‘विश्पाद गुधौलिया’

आशुतोष राणा की कलम से…
उन्होंने अपने खेत पर अंगद का मंदिर बनाया हुआ था। ये पूरे संसार में एक मात्र मंदिर था जिसमें अंगद की पूजा होती थी। इसका कारण था, बचपन में देखी गई रामलीला में अंगद ने प्रभु श्रीराम का नाम लेके रावण की सभा में जो पैर जमाया था और चुनौती दी कि कोई भी मेरा पैर अगर तिल भर भी हिला देगा तो प्रभु श्रीराम हार मानकर वापस लौट जाएँगे। गाँव के सबसे बड़े पहलवान कुंदन काका जो रावण का रोल करते थे, वे भी अंगद बने हुए किस्सु कबाड़ी का पैर नहीं हिला पाए थे। इस बात ने विश्वपाद के बालमन को बेहद प्रभावित किया और वे अंगद की शक्ति के लपेटे में आ गए थे, उन्होंने छुटपन में ही गाँव के अखाड़े में जाकर अपने को तैयार करना शुरू कर दिया था। उनके दादाजी का नाम विश्वमोहन, पिता का नाम विश्वस्वरूप, चाचा का विश्वगोपाल, छोटे चाचा का विश्वविजय था- इस नाते सम्पूर्ण विश्व पर उनके गुधौलिया परिवार का एकछत्र राज था। विश्व में कुछ और बचा नहीं था तो पूरे परिवार ने आम सहमति से अपनी अगली पीढ़ी के इस प्रथम चिराग का नाम विश्वपाद रख दिया था, जिसका अर्थ होता है- विश्व के चरण या ऐसे चरण जिनकी विश्व भर में प्रतिष्ठा है।
सो वे अपने आराध्य देव अंगद से प्रेरित हो प्रतिदिन अखाड़े में अपने पैरों को यथा नाम तथा गुण देने में जुट गए। किंतु जैसी की परम्परा होती है, ग्रामीण अंचल में शास्त्रीयता को लोग सरल करके स्वीकारने में विश्वास करते हैं तो वही इनके शास्त्रीय गरिमा से पूर्ण नाम विश्वपाद के साथ हुआ। लोग इन्हें विश्वपाद की जगह सुविधानुसार- विश्पाद या बिस्पाद कहकर बुलाने लगे। माना जाता है कि नाम का प्रभाव मनुष्य की प्रकृति पर पड़ता है, यह सत्य है या नहीं यह विवादास्पद है, किंतु विश्पाद के ऊपर ये फार्मूला एकदम सही साबित हुआ। पहलवानी के चक्कर में ताकत बढ़ाने के लिए अपनी पाचन शक्ति की औकात से ज्यादा किस्म-किस्म के पिस्ता, बादाम, अखरोट, दूध, दही, केला, छाँछ, लस्सी के निरंतर सेवन से उनके पेट का सिस्टम गड़बड़ा गया जिसके परिणामस्वरूप हर दस-पंद्रह मिनिट में विश्पाद से ऑटोमैटिक गैस रिसती रहती, इनके पेट से बिना आवाज किए छूटने वाली इस ‘अपानवायु’ में विलक्षण मारक क्षमता थी। यह मरे हुए चूहे, सड़े हुए अंडे या किसी बड़े शहर के कभी ना साफ होने वाले गंधाते हुए नाले की दुर्गन्ध से भी अधिक भीषण और अत्याचारी थी। जब विश्वपाद अपनी ताल ठोककर अखाड़े में उतरते तब उनका यह वायवास्त्र अखाड़े में इनसे गुँथे हुए पहलवान के लिए प्राण घातक होता था, जिससे विचलित होकर विरोधी पहलवान दम घुट के मरने से बेहतर चित्त होकर हारना पसंद करता, अपनी प्रतिष्ठा से अधिक उसे अपने प्राणों की परवाह हो जाती। उस समय यदि विश्पाद उसकी पकड़ में भी होते, वो उनको