वासुदेव_कृष्ण : आशुतोष राणा की कलम से… {भाग_४}

स्तम्भ : कृष्ण, मेरी माँ पवनरेखा अनिंद्य सुंदरी थी, अपने पति उग्रसेन के प्रति पूर्णतः समर्पित। किंतु किसी भी स्त्री के लिए सम्बंध से अधिक महत्वपूर्ण सम्मान होता है, दुर्योग से कुछ ऐसा घटित हुआ कि माँ का महाराज उग्रसेन के साथ सम्बंध तो बचा रहा किंतु उसके सम्मान का हरण हो गया।
विवाह के बाद प्रत्येक बच्ची को अपने पितृगृह की याद बहुत सताती है, किंतु मेरी माँ उग्रसेन के प्रेम में ऐसी डूबी कि उसका सम्पूर्ण संसार सिमटकर महाराज उग्रसेन तक सीमित हो गया। और उग्रसेन भी माँ के सौंदर्य में ऐसे डूबे की शासन, प्रशासन, प्रजा, सभी कुछ भुला बैठे।


मेरी माँ पवनरेखा, मात्र रूपमती ही नहीं थीं वे बुद्धिमती भी थीं। वे जान रहीं थीं कि उग्रसेन की उनके प्रति आसक्ति मथुरा के सुप्रशासन में बाधक का कार्य करेगी। किसी सभापति का मात्र अपनी पत्नी के समीप बने रहना उसे प्रजा से काट सकता है। राजतंत्र में राजा का प्रजा से कटे रहना प्रजा को अपेक्षित भी होता है इसलिए वह उतना अकल्याणकारी नहीं होता।
किंतु लोकतंत्र में सभापति का प्रजा से कट जाना सभापति के साथ-साथ सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए विनाशकारी होता है।राजतंत्र में राजा की इच्छा ही राष्ट्र का धर्म होता है, किंतु लोकतंत्र में प्रजा की इच्छा ही नायक का धर्म होता है। राजतंत्र में राजा की सुरक्षा सर्वोपरी होती हैं किंतु लोकतंत्र में प्रजा की सुरक्षा प्रमुख होती है। मेरी माँ जानती थीं कि मथुरा में राजतंत्र नहीं लोकतांत्रिक व्यवस्था है, इसलिए उग्रसेन का प्रजा से कटकर अपनी पत्नी के अंक में डले रहना मथुरा के हित में नहीं होगा। मेरी माँ प्रीतिनिपुण होने के साथ-साथ नीतिनिपुण भी थीं, वे जानती थीं कि उग्रसेन का यह व्यवहार प्रजा के हृदय में उनकी छवि को धूमिल कर सकता है इसलिए उन्होंने स्वयं को गायन, वादन व विभिन्न ललितकलाओं को सीखने के लिए प्रेरित किया जिससे उग्रसेन उनकी उस साधना के समय में सभा के कार्यों की ओर अपना ध्यान लगाएँ।
किंतु इसका परिणाम माँ की अपेक्षा के प्रतिकूल हुआ, ललित कलाओं की साधना से माँ के सौंदर्य में अनुपम वृद्धि हो गई और वे शरदचंद्र की भाँति प्रकाशित होने लगीं जिसके वशिभूत होकर उग्रसेन उनकी ओर चातक की भाँति और अधिक तीव्रता से आसक्त हो गए।
मंत्रीपरिषद में उग्रसेन के इस व्यवहार को लेकर असंतोष उत्पन्न होने लगा, उग्रसेन की अकर्मण्यता का कारण मेरी माँ पवनरेखा को माना जाने लगा, राजसभा में ये चर्चा आम हो गई कि पवनरेखा की मोहिनी ने उग्रसेन की बुद्धि का हरण कर लिया है। लोग दबे छिपे स्वरों में माँ को जादूगरनी कहने लगे। प्रजा में इस बात की खुसफुसाहट भी होने लगी की पवनरेखा अपनी तंत्रविद्या के माध्यम से माथुरों का लोकतंत्र ध्वस्त करना चाहती है।
उग्रसेन के हृदय में मेरी माँ के प्रति अरुचि को उत्पन्न करने के लिए पवनरेखा के व्यक्तित्व को संदेहास्पद रूप प्रदान किया जाने लगा, उसे असुर विद्या में दक्ष यक्षणी तक कहा जाने लगा।
इस धूर्त समाज ने उग्रसेन के हृदय में पवनरेखा के उज्जवल चरित्र के प्रति शंका के बीज बो दिए थे। इसका परिणाम यह हुआ की उग्रसेन पहले से अधिक अनमनस्क रहने लगे।
उग्रसेन की बढ़ी हुई अनमनस्कता का कारण माथुरों की मंत्रीपरिषद ने पवनरेखा की राक्षसी विद्या के कुप्रभाव के रूप में प्रजा में प्रसारित कर दिया।
मेरी माँ तक ये सभी कुप्रचार पहुँच रहे थे। उसने विचार किया की कुछ समय के लिए उसे मथुरा के परिदृश्य से हट जाना चाहिए। उसने सोचा कि, मैं अपने पति के प्रति प्रेम के कारण विवाह के बाद से आज तक अपने पितृगृह नहीं गई हूँ, तो क्यों ना कुछ समय के लिए अपने पिता के पास रहा जाए ? उसके मथुरा में ना रहने से कदाचित उग्रसेन अपना सम्पूर्ण समय और श्रम प्रजा के हित के लिए व्यय करने लगेंगे ? इससे महाराज की ध्वस्त होती छवि की रक्षा भी हो जाएगी साथ ही मंत्रीपरिषद के रोष और प्रजा के असंतोष का निदान भी हो जाएगा।
उन्होंने एक दिन बहुत मनुहार के साथ अपने मनमीत उग्रसेन से कुछ समय के लिए अपने मायके जाने कि इच्छा व्यक्त की। उग्रसेन ने बहुत भारी मन से उनकी इच्छा का मान रखते हुए उन्हें मथुरा से विदा किया।
कंस ने अचानक एक अन्वेषक दृष्टि श्रीकृष्ण के ऊपर डाली और चुपचाप उन्हें देखता रहा।
वासुदेव को लगा कि कंस किसी ऐसे रहस्य को उनसे साझा करता चाहता है जो उसके हृदय के भीषण द्वन्द का कारण है। किंतु साझा करने से पहले वह कृष्ण को परखना चाहता है कि क्या कृष्ण में यह क्षमता है कि वे उसे निर्द्वंद कर सकें ?
कृष्ण ने अपने हृदय का सम्पूर्ण सम्मान अपने प्रतिपक्षी कंस की आँखों में उड़ेल दिया, श्रीकृष्ण सच्चे सम्मान के चमत्कारी प्रभाव से भलीभाँति परिचित थे, सम्मान एक ऐसा दिव्य भाव है जो अमित्र को भी मित्र बना देता है।


