सुतीक्ष्ण जी की विलक्षण गुरुदक्षिणा : स्वयं राम की प्राप्ति कर साक्षात राम को ले जाकर अपने गुरु को किया समर्पित

अध्यात्म : सुतीक्ष्ण जी अगस्त्य मुनि के शिष्य थे। शिक्षा प्राप्त कर लेने के पश्चात् सुतीक्ष्ण ने गुरुजी से दक्षिणा हेतु प्रार्थना की। गुरुजी ने दक्षिणा लेने से इन्कार किया किन्तु सुतीक्ष्णजी के बार-बार आग्रह करने पर कहा कि तुम भगवान् को ले आकर मुझे दो, यही दक्षिणा है। सुतीक्ष्ण ने गुरु के वचनों को शिरोधार्य किया। वे भगवान् के अनन्य भक्त थे। अनन्य उसे कहा जाता है जिसके लिए भगवान् को छोड़कर किसी दूसरे का सहारा नहीं होता और उसमें भगवान् को छोड़कर किसी दूसरे के प्रति प्यार नहीं होता। उनके जीवन में स्वप्न में भी भगवान् को छोड़कर किसी दूसरे का सहारा नहीं था और मनसा, वाचा, कर्मणा राम के सच्चे सेवक थे—
‘‘मन क्रम वचन राम-पद सेवक, सपनेहु आन भरोस न देवक।’’
उन्हें अपनी वास्तविक स्थिति का समुचित परिज्ञान था। शुभ समझे जाने वाले समस्त धर्माचरण, कर्म, योगादिक क्रियाओं का अभ्यास उन्हें न था और न भगवान् की भक्ति की कोई औपचारिक प्रविधि ही उन्हें ज्ञात थी। उनमें मन-वाणी-कर्म की सहज स्थिति में राम-रति थी, और सिद्धान्त यह है कि—
‘‘मन, क्रम वचन छाँड़ि चतुराई, भजत कृपा करिहहिं रघुराई।’’
इसकी स्थिति उनमें थी। सुतीक्ष्ण ने प्रभु के आगमन को ज्योंही सुना, आतुर होकर दर्शन हेतु दौड़ पड़े। एक ओर भक्ति ज्ञान-वैराग्य की शास्त्रविहित स्थितियों का अपने में अभाव और दूसरी ओर प्रभु का दर्शन-उनके मानस को झकझोरने लगे। साथ ही अपनी समस्त इन्द्रियजन्य, बुद्धिजन्य योग्यताओं की विफलता का बोध उन्हें होने लगा ओर सहज दैन्य भाव का जागरण हुआ। यह दैन्य मानव को समस्त ममता तथा अहम् से शून्य कर देने वाला होता है। इसी अवस्था में मानव शरणागत होकर सर्वभावेन प्रभु को समर्पित हो सकता है।