चित्त करके जीतने की कगार पर भी होता और तब विश्वपाद हार से बचने के लिए उसकी पकड़ से छूटने के प्रयास में अपने शरीर को आड़ा तिरछा करते, ठीक उसी समय उनका यह वायुअस्त्र जो खुद मुखतार की श्रेणी में आता था, जिसपर इनका कोई कंट्रोल नहीं था, बिना इनकी मर्जी के चुपचाप छूटकर विश्पाद के लिए संकटमोचक का काम करता, विष से भी अधिक घातक वायु के चेंबर के बिलकुल समीप होने कारण वह विरोधी पहलवान जो अभी तक इन पर हावी था इनसे छूटने के लिए फड़फड़ाने लगता, लेकिन बिस्पाद जोंक के जैसे उससे चिपक जाते, जिससे अपनी जान बचाने के लिए वो विरोधी पहलवान स्वयं ही चित्त हो जाता, अपनी पीठ पर मिट्टी लगा लेता और खुद ही विश्वपाद की जीत की घोषणा कर अखाड़े के बाहर भाग खड़ा होता।
लोग आश्चर्य से विश्वपाद के इस कौशल की दाद देते, कुश्ती के बड़े-बड़े महारथियों को भी विश्वपाद का ये अनोखा दाँव समझ में ना आता, वे चमत्कृत हो जाते कि पता नहीं ये कौनसी विद्या है बिस्पाद के पास? जो अभी तक बिस्पाद की छाती पर चढ़ा हुआ पहलवान खुद ही उनको अपने ऊपर लेके चित्त हो जाता है और अखाड़े से भाग खड़ा होता है? इस हवाबाण दाँव के कारण पहलवानी की दुनिया में उनका नाम बन गया, वे अजेय पहलवान हो गए थे। लोग उनसे जोड़ लिखाने से डरते परिणामस्वरूप कभी-कभी वे बिना लड़े ही विजेता घोषित कर दिए जाते। कुश्ती फेडरेशन में इस बात की शिकायत भी नहीं की जा सकती थी, क्योंकि उनका ये पाद-प्रहार जिसका प्रमाण पेश कर पाना असम्भव था, कुश्ती के नियमों के मुताबिक ये अवैध, अनैतिक, धोखा या छल की श्रेणी में नहीं आता था और हवा कोई पुख्ता सबूत नहीं होता और सबसे बड़ी बात इस पादप्रहार का उस हारे हुए पहलवान के अलावा कोई और गवाह भी नहीं होता था, क्योंकि मामला पूरा साउंडलेस था। शिकायत करने पर इसे पहलवान के द्वेष, उसकी अक्षमता की श्रेणी में रखा जाता जो अपनी हार से बौखला कर अनर्गल प्रलाप कर रहा है। रेफरी भी बदबू सूंघता था किंतु इसका लाभ बिस्पाद को ही मिलता, वो कहता कि बिस्पाद ने अपने उठा पटक दऊँ-तरै गुलक दऊँ दाँव से अपने विरोधी पहलवान को पदा दिया।
उन दिनों पहलवानी में सुहागपुर, इटारसी, बनारस, जबलपुर, बुरहानपुर एक बड़ा नाम हुआ करता था। यहाँ के पहलवानों से जोड़ लिखाते हुए अन्य मल्लों के पैर कांपते थे। विश्पाद के कारण हमारे गाँव के अखाड़े की कुश्ती की दुनिया में धाक सी जम गयी थी, इसलिए दूर-दूर के प्रसिद्घ मल्ल भी हमारे गाँव में ताल ठोकने के लिए बेताब रहते थे। इन पहलवानों को जिनके लंगोट को आजतक कोई पहलवान हाथ भी नहीं लगा पाया था, विश्पाद के इस दम घोंटू हुनर का इल्म ही नहीं था। सो वे अति उत्साह से नागपंचमी, दिवाली, दशहरा पर हमारे यहाँ होने वाले बड़े दंगल में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते और बिस्पाद को चित्त करने की हसरत लिए उनके खिलाफ जोड़ लिखवा लेते, किंतु इनमें से हर एक का वही हश्र होता, बिस्पाद से लिपटते ही ये बाहुबली जल बिन मछली के जैसे फड़फड़ाने लगते। मनुष्य बिना भोजन के तीस दिन जिंदा रह सकता है किंतु बिना साँस लिए तीन मिनिट में उसके प्राण निकल सकते हैं। साँस को रोकना व साँस का अवरुद्घ हो जाना दो अलग बातें होती हैं। बिस्पाद से लड़ी जाने वाली कुश्ती साँस रोकने की यौगिक क्रिया के अंतर्गत नहीं बल्कि साँस के बलात अवरूद्घ किए जाने की श्रेणी में आती थी। बिस्पाद के दमघोंटू आलिंगन में फँसे हुए ये वीर, बलिष्ठ, बाहुबली, भीम पुरुष उस समय संसार के सबसे निरीह और असहाय प्राणी प्रतीत होते। अभी तक अजेय रहने वाले ये मल्ल हमारे गाँव की हवा से परास्त हो जाते और उन्हें मजबूरन संन्यास लेना पड़ता। विश्वपाद पहलवानी में तो बढ़ रहे थे किंतु पढ़ाई में पिछड़ रहे थे। ऐसा नहीं था कि वे ठस्स बुद्घि थे, वे निम्न औसत बुद्घि के विद्यार्थी थे किंतु गैस के अभिशाप के कारण क्लास रूम उनको रिष्यमूक पर्वत के जैसा लगता था जहाँ पर अंगद के पिता वानरराज बाली क्षमता होने के बाद भी जान के भय से नहीं जाते थे। ऋषियों ने बाली को शाप दिया कि खबरदार अगर रिष्यमूक पर्वत पर आया तो जान से हाथ धो बैठेगा, विश्वपाद को क्लास रूम में जान का नहीं, अपने मान का खतरा था। क्योंकि जिस ठुसकी की ठसक ने उन्हें अजेय पहलवान बना दिया था वही उनकी कुख्याति का कारण होती और तमाम बाहुबल होने के बाद भी उन्हें अपने ऋषि रूपी क्लास्मेट्स की हिकघरत व धिक्कार से उपजे रौरव नरक की यातना से गुजरना पड़ता। इसलिए वे स्कूल को रिष्यमूक पर्वत मानकर उससे दूर-दूर ही रहते। जैसे-तैसे बिस्पाद स्कूल से पास होकर कॉलेज में बीए के मार्ग से होते हुए एलएलबी हो गए।
पहलवानी और पढ़ाई की इस प्रक्रिया के बीच गुपचुप उन्होंने डॉक्टर्स से इस ‘निराकार बेआवाज मानभंजनी’ का उपचार कराना चाहा था, किंतु परीक्षण के दौरान ही उसके रिसाव से डॉक्टर बेहाल हो कमरा छोड़कर भाग जाते और आइन्दा यहाँ ना आने की चेतावनी देकर उन्हें भगा देते। एक-एक कर इलाके भर के डॉक्टरों ने उनके लिए अपने दवाखाने के दरवाजे बंद कर दिए। डॉक्टरों के रवैए से नाखुश होकर उन्होंने एलोपैथी छोड़, जड़ी बूटी वालों को पकड़ लिया जिससे उनकी समस्या खत्म होने की जगह और बिफर गई। अभी तक वे दस बाई दस के एरिया को ही कवर करते थे, किंतु जड़ी बूटियों के सेवन से उसका घनत्व और अधिक बढ़ गया अब वे बीस बाई बीस के ओपन-क्लोज एरिया को प्रभावित करने लगे। अपनी ही हवा को अपने ही विरुद्घ वातावरण बनाता देख विश्वपाद ने इसका तोड़ निकाला और भीड़-भाड़ में घुसना शुरु कर दिया। क्योंकि भीड़ में पकड़े जाने की सम्भावना ना के बराबर होती है। क्योंकि