राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : राष्ट्र सेवा के 94 वर्ष

  • संघ को जानें तो सही

बृजनन्दन राजू

हिन्दू संगठन और राष्ट्र को परमवैभव पर ले जाने के जिस उद्देश्य को लेकर 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में डा. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। संघ अपनी विकास यात्रा के 94 वर्ष पूर्ण कर चुका है। इन वर्षों में हिन्दू संगठन के साथ-साथ आम लोगों का विश्वास जीतने और राष्ट्र जागरण के प्रयास में संघ पूर्णतया सफल रहा है। देश दुनिया में आर.एस.एस. नाम से विख्यात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विश्व का सबसे बड़ा सामाजिक संगठन है। संघ की तुलना किसी दूसरे संगठन से नहीं कर सकते क्योंकि तुलना करने के लिए भी इसके जैसा कोई होना चाहिए। इसीलिए बहुत से लोग स्वार्थवश संघ को बुरा भला कहते हैं। क्योंकि उनको संघ की असलियत पता नहीं है।

नागपुर से शुरू हुआ संघ विशाल वटवृक्ष का रूप धारण कर चुका है। इस वटवृक्ष की छांव में भारत की संस्कृति और परम्परा पुष्पित पल्लवित हो रही है। आज 50 से अधिक संगठन विविध क्षेत्रों में संघ से प्रेरणा लेकर कार्य कर रहे हैं। यह सभी संगठन स्वायत्त जरूर हैं लेकिन उनके पीछे संघ की शक्ति ही सक्रिय है। विविध क्षेत्रों में कार्य करने वाले संघ के आनुषांगिक संगठन विश्व के शीर्ष संगठनों में शुमार हैं चाहे किसान संघ हो, मजदूर संघ हो, विद्यार्थी परिषद हो, वनवासी बंधुओं के बीच कार्य करने वाला संगठन वनवासी कल्याण आश्रम हो, धर्म के क्षेत्र में सक्रिय विश्व हिन्दू परिषद हो या फिर राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय भारतीय जनता पार्टी। यह सब विश्व में चोटी के संगठन हैं। भाजपा की आज देश के कई राज्यों में सरकार है वहीं प्रधानमंत्री गृहमंत्री, राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति जैसे महत्वपूर्ण पदों पर संघ के स्वयंसेवक विराजमान हैं। इसलिए भी आज संघ के बारे में जानने को देश दुनिया में उत्सुकता बढ़ी है।

किसी भी संगठन के बारे में जानने से पहले उस संगठन को शुरू करने वाले व्यक्ति के बारे में जानना जरूरी होता है। इसलिए यदि संघ को जानना है तो डा. हेडगेवार के जीवन के बारे में जानना होगा। उनके जीवन को समझे बिना संघ को नहीं समझा जा सकता। डा. हेडगेवार क्रान्तिकारी थे। मेडिकल की पढ़ाई के दौरान कलकत्ता में उनका क्रान्तिकारियों से संपर्क हुआ। पढ़ाई पूरी कर जब वह वापस नागपुर आये तो कांग्रेस में सक्रिय हो गये। कठोर परिश्रम, मितव्यी व्यवहार के कारण शीघ्र ही वह कांग्रेस में प्रान्तीय स्तर के नेता बन गये। बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु के बाद कांग्रेस का नेतृत्व महात्मा गांधी के हाथ में आ चुका था। तिलक की मृत्यु के पहले ही कांग्रेस नरम दल और गरम दल में विभक्त हो चुकी थी। क्रान्तिकारी अंग्रेजों की नाक में दम किये थे। कांग्रेस में तुष्टीकरण की नीति हावी हो रही थी। मुस्लिम कांग्रेसी वंदेमातरम गाने से इन्कार कर रहे थे जबकि गांधी जी ने मुस्लिमों का विश्वास जीतने के लिए देश में खिलाफत आन्दोलन शुरू कर दिया जबकि खिलाफत आन्दोलन का भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति से कोई मतलब नहीं था। तुर्की के खलीफा को उसकी गद्दी से हटा देने के बाद भारत के मुसलमानों ने इस आन्दोलन को शुरू किया था। आन्दोलन असफल हो गया। क्योंकि तुर्की के मुसलमान स्वयं खलीफा नहीं चाहते थे। आन्दोलन असफल होने से हिन्दुस्थान में इसका उल्टा परिणाम हुआ। उन्होंने उल्टे हिन्दुओं पर हमले करने शुरू कर दिये। मोपला विद्रोह हुआ। मुस्लिमों ने 150 से अधिक हिन्दुओं की हत्या कर दी और 20 हजार से अधिक हिन्दुओं को मुसलमान बनाया। इन सब घटनाओं का डा. हेडगेवार ने बारीकी से अध्ययन किया। उस समय की परिस्थिति को देखकर यह लग रहा था कि भारत जल्द आजाद होने वाला है। लेकिन आजादी के बाद देश का भविष्य क्या होगा इस बारे में स्पष्ट कल्पना लोगों के दिमाग में नहीं थी।

