सतत कर्म का कोई विकल्प नहीं


हृदयनारायण दीक्षित: प्रकृति की सभी शक्तियां गतिशील हैं। हम पृथ्वी से हैं, पृथ्वी में हैं। पृथ्वी माता है। पृथ्वी सतत् गतिशील है। वह सूर्य की परिक्रमा करते हुए अपनी धुरी पर नृत्य मगन रहती है। माता पृथ्वी के अंतस् में अपनी संतति को सुखी बनाए रखने की अभिलाषा है। इसलिए वह कोई अवकाश नहीं लेती। मनुष्य के चित्त में भी सुखी जीवन की अभिलाषा है। इच्छा मुक्त कोई नहीं। सुख स्वस्ति और आनंद परिश्रम के पुरस्कार होते हैं लेकिन मनुष्य आदिम काल से जिज्ञासु है। तमाम प्रश्न उससे मथते रहे हैं। क्या परिश्रम का फल अपने-अपने आप मिलता है? क्या कोई अज्ञात चेतन शक्ति कर्मफल की दाता विधाता है? क्या देव शक्तियां हम सबको प्रसन्नता देती हैं? क्या सृष्टि का संचालक आराधना उपासना से प्रसन्न होता है? या अनेक देवशक्तियां कर्मफल का आवंटन करती हैं? भारत के वैदिक काल में ऐसी शिखर जिज्ञासा थी। ऋग्वेद (1.10.121) में प्रजापति की स्तुति हैं उन्हें जगत का पालक संचालक कहा गया है लेकिन इन मंत्रों में मजेदार जिज्ञासा भी है कि ‘‘हम किस देवता का हवि दें?’’ कस्मै देवाय हविषा विधेम। यहां निश्ंिचतता नहीं है प्रश्न बना रहता है। देवता ढ़ेर सारे हैं। हम सबका मन भी प्रश्न करता है कि किसकी उपासना करें हम? इन्द्र भारतीय देवतंत्र के बड़े देवता हैं। ऋग्वेद में उन्हीं की स्तुति के मंत्र सर्वाधिक हैं। वे ऋग्वेद से लेकर पुराणों तक छाए हुए हैं। पुराणों वाले इन्द्र का रूपक मजेदार है। वे तप से प्रसन्न नहीं होते। वे अपनी सत्ता के प्रति सतर्क जान पड़ते हैं। तपस्वी उनकी पदवी छीन सकते हैं। सुना है कि वे तप भ्रष्ट करने के लिए रूपवती अप्सराएं भेजते थे। अप्सराए तपस्वी को पथच्युत करती थी। हमारा मन कहता है कि क्या बहुत सारे लोग अप्सराओं के लिए भी तपस्या करते रहे होंगे। लेकिन ऋग्वेद वाले इन्द्र जल अवरोध हटाते हैं। नदी प्रवाह उन्हीं की देन है। मेरा मन फिर से जिज्ञासु हो जाता है कि हम किस इन्द्र की उपासना करें? क्या वृत्तासुर हंता वैदिक देव इन्द्र की या पौराणिक इन्द्र की। संशय शोध का प्रेरक होता है। ऋग्वेद में इंद्र को लेकर भी प्रश्न उठाए गए हैं। इन्द्र की स्तुति ठीक बात है लेकिन ऋषि के मन में प्रश्न है कि ‘‘वे किससे याचना करते हैं? वे कहां हैं? उनके विषय में यह भी शंका है कि वे नहीं हैं।’’ इसी तरह एक सुंदर मंत्र में कहा गया है ‘‘बहुतों का कथन है कि कोई इंद्र नहीं है। क्या किसी ने उसे कभी देखा है? हम किसके लिए स्तुति करें?’’ बड़ी बात है कि वैदिक पूर्वजों के मन में अपने देवों के अस्तित्व के बारे में भी संशय और जिज्ञासा बनी रहती है।
