स्वतंत्र, स्वभाव, स्वराज और स्वाभिमान

- in साहित्य, स्तम्भ

‘स्वतंत्र’ का अर्थ गहरा है। स्व का अर्थ सुस्पष्ट है। स्व यानी मैं। मेरा अन्तःक्षेत्र। हमारी अपनी अनुभूति। प्रत्येक व्यक्ति का अंतःकरण ‘स्व’ है। प्रत्येक प्राणी आनंद का अभिलाषी है। हमारा ‘स्व’ आनंद प्राप्ति के लिए सक्रिय रहता है। इस स्व का सक्रिय भाग है मन। मन तमाम विकल्प खोजता रहता है। बुद्धि निर्णय करती है। लेकिन ‘स्व’ का ध्यान रखती है। बुद्धि क्षेत्र में देशकाल के अनुरूप प्राचीन या नई मान्यताएं होती हैं। इस तरह प्रत्येक स्व का अपना तंत्र होता है। यही स्वतंत्र कहा जाता है। स्वतंत्र की प्रकृति प्रवृत्ति का नाम स्वतंत्रता है। व्यक्ति की तरह प्रकृति या राष्ट्र भी अपना स्व व तंत्र होता है। स्व अपने तंत्र के अंतिम छोर से प्रकृति के स्व से जुड़ा रहता है। प्रकृति के तंत्र में अनेक रूप हैं। वे हमारे स्व-तंत्र में संवेदन जगाते हैं। भारतीय चिंतन में भूमि जन और संस्कृति से मिलकर बना ‘स्व’ राष्ट्र कहलाता है। इकाई के रूप में हम सबको अपने स्व का अभिमान होता है। यह स्वभावना का परिणाम है। इसलिए इसे ‘स्वाभाविक’ कहते हैं और स्व-अभिमान को स्वाभिमान। संस्कृति सामूहिक स्वाभिमान होती है। इसलिए आनंद देती है। हमारे सारे भाव स्व-भाव का विस्तार है। स्वार्थ भी स्व-अर्थ है। सो स्वाभाविक है।

‘स्व’ का विस्तार दिक्काल में विस्तृत है। स्वतंत्र, स्व-अर्थ, स्व-अभिमान और स्वभाव जैसे शब्द स्व केन्द्र के परिजन हैं। श्रीकृष्ण ने गीता में अर्जुन से ‘स्वभाव’ का रहस्य बताया था – स्वभावो अध्यात्म उच्यते। अर्जुन! स्वभाव अध्यात्म है। हम भारतीय अध्यात्मिक कहे जाते हैं। अध्यात्म अपने मूलरूप में ‘स्वभाव’ है। स्वभाव आंतरिक संगीत है। हम स्वभाव की चर्चा करते हैं। लोगों के स्वभाव को अच्छा या बुरा बताते हैं। वस्तुतः यह उनका वाह्य आचरण है। आचरण और स्वभाव एक नहीं हो सकते। स्वभाव का वृक्ष अंतःकरण की भूमि पर उगता है। स्वभाव हमारा प्रेरक है। यही उत्साह भरता है। कर्म प्रेरित करता है। यही जिज्ञासा धारण करता है। जिज्ञासु बनता है। यही जिज्ञासा के विषय तय करता है। यही सत्य खोजी बनता है। स्वभाव के घर में ही सत्य प्राप्ति के आंतरिक उत्सव संपन्न होते हैं। स्वभाव बाहर भी प्रकट होता है लेकिन तब यह आचार व व्यवहार कहा जाता है। चतुर मित्र स्वभाव को भीतर रखते हैं और सांसारिक कार्य व्यापार के लिए स्वभाव से भिन्न व्यवहार करते हैं। स्वाभाविक और अध्यात्मिक शब्द एक जैसे। स्वभाव अध्यात्म है ही। स्वभाव में जीने वालों के लिए उनके स्वभाव राष्ट्रभाव वाला समाज चाहिए। लेकिन ऐसा होता नहीं। इसलिए स्वभाव जैसा समाज बनाने का प्रयत्न करना होता है। स्वाभाविक समाज को स्वाभाविक राजव्यवस्था की भी जरूरत है। इसके लिए स्वतंत्र होना जरूरी है।