डा.हेडगेवार ने सोचा आाजादी तो हमें मिल जायेगी लेकिन क्या गारंटी है कि भारत फिर से गुलाम नहीं होगा। उन्होंने भारत की गुलामी के कारणों का अध्ययन किया तो ध्यान में आया कि भारत धनधान्य से परिपूर्ण था, बड़े -बड़े शूरवीर योद्धा, उन्नत हथियार सारे संसाधन भारत में मौजूद थे। कमी एक चीज की थी कि स्वत्व का अभाव था। यहां का समाज आपस में जातियों में बंटा था। तब ध्यान में आया कि अगर हम एक नहीं हुए तो हम पिटते रहेंगे लुटते रहेंगे और गुलाम बनते रहेंगे। डा. हेडगेवार ने निश्चय किया कि हम एक ऐसा संगठन बनायेंगे जिससे जुड़े युवाओं के मन में राष्ट्रभक्ति की भावना, भारत की परम्परा और संस्कृति के प्रति अनुराग और गौरव का भाव होगा। इस महान कार्य के लिए उन्होंने बच्चों को चुना। प्रारम्भ में जब हेडगेवार छोटे-छोटे बच्चों को बुलाकर उनके साथ खेलते थे तब लोग कहते थे कि डाक्टर हेडगेवार पागल हो गया है। क्योंकि उस समय देश में गिने चुने डाक्टर थे। वह चाहते तो उनकी अच्छी प्रैक्टिस चल सकती थी और अच्छी सेवा में भी जा सकते थे। लेकिन उन्होंने भारत माता की सेवा का व्रत लिया। वह बच्चों के साथ खेलते उन्हें कहानियां सुनाते और उनसे भी सुनते। शाखा शुरू हुई। धीरे-धीरे कार्यपद्धति का विकास हुआ। दायित्व का नामकरण, आज्ञा, प्रार्थना और गुरूदक्षिणा शुरू हुई।

