सफलता का मूल केन्द्र इच्छा या अभिलाषा है और अभिलाषाएं अनंत हैं 

हृदयनारायण दीक्षित : सफलता प्रसन्न्ता देती है और असफलता दुख। मोटे तौर पर सफलता का अर्थ इच्छानुसार कर्मफल की प्राप्ति है। इच्छानुसार कर्मफलता ही सफलता है। सफलता का मूलकेन्द्र इच्छा या अभिलाषा है और अभिलाषाएं अनंत हैं। मनुष्य अपनी सभी अभिलाषाओं की पूर्ति के लिए काम नहीं करता। वह कुछ अभिलाषाओं की पूर्ति की योजना बनाता है। तद्नुसार काम करता है। उनमें कुछ योजनाएं इच्छानुसार पूरी होती है और बहुत सारी योजनाएं पूरी नहीं होती। असफलता शांति नहीं देती। भीतर ही भीतर कचोटती रहती है। सफलता भी शांति नहीं देती। सफल व्यक्ति और सफल होने के लिए जीवन ऊर्जा लगाते हैं। मूलभूत प्रश्न है कि सफलता का उद्देश्य क्या है? सफलता प्राप्ति के लिए परिश्रम करना ठीक है लेकिन जीवन में सफलता का उपयोग क्या है? सफलता अपने आप में कोई विधायी मूल्य नहीं है। कर्म का उद्देश्य और अधिष्ठान ही विचार का विषय है। अपराधकर्म में असफलता समाज के लिए स्वागत योग्य है। इसी तरह लोकमंगल के काम में हुई असफलता भी वरेण्य है। श्रेष्ठ उद्देश्य की असफलता भी फिर उठकर काम करने के लिए प्रेरित करती है।
असफलता सहज स्वीकार्य नहीं होती। लेकिन जीवन का बड़ा भाग असफलताओं में ही जाता है। असफलता की प्रशंसा भी नहीं होती। सफल व्यक्ति का यश बढ़ता है। तमाम लोग उसके साथ खड़े होते हैं लेकिन असफल व्यक्ति के मित्र घटते हैं। प्रशंसक भी कम होते जाते हैं। असफलता का सहज स्वीकार करना कठिन होता है। गांधी जी के व्यक्तित्व पर ढेर सारे ग्रंथ लिखे गए हैं। उनके कर्म और विचार की गहन समीक्षा हुई है। गांधी अंतर्राष्ट्रीय व्यक्तित्व थे। उनकी प्रतिष्ठा लगातार बढ़ती गई है। वे किसी राजकीय/संवैधानिक पद पर नहीं रहे तो भी भारतीय मुद्रा पर उनका चित्र छपता है। सरकारी कार्यालयों में उनके चित्र लगाए जाते हैं। प्रश्न यह है कि क्या गांधी जी एक सफल व्यक्ति थे? वे भारत विभाजन के विरोधी थे। लेकिन देश विभाजन नहीं रोक पाए। मई 1947 में अरूणा आसफ अली और अशोक मेहता ने गांधी जी से पूछा था कि “क्या पाकिस्तान का कोई विकल्प है?” गांधी जी ने उत्तर दिया “पाकिस्तान का एकमात्र विकल्प अविभाजित भारत है।” (संपूर्ण गांधी वांग्मय 87/436) लेकिन गांधी जी का अखण्ड भारत स्वप्न भहरा गया। वे अपने ध्येय में असफल रहे लेकिन यह कांग्रेस की असफलता नहीं थी। कांग्रेस विभाजन के लिए तैयार हो चुकी थी। उसका उद्देश्य सत्ता हस्तांतरण था। बाद में गांधी जी भी भारत विभाजन के लिए तैयार हो गए थे।
गांधी जी सत्याग्रही थे। वे अपनी सही आग्रहों के लिए ईमानदारी से लड़ते थे। वे अनशन आदि उपायों से अपने विचार के पक्ष में वातावरण बनाते थे। वे भारत विभाजन के विरोधी थे। यहां बड़ा प्रश्न है कि देश विभाजन पर उन्होंने कोई प्रतिरोध क्यों नहीं किया? वे कांग्रेसजनों के इस प्रस्ताव पर सहमत क्यो हो गए? गांधी जी विकल्पहीन मनोदशा में क्यों थे? पाकिस्तान का निर्माण भारतीय उपमहाद्वीप की त्रासद घटना थी। गांधी जी यह बात जानते थे। तब भी गांधी जी ने आत्मसमर्पण किया। इसके पीछे रहस्य क्या थे? इतिहास उन्हें ‘असफल’ प्रमाण पत्र देकर भी शांत चित्त नहीं बैठ सकता। गांधी जी हिन्दू मुस्लिम एकता चाहते थे। इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वे खिलाफत आन्दोलन में सहयोगी बने। यह दुनिया का सबसे बड़ा साम्प्रदायिक आन्दोलन था। गांधी जी ने कहा था कि भारत के मुसलमान खलीफा के पद की समाप्ति पर दुखी हैं। वे उनके दुख में सम्मिलित हैं। वे मुसलमानों की मित्रता चाहते थे। उन्होंने तमाम अन्य मसलों पर भी मुस्लिम सम्प्रदाय की पक्षधरता की थी। वे हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रति ईमानदार थे। उनके मन में कोई चालाकी नहीं थी। संविधान बनाने की ब्रिटिश अनुमति के बाद भी साम्प्रदायिक दंगे हो रहे थे। गांधी जी से प्रश्न किया गया कि हिन्दू मुस्लिम समस्या को कैसे हल किया जाये? गांधी जी ने कहा, “इस मामले में मुझे अपनी हार स्वीकार करनी चाहिए। मैं जानता हूं कि मेरी आवाज कोई नहीं सुनता? (वही 85.352) हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रश्न पर वे असफल रहे। पाकिस्तान इसी असफलता का परिणाम था। 
