग्रह और भू-केंद्रों का वैश्विक संजाल है जो धरती के जर्रे-जर्रे पर अपनी पैनी नज़र 24 घंटे रख सकता है। यह अत्यंत महंगी प्रणाली है। अत: ‘इसरो’ ने अपने लक्ष्य को सीमित करने पर विचार किया और निष्कर्ष यह था कि हमारी प्रणाली समस्त भारत भूमि को अपने सिग्नल देगी और साथ ही सीमा के इर्द-गिर्द 1500 किमी. तक भी अपनी नज़र रखेगी। हजारों संरचनाओं पर विचार करने के उपरांत एक ऐसी रूप-रेखा निर्मित की गई जिसमें मात्र सात उपग्रहों की स्थापना करके ही हम अपनी असैन्य/सैन्य जरूरतों को पूरा कर लेंगे।
भारतीय नैविगेशन प्रणाली में सात उपग्रह होंगे, जिनमें से पांच उपग्रहों की सफल स्थापना की जा चकी है। ध्रुवीय रॉकेट की 24वीं उड़ान (पीएसएलवी-सी22) में एक जुलाई, 2013 को की गई थी। इस उड़ान में इसने भारत के पहले नैविगेशन उपग्रह ‘आईआरएनएसएस-1ए’ (इंडियन रीजनल नैविगेशन सैटेलाइट सिस्टम) को भू-स्थिर कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया। उपग्रह का भार 1425 किग्रा. है और इसकी कार्यकारी अवधि 10 वर्ष आकलित की गई है। यह ध्रुवीय रॉकेट की 23वीं सफल उड़ान थी। यह उपग्रह राष्ट्र को अपनी सेवाएं मुहैया करा रहा है।
इस क्रम में भारत ने अपने दूसरे नैविगेशन उपग्रह ‘आई आर एन एस एस-1बी’ का प्रक्षेपण चार अप्रैल, 2014 को सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से ध्रुवीय रॉकेट (पीएसएलवी-सी24) से सायं 5:14 बजे किया और हमारे ध्रुवीय राकेट ने उस पर सवार उपग्रह (आईआरएनएसएस-1बी) अर्थात ‘भारतीय क्षेत्रीय नैविगेशन उपग्रह प्रणाली-1बी’ का सफल प्रक्षेपण किया। उड़ान भरने के मात्र 19 मिनट बाद उसने उपग्रह को उसकी कक्षा में स्थापित कर दिया। उस समय उपग्रह की धरती से निकटतम दूरी 283 किमी. और अधिकतम दूरी 20,630 किमी. थी। तात्पर्य यह है कि उपग्रह भू-स्थिर अंतरण कक्षा (जीटीओ) में पहुंच गया और इसके बाद ‘मुख्य नियंत्रण सुविधा’ (एमसीएफ), हासन (कर्नाटक) से मिले कमांड से उपग्रह से संलग्न ‘लैम’ (लिक्विड एपोजी मोटर) मोटरों को 5 बार दाग कर सफलतापूर्वक उसका कक्षोन्नयन किया गया अ‍ौर प्राय: एक सप्ताह के बाद उपग्रह 36,000 किमी. की ऊंचाई वाली वांछित भू-स्थिर/भू-समकालिक कक्षा (जीएसओ) में पहुंच गया। हमारे ध्रुवीय राकेट (पीएसएलवी-सी26) ने 16 अक्टूबर, 2014 को तड़के 1:32 बजे सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से उड़ान भरी और लिफ्ट ऑफ के 20 मिनट 18 सेकंड बाद उसने भारत के तीसरे नैविगेशन उपग्रह ‘आईआरएनएसएस-1सी’ को सफलतापूर्वक उसकी कक्षा में स्थापित कर दिया। ध्रुवीय रॉकेट की सद्य: उड़ान 28वीं और लगातार 27वीं सफल उड़ान थी। इस उड़ान में ध्रुवीय रॉकेट के ‘एक्स एल संस्करण’ का इस्तेमाल किया गया था। इससे पूर्व भी हम इस मॉडल का 6 बार इस्तेमाल कर चुके हैं। भारत के तीसरे नैविगेशन उपग्रह ‘आईआरएनएसएस-1सी’ का भार 1425 किग्रा. है और इसकी भी कार्यकारी अवधि 10 वर्ष आकलित की गई है।
