सर्वकल्याणकारी प्रेम : सर्वनाशक मोह

अध्यात्म : संसार में हाथ, दो पैर वाले जीवों की भरमार है। सामान्यतया उन्हें ‘मनुष्य’ कहते है। लेकिन ‘मनुष्य’ ये सब-के-सब होते नहीं। दो हाथ, दो पैर तो ‘दैत्यों, दानवों, राक्षसों, देवी-देवताओं आदि के भी होते हैं। पर इनका व्यवहार मनुष्यों से सर्वथा भिन्न होता है। शिवजी पार्वतीजी को समझाते हैं।


‘‘जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रीबन सुनइ दससीसा।
आपुनु उठि धाबइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा।।
अस भ्रष्ट आचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहिं काना।
तेहि बहु बिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना।।
बरनि न जाइ अनीति घोर निसाचर जो करहिं।
हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि मिति।।
बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लम्पट परधन परदारा।।
मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहि सेवा।।
जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी।।
— बालकाण्ड (१८३,१८४)
पूरे ब्रह्माण्ड में परम सत्ता समान रूप से व्याप्त है। अपनी कृपा के क्षेत्र में प्रवेश कराने के लिए ही परमात्मा ने जीवात्मा को कुछ विशेष सुविधाओं के साथ मानव-योनि प्रदान की है। पर मानव अपनी मूढ़चेतना के वशीभूत प्राय: ऐसा आचरण करता है, जिससे उसकी अन्तश्चेतना में ऐसे संस्कार संचित हो जाते है कि वह स्वयं को भी नहीं पहचान पाता, भूल जाता है कि पूर्ण परमात्मा का अंश होने के नाते वह स्वयं पूर्ण है, दीन दुःखी भिखारी बनकर जो क्लेश वह भोगता है, वह अपने ही अज्ञान के कारण है। यह जान लेना आवश्यक है कि रावण के दस सिर, बीस भुजाएँ जो दर्शाई गई है यह रूपक अलंकार है। उसके एक सिर व दो हाथ ही थे। दस सिरवाला न लेट सकता है, न सो सकता है। बहरहाल मानव-जीवन का उद्देश्य आसुरी संस्कारों से अपने को मुक्त करने व परमात्मा से योग स्थापित करने का है।
विषय को भलीभाँति समझने के लिए ‘संस्कार व योग’ की परिभाषा जान-समझ लेना परमावश्यक है। मिथ्याडंबर को जीवन समझने वाला आज का भ्रष्ट समाज ऐसे शब्दों को सधुक्कड़ी मानकर उनकी उपेक्षा करता और जीवन-भर रोता है।
योग
लघु चेतना (जीवात्मा) एवं पूर्ण चेतना (परमात्मा) के मिलन का नाम ‘योग’ है और इस मिलन-अभियान के प्रति अपनाए जाने वाले साधन-क्रम का नाम ‘साधना’ है।
योग वासिष्ठ के अनुसार—‘संसार-सागर से पार होने या मुक्त होने की कला का नाम ‘योग’ है।
महर्षि दयानन्द का कथन है कि ‘‘योग’’ शिक्षा की आत्मा है क्योंकि यह जीवन की शिक्षा देता है।
योग—विद्या के जनक महर्षि पातंजलि के शब्द है—‘‘चित्तवृत्तियों को तामसिक व राजसिक मार्ग पर जाने से रोक कर उन्हें परमात्मा के मार्ग पर जाने के लिए सही मोड़ देना ही ‘योग’ है।’’
अत: आवश्यकता है जीवनदायी योग के संस्कार बनाने और उन्हें दृढ़ कर संचित करने की। अब देखें कि संस्कार कैसे बनते हैं।
आचरण एवं संस्कार
संस्कार ‘योग’ के हों या भोग के, अपने आचरण से मनुष्य उन्हें लगातार स्वयं बनाता है। आचरण स्वेच्छा से हो या किसी बाहरी प्रेरणा के वशीभूत, उसे लगातार दोहराते रहने से उसके अनुसार शुभ या अशुभ संस्कार बन जाता है। इस प्रकार पहले तो आचरण के अनुसार संस्कार बनता है, फिर व्यक्ति उस संस्कार का दास बन जाता है और संस्कार यदि आसुरी है तो उससे लगातार कष्ट भोगने के बाद भी व्यक्ति अपने दुराचरण को छोड़ नहीं पाता। अनेक सज्जनों को बुरे संस्कारों में फँसकर बरबाद होते देखा जाता है।
आध्यात्मिक विभूति कैथरीन पाण्डर का घोष है ‘अपने पाप में जो शक्ति दिखाई पड़ती है वह व्यक्ति की अपनी ही दी हुई है और उसे वापस भी वही ले सकता है, कोई दूसरा नहीं।
महाविभूति एमर्सन का मत है—‘‘मनुष्य अपने को खुद धोखा देता है। किसी दूसरे द्वारा उसे ठगा जाना असम्भव है।’’