देशकाल परिस्थिति के अनुसार राष्ट्र रक्षा के स्वरूप और प्रक्रिया में बदल आता रहता है। कोई भी संगठन समय और परिस्थिति के अनुसार अगर बदल नहीं करता है तो उसकी स्वीकार्यतः समाप्त हो जाती है। ब्रह्म समाज और आर्य समाज कितना बड़ा संगठन था आज उनकी संपत्तियों को देखने वाला कोई नहीं है। कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना भी करीब उसी कालखण्ड में हुई थी आज समाप्ति की ओर है। इसलिए डा. हेडगेवार ने शाखा रूपी अनोखी कार्य पद्धति विकसित की। शाखा में नित्य जाना होता है। जबकि देश दुनिया के किसी संगठन में नित्य मिलन की कोई व्यवस्था नहीं है। कोई भी व्यक्ति नजदीक की संघ शाखा में जाकर संघ में सम्मिलित हो सकता है। उसके लिए कोई भी शुल्क या पंजीकरण की प्रक्रिया नहीं है।
महात्मा गांधी अपने जीवन काल में प्रसिद्धि के शिखर पर थे। लेकिन आज इनके मार्ग पर चलने वाले अनुयायी नाम मात्र के हैं। जबकि डा. हेडगेवार के दिखाये मार्ग पर चलने वालों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है। 1925 में स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ करीब 60 हजार शाखाओं के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन का अहर्निश कार्य कर रहा है। उपेक्षा, उपहास, विरोध सहते हुए तथा अनेक झंझावतों को पार करते हुए संघ कार्य आज निरंतर बढ़ रहा है।
आजादी के बाद संघ की बढ़ती शक्ति कांग्रेस को हजम नहीं हो रही थी। विभाजन के बाद संघ के स्वयंसेवकों ने जिस तरह कार्य किया उसकी सर्वत्र प्रशंसा हो रही थी। इसी दौरान देश के दुर्भाग्य से और कांग्रेस के सौभाग्य से महात्मा गांधी की हत्या हो गयी। 4 फरवरी 1948 को संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। संघ स्वयंसेवकों को यातनाएं दी गयी। स्वयंसेवकों के घरों को आग के हवाले किया गया। ऐसे कठिन समय में स्वयंसेवकों ने धैर्य का परिचय दिया। उस प्रतिबंध काल में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नाम से गतिविधियां शुरू की गयी। प्रतिबंध की अग्निपरीक्षा से संघ और तप कर निकला और कार्य विस्तार शुरू किया। उस समय संघ का पक्ष रखने वाला कोई दल नहीं था। आवश्यकता महसूस हुई कि कोई राजनीतिक दल होना चाहिए जो कम से कम हमारी आवाज संसद में उठाये। डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की स्थापना की। डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सहयोग मांगा तो गुरूजी ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय को जनसंघ में भेज दिया। राजनीति सब कुछ तो नहीं है लेकिन कुछ तो है। केवल सत्ता से मत करना परिवर्तन की आस यह गीत संघ में गाया जाता है। संघ सत्ता से अलग रहकर समाज परिवर्तन में विश्वास रखता है क्योंकि सत्ता द्वारा परिवर्तन स्थाई नहीं होता है। संघ राजनीति नहीं करता लेकिन राष्ट्रनीति जरूर करता है। वह राजनीति पर अंकुश जरूर रखता है। वहीं देशभर में डेढ़ लाख सेवा कार्यों के माध्यम से समाज में समरसता लाने का कार्य कर रहे हैं। सर्वविदित है कि अनुसूचित जाति जनजाति के बीच उत्थान का सर्वाधिक कार्य संघ ने किया। आज कश्मीर घाटी में भी हजारों सेवा कार्य चल रहे हैं। ताकि कश्मीरियों के जीवन व व्यवहार में परिवर्तन लाया जा सके। परम् वैभवन् नेतुमेतत् स्वराष्ट्रम। यानि संघ का उद्देश्य राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाना है। यह संघ के स्वयंसेवकों की 94 वर्षों की तपस्या का फल है कि आज संघ निरन्तर बढ़ता जा रहा है। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए समय के साथ परिवर्तन किसी भी जीवंत संगठन का लक्षण है। इन 90 वर्षों में केवल गणवेश ही नहीं, संघ की प्रार्थना, आज्ञाएं, घोष की रचनाएं, सेवा-संपर्क-प्रचार जैसे कार्य विभाग व सामाजिक समरसता,ग्राम विकास,कुटुम्ब प्रबोधन, पर्यावरण व जल संरक्षण जैसी अन्यान्य गतिविधियां शुरू की गयीं।

संघ कार्यपद्धति की यह अनोखी मिसाल है जो अन्य किसी संगठन में देखने को नहीं मिलेगी। संघ ने इस अवधि में डाॅ. हेडगेवार के बाद पांच सरसंघचालक देखे हैं। डा. हेडगेवार और गुरूजी ने जो परम्परा शुरू की उसी परम्परा के तहत संघ के सरसंघचालक तय होते हैं। संघ अब सर्वव्यापी के बाद सर्वस्पर्शी संगठन बन चुका है। आतंकी राष्ट्र पाकिस्तान भी संघ से खौफ खाता है। वहां के प्रधानमंत्री इमरान खान से संयुक्त राष्ट्र संघ की बैठक में एक बार नहीं 11 बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जिक्र किया। संघ अपने स्थापना काल से राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने के जिस उद्देश्य को लेकर आगे बढ़ा था आज 94 वर्ष की यात्रा के बाद भी लक्ष्य से भटका नहीं है।
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(लेखक प्रेरणा शोध संस्थान नोएडा से जुड़े हैं)