navigation_1हमारे चौथे नैविगेशन उपग्रह (आई आर एन एस एस-1डी) को 28 मार्च, 2015 को ध्रुवीय राकेट (पीएसएलवी-सी 27) से श्री हरिकोटा से शाम को प्रक्षेपित किया गया। उड़ान के 19 मिनट बाद ध्रुवीय राकेट ने 1425 किग्रा. वजनी आई आर एन एसएस-1डी को 282 ़ 20,644 कि.मी. की ऊंचाई वाली दीर्घवृत्ताकार कक्षा में पहुंचा दिया। उपग्रह से संलग्न लैममोटर को 29 मार्च से लेकर एक अप्रैल 2015 तक चार बार दागा गया और इस प्रकार उपग्रह के कक्षोन्न्यन की प्रक्रियाएं सम्पन्न हुई और उपग्रह 36,000 कि.मी. की ऊंचाई वाली भू-स्थिर कक्षा में पहुंच गया। यह उड़ान ध्रुवीय राकेट की 29वीं और लगातार 28वीं सफल उड़ान थी। इस बार भी धु्रवीय राकेट के एक्स एल संस्करण (एक्स्ट्रा लार्ज वर्जन) का उपयोग किया गया था। इससे पहले इस संस्करण का सात बार सफलतापूर्वक प्रयोग किया जा चुका है। उपग्रह की कार्यकारी अवधि 10 वर्ष आकलित की गई है। ‘इसरो’ का यह भी कहना है कि जरूरत पड़ने पर इस प्रणाली में चार और उपग्रह छोड़े जा सकते हैं। सद्य: प्रक्षेपित उपग्रह से नि:संदेह हमारी नैविगेशन प्रणाली सुदृढ़ होती प्रतीत हो रही है। हमें गौरव की अनुभूति हो रही है कि भारत ने अपनी स्वतंत्र प्रणाली का विकास कर लिया है और वह भी मात्र 1420 करोड़ रुपये की लागत से। ‘इसरो’ के कर्मठ इंजीनियरों ने अत्यल्प पूंजी निवेश के साथ इस प्रणाली को दुनिया के सामने पेश करके एक उदाहरण प्रस्तुत किया है जो शेष विश्व के लिए अनुकरणीय है। प्रचार माध्यमों में नैविगेशन के लिए समानार्थी शब्द नौवहन/नौसंचालन का प्रयोग किया जा रहा है जो भ्रामक है। यह सेवा जल ही नहीं अपितु थल और नभ में स्थित किसी भी वस्तु की लोकेशन पर नज़र रख सकती है, उसका मार्ग-निर्देशन कर सकती है, बशर्ते उसके पास उपग्रहों के भेजे जाने वाले सिग्नलों को ग्रहण करने के लिए रिसीवर हो। मसलन ट्रक/कार ड्राइवर अपनी मोबाइल से अपनी सटीक लोकेशन की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। हमारी नैविगेशन प्रणाली ट्रकों, कारों, युद्धक टैंकों, समुद्री जहाजों, पनडुब्बियों, वायुयानों और प्रक्षेपास्त्रों की अवस्थिति की सटीक जानकारी प्रेषित करती रहेगी। इस प्रणाली का उपयोग करके ट्रक/कार ड्राइवर, नागरिक और युद्धक विमानों के पायलट, समुद्री जहाजों के कैप्टन समुचित रूप से अपने रूटों की आयोजना कर सकेंगे क्योंकि ये उपग्रह उन्हें अपने लक्ष्यों की ओर निर्देशित करते रहेंगे। यहां तक कि मिसाइलें भी आसानी से अपने लक्ष्यों को खोज पाने में सफल होंगी। वायुयानों की ‘सेफ लैंडिंग’ के लिए तो यह सेवा अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी और इससे दुर्घटनाएं टाली जा सकती हैं।
भारतीय नैविगेशन प्रणाली से हम दो तरह की सेवाएं ले सकेंगे। एक सेवा तो आम लोंगो के लिए होगी और दूसरी सेवा सेना या कि सुरक्षा एजेंसियों के लिए होगी। अब हम अपने दुश्मनों की गतिविधियों पर नज़र रख सकते हैं, आतंकवादियों के ठिकानों को खोज सकते हैं और आपदा प्रबंधन में भी इसका बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं। इस प्रणाली की सफल स्थापना के साथ भारत में किसी भी स्थल की सटीक जानकारी 10 मीटर की परिशुद्धता तक प्राप्त की जा सकेगी और भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में इसकी परिशुद्धता 20 मीटर तक होगी।=

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