अत: यह सिद्ध तथ्य है कि अपने भाग्य का निर्माता व्यक्ति स्वयं है। शराब, जुआ, परस्त्रीगमन, चोरी आदि के पतनकारी संस्कार यदि निर्मित हो गए तो कोई दूसरा लाख प्रयत्न करने के बाद भी उन्हें नष्ट न नहीं कर सकता। हाँ यदि भुक्तभोगी, खुद उनसे मुक्त होना चाहे तो दूसरा उसकी मदद कर सकता है।
अब शुभ संस्कारों पर विचार करें। वह तथ्य हम जानते ही हैं कि प्रेम-तत्व और भगवद्तत्व एक ही है। ईसा मसीह ने कहा है कि—‘God made man after his own image’ (भगवान् ने मनुष्य को अपने जैसा ही बनाया है।) फिर तो यह सिद्ध है कि मनुष्य घनीभूत प्रेम ही है। फिर हम लोगों के मध्य में यह इतना विघटन इतना अकल्याण और दुख क्यों हैं? अपने कल्याण और दुख का कारण हम स्वयं है। अज्ञानवश हम स्वयं अपने को धोखा दे रहे हैं। भगवान् ने मनुष्य को दो सुन्दर केन्द्र प्रदान किये एक बुद्धि विवेक व दूसरा हृदय प्रेम का। बुद्धि व हृदय दोनों परस्पर भिन्न होने के कारण विवेक व प्रेम की परस्पर तुलना करना तो नादानी है, पर साथ ही विवेक प्रेम का अनिवार्य दृढ़ आधार है और विवेक रहित तथा कथित प्रेम ‘मोह’ है, जो सभी व्याधियों की जड़ है। ‘मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला, तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला।’
अब वेदों में भगवान् के उपदेश और कुछ अनुभव प्राप्त महापुरुषों के मार्गदर्शक परामर्श पर विवेकपूर्ण विचार करें–


वेद का स्पष्ट उपदेश है–‘मनुर्भव’ (रोग, कमजोरी, चिन्ता, भय, वियोग के क्लेशों से मुक्त हो मर्यादित मनुष्य बनो) और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ (सारा विश्व एक विशाल परिवार है; अत: सभी से परिवारीजनों-जैसा प्रेम करो)।
‘मनुर्भव’ के विषय में वेदों का आगे कथन है
(यजु. (40/2)
‘‘कुर्वन्नेवेह कर्माण जिजीविवेच्छत: सभा।
पश्येत शरद: शतम्।
भद्रं कर्णाभि: श्रणुनाम’’

(मनुष्य संसार में सत्यकर्म करते हुए सौ वर्षों तक जीने की इच्छा करे। सौ वर्षों तक स्वस्थ नेत्रों से देखें। सौ वर्षों तक स्वस्थ कानों से सुने।)
मर्यादित जीवन जीने के प्रति ऋग्वेद (10/5/6) में विवेकयुक्त परामर्श है।
‘सप्त मर्यादा: कवपस्तत श्रुस्ता सामेकभिदम्यं हुरो गात।
आयोर्ह स्कम्भ उपमस्य नीले पथां विसर्गेश्ररूपेषु तस्थै।।’’
(प्राणिहिंसा चोरी, व्याभिचार, मद्यपान, जुआ, मिथ्याभाषण तथा पापकर्मों में बार-बार लिप्त हो जाना ये सातों महापाप हैं। बुद्धिमान को चाहिए कि इनका बिल्कुल परित्याग कर दे। इनमें प्रत्येक मानव-जीवन के लिए घोर घातक है। यदि कोई किसी एक में ही लिप्त हो जाय तो उसका जीवन नष्ट हो जाता है।)
गुरु वसिष्ठ के अनुसार मोक्ष के महालय में द्वार पर नियुक्त रक्षकों-शुभ, विचार, सन्तोष, सत्संग–सभी चारों के सन्तुष्ट करने के बाद ही अन्दर प्रवेश की अनुमति मिल सकेगी।
हजरत लुकमान कहते हैं कि इन्सान वह है, जो–
मालिक ‘खुदा’ और मौत को कभी न भूले।
तथा
अपनी अच्छाई व दूसरों की बुराई की कभी याद न करे।
महावीर स्वामीजी का उपदेश है–
शराब, मांस, वेश्या, जुआ, शिकार, परस्त्रीगमन, चोरी–महाव्यसन हैं।
इस पाप कर्म से बचो।
और व्रत लो–
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह का
प्रेम का गुणगान सभी महापुरुषों ने एक स्वर में किया है। महात्मा गांधी ने कहा है ‘‘हम विरोधी को प्रेम से ही जीत सकते हैं, घृणा से कभी नहीं।’’