गांधी जी का स्वाधीनता आन्दोलन भी पूरी तरह सफल नहीं हुआ था। 1946 के साल की राजनीतिक गतिविधि विचारणीय है। ब्रिटिश सत्ता ने भारत के लोगों को अपना संविधान बनाने की अनुमति दी थी। यह संविधान सभा स्वाधीनता आन्दोलन की सफलता का परिणाम नहीं थी। ब्रिटिश सत्ता ने ही संविधान सभा गठित करने की अनुमति दी थी। ‘अनुमति’ शब्द ध्यान देने योग्य है। 1946 के आखिरी माह गांधी जी ने कहा था, “यह बात नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस कितनी ही शक्तिशाली क्यों न हो गई हो, आज जिस संविधान सभा की कल्पना की गई है उसकी बैठक केवल ब्रिटिश सरकार की अनुमति से ही हो सकती है।” (वही 86.208) ब्रिटिश सत्ता कांग्रेसी नेताओं को तमाम शर्ते मनवाने के लिए दबाव बनाती थी। संविधान सभा को लेकर ब्रिटिश आग्रह धमकाऊ थे। शर्त थी कि संविधान सभा मंे मुस्लिम लीग और कांग्रेस दोनो को शामिल होना चाहिए। दोनो के सहयोग से ही भारत का संविधान बन सकता है। गांधी जी अंग्रेजों की अनुमति वाली संविधान सभा नहीं चाहते थे। लेकिन कांग्रेस में आन्दोलन जारी रखने का दम नहीं था। जरूरत यह थी कि पहले ब्रिटिश सत्ता भारत से वापस जाये। भारत के लोग स्वतंत्र संप्रभु होकर अपनी संविधान सभा चलाएं। अपने मन का संविधान बनाएं। गांधी जी ऐसा ही चाहते थे लेकिन असफल रहे। उनका ध्येय पवित्र था। कांग्रेस का उपकरण कमजोर था। कांग्रेस को असफलता का मलाल नहीं था। गांधी जी आहत थे। गांधी जी भारत की प्रकृति और संस्कृति वाला भारत चाहते थे। कांग्रेस सत्ता की जल्दबाजी में थी। वह आगे लड़ाई लड़ने की स्थिति में नहीं थी। कांग्रेस अपनी राजनीति के लिए गांधी जी के विराट व्यक्तित्व का उपयोग करती थी लेकिन उनकी विचारधारा और सत्याग्रह पर कांग्रेस की आस्था समाप्त प्रायः थी। गांधी जी ने कांग्रेस की मनोदशा का उल्लेख किया था “इसकी जड़ में झूठा आत्म संतोष है कि जेल में रहने के बाद कांग्रेसियों को स्वतंत्रता के लिए और कुछ बटवारे में उन्हें प्राथमिकता देकर पुरस्कृत करना चाहिए। इसलिए आज तथाकथित पुरस्कार पदों को प्राप्त करने के लिए एक अशोभनीय होड़ मची हुई है।” (वही, 84.413) भारत को अभी स्वतंत्रता नहीं मिली थी। पूर्ण स्वतंत्रता के लिए अभी बहुत कुछ करना शेष था। कांग्रेस आगे संघर्ष के लिए तैयार नहीं थी। गांधी जी देश को कांग्रेस के सबसे बड़े नेता थे। वे अपनी ही पार्टी को संयम और त्याग के मूलभूत भारतीय आदर्शो के लिए तैयार नहीं कर पाए। कांग्रेसजनों में स्वतंत्रता के पहले ही पदो की होड़ थी। गांधी जी उन्हें संयम नहीं सिखा पाए। गांधी जी इस काम में भी बुरी तरह असफल हुए लेकिन उनका ध्येय पवित्र था। असफलता से भी उनका कद नहीं घटा।
कांग्रेस ने समझौता और आत्म समर्पण का मार्ग चुना। ब्रिटिश सत्ता गांधी जी के नेतृत्व व अन्य आन्दोलन से बहुधा परेशान हुई। भारत में अंग्रेजी सत्ता के उपकरण भी विद्रोह की मनोदशा में थे। इन सबके प्रभाव के बावजूद अंग्रेज हराए नहीं जा सके। उन्होंने अपनी योजनानुसार ही भारत छोड़ने का कार्यक्रम पूरा किया। 1946 में हुए तमाम समझौतो में से ही एक सबसे बड़ा जिन्न निकला पाकिस्तान। गांधी जी पाकिस्तान नहीं चाहते थे। भारत को ब्रिटिश तर्ज की राजव्यवस्था मिली। ब्रिटिश संसदीय प्रणाली की आलोचना गांधी जी ने ‘हिन्द स्वराज’ में की थी। भारत को ब्रिटिश सभ्यता का रोग मिला। गांधी जी ने सावधान किया था कि “मेरा निश्चित विचार है कि भारत अंग्रेजों की नकल करेगा तो बर्बाद हो जायेगा।” (वही 10.318) भारत ने ब्रिटिश तर्ज की राजव्यवस्था अपनाई, प्रशासनिंक तंत्र भी अपनाया। भाषा और सभ्यता व जीवनशैली की भी नकल की गई। गांधी जी ऐसा नहीं चाहते थे लेकिन वे असफल रहे। महान लोगों की असफलताएं भी बड़ी होती हैं। वे नई पीढ़ी को उसी मार्ग पर चलने व असफल लक्ष्यों को प्राप्त करने की प्रेरणा देती है। क्या गांधी जी ऐसे ही असफल संरक्षक नहीं थे? 
(रविवार पर विशेष)
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष हैं)