वासुदेव_कृष्ण : आशुतोष राणा की कलम से.. {भाग_१}

स्तम्भ: वे अपने महल के विशाल कक्ष में बेचैनी से चहल क़दमी कर रहे थे, मृत्यु के मुख पर खड़े होने के बाद भी जो अपनी बाँसुरी से जीवन का संगीत फूंकता रहा हो वे आज अपनी प्राण प्रिय बाँसुरी को जैसे विस्मृत ही कर गए थे। ये कैसा विषाद है कि अपने अधरों पर सदैव मुरली और मुस्कान को धारण करने वाले मुरलीमनोहर आज मुरली को भी हाथ लगाने से कतरा रहे थे ? अपने मन को शांत करने के लिए वे अपने कक्ष के उस गवाक्ष के सामने रुक गए जहाँ से क्षितिज तक फैला हुआ समुद्र दिखाई देता था। समुद्र के हाहाकार को सुनना उन्हें सर्वाधिक प्रिय था वह उनके हृदय में व्याप्त किसी भी क्लेश को पल भर में समाप्त कर देता था, किंतु उन्हें लगा कि जैसे आज उनके हृदय में उठने वाले हाहाकार की अपेक्षा समुद्र अप्रत्याशित रूप से शांत है, प्रयास करने के बाद भी उन्हें समुद्र का अनहद नाद सुनाई नहीं पड़ रहा था।
उन्हें सूचना मिल चुकी थी कि समूचे यादव वंश ने अपने ही हाथों अपने गौरवशाली वंश का नाश कर लिया है। किसी गौरवशाली वंश का इतना घृणास्पद अंत भी हो सकता है इसकी उन्हें कल्पना भी ना थी।


यादवों का मदनोत्सव उनके समूचे वंश के लिए मरोणत्सव हो जाएगा यह सोचा ना था। हरकारे ने सूचना दी थी की सभी मदिरा के प्रभाव से मदोन्मत्त होकर एक दूसरे पर टूट पड़े थे, जो कल तक एक दूसरे के सहारे थे, वे ही आज एक दूसरे के संहारक हो गए थे।
श्रीकृष्ण मानो स्वयं से बात करते हुए बोले- होनी को कौन टाल सकता है ? दुर्वासा का शाप था उसे फलित तो होना ही था।
अपने प्रत्येक अभियान में सफल होने वाले श्रीकृष्ण, आज अपने ही महल में निपट अकेले असफलता के इस दंश से ग्रसित होकर चक्कर लगा रहे थे। संसार को अपनी धुन पर नचाने वाला श्याम आज समय की ध्वनि से ध्वस्त हुआ जान पड़ता था।
अपने चक्र से संसार के सारे दुष्टों का अंत करने वाले चक्रपाणि समय के कुचक्र से आज अपने वंश को ना बचा पाए।
उन तक ये सूचना भी पहुँच चुकी थी कि बलराम ने स्वयं को जल में समा दिया था, और वे धरती को छोड़ चुके थे।
वासुदेव श्रीकृष्ण स्वयं को संयत करने का प्रयास कर रहे थे की तभी उन्हें  लगा कि जैसे कक्ष में कोई हँस रहा है ! उन्होंने घूम कर देखा तो कक्ष में कोई नहीं था, उस हँसी को अपना मानसिक विभ्रम समझकर वे गवाक्ष की ओर पलटे ही थे कि उन्हें अपना नाम सुनाई दिया- कृष्ण..!!


वे बेहद तीव्रता से पलट कर आवाज़ की दिशा में देखने लगे, किंतु कक्ष के उस कोने में मात्र गहरा अंधकार था।
सूर्य के अस्त होते ही जिस राजमहल का प्रत्येक कोना प्रकाश से जगमगा जाता था आज उसी राजमहल के सबसे महत्वपूर्ण कक्ष में अंधकार का साम्राज्य था। एक भी सेवक वहाँ नहीं था जो प्रकाश की व्यवस्था कर सके !!
श्रीकृष्ण को लगा कि कक्ष से अधिक घना अंधकार उनके हृदय में व्याप्त है, वे सोच में पड़ गए..यह कैसी विसंगती है, संसार को अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाने वाला कृष्ण आज स्वयं ही अवसाद से ग्रस्त होकर अंधकार में खड़ा है ?
यह असफलता से उत्पन्न होने वाले अवसाद का अहसास है या अवसाद से उत्पन्न होने वाली असफलता की अनुभूति ? पल भर में अचूक निर्णय लेने वाले कृष्ण आज स्वयं की मन:स्थिति को समझ पाने में प्रतिपल चूक रहे थे, की तभी उन्हें फिर वही स्वर सुनाई दिया- ये तुम कह रहे हो कृष्ण, की होनी को कौन टाल सकता है ?
जिसने दुर्वासा के कोप से पांडवों को बचा लिया हो, वह दुर्वासा के श्राप से अपने ही वंश की रक्षा ना कर सका ?
द्वारिकाधीश ने उस अंधकार में ध्यान से देखा तो वे अचम्भित रह गए !!
उनको सम्बोधित करते हुए स्वर उस राजमुकुट में से फूट रहे थे, जिसे उन्होंने अपने जीवन में पहली और आख़िरी बार तब धारण किया था जब सम्पूर्ण माथुरों ने सर्वसम्मति से निर्णय लेकर उन्हें अर्थात वासुदेव कृष्ण को द्वारिका का अधिपति घोषित कर उनका राज्याभिषेक कर दिया था।
सम्पूर्ण आर्यावर्त में जहाँ एक तरफ़ साम्राज्यवाद और राजतंत्र प्रणाली का प्रभुत्व था वहीं दूसरी तरफ़ यदुवंशियों ने अपने प्रभावक्षेत्र वाले भूखंड पर लोकतंत्र को स्थापित किया था। यादवों ने शासन चलाने के लिए एक सभा और सभापति की नियुक्ति कर उग्रसेन को अपना प्रमुख बना दिया था, किंतु यादवों के लोकतंत्र को ध्वस्त करके उसे राजतंत्र में बदलने का काम उग्रसेन के ही महाप्रतापी पुत्र कंस ने सम्पन्न कर दिया था।
ये वही राजमुकुट था जो कंस से पहले महाराज उग्रसेन और कंस के बाद श्रीकृष्ण के मस्तक पर रखा गया था।
कृष्ण को लगा राजमुकुट जैसे कंस में बदलता जा रहा है और अट्टहास करता हुआ साक्षात् उनके सामने खड़ा होकर पूछ रहा है- ये तुम हो ? जो होनी के ना टलने की बात कर रहे हो ? तुम तो संसार की नियति के नियंत्रक ही जन्मदाता भी हो।
कंस के स्वर में उपहास को श्रीकृष्ण स्पष्ट लक्षित कर रहे थे, किंतु उसे अनसुना करते हुए बोले- जी मामा जो घटित होना है उसे घटित होने से किसी भी विधि से रोका नहीं जा सकता।
श्रीकृष्ण के कथन को सुनकर कंस भयंकर अट्टहास करने लगा, कंस का भीषण हास्य श्रीकृष्ण को बेचैन कर रहा था। अपनी मुस्कान से संसार के चित्त को आलोड़ित, उद्वेलित, शांत और बेसुध करने वाले आनंद कंद, कंस के अट्टहास से स्वयं को संयत नहीं रख पा रहे थे।
श्रीकृष्ण की बेचैनी का आनंद लेते हुए कंस इस बार ठठाकर हँसते हुए बोला- लेकिन तुम तो होनी को टालने का दावा करते थे कृष्ण ? तुम तो लोगों के दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदल देते हो ? इन्हीं यादवों की रक्षा के लिए तो तुमने मेरा वध किया था ? फिर क्या हुआ जो आज विवश होकर इनके घृणित अंत को देख रहे हो ?
श्रीकृष्ण ने लगभग बुदबुदाते हुए कहा- वह दावा मैंने कभी नहीं किया मामा, ये घोषणा उन लोगों की थी जो मुझ पर विश्वास करते थे।
ये मेरा सामर्थ्य नहीं उनकी आस्था थी, जो अभी तक उनके उत्कर्ष, उनके रक्षण का कारण थी। सम्भवत: उनकी आस्था, उनके विश्वास का ह्रास ही उनके इस अशोभनीय अंत का कारण बना।
कंस ने लगभग डाँटते हुए कहा..।

~#आशुतोष_राणा

क्रमशः•••

वासुदेव_कृष्ण : आशुतोष राणा की कलम से..{भाग_२]