और अब्राहम लिंकन की उक्ति है–’With malice toward none, with charity toward all’
किसी के भी प्रति मनोमालिन्य नहीं, सभी के प्रति उदारता का भाव।
बच्चे राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय समाज के आधार-स्तम्भ हैं। उनके जीवन-निर्माण में विवेकयुक्त प्रेम और कर्तव्यनिष्ठा की परम आवश्यकता है। अभिभावकगण व शिक्षक-शिक्षिकाएँ जब विवेकयुक्त प्रेम से सम्पन्न होंगे और बालक-बालिकाएँ भी विवेकयुक्त कत्र्तव्यनिष्ठ होंगे तभी मानव समाज का कल्याण हो सकेगा। अनेक उदाहरण हैं। दिल्ली की कु. अंजना राजगोपाल हैं। वे अविवाहित हैं और कहती हैं कि हमारे तीस बच्चे हैं। वे आवारा प्राय: मातृ-पितृविहीन बच्चों को ले आती हैं और उन्हें मर्यादित मनुष्य बनाती हैं।
अमेरिका के बाल्टीमोर स्थान की मलिन बस्ती के बच्चों की घटना तो हमारी पुस्तकों में प्रकाशित हो चुकी है।त्वरित संदर्भ के लिए-शोध छात्रों के दल ने दो सौ विद्यार्थियों की जाँचकर रिपोर्ट दी कि इनमें कम-से-कम नब्बे प्रतिशत बच्चे आवारा हो जाएँगे। पर उनमें सभी बच्चे मर्यादित नागरिक बन गए, एक भी आवारा नहीं हुआ। पता लगाने पर मालूम हुआ कि यह अप्रत्याशित कमाल शीला रुरकी नामक शिक्षिका का था जिसने उन्हें प्रेमपूर्वक शिक्षित किया था।
इस विषय में निम्न सदुपदेशों पर विवेकपूर्वक चिन्तन-मनन करें–
विदुर प्रजागर में विद्यार्थियों के लिए सात दोषों से सदैव बचने का उपदेश है। यथा–

‘‘आलस्यं मदमोहौ व चापलं गोष्ठिरेव च।
स्तब्धता चामिमानित्यं तथा त्यामित्वमेव च।
एतै वै सप्त दोषा: स्यु: सदा विद्यार्थिनां मता:।।
सुखायिन: कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिना सुखम् ।
सुखार्थी वा तजेद्विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत्सुखम् ।।
(आलस्य, नशाखोरी, मोह, चपलता, व्यर्थ बकवास, अभिमान, त्याग-भावना का अभाव–विद्यार्थियों के ये सात दोष हैं। इनसे उन्हें सदैव बचना चाहिए।)
(आरामतलब को विद्या और विद्यार्थी को आराम की कामना नहीं करनी चाहिए।)
व्याकरण महाभाष्य में अभिभावकों एवं शिक्षक-शिक्षिकाओं के प्रेम की परिभाषा निम्नवत् है–
‘‘सामृतै: पाणिर्मिदर्नन्ति मुखे म विषोक्षिवै:।
लालनाश्रयिषो दोषास्ताड़नाश्रयिणो गुणा:।।’’
(जो माता-पिता और आचार्य सन्तान व शिष्यों का ताड़ना करते हैं वे मानों उन्हें अपने हाथों अमृत पिला रहे हैं और लाड़ना करने वाले विष पिलाकर उन्हें नष्ट कर देते हैं।)
समाज विविध मानसिकताओं का मेला है। एक विवेकशील पिता कहता है (मैं अपने बच्चे को पीटता हूँ क्योंकि मुझे उससे प्यार है)।
और अखबार में एक बाहुबली पिता का बेटे को आश्वसन छपा था ‘‘करना हो सो कर लो, आखिर मेरे बेटे हो।’’
बच्चों के प्रति या किसी के प्रति क्रोध करें तब ध्यान रखें कि क्रोध आपके वश में रहे, कहीं आप क्रोध के वश में न जायें। ऊपर से बनावटी क्रोध और अन्दर प्यार।

(ब्रह्मलीन श्री अमरनाथ शुक्ल के प्रकाशित साहित्य से)