दैन्य किसी क्रिया का परिणाम नहीं, किसी मानसिक अथवा बौद्धिक परिधि का विषय नहीं अपितु यह तब जागृत होता है जब मानव में पराश्रय और परासक्ति नहीं होती और जिसकी गति (अर्थात् क्रिया, नि:श्रेयस् और अन्तिम स्थिति) प्रभु ही होते हैं। साधना में अहम् की स्वीकृति का लोप नहीं हो पाता किन्तु शरणागति में सहज दैन्य भाव होने से अहम् प्रभु को समर्पित हो जाता है यह कोई अभ्यास नहीं, सहज है। सुतीक्ष्णजी में दैन्य की जागृति होते ही प्रभु के स्वभाव की स्मृति आ गई—
‘‘एक बान करुनानिधान की, सो प्रिय जाके गति न आन की।’’
जिसकी भगवान् को छोड़कर कोई अन्य गति (सहारा और आकर्षण) नहीं होती वह प्रभु को प्रिय होता है तथा उस पर प्रभु की करुणा होती है—यह उनका स्वभाव है। इसकी स्मृति होने पर उनमें नवजीवन का संचार हुआ और सहज विश्वास का उदय भी। वे निर्भर प्रभु-प्रेम के अगाध सागर में तल्लीन हो उठे। शिवजी पार्वतीजी को उनकी अद्भुत दशा का वर्णन करने में अपने को असमर्थ पाने लगे। वास्तव में निर्भर प्रेम स्थिति का निर्वचन शब्दों के माध्यम से सम्भव नहीं— वह पूर्णत: अनिर्वचनीय स्थिति होती है। उस स्थिति में जो कुछ भी होता है वह अतीन्द्रिय अनुभूति है। अपना तथा अपनों की परिधि समाप्त हो गई होती है। दिशाएँ असीम प्रेम की नि:सीमता में विलीन हो जाती है। क्रिया के आरम्भ तथा अन्त में प्रेमत्व को प्रकट होने पर अनन्त जीवन प्रादुर्भूत हो जाता है। पथ, गन्तव्य, पथिक सब कुछ असीम हो जाते हैं। सुतीक्ष्णजी ने अविरल निर्भर प्रभु-प्रेम को प्राप्त कर लिया, जिसके द्रष्टा वृक्ष-ओट में छिपे भगवान् थे। वे प्रभु के आगमन को सुनकर आतुर दौड़ पड़े थे—जिस प्रभु के दर्शन के लिए भक्त दौड़ता है वह वहीं है फर्क मात्र छिपे रहने का है। तब रामजी उनके ‘अतिशय प्रेम’ को देखकर उनके हृदय में ही प्रगट हो गए। मुनि निश्चल हो गए, आतुरता और दौड़ शान्त हो गई और वे—
‘‘मुनि मग माँझ अचल होई जैसा,
पुलक सरीर पनस फल जैसा।’’


उनका शरीर प्रेम में कटहल जैसा रोमांचित हो गया साथ ही उनमें निश्चलता भी आई। प्रेम के अतिरेक में मानवीय चेतना, आनन्द तथा शक्ति का समन्वित विकास होता है और प्रेमस्वरूप प्रभु का जीवन में आभ्यांतरिक और वाह्य रूप में प्राकट्य होता है। भक्त की भावना के अनुरूप प्रभु का दर्शन हृदय में होने लगता है और भक्त तल्लीनता की अनुभूति करता है। सुतीक्ष्णजी के समक्ष राम जी आ गए। सुतीक्ष्णजी को राम का रूप जो अन्दर दिखाई दे रहा था वह उनके लिए सुखकारी था। रामजी ने उन्हें इस अवस्था से जगाने की चेष्टा की किन्तु वे ‘ग्यान जनित’ सुखानुभूति के कारण जगे नहीं। तब—
‘‘भूप रूप तब राम दुरावा, हृदय चतुर्भुज रूप दिखावा।’’


और भक्त व्याकुल होकर जग गया। इस प्रसंग में एक बात उल्लेखनीय यह है कि सुतीक्ष्ण जी चतुर्भुज रूप से भयभीत होकर नहीं अपितु ध्यान जनित भूपरूप के हट जाने के कारण व्याकुल हो गए। और आँख खुलने पर उन्होंने वहीं रूप समक्ष देखा जो अभ्यान्तर में देख रहे थे। अब भक्त में भगवान् को प्राकट्य पहले आभ्यन्तर में और तत्पश्चात् बाह्य में होने लगा। भक्त के जीवन में अन्दर और बाहर भगवान् के प्राकट्य से दीनता तथा दुःख मिट जाते हैं और वह शाश्वत तथा अखण्ड जीवन की अनुभूति करने लगता है जिसके संस्पर्श के लिए वह जन्म जन्मान्तर से पिपासु रहा है।
सुतीक्ष्णजी ने भगवान् की स्तुति की और अपनी नि:साधनता, अयोग्यता तथा दैन्य को स्पष्टतया निवेदित किया। उन्होंने राम से मुनि अगस्त्य जी के आश्रम में चलने का निवेदन किया जिसके परिणाम स्वरूप सुतीक्ष्ण जी ने स्वयं राम की प्राप्ति कर साक्षात राम को ले जाकर अपने गुरु को समर्पित किया।

(पूज्य ब्रह्मलीन श्री हृदय नारायण योगीजी के प्रवचनों से संकलित)