अपने लिए कृष्ण के हृदय में सम्मान देख कंस का शंकित मन नि:शंक हो गया। कृष्ण के और समीप आते हुए कंस बेहद धीमे स्वर में बोला- कृष्ण जो बात मैं बताना चाहता हूँ, उसे सुनकर तुम विश्वास नहीं करोगे क्योंकि मेरे जन्म को लेकर भ्रांतियाँ बहुत गहरी हैं।
कृष्ण बहुत शांति से कंस को देखते हुए बोले- जी मामा संसार आपको महाराज उग्रसेन का क्षेत्रज पुत्र कहता है।
कंस ने विषादपूर्ण मुस्कुराहट के साथ कहा- कृष्ण, कंस उग्रसेन का अपना पुत्र है या क्षेत्रज ? इस रहस्य को तो जीवनपर्यन्त मुझे जन्म देने वाली मेरी माँ भी नहीं समझ पायी। वो बेचारी तो बस इतना ही जानती थी की, वह जब मथुरा से अपने पिता के घर की ओर जा रही थी तो उसे ऐसा लग रहा था जैसे वो गर्भ से है, कोई नन्हा सा जीव उनके उदर में अपना अस्तित्व बना रहा है। अनुभूतियों को प्रमाण नहीं माना जाता इसलिए मथुरा से विदा लेते समय उसने इस आनंद को अपने पति से भी साझा नहीं किया था।
कृष्ण समझ रहे थे कि कंस स्वयं को क्षेत्रज कहे जाने से बुरी तरह पीड़ित है। किसी के वैध अस्तित्व को यदि अवैध सिद्ध किया जाए तो उसका विचलित होना स्वाभाविक है, कंस का क्रोध समाज में अपनी अवैधता को वैध सिद्ध करने या अपनी वैधता को समाज द्वारा अवैध घोषित किए जाने पर था। वैधावैध के इस द्वन्द ने ही, वंदन किए जाने योग्य कंस को समाज के क्रंदन का कारण बना दिया।
कंस ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा- श्याम, उग्रसेन के हृदय में अपनी पत्नी के लिए शंका के बीज ने स्थान बना लिया है इस बात को पवनरेखा समझ रहीं थीं, वे इस बात को भी जानती थीं कि व्यक्ति जब किसी के प्रति शंकालु हो जाता है तो उसके द्वारा कही गई प्रत्येक बात शंका को और घना कर देती है, इसलिए माँ ने अपने गर्भवती होने के आभास को उनसे साझा नहीं किया। माँ को लग रहा था की अपने पति से कुछ दिनों की दूरी सम्भवत: उनके बीच उत्पन्न हुई इस शंका को भी दूर कर देगी, इसलिए वो शीघरातिशीघ्र मथुरा छोड़ देना चाहती थी।
किंतु उसे क्या पता था कि जिस दुर्भाग्य से पीछा छुड़ाने के लिए वो अपने पति से दूर, अपने पिता के घर जा रही है वह #दुर्मिल के रूप में पिता के घर में ही उसकी प्रतीक्षा कर रहा है।~#आशुतोष_राणा

#क्रमशः••

वासुदेव_कृष्ण :आशुतोष राणा की कलम से स्तम्भ {भाग_५]