संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा महिमा का संरक्षण संवर्द्धन ही डॉ. आम्बेडकर को सच्ची श्रद्धांजलि : हृदयनारायण दीक्षित

- in स्तम्भ

इतिहास प्रायः अपनी राह चलता है लेकिन विचार और संकल्प से समृद्ध महानुभाव इतिहास की गति में हस्तक्षेप भी करते हैं। वे इतिहास की धारा को बदलते हैं। समाज उन्हें अपनी श्रुति स्मृति का भाग बनाता है। वे अपने जीवन भर समय से टकराते हैं। लेकिन कुछेक विरल लोग न रहने पर भी जीवित रहने जैसी हैसियत से प्रभावी रहते हैं। वे मरकर भी सामाजिक परिवर्तन के कालरथ को सही दिशा में ले जाने जैसा प्रभाव डालते रहते हैं। डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर आधुनिक भारतीय इतिहास के ऐसे ही विरल नक्षत्र हैं। उन्हें ‘थे’ कहने या लिखने में मुझे हमेशा संकोच हुआ है। वे अर्थशास्त्र, इतिहास सहित तमाम सामाजिक विज्ञानों के विद्वान थे। उन्होंने भारतीय समाज की जड़ता का गहन अध्ययन किया था। वे भारत और दुनिया के प्राचीनतम शब्द साक्ष्य ऋग्वेद के भी गहन जानकार थे। ऋग्वेद के तमाम उद्धरणों से उन्होंने ‘आर्य आक्रमण’ के सिद्धांत को गलत बताया था। भारतीय समाज में अछूतपन की समस्या का भी उन्होंने गहन विवेचन किया। दि ‘अनटचेबुल्स’ उनकी महत्वपूर्ण किताब है। उन्होंने अस्पर्शयता की शुरुआत का लगभग ईसा के सवा सौ पूर्व अनुमान किया। भारतीय जाति व्यवस्था पर उन्होंने कोलम्बिया विश्वविद्यालय में शोधपरक भाषण दिया था। वे प्रमुख संविधान शिल्पी थे। भारतीय राष्ट्र राज्य ने उन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया।

उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक लम्बे समय तक सांसद व केन्द्रीय मंत्री रहे हैं। वे बाबा साहब अम्बेडकर के व्यक्तित्व, दर्शन व राष्ट्र सर्वोपरि की विचारधारा से भी जुड़े रहे हैं। उन्होंने सांसद के रूप में 28 दिसम्बर 1989 के लोकसभा सत्र में तद्विषयक अतारांकित प्रश्न पूछा था “क्या सरकार ने वर्ष 1990 में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की जन्म शताब्दी के अवसर पर कोई विशेष डाक टिकट जारी करने का निर्णय लिया है। डॉ. बी.आर. अम्बेडकर के सम्मान में 15 पैसे और 20 पैसे मूल्य वाले दो डाक टिकट क्रमशः 14/4/1966 और 14/4/1973 को जारी किए जा चुके हैं। फिलहाल कोई अन्य डाक टिकट जारी करने का प्रस्ताव नहीं है। सरकार के इस जवाब के बाद नाईक ने प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को पत्र लिखा और मुलाकात कर मांग की। उनका निवेदन था कि जिस प्रकार लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी एवं पं. जवाहर लाल नेहरू की जन्मशताब्दी मनायी गयी उसी प्रकार डॉ. अम्बेडकर की जन्मशताब्दी मनायी जानी चाहिए। फिर राजनैतिक कारणों से 10 नवम्बर, 1990 को विश्वनाथ प्रताप सिंह ने त्याग पत्र दिया और चन्द्रशेखर प्रधानमंत्री बने। श्री राम नाईक ने उनसे भी इस सम्बन्ध में बात की। रामनाईक ने बताया कि परिणमतः भारत सरकार की ओर से डॉ. अम्बेडकर की जन्मशताब्दी के अवसर पर डाक टिकट 1991 में जारी हुआ। उस टिकट पर डॉ. अम्बेडकर का नाम हिन्दी में ‘डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर’ और अंग्रेजी में ‘Dr. B.R. Ambedkar’ लिखा है।
नाईक सार्वजनिक जीवन के तमाम पहलुओं पर निरंतर शोधरत रहते हैं। इस दफा वे बाबा साहब के असली नाम को लेकर सक्रिय हुए। विश्वविख्यात अंग्रेजी लेखक शेक्सपियर ने कहा था कि “नाम में क्या धरा है?” नाम समाज में हरेक व्यक्ति की पहचान मात्र होते हैं। लेकिन भारतीय संदर्भ में यह बात वैसी ही नहीं है। तुलसीदास ने राम के नाम को राम से भी बड़ा बताया है। रामचरित मानस बालकाण्ड में कहते हैं “कहऊं नाम बड़ राम तें, निज विचार अनुसार।” बताते हैं, “ब्रह्म राम तें नामु बड़/वरदायक वर दानि।” पहले कहते हैं कि राम का नाम राम से भी श्रेष्ठ है फिर कहते हैं कि नाम ब्रह्म से भी बड़ा वरदायक। राम नाईक के नाम में भी राम है। वे रामप्रिय हैं इन्हीं नाईक ने खोज निकाला कि बाबा साहब आम्बेडकर के नाम में भी राम है। वैसे एक अंग्रेजी के भारतीय पत्रकार ने देश के 60 से 70 प्रतिशत नामों में राम का उपयोग बताया था। रामनाईक की प्रकृति मजेदार है। वे पढ़ते हैं, जांचते हैं। सूक्ष्म निरीक्षण करते हैं। सुनते हैं। गुनते हैं फिर अपने अभियान पर चल निकलते हैं। उन्होंने बाबा साहब का सही नाम लिखे जाने के लिए राष्ट्रपति को पत्र लिखा। प्रधानमंत्री, केन्द्रीय गृहमंत्री व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती को भी पत्र लिखे। नाईक ने ‘भीम और राव’ को अलग-अलग लिखा जाना अनुचित बताया। दोनों को मिलाकर ‘भीमराव’ को उचित बताया। अम्बेडकर के स्थान पर उन्होंने आम्बेडकर को सही बताया। उनके सुझाव पर मुख्यमंत्री योगी सरकार डॉ. आम्बेडकर के संशोधित नाम वाला आगरा विश्वविद्यालय विधेयक लाई। सभी दलों ने सर्वसम्मति से पारित किया। नाम को लेकर यू.पी. सरकार ने शासनादेश भी जारी किया। शासनादेश में उनके चित्र सभी कार्यालयों में लगाने के भी निर्देश हैं।
नाईक के अभियान की प्रशंसा की जानी चाहिए। हम भारत के लोग डॉ. भीमराव रामजी आम्बेडकर को महापुरूष जानते हैं। लेकिन उनका सही नाम भी नहीं जानते। सामान्तया नाम और रूप परिचय का आधार हैं। अपने तप, श्रम से इतिहास में आदरणीय होने वाले महानुभाव राष्ट्र की श्रद्धा पाते हैं। डॉ. आम्बेडकर ऐसे ही इतिहास के विरल महापुरूष हैं। उन्होंने भारत, भारतजनो पूर्वज आर्यो के स्वाभिमान की रक्षा तब की जब पं. नेहरू सहित देश के अधिकांश राजनेता विद्वान पूर्वज आर्यो को विदेशी आक्रमणकारी बता रहे थे। डॉ. अम्बेडकर ने ऋग्वेद के तमाम उद्धरण देकर सिद्ध किया कि आर्य विदेशी नहीं भारतीय ही थे। कथित शूद्रो को मूल भारतीय समाज से भिन्न बताने का दुष्प्रचार भी उन्होंने खारिज किया और देश को बताया कि शूद्र भारतीय समाज के ही मूलभूत अंग हैं। इस दृष्टि से डॉ. अम्बेडकर की लिखी ‘हू वेयर शूद्राज’ पठनीय है। उन्होंने ऐतिहासिक परिश्रम किया है। राम नाईक ने भी उनके नाम, यश, प्रतिष्ठा को बढ़ाने का ऐतिहासिक काम किया है।
जाति उन्मूलन भारतीय समाज की बड़ी समस्या है। जातियां समरस, एकात्म समाज और राष्ट्र के गठन में बाधा हैं। राजनीति जाति विभेद का अनुचित लाभ उठाती हैं। अनु. जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 पर आए सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले पर पीछे सप्ताह हिंसक भारत बंद हुआ। केन्द्र इसके पहले ही कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल कर चुका है। दलित मन और स्वभाव विधि पालक हैं। निश्च्छल मन के दलित बंधु अपने ही देश की राष्ट्रीय संपदा को आग नहीं लगा सकते। संविधान सभा के अंतिम भाषण (25 नवम्बर 1949) में डॉ. आम्बेडकर ने चेतावनी दी थी, “यदि हम लोकतंत्र को यथार्थ में बनाए रखना चाहते हैं तो हम अपने सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए दृढ़तापूर्वक संवैधानिक रीतियों को ही अपनाएं। असंवैधानिक रीतियों का अपनाना कभी न्यायसंगत नहीं। ये रीतियां अराजकता के सूत्रपात के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं।” डॉ. आम्बेडकर की चिंता सही थी। भारत बंद में देश ने अराजकता झेली। उद्देश्य राजनैतिक थे।
संप्रति देश के सामने तमाम चुनौतियां हैं। सुखद है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी डॉ. आम्बेडकर के दर्शन को अतिरिक्त महत्व देते हैं। डॉ. आम्बेडकर का रचा संविधान ही भारत का राजधर्म है। संविधान से जन्मी सारी संस्थाओं की सफलता में ही लोकतंत्र की सफलता है। कार्यपालिका विधायिका और न्यायपालिका के स्तम्भो पर ही भारतीय जनतंत्र टिका हुआ। भारतीय प्रेस की अभिव्यक्ति स्वतंत्रता भी संविधान की देन है। सबके अधिकार हैं और सबकी मर्यादा। सभी संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा महिमा का संरक्षण संवर्द्धन ही डॉ. आम्बेडकर को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। राज्यपाल रामनाईक बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने बाबा साहब से जुड़े विषयों को लगातार सार्वजनिक विमर्श का केन्द्र बनाया है।

(रविवार पर विशेष)

(आलेख में व्यक्त किये गये विचार लेखक के निजी विचार हैं, इससे सम्पादक प्रकाशक का सहमति होना आवश्यक नहीं है।)