देवता उपास्य हैं। उनके सम्बन्ध में जिज्ञासु बने रहना भारतीय चिंतन की विशेषता हैं। श्रद्धा और जिज्ञासा का ऐसा साथ दुर्लभ है। भारत में अनेक देवों की जन्मतिथि के उत्सव बनाए जाते हैं। श्री राम और श्री कृष्ण भारतीय लोकमन के ईश्वर हैं। दोनों ऋग्वेद के प्रतिष्ठित देव विष्णु के अवतार हैं। दोनों की जन्मतिथि पर महोत्सव होते हैं। जन्म तिथि का विवरण उनके प्रादुर्भाव की विशेष सूचना है। वे कालखण्ड विशेष में जन्मे, इसके पहले वे इस रूप में नहीं रहे होंगे। ऋग्वेद (10.72) में कहते हैं ‘‘एक समय देवताओं से पहले का भी है जब असत् से सत् उत्पन्न हुआ।’’ देवों पर ऐसी टिप्पणी साहसपूर्ण है और वैज्ञानिक भी है। कहते हैं कि हम देवों के प्रादुर्भाव का वर्णन उत्तम वाणी से करते हैं ‘‘असत् से सत् आने के बाद चेतना फैल गई। अदिति से दक्ष आए और दक्ष से अदिति।’’ अदिति ऋग्वेद में निराले देवता हैं। यहां अदिति सम्पूर्णता के पर्याय हैं। असत् अव्यक्त के प्रकट होते ही अदिति। अदिति से विस्तार और फिर लगातार अदिति। कहते हैं कि फिर अमृतबंधु देवों का जन्म हुआ- तां देवा अन्वजायंत मद्रा अमृत बंधवः।’’ अमृत बंधु का अर्थ है न मरने वाला। देव अमृत बंधु है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह है कि देवों का उद्भव सृष्टि जन्म के प्रथम चरण के बाद हुआ। भारतीय देवतंत्र दिलचस्प है। प्रत्येक समाज में विद्वानों और ज्ञानियों का एक वर्ग होता है। देवों की तुलना में मनुष्य का ज्ञान छोटा होना चाहिए। पुनर्जन्म प्राचीन भारतीय चिन्तन की चुनौती है। कठोपनिषद् का रचनाकाल बुद्ध के पहले का है। इस उपनिषद् में पुनर्जन्म की प्रीतिपूर्ण चर्चा है। यम मृत्यु के देवता है। युवा नचिकेता उनसे पुनर्जन्म पर प्रश्न करता है कि क्या मृत्यु के बाद जीवन का संपूर्ण नाश हो जाता है? या जीवन की गति किसी न किसी रूप में चला करती है? यम स्वयं देवता है। वे कहते हैं कि ‘‘नचिकेता इस प्रश्न पर देवताओं में भी संशय है। यह प्रश्न न पूछो।’’ इसका एक अर्थ है कि देवों के ज्ञान की भी सीमा है। दूसरा अर्थ यह भी है कि देवता भी संशयी और जिज्ञासू होते हैं। वे गंभीर विषयों पर जल्दबाजी में निर्णय नहीं लेते। तीसरा अर्थ यह भी संभव है कि कठोपनिषद् के रचनाकाल में पुनर्जन्म पर विद्वानों में बहस थी। तब निर्णायक मत नहीं रहा होगा। देवों में बहस का अर्थ विद्वानों में बहस लिया जाना चाहिए। तो भी कठोपनिषद् के रचनाकार का साहस अनूठा है। उसने ‘‘देवों में भी संशय’’ लिखकर भारतीय प्रज्ञा के साहस का परिचय दिया है।
