संसार को मनोरम बनाने का प्रचीन ज्ञान अभिलेख है ‘ऋग्वेद’

प्रकृति सुसंगत व्यवस्था है। यह अपनी अव्यवस्था को भी अल्पकाल में पुनर्व्यवस्थित करती है। प्रकृति की गति की एक लय है। हमारी सुखानुभूति प्राकृतिक लय के साथ छन्दबद्धता में ही संभव होती है। अशांत मन प्रकृति की लय से असम्बद्ध होता है। अशांत चित्त की वाणी स्वाभाविक नहीं होती, उसका बोलना और सुनना भी सरल नहीं होता। अशांत मन से लिखना भी असंभव है। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य बोला और सुना हुआ है। उपनिषद् के ऋषियों ने शिष्यों और जिज्ञासुओं के बीच भारतीय तत्वज्ञान का उपदेश दिया था। उपनिषद् मंत्रों की बड़ी संख्या ऋषि और शिष्यों के बीच हुआ प्रश्नोत्तर है। ऋषि अनुभूत सत्य के तत्वदर्शी थे। वे अशांत मन की अराजकता से सुपरिचित थे। वे प्रार्थना की शक्ति से भी परिचित थे। प्रार्थना के समय भावजगत् की प्रगाढ़ दशा का निर्माण होता है। संभवतः इसीलिए हरेक उपनिषद् के प्रारम्भ के पहले ही ‘शांतिपाठ’ का आयोजन था। हम अपने अनुमान के पक्ष में कई साक्ष्य भी पाते हैं। अशांत चित्त से सामान्य काम भी गड़बड़ा जाते हैं। तब दर्शन ज्ञान के विश्लेषण सुनना कैसे संभव है? शांत चित्त की ग्राह्यता सुंदर है। शांत मन से सुना गया प्रत्येक विचार चित्त में अपनी जगह बनाता है। प्रत्येक उपनिषद् के पहले शांति मंत्रों का पुरश्चरण इसीलिए किया जाता रहा है।
सुनने के लिए एक विशेष मानसिक तल जरूरी है। बड़ी बात सुनने और समझने के लिए प्रशांत मन अपरिहार्य है। मुझे अपना छात्र जीवन याद है। डाट दिए जाने के बाद कक्षा में सुना गया या पढ़ाया गया सब फिसल जाता था। रास्ते में चले समय निस्संदेह हम आगे देखते हैं लेकिन कुछ न कुछ सोचा भी करते हैं। पीछे से आती गाड़ी का हार्न सुनेकर भौचक होने का अर्थ हमारे चंचल मन की ही सूचना है। वैसे सड़क पर चलते हुए हार्न सुनना स्वाभाविक ही है। वायुयान को सब जगह नहीं उतारा जाता। उसके लिए विशेष रूप से बनाए गए भूमि तल की आवश्यकता हाती है। जब वायुयान सब जगह नहीं उतारा जाता तो वैदिक तत्व दर्शन को ऊबड़ खाबड़ मनोभूमि पर कैसे उतारा जा सकता है? आचार्यो ने ऐसी मनोभूमिका बनाने के लिए ही शांति मंत्रों की आवश्यकता अनुभव की। शांति पाठ उपनिषदों के ही भाग नहीं हैं। उनके मंत्र ऋग्वेद आदि वेदों से भी लिए गए हैं। कहीं कहीं किसी दूसरी उपनिषद् के मंत्र भी शांति पाठ में प्रयोग किए गए हैं। ईशावास्योपनिषद् का शांति पाठ वृहदारण्यक उपनिषद् का मंत्र है। इसी तरह प्रश्नोपनिषद् का शांति पाठ ऋग्वेद व यजुर्वेद के दो मंत्रों से मिलकर बना है। यह शांति पाठ ध्यान देने योग्य है।
देवता प्रकृति की शक्तियां हैं। वे अनुकूल तो सारी कठिनाइयां दूर। ऋग्वेद की एक सुंदर स्तुति में कहते है “सब तरफ यशस्वी इन्द्र व संपूर्ण विश्व का ज्ञान रखने वाले पूषा हमारा कल्याण करें। हमारे अरिष्ट को दूर करने वाले शक्तिशाली तार्क्ष्य हमारा कल्याण करें। वृहस्पति देव भी हमारे लिए कल्याण की पुष्टि करें।” यहां इन्द्र, पूषा, वृहस्पति व तार्क्ष्य ऋग्वैदिक काल के देवता हैं। इन्द्र की शक्ति का थोड़ा परिचय जरूरी है। ऋग्वेद में सर्वाधिक स्तुतियां इन्द्र की हैं। लगभग 250 सूक्तों में उनकी प्रतिष्ठा है। 50 अलग सूक्तों में वे अन्य देवों के साथ स्तुति पाते हैं। अनेक वैदिक विद्वान उन्हें बादलों व बिजली में कड़क व चमक पैदा करने वाला देवता हैं। वे सूखे के दानव वृत्र को मारने वाले हैं। ऋग्वेद (6.59.2) में उन्हें अग्नि का भाई भी बताया गया है। वैदिक इन्द्र और पौराणिक इन्द्र अलग प्रतीत होते हैं। पुराणों वाले इन्द्र किसी को तप करते देखकर तप भंग करने के लिए अप्सराएं भेजते हैं। वैदिक इन्द्र प्रकाश व जल के अवरोध दूर करते हैं। वृहदारण्यक उपनिषद् के अनुसार वे प्रकृति की आंतरिक शक्ति हैं। पूषा भी ऋग्वेद के देवता हैं। वे धन समृद्धि देते