भीड़ पर किसी भी कृत्य की सामूहिक जिम्मेदारी नहीं होती है, सब एक-दूसरे को शक की निगाह से देखते हैं, कोई किसी पर स्पष्ट आरोप नहीं लगा पता, इसमें कोई एक व्यक्ति अपराधी नहीं ठहराया जाता, शक की बिना पर मूल अपराधी दोषी होते हुए भी, दोष मुक्त हो निर्दोष जीवन जीता रहता है। साथ ही उन्होंने आजीवन विवाह ना करने की प्रतिज्ञा भी कर ली। क्योंकि जिस वायु के साथ वे इतने सालों से रह रहे थे उसके कोप से वे भलीभाँति परिचित थे, कि जब इस दुष्टा ने इतने बड़े-बड़े पहलवानों को उनके साथ नहीं टिकने दिया तो फिर उस बेचारी पत्नी की क्या बिसात? शादी की पहली रात ही ये ‘प्रतिष्ठाखोर फुस्की’ बिना कोई शोर शराबे के अपने प्रकोप से उस मासूम लड़की को थू-थू करते हुए घर से भागने पर मजबूर कर देगी। इसलिए बदनामी से बेहतर है ब्रह्मचर्य, सो वे ब्रह्मचारी हो गए। उनके ब्रह्मचर्य की घोषणा से घर में हड़कंप मच गया। क्योंकि गुधौलिया वंश को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उनके मजबूत कंधों पर थी, वे मात्र अपराजित पहलवान ही नहीं एक सफल वकील की ख्याति को भी प्राप्त कर चुके थे।
प्रदेश ही नहीं देश भर की अन्य अदालतों में भी लोग उनको जमानतवीर के नाम से जानते थे। कितना ही संगीन अपराध क्यों ना हो, अपराधी को कहीं भी जमानत ना मिल रही हो, वो चारों तरफ से निराश हो चुका हो- तब वो बिस्पाद के पास आता और विश्वपाद उसको जमानत दिलवाकर ही दम लेते। वे सेशन कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक उन जजों की बेंच पर अपना केस पुटअप करते जिनकी अदालत खचाखच भरी होती थी। उनके घुसते ही अदालतों का विषादपूर्ण वातावरण विषाक्त हो जाता। अक्सर जजों के सामने वकील बेचैन होते हैं लेकिन विश्वपाद की उपस्थिति में जज बेचैनी से फड़फड़ाने लगते, उन्हें वॉमिटिंग सेन्सेशन जैसा होने लगता, स्टैनो से लेकर चोबदार तक ना चाहते हुए भी अदालत की अवमानना कर बैठते, वे अपना काम बीच में छोड़ अपनी जगह से उठ खड़े होते, अदालत की गम्भीरता को ताक पे रख नाक पर रूमाल रख लेते या नाक के सामने दोनों हाथ जोर-जोर से लहराते हुए पंखा झलने लगते, जिससे उनपर कभी-कभी कंटेम्प्ट भी लग जाता। एक और आश्चर्य जो देखने को मिलता वो ये कि अदालत के कमरे में जज के आने पर पूरी अदालत के खड़े हो जाने की परम्परा है, किंतु विश्वपाद के कमरे में घुसते ही जज साहब यकायक अपनी कुर्सी से खड़े हो जाते, उनकी शक्ल देख के लगता कि जैसे उन्हें खुद भी नहीं पता कि वे किस अदृश्य शक्ति के कारण ना चाहते हुए भी यंत्रचलित से उठ खड़े हुए, ऐसा वे कोई एक बार नहीं जब तक विश्वपाद उनसे जमानत के लिए जिरह करते रहते तब तक बार-बार वे कुर्सी से खड़े हो जाते, फिर बैठ जाते, ऐसा लगता कि वे कोर्ट से भाग जाना चाहते हैं लेकिन