सामाजिक समरसता का महापर्व मकर संक्रान्ति

बृजनन्दन राजू

स्तम्भ : मकर संक्रांति लोक रूचि और जन आस्था के साथ—साथ मकर संक्रान्ति समाजिक समरसता का महापर्व है। यह व्यक्ति के बीच भेद को मिटाकर आपसी प्रेम एवं सौहार्द को बढ़ावा देता है। इस दिन सूर्य भूमध्य रेखा को पार करके उत्तर की ओर अर्थात मकर रेखा की ओर बढ़ना शुरू करता है। इसी को सूर्य का उत्तरायण स्वरूप कहते हैं। इससे पूर्व वह दक्षिणायन होता है। जब सूर्य एक राशि को पार करके दूसरी राशि में प्रवेश करता है, तो उसे संक्रांति कहते हैं। यह संक्रांति काल प्रतिमाह होता है लेकिन मकर संक्रांति वर्ष में केवल एक बार होती है।

मकर संक्रांति सूर्योपासना का पर्व है। इस अवसर पर भगवान सूर्य की गायत्री महामंत्र के साथ पूजा-उपासना, यज्ञ-हवन का अलौकिक महत्व है। यह पर्व हमारे जीवन में नवस्फूर्ति, चेतन, उत्साह एवं उमंग का प्रतीक है। इस समय प्रकृति में भी पविर्तन देखने को मिलने लगते हैं। जैसे -जैसे सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर जाता है वैसे- वैसे पृथ्वी पर सूर्य की तपन तेज होने लगती है। इस पर्व के बाद से दिन बड़े होने लगते हैं। दिन बड़े होने का अर्थ जीवन में अधिक सक्रियता से है। सूर्य प्रत्यक्ष देवता हैं। बिना सूर्य के जीवन की कल्पना व्यर्थ है। मकर संक्रान्ति के बाद हमें सूर्य का प्रकाश भी अधिक समय तक मिलने लगता है, जो हमारे स्वास्थ्य के साथ—साथ फसलों के लिए अत्यंत आवश्यक है। इससे यह पर्व अधिक क्रियाशीलता और अधिक उत्पादन का भी प्रतीक है। मकर संक्रान्ति के बाद सभी मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं। जनेऊ धारण करने और दीक्षा लेने के लिए भी यह दिन बहुत ही पवित्र मानाा गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरू जी को उनके गुरू स्वामी अखण्डानन्द जी ने सारगाछी आश्रम में मकर संक्रान्ति के दिन ही दीक्षा दी थी। इस दिन गौ पूजा का विशेष महत्व है। कर्नाटक में इस दिन लोग बैल और गायों को सुसज्जित कर शोभायात्रा निकालते हैं। यह पर्व शिशिर के अंत तथा बसंत के आगमन का प्रतीक भी है। मकर संक्रान्ति एक ऐसा पर्व है जो सम्पूर्ण भारतवर्ष में मनाया जाता है। भले ही अलग-अलग प्रदेशों में इसके आयोजन की विधि व नाम में अंतर हो। पंजाब, हरियाणा, जम्मूकश्मीर में लोहड़ी, तमिलनाडु में पोंगल, आन्ध्र में उगादि, असम में नेगालीबि और गुजरात में इसे पतंगोत्सव के रूप में मनाया जाता है। जबकि उत्तर प्रदेश उत्तराखण्ड,बिहार, झारखण्ड, मध्य प्रदेश,छत्तीसगढ़,राजस्थान और दिल्ली में मकर संक्रान्ति या खिचड़ी के रूप में मनाते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा मनाये जाने वाले छ: प्रमुख उत्सवों में मकर संक्रान्ति भी शामिल है। आरएसएस मकर संक्रान्ति को बस्ती स्तर तक मनाता है। संघ के स्वयंसेवक प्रत्येक बस्ती में इस दिन सहभोज का कार्यक्रम करते हैं जिसमें समाज के सभी बंधु एक साथ बैठकर भोजन करते हैं।
आंध्र में इस दिन घरों को रंगोली से सजाया जाता है तथा घर की सभी देहलियों और आंगन में गोबर की छोटी-छोटी टिकियाएं रखी जाती हैं, जिनमें घास के तिनके लगाकर उनमें हल्दी और सिंदूर लगाया जाता है। इनके साथ तिल, मूंग, चावल, बैंगन तथा बेर आदि वस्तुएं भी रखी जाती हैं। इसके बाद महिलाएं एक दूसरे के मस्तक पर कुंकुम और चंदन लगाती हैं तथा आंचल में गुड़ और तिल रखती हैं। महाराष्ट्र में इस दिन सभी विवाहित महिलाएँ अपनी पहली संक्रान्ति पर कपास, तेल व नमक आदि चीजें अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं। तिल-गूल नामक हलवे के बाँटने की प्रथा भी है। इसके अलावा महिलाएँ आपस में तिल, गुड़, रोली और हल्दी भी बाँटती हैं।शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि अर्थात नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुनः प्राप्त होता है। मान्यता है कि इस अवधि में देह त्याग करने से व्रूक्ति जन्म मरण से मुक्त हो जाता है। इसी कारण महाभारत युद्ध में शर शैया पर पड़े भीष्म पितामह अपनी मृत्यु को उस समय तक टालते रहे, जब तक कि सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण नहीं हो गया। मकर संक्रांति होने पर ही उन्होंने देह त्यागी। यह दिन को बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है। इसी दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत करके युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी। उन्होंने सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। एक अन्य पुराण के अनुसार गंगा को धरती पर लाने वाले महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था। उनका तर्पण स्वीकार करने के बाद इस दिन गंगा समुद्र में जाकर मिल गई थी। जनवरी माह में आने वाली संक्रांति के समय ठंड बहुत ज्यादा होती है। तिल और गुड़ गर्म होते हैं जो ठंड में स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी होते हैं, जिसके कारण घरों में तिल और गुड के लड्डू बनते हैं। इस त्यौहार का सम्बन्ध प्रकृति, ऋतु परिवर्तन और कृषि से है। ये तीनों चीजें ही जीवन का आधार हैं। मकर संक्रान्ति के दिन सभी तीर्थों एवं नदियों एवं संगम के तट पर मेला लगता है जहां लोग नदियों में स्नान कर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं। इस दौरान प्रयाग में भी माघ मेला लगता है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में गोरक्षनाथ मंदिर में इस दिन गुरू गोरखनाथ के दर्शन के लिए अपार भक्तों की भीड़ उमड़ती है और बाबा को खिचड़ी चढ़ाती है। सबसे पहले बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी नेपाल नरेश की चढ़ती है। यह भारत और नेपाल के आध्यात्मिक संबंधों को भी प्रगाढ़ करता है। बंगाल में गंगा सागर के तट पर विशाल मेला लगता है। इसके अलावा अयोध्या, मथुरा और काशी में भी विशाल मेला लगता है। धार्मिक स्थलों एवं इस दिन पूरे देश में लोग नदियों, तीर्थों एवं मठ मन्दिरों में जाकर पूजा अर्चना करते हैं और सुखद भविष्य की मंगल कामना करते हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधवराव सदाशिव गोलवलकर ने कहा था कि “यह राष्ट्रीय पर्व हमारे राष्ट्रीय जीवन में परस्पर स्नेह को पुष्ट करने वाला है. समाज के सारे भेदभाव बुलाकर एकात्मता का साक्षात्कार कराने का उदार सत्कार देने वाला यह दिन है। ” इस समय देश की परिस्थिति पर नजर डालें तो देश पर नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव बढ़ा है। कहीं नागरिकता संशोधन को लेकर विरोध हो रहा है तो कहीं एनआरसी के नाम पर और देश के प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान जेएनयू में वामपंथी उत्पात मचा रहे हैं। मकर संक्रान्ति आने के बाद नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव कम होगा और देश नये जोश नयी उमंग और नये उत्साह के साथ सही दिशा की ओर अग्रसर होगा। मकर संक्रान्ति के बाद वर्षों से प्रतीक्षारत भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण का कार्य शुरू होते ही देश में एक आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होगा। इस ऊर्जा के प्रबल प्रताप के आगे आसुरी शक्तियों ठिक नहीं पायेंगी।
(लेखक प्रेरणा शोध संस्थान नोएडा से जुड़े हैं।)