स्वतंत्र स्व-भाव की समाज व्यवस्था होती है और राजव्यवस्था भी। स्वभाव, स्वसंस्कृति, स्वधर्म, स्वप्रकृति वाली व्यवस्था स्व-राज कही जाती है। भारतीय दर्शन और अनुभूति के महाविद्वान तिलक ने “स्वराज को जन्मसिद्ध अधिकार” बताया था। जन्मसिद्ध शब्द का प्रयोग गहरा है। स्वभाव निस्संदेह जन्मसिद्ध है, जन्म से मिलता है। हम अपने स्वभाव में ही अपना चरम उद्देश्य पा सकते हैं। लेकिन समाज व्यवस्था और राजव्यवस्था वैसी ही नहीं होती। सो तमाम अंतर्विरोध भी पैदा होते हैं। इसीलिए समाज परिवर्तन की जरूरत पड़ती है। भारत में प्रेय और श्रेय नाम के दो भाव सर्वविदित हैं। यह भाव सबसे पहले उपनिषदों में आए हैं। प्रेय वह है जो प्रिय है। श्रेय मानवता के हित से जुड़े कत्र्तव्यबोध है। श्रेय प्राप्ति के लिए स्वराज जरूरी है। तिलक ने इसीलिए स्वराज को जन्मसिद्ध अधिकार बताया था और गांधी जी सत्याग्रह का हथियार लेकर स्वतंत्रता संग्राम में कूदे थे। तब पूरा भारत स्वराज प्राप्ति के लिए बेचैन था। जीवन की प्रत्येक साधना के लिए स्वतंत्रता जरूरी है। वातावरण की पूर्ण स्थिति के लिए स्वराष्ट्र सर्वोपरिता तथा स्वराज और भी जरूरी है। यहां सारे कर्म स्वांतः सुखाय हैं। सीधे सरल कहें तो स्वार्थ पूर्ति के लिए। यह स्वार्थ अपने मूल में ‘स्व-अर्थ’ है और भारत का स्व विशाल राष्ट्रहित से कम स्वार्थी नहीं है।

स्वाधीनता संग्राम कई मोर्चो पर लड़ा गया था। अहिंसक आन्दोलन का नेतृत्व गांधी जी कर रहे हैं। राष्ट्रभाव के जागरण और पुनर्जागरण का काम पत्रकार साहित्यकार कर रहे थे। क्रान्तिकारी उपायों से स्वाधीनता पाने के लिए उतावले नौजवानों का बलिदान इतिहास का श्रद्धेय अध्याय है। पूरा देश स्वाधीनता संग्राम में था। स्वराज पाने की अभिलाषा राष्ट्रीय उमंग थी। अंग्रेजी राज ने देश को लूटा था। भारत की धनसंपदा से इंग्लैण्ड चमक रहा था। ‘स्वराज’ का कोई विकल्प नहीं था, हो भी नहीं सकता। स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त स्वराज प्राप्ति की मुहूत है। स्वराज को आदर्श बनाने का कत्र्तव्य सबका है। राजव्यवस्था से जुड़ा होने के कारण यह कत्र्तव्य राजनैतिक दलों का भी है। दल अपनी भिन्न विचारधारा के अनुसार लोकमत चलाकर स्वतंत्र जनतंत्र को महिमा गरिमा दे सकते हैं। स्वराज स्वच्छंदता नहीं है। यह अपनी ही व्यवस्था का अनुशासन है। स्वतंत्रता का उपभोग संयम में ही आनंद देता है। संसद व विधानमण्डलों में संविधान प्रदत्त वाक् स्वतंत्रता है। सदन में कही गई किसी भी बात पर न्यायालयों में मुकदमा नहीं हो सकता। ऐसे विशेषाधिकार संपन्न सदनों में भी शोर व हल्ला गुल्ला है। स्वतंत्रता का फल पूरी मिठास नहीं देता। संयम और अनुशासनहीनता के कारण स्वराज भी स्वअराज हो जाता है। भारत में यही चुनौती सामने है। क्या 15 अगस्त आत्मचिंतन की महत्वपूर्ण मुहूर्त हो सकती है?

संसद विधानमण्डल स्वतंत्र संप्रभु जनतंत्र के पवित्र स्थल हैं। यहां प्रीतिपूर्ण तर्क तथ्य द्वारा ही लोकमत का संस्कार किया जाना चाहिए। वैचारिक लोकमत का निर्माण श्रमसाध्य है लेकिन इसका कोई विकल्प नहीं। राजनैतिक दलों को विचार आधारित लोकमत बनाना चाहिए। वैचारिक लोकमत का निर्माण शेर गुल में नहीं होता। प्रत्यक्ष जनसम्पर्क और सतत् जनसंवाद ही रास्ता है। संसद और विधानमण्डलों में सभी दलों को अपने वैचारिक विकल्प रखने चाहिए। जनता ही सभी दलों को उचित अवसर देती है। वह एक भाग को बहुमत देती है। बहुमत पक्ष जनादेश की शक्ति से सरकार चलाता है। जनादेश की शक्ति से ही अल्पमत सरकारी नीतियों का विकल्प देते हैं। अल्पमत विपक्ष को इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए। बजट विधि निर्माण या अन्य विषयों पर विकल्प देना उसका संवैधानिक कत्र्तव्य है। लेकिन ऐसा बहुधा नहीं होता। हंगामा युक्ति युक्त भाषण या विचार का विकल्प नहीं है। विचार अनेक स्वतंत्र जनतंत्र एक। सब मिलकर एक जन। एक संस्कृति। एक राष्ट्र। हम भारत के लोगों में स्वतंत्र, स्वभाव और समाज का स्वाभिमान होना चाहिए।

 

 

 

 

 

हृदयनारायण दीक्षित
(15 अगस्त पर विशेष)