कहीं खुद पर कंटेम्प्ट ना लगाना पड़ जाए इसलिए बैठ जाते। विश्वपाद द्वारा उत्सर्जित वह ‘नि:शब्द बदबू बम’ भगवान की लाठी के जैसा था- जो दिखाई नहीं देती लेकिन व्यक्ति उसकी चोट से कराहता रहता है। व्यक्ति की भले ही कोई मर्यादा ना हो- लेकिन पद की अपनी एक मर्यादा होती है, जिसकी रक्षा करना व्यक्ति का प्रमुख धर्म होता है, सो साहब वीरोचित भाव से उन हवाई हमलों को अपनी क्षमता भर बर्दाश्त करते। शरीर और आत्मा एक दूसरे से बेइंतहाँ मोहब्बत करते हैं, लेकिन विश्वपाद की यह ‘कुलटा कुलक्षणी कुवास’ शरीर को आत्मा से और आत्मा को शरीर से मुक्त हो जाने के लिए तीव्रता से प्रेरित करती और विश्वपाद इस पूरी स्थिति से अनभिज्ञ स्थितप्रज्ञ भाव से अपने मुवक्किल को जमानत दिए जाने के लिए जिरह करते रहते। साहब के पास इस भीषण गैस त्रासदी से बचने का एक मात्र उपाय बचता था कि विश्वपाद की जमानत याचिका को तत्काल प्रभाव से मंजूर कर विश्वपाद को अदालत से फौरन रुखसत करना। अदालत में हथियार ले जाना, ऊँची आवाज में बात करना, शोर शराबा करना ये सब अदालत की गरिमा को खंडित कर कंटेम्प्ट के दंड के अंतर्गत आता था।
लेकिन विश्वपाद इनमें से किसी भी कैटेगरी के अंतर्गत नहीं आते थे, क्योंकि उनसे छूटने वाली असहनीय बदबू- बेआवाज हुआ करती थी। अदालत में शक की बिना पर अपराधी छोड़ दिया जाता है, सो विश्वपाद को अदालत के इस नियम का भरपूर लाभ मिलता। कानून की आँख पर पट्टी बंधी होती है, वो देखकर नहीं, सुनकर न्याय करता है- और विश्वपाद का यह ‘गैरइरादतन कृत्य’ सुनने की नहीं सूँघने की श्रेणी में आता था। वे प्रत्यक्षत: ऐसा कोई काम ही नहीं करते थे जो अदालत की अवमानना के अंतर्गत आता हो, हाँ, ये अपराध नहीं रोग की श्रेणी में अवश्य आ सकता था, लेकिन रोगी होना कोई अपराध नहीं होता !! और फिर अदालत के पास इनके इस ‘विवेकहन्ता रोग’ का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण भी नहीं था, जिसका हवाला देकर उनका लाइसेन्स रद्द किया जा सके। विश्वपाद की उपस्थिति में वहाँ बैठे हुए हर व्यक्ति के दिल में यह तमन्ना पैदा होती कि जैसे कानून की आँख पर पट्टी बंधी है, काश वैसी ही पट्टी कानून की नाक पर भी बंधी होती तो अधिक सटीक न्याय हो पता। क्योंकि गंध में विवेक को विचलित करने की अपार क्षमता होती है। गंध से ही व्यक्ति प्रभावित और अप्रभावित होता है। गंध व्यक्ति के विवेक का हरण कर लेती है। इसी सिद्घांत पर दुनिया भर में इत्र का, पफर््यूम का, डीओडरंट का और उससे जुड़ी विज्ञापन फिल्मों का अरबों-खरबों का व्यापार चल रहा है। भोजन की गंध ही भूख को बढ़ाने और पचाने वाले एंजायम्ज शरीर में छोड़ती है। सो कानून की सिर्फ आँख बंद करने से काम नहीं चलेगा, उसकी नाक भी बंद करनी आवश्यक है, जिससे विवेक भ्रमित