देवता कितने हैं? यह प्रश्न वृहदारण्यक उपनिषद् में है। ऋग्वेद में एक सूक्त में 33 देव हैं। विश्वमित्र ने अग्निदेव से कहा ‘‘हमारे यज्ञ में आप 33 देवों को पत्नी सहित लाएं।’’ यही ऋषि विश्वामित्र अन्यत्र कहते हैं कि ‘‘तीन हजार तीन सौ उन्तालीस देवों ने अग्नि की उपासना की।’’ अग्नि प्रकृति की विराट शक्ति है। वे सूर्य में हंै, जल में हैं। हम मनुष्यों की काया में हैं। तीन हजार से ज्यादा देव उनकी उपासना करते है तो कोई बड़ी बात नहीं। हमारा मन प्रश्न करता है कि विश्वामित्र ने यज्ञ में 33 देव ही क्यों बुलाए? विश्वामित्र के ही अनुसार देव 3 हजार से ज्यादा हैं। संभवतः 33 देव ज्यादा महत्वपूर्ण रहे होंगे। शतपथ व्राह्य में 33 देवों की सूची हैं, 8 वसु हैं, 11 रूद्र हैं। 12 आदित्य हैं। इन्द्र और प्रजापति मिलाकर कुल 33 देव। अग्नि, पृथ्वी, वायु, आदित्य, अंतरिक्ष, धुलोक, चन्द्र और नक्षत्र वसु हैं। इसी तरह 10 प्राण इन्द्रिय व 11वां मन रूद्र हैं। भारत का मन दिव्यता में रमता है। जहां दिव्यता देखी, वहां-वहां देव अनुभूति। देवों की संख्या बढ़ती रही। वैदिक देवतंत्र में पौराणिक देव जुड़े। आधुनिक काल में बहुत सारे लोग देवों को अंधविश्वास बताते हैं तो भी देव उपासकों की संख्या बढ़ी है। देवी उपासना का क्षेत्र पं0 बंगाल और असम सहित उत्तर भारत के बड़े भू-भाग तक विस्तृत है। श्री राम भक्त हनुमान की उपासना का क्षेत्र व्यापक हुआ हैं शिव का क्या कहना? पूरा पश्चिम एशिया शिव भक्ति से ओतप्रोत रहा है।  
वैदिक समाज में भी आधुनिक काल की तरह सभी लोग देवोपासक नहीं थे। देवोपासक देवोपासना न करने वालों से असहमत थे। वे देवोपासना के तमाम लाभ बताते थे। ऋग्वेद के एक मंत्र के अनुसार ‘‘देव विश्वासी का रथ तेज चलता है।’’ जान पड़ता है कि यज्ञा या देवोपासना न करने वाले भी समृद्ध और सुखी रहे होंगे। ऋषि कहते हैं ‘‘यज्ञ न करने वाले के स्वर्ग पहुंच जाने पर इन्द्र का सखा पर्वत उसे नीचे ढकेल देता है।’’ ऐसा होता था या नहीं? इस तरह के प्रश्न संदेह और संशय के रास्ते वास्तविक ज्ञान की ओर ले जाते हैं। 33 देवों की सूची में पृथ्वी, सूर्य, वायु, अग्नि आदि में प्रत्यक्ष हैं। नास्तिक देव कृपा नहीं मानते। देवता प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष धन, यश, समृद्धि भले ही न देते हों लेकिन पृथ्वी देव की प्रसन्न्ता का सम्बन्ध पर्यावरण और जैव विविधता से है। पर्यावरण ठीक तो मानवता स्वस्थ। वायु देव स्वस्थ प्रसन्न तो सभी जीव दीर्घ जीवी। ऐसे प्रत्यक्ष देवों के अलावा तमाम अनुभूतिपूरक दिव्यताएं हैं। क्या वे हमारी उपासना से प्रसन्न होते हैं या नहीं? यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है। हम उपासना के समय अपनी विशेष चित्त दशा मेें जाते हैं। आस्तिक चित्तदशा हमको अवसाद, विषाद से दूर रखते हुए प्रसादपूर्ण बनाती है। इसलिए सतत् जिज्ञासा और आस्तिकता के साथ कर्मरत रहने में ही आनंद है। 
(रविवार पर विशेष)
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वर्तमान में विधानसभा अध्यक्ष हैं।)