हैं। सर्वज्ञ हैं। ईशावास्योपनिषद् में सत्य के दर्शन के लिए पूषा देव से ही हिरण्य पात्र खोलने की स्तुति की गई है। पूषा स्वाभाविक ही लोकप्रिय देव हैं। इनसे कल्याण की स्तुति भी स्वाभाविक ही है। लोककल्याण सबका अभीष्ट है। ऋग्वेद संसार को ही मनोरम बनाने का प्रचीन ज्ञान अभिलेख है। इस मंत्र में तार्क्ष्य देव से भी कल्याण कामना की गई है। ऋग्वेद के पहले व दसवें मण्डल में तार्क्ष्य हैं। तार्क्ष्य शब्द का अर्थ है देवी अश्व। यह सूर्य का भी अश्व हो सकता है। सूर्य के घोड़े प्रतीक ही हैं। ऋग्वेद (2.4.1) में तार्क्ष्य से एक पक्षी का अर्थ भी निकलता है। गीता प्रेस गोरखपुर के (प्रश्नोपनिषद् – शांतिपाठ) ऋग्वेद के इसी मंत्र के भाष्य में तार्क्ष्य का अर्थ गरूण किया गया है। गरूण एक पक्षी है। इनका आधा शरीर पक्षी का और आधा मनुष्य का बताया गया। पुराणों के अनुसार वे विष्णु के वाहन हैं। यहां विष्णु सूर्य का ही एक रूप है। सूर्य असीम आकाश की परिक्रमा करते हैं। इस बड़े कार्य के लिए स्वाभाविक ही तेज रफ्तार वाहन की जरूरत थी सो गरूण को विष्णु का वाहन बताया गया। विष्णु के वाहन गरूण हैं लेकिन रथ का चालक/सारथि कौन था? इसका उल्लेख नहीं है। सूर्य का सारथि‘अरूण’ बताया गया है। अरूण का अर्थ लालिमा है। लालिमा यानी पूरा लाल नहीं, लाल होने का प्रयास करने वाली वृत्ति। पूर्वजों ने बहुत सुंदर प्रतीक गढ़े थे अपनी ज्ञान उपासना के निष्कर्ष आनंद में।
कल्याण की कामना इन्द्र से है, पूषा देव व तार्क्ष्य से है और वृहस्पति से भी है। वृहस्पति नाम का देव प्रतीक भी कई रूपों में छाया हुआ है। भारतीय दर्शन की लोकायत शाखा पुनर्जन्म नहीं मानती थी। इस दर्शन के अनुयायी चार्वाक कहे गए। इसी विचार के प्रमुख आचार्य वृहस्पति थे। इस विचार के अनुसार स्वर्ग, परलोक और आत्मा आदि नहीं हैं। डॉ0 राजबली पाण्डेय ने ‘हिन्दू धर्मकोष’ में बताया है कि “वृहस्पति लोकाचार्य दर्शन के पूर्वाचार्य समझे जाते हैं और अवश्य ही महाभारत के पहले के हैं।” ऋग्वेद में देव रूप उल्लखित वृहस्पति लोकायत वाले वृहस्पति नहीं हो सकते। पुराणों के अनुसार वृहस्पति देवों के गुरू हैं। वृहस्पति एक विशालकाय ग्रह भी हैं। ऋग्वेद के ऋषियों ने सूर्य चन्द्र आदि की तरह वृहस्पति को भी देवता जाना है। वैदिक पूर्वज लोककल्याण अभीप्सु थे। लोक कल्याणकामी इन पूर्वजों ने कई देवों से इस मंत्र में स्वस्ति कल्याण की स्तुति की है। यह मंत्र महत्वपूर्ण है। यजुर्वेद में भी ज्यों का त्यों आया है। प्रश्नोपनिषद् के शांति पाठ में प्रयुक्त इस मंत्र का उपयोग ज्ञान प्राप्ति की कार्यवाही को परिपूर्ण बनाने के लिए किया गया है।
शांति पाठ में प्रयुक्त पहला मंत्र ऋग्वेद का है। इस मंत्र में प्रत्यक्ष सांसारिक अभिलाषा है “हम ज्ञान अभीप्सु हैं। हम कानों से सुन्दर सुनें, आखों से सुंदर देखें। हमारे शरीर के अंग सुदृढ़ रहें। शरीर स्वस्थ रहे। हमारा जीवन देवहित (देवहितं) में प्रयुक्त हो।” मंत्र सुस्पष्ट है। यहां कोई रहस्यवाद नहीं है। कान से सुंदर सुनने और आंख से प्रीतिकर देखने की सरल सांसारिक इच्छा है। देवहित का अर्थ लोककल्याण है। जीवन को देवहित में प्रयोग करने की अभिलाषा का अर्थ ध्यान देने योग्य है। प्रत्येक मनुष्य इकाई है। शरीर, आंख, कान, स्वस्थ रहते हैं तभी वह ठीक से देखता, सुनता और कर्म करता है। संसार रहने लायक होता है तो जीवन प्रसाद बनता है। संसार को सुंदर बनाना सबका कर्तव्य है। यहां जीवन की प्राथमिकताओं का खूबसूरत क्रम है। पहली प्राथमिकता आंख से सुंदर देखना है। दूसरी कान से सुंदर सुनना है और तीसरी शरीर के सभी अंगो हाथ, पैर, उदर उपस्थ आदि की सुदृढ़ता। फिर अंतिम अभिलाषा देवहित है। देवहित अर्थात लोकमंगल लोक कल्याण। यही दोनो मंत्र सध जाएं तो उपनिषद् के तत्व सागर में उतरना या संसार सागर को मजे से पार करना खेल बन जाता है।

  • हृदयनारायण दीक्षित