ना हो। क्योंकि विवेक सुन के भले ही प्रभावित ना हो, किंतु सूंघ के निश्चित ही प्रभावित होता है। जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण विश्वपाद जैसे साधारण से वकील का असाधारण जमानतवीर वकील के रूप में प्रतिष्ठित होना है। संसार में लोगों के व्यक्तित्व की खुशबू फैलती है, किंतु ऐडवोकेट विश्वपाद गुधौलिया के व्यक्तित्व की बदबू ने चंहुँओर हड़कम्प मचा दिया था। वे दस बार शरीर के ऊध्र्व भाग से प्राणवायु इन्हेल करते और एक बार अधोभाग से प्राणघातक वायु का निष्क्रमण करते। पता नहीं परमात्मा की कौन सी कारीगरी के तहत उनके द्वारा इन्हेल की गई अक्सीजन- सल्फ्युरिक एसिड ( गंधकाम्ल ) की गंध में कन्वर्ट होकर अपानवायु के रूप में निकलकर विध्वंस मचा देती? सभी कानूनविदों ने सलाह की- कि एक वकील के रूप में विश्वपाद देश की प्रत्येक अदालत का वातावरण दूषित कर रहा है, जिसे कानूनन हम रोक नहीं सकते। तो क्यों ना इसे एलेवेट करके जज बना दिया जाए? जिससे इसका कार्यक्षेत्र सीमित हो जाएगा जिससे देश की अन्य अदालतें व न्यायाधीश विश्वपाद की उपस्थिति से होने वाले दुष्प्रभाव से बच जाएँगे। विश्वपाद को एलेवेट करके हम न्याय को प्रोटेक्ट कर लेंगे। सो विश्वपाद को उठाने के नाम पे उन्हे जज बनाकर एक जगह बिठा दिया गया। इस महानतम उपलब्धि से पूरे गुधौलिया परिवार में हर्ष की लहर दौड़ गयी, उनके दादाजी, पिताजी से लेकर दोनों चाचा उनके ऊपर विवाह कर लेने का दबाव बनाने लगे, उनके ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा पर चोट ना आए इसलिए उनके दादाजी ने उन्हें तर्क देते हुए कहा प्रिय पाद, तुम्हारा यह विवाह वासना पूर्ति का नहीं वंश वृद्घि हेतु है। पुत्र- वंश की रक्षा, वंश की वृद्घि करना तुम्हारा कर्तव्य है। क्योंकि ‘पु’ नाम के नरक से पितरों को तारने का काम पुत्र ही करता है, यह पितृ ऋण है इससे ऋण होना परम आवश्यक है। विश्वपाद ने जवाब दिया यदि वंश वृद्घि ही आपका हेतु है दादाजी तो जिस ब्रह्मचर्य व्रत का मैं पूरी निष्ठा के साथ पालन कर रहा हूँ उसमें बहुत शक्ति होती है। मैं ब्रह्मचर्य को खंडित किए बिना भी वंश की वृद्घि कर सकता हूँ। इसके लिए विवाह करने की आवश्यकता ही नहीं है। ब्रह्मचारी के पसीने और उसके आँसुओं में संतान पैदा करने की शक्ति होती है। पुराणों में इसके प्रमाण हैं, हम सभी जानते हैं कि हनुमान जी के पसीने की बूँद को एक मछली ने पी लिया था जिससे मकरध्वज का जन्म हुआ। मोर ब्रह्मचारी होता है मोरनी उसके आँसुओं को पी लेती है जिसके परिणाम स्वरूप मोर का जन्म होता है। मोर की पूरी प्रजाति ही ब्रह्मचारी मोर के आँसुओं से उत्पन्न होती है। इसलिए धैर्य धारण कीजिए आपका यह विश्वपाद ब्रह्मचारी है इसे गुधौलियों को पैदा करने के लिए विवाह करने की नहीं व्यायाम करने की जरूरत है ताकि पसीना निकल सके, वंश बढ़ाने के लिए मुझे विवाह नहीं समाज की वेदना को स्वीकार करना होगा ताकि मेरे आँसू निकल सकें।
दादाजी उनकी बात सुनके चौंक गए और बोले बेटा विश्वपाद तुम आस्था के बहाव में आकर पूर्णत: अवैज्ञानिक बात कर रहे हो, तुम जैसे कानूनविद को यह अतार्किक बात शोभा नहीं देती। विश्वपाद न्यायाधीश के जैसे स्वर में बोले दादाजी अपना ये अंग्रेजीपना छोड़िए जो तर्क, विज्ञान की बात करता है। हमारी संस्कृति आस्था-अनासक्ति को प्रधानता देती है और आस्था में तर्क का कोई स्थान नहीं होता। मैं आपके परिवार का जरूर हूँ लेकिन मेरे ऊपर सिर्फ अपने वंश के रक्षण की ही जिम्मेदारी नहीं है, मुझे समाज को क्षरण से बचाना है। सच बात तो ये है कि आप जैसे पहले वाले लोगों ने ही हमारी संस्कृति का सत्यानाश किया है, आपके यही वन मोर, हैव मोर, वन्स मोर, के चक्कर में पड़ के हम लोग आसक्ति प्रधान हो गए, और अपने हिंदी वाले मोर को, जो अनासक्ति का प्रतीक है उसको भूल गए। आप जैसे लोभी आसक्ति पूर्ण पुरखों के कारण ही हमारी पीढ़ी ये दिल माँगे मोर के मंत्र का जाप करने लगी। आसक्ति अशांति का कारण होती है, हमारी वर्तमान अशांति का कारण आप लोगों की यही आसक्ति है। इसलिए नो मोर डिस्कशन। दिस इज माई फाइनल डिसिजन आई विल नट मैरी। रही बात वंश वृद्घि की, जिससे गुधौलिया वंश चल सके? सो फर देट़.आई विल डोनेट माई टीअर्स़.और ऑर्डर-ऑर्डर कहके वे वहाँ से चले गए। दादाजी बेहद अनुभवी आदमी थे, वे समझ गए थे की विश्वपाद डिफेक्टफुल होते हुए भी अपने आपको एफेक्टफुल सिद्घ करना चाहता है। अपनी पाद के लिए पुरखों को दोषी ठहरा रहा है। अपनी विति को जस्टिफाई करने के लिए, संस्कृति का हवाला दे रहा है। हवा खराब करने के बाद भी ये उस हवा को दूषित करने का दोष दूसरों पर डालना चाहता है। दादाजी को क्रोध आ गया और उन्होंने ललकार कर कहा। अपनी औकात से ज्यादा खाने वाले बदहजमी के शिकार, अन्न को पचाने में असमर्थ अपची, पवित्र पद पर पदासीन पदोड़े, पाद की दम पे पहलवानी के शिखर पर पहुँचने वाले बिस्पाद, कान खोलकर सुनले मैं गुधौलिया वंश का पितामह तुझे शाप देता हूँ कि आज से तुझे ना पसीना निकलेगा और ना ही आँसू। और गांधारी के श्राप के जैसा ही, दादाजी का श्राप भी सत्य हुआ। बिस्पाद के साहब बन जाने के कारण वे एसी कार से निकलकर एसी दफ्तर में पहुँचते हैं, जिससे उन्हें पसीना नहीं निकलता। अब उन्हें आँसू भी नहीं निकलते क्योंकि उनपर समाज को न्याय देने की जिम्मेदारी है- न्याय वेदना पर नहीं विवेक पर आधारित होता है, और आँसू तो वेदना की उत्पत्ति होते हैं, विवेक की नहीं। लोग कहते हैं- व्यक्ति का विवेक जागता ही तब है, जब उसकी वेदना मर जाती है। इति वायवास्त